Dhokhaghadi karne wale vikreta - 1 in Hindi Horror Stories by Abhishek Chaturvedi books and stories PDF | धोखाधड़ी करने वाले विक्रेता - भाग 1

Featured Books
Categories
Share

धोखाधड़ी करने वाले विक्रेता - भाग 1

पेशकश: धोखाधड़ी करने वाले विक्रेता ( कहानी )
लेखक:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'

वाराणसी की गलियों में शाम का धुंधलका गहरा रहा था। गंगा की लहरों पर दीयों की रोशनी कॉंप रही थी, लेकिन शहर के बाहरी इलाके में स्थित 'अनंत विंटेज पैलेस' के अंदर एक अलग ही खेल चल रहा था। यह दुकान पुरानी और बेशकीमती वस्तुओं के लिए मशहूर थी, जिसका मालिक अभिषेक नाम का व्यक्ति था।

अभिषेक की शख्स़ियत में एक अजीब-सा आकर्षण था। उसकी गहरी ऑंखें और सलीके से तराशी गई दाढ़ी किसी को भी सम्मोहित कर सकती थीं। लेकिन उस आकर्षण के पीछे छिपा था एक शातिर दिमाग़, जो अमीर खरीदारों को 'इतिहास' बेचने के नाम पर 'धोखा' बेचता था।

एक रहस्यमयी मुलाकात:-
उस शाम दुकान की घंटी बजी और एक युवती अंदर दाखिल हुई। उसका नाम था मायरा। सिल्क की साड़ी और आंखों में एक अजीब सी चमक लिए मायरा ने सीधे अभिषेक की ऑंखों में देखा।
"सुना है आप वो चीजें भी ढूंढ निकालते हैं, जो दुनिया की नजरों से ओझल हो चुकी हैं," मायरा की आवाज़ में एक क़शिश थी।
अभिषेक ने एक मखमली मुस्कान के साथ उसका स्वागत किया। "बाजार में मेरा नाम भरोसे का पर्याय है, मिस मायरा। बताइए, आपको क्या चाहिए?"

मायरा ने एक पुरानी तस्वीर मेज़ पर रखी। "मुझे 'नूर-ए-मोहब्बत' नाम का वह प्राचीन हार चाहिए, जो कहा जाता है कि मुग़ल काल में एक शहजादी ने अपनी जान देकर बचाया था।"

अभिषेक के चेहरे पर एक पल के लिए शिकन आई, फ़िर वह सामान्य हो गया। उसे पता था कि वह हार सिर्फ एक मिथक था। लेकिन एक अमीर ग्राहक को खाली हाथ जाने देना उसके उसूलों के ख़िलाफ़ था।

रोमांस का जाल:-
अगले कुछ हफ़्तों तक अभिषेक और मायरा के बीच मुलाकातों का सिलसिला बढ़ गया। अभिषेक उसे हार ढूंढने के बहाने शहर के सबसे महॅंगे रेस्तरां और गंगा के शांत घाटों पर ले जाने लगा।
एक रात, नाव पर बैठते हुए अभिषेक ने मायरा का हाथ थाम लिया। "तुम्हें पता है मायरा, इस हार को ढूंढते-ढूंढते मैं खुद को खो बैठा हूं। तुम्हारी सादगी उस किसी भी गहने से ज्यादा कीमती है।"
मायरा की आंखों में ऑंसू भर आए। "अभिषेक, मैं बस उस हार को पाकर अपनी मॉं की आख़िरी ख़्वाहिश पूरी करना चाहती हूॅं। क्या तुम मेरा साथ दोगे?"

अभिषेक का पत्थर दिल पिघलने लगा था, लेकिन उसका लालच उससे कहीं ज्यादा बड़ा था। उसने तय किया कि वह मायरा को एक नकली हार बेचेगा, उसकी कीमत वसूलेगा और फिर उसे हमेशा के लिए अपना बना लेगा। उसे लगा कि वह प्यार और पैसे, दोनों जीत लेगा।

सस्पेंस की गहरी परतें:-
अभिषेक ने अपनी वर्कशॉप में रात-दिन एक कर दिया। उसने कांच और सस्ते धातुओं से एक ऐसा हार तैयार किया जो असली हीरे-पन्ने से भी ज्यादा चमक रहा था। उसने प्राचीन दिखने के लिए उस पर कुछ खास रसायनों का इस्तेमाल किया।
सौदे वाली रात, विंटेज पैलेस में मोमबत्तियॉं जल रही थीं। मायरा एक काला नक़ाब पहनकर आई थी।

"यह रहा तुम्हारा 'नूर-ए-मोहब्बत'," अभिषेक ने बॉक्स खोला। हार की चमक ने पूरे कमरे को रोशन कर दिया।
मायरा ने कॉंपते हाथों से हार उठाया। "अद्भुत! इसकी क़ीमत क्या होगी?"
"दो करोड़," अभिषेक ने बिना पलक झपकाए कहा। मायरा ने तुरंत एक बैग मेज पर रख दिया, जो नोटों की गड्डियों से भरा था।
तभी, दुकान का भारी दरवाजा अपने आप बंद हो गया। हवा में एक अजीब सी सड़न की बू फैल गई।

थ्रिलर और डर का साया:-
"अभिषेक, तुमने कहा था कि यह हार प्यार की निशानी है," मायरा की आवाज अचानक बदल गई। वह अब कोमल नहीं, बल्कि बर्फ की तरह ठंडी थी। "लेकिन एक धोखाधड़ी करने वाला विक्रेता कभी प्यार नहीं कर सकता।"
अभिषेक के माथे पर पसीना आ गया। "तुम क्या कह रही हो मायरा?"
मायरा ने अपना नक़ाब हटाया। मोमबत्ती की रोशनी में उसका चेहरा किसी लाश की तरह सफ़ेद और बेजान-सा लग रहा था। उसकी ऑंखों की पुतलियॉं पूरी तरह काली हो चुकी थीं। "यह हार असली नहीं है, अभिषेक। और यह पैसा भी असली नहीं है।"

अभिषेक ने बैग खोला। नोटों की जगह वहॉं पुरानी कब्रों की मिट्टी और सूखे पत्ते भरे थे।

"तुम... तुम कौन हो?" अभिषेक चिल्लाया और पीछे हटने लगा।
"मैं उस शहजादी की रूह हूॅं, जिसके हार का सौदा तुमने आज रात नकली पत्थरों से किया," मायरा की परछाई दीवार पर किसी दानव की तरह बड़ी होने लगी। "तुमने सालों तक लोगों की भावनाओं और इतिहास के साथ खिलवाड़ किया। आज तुम्हारी धोखाधड़ी की आखिरी रात है।"

रोंगटे खड़े कर देने वाला अंत:-
अचानक दुकान की सारी पुरानी चीजें हिलने लगा। दीवारों पर टंगी तलवारें म्यान से बाहर निकल आईं। अभिषेक भागने की कोशिश करने लगा, लेकिन उसके पैर जमीन से चिपक गए थे।
"नहीं! मुझे माफ कर दो! मैं सब ठीक कर दूंगा!" अभिषेक गिड़गिड़ाया।
मायरा (या जो भी वह रूह थी) ने वह नकली हार अभिषेक के गले में डाल दिया। जैसे ही हार ने उसकी त्वचा को छुआ, वह असली आग की तरह दहकने लगा। अभिषेक की चीखें बंद दरवाजों के पीछे ही दबकर रह गईं।
अगली सुबह, जब पुलिस ने 'अनंत विंटेज पैलेस' का दरवाजा तोड़ा, तो वहां कोई मायरा नहीं थी, न ही कोई पैसा। दुकान के बीचों-बीच अभिषेक की लाश पड़ी थी। उसके गले में कांच का एक सस्ता हार बुरी तरह गड़ा हुआ था, और उसके चेहरे पर वह खौफ जम चुका था जो सिर्फ मौत के वक्त आता है।
दुकान के रजिस्टर पर खून से एक आख़िरी लाइन लिखी थी: "विक्रेता सावधान रहे, क्योंकि रूहें कभी सौदा नहीं करतीं।"
लेखक: अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'
(आज की कहानी जानिए अगले भाग में.....)