नियति का मोड़
शहनाइयाँ बज रही थीं।
मंडप में अग्नि जल रही थी।
फूलों की खुशबू और हवन की धूप के बीच, पंडित जी ने अगला मंत्र पढ़ा —
“अब दूल्हा-दुल्हन फेरे के लिए खड़े हों…”
पंकज और कविता फेरो के लिए उठे।
पर जैसे ही उन्होंने पहला कदम बढ़ाया, कविता की सहेली नेहा उसके पास आई। वह धीरे से झुकी और उसके कान में कुछ फुसफुसाई।
कविता की मुस्कान जैसे जम गई।
उसके चेहरे पर भय और हताशा की परछाइयाँ दौड़ गईं। उसकी आँखों में झलकते आँसू किसी तूफान का इशारा दे रहे थे।
कविता ने एक क्षण पंकज की ओर देखा — उसकी आंखों में भरोसा था, प्यार था, और इंतज़ार भी।
लेकिन...
कविता ने लहंगे की गिरह थामी और एक झटके से मंडप से बाहर की ओर भाग गई।
चारों ओर अफरा-तफरी मच गई।
पंकज वहीं खड़ा रह गया।
उसकी आँखें नम हो गईं, हाथ अधूरे से लटक गए —
वो कुछ समझ नहीं पाया... और शायद कभी समझ नहीं पाएगा।
कविता के माता-पिता स्तब्ध थे।
भीड़ में फुसफुसाहट शुरू हो चुकी थी।
कविता की माँ रोती हुई सभी से कह रही थी —
"हमें माफ़ कर दीजिए... हम खुद नहीं जानते उसने ऐसा क्यों किया... ये सब अचानक हुआ..."
पिता हाथ जोड़कर सबसे क्षमा माँगते रहे।
शहनाइयाँ अब चुप थीं।
फूलों की खुशबू अब बोझ लगने लगी थी।
और पंडित, वे मंत्र अधूरे छोड़, चुपचाप अग्नि को देखने लगा।
वो रात न सिर्फ दो परिवारों के लिए, बल्कि पंकज और कविता दोनों के जीवन के लिए…
एक निर्णायक मोड़ थी — "नियति का मोड़"।
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शादी के मंडप से भागी कविता
किसी और की दुल्हन बनने जा रही थी
पर दिल और आत्मा...
आज भी विशाल के साथ बंधे थे।
पाँच साल पहले का वह एक्सीडेंट
जब विशाल कोमा में चला गया था —
डॉक्टर ने कहा था, “उम्मीद कम है...”
पर कविता ने उम्मीद नहीं छोड़ी थी।
हर रोज वो उस हॉस्पिटल जाती थी,
जहाँ विशाल एक मशीन के सहारे साँसे ले रहा था।
मंडप से भागते ही,
वो उसी हॉस्पिटल पहुँची —
लहंगे में, सजे हुए हाथों के मेहंदी के बीच
उसके चेहरे पर बस एक ही ख्याल था —
“वो जगा है... मेरा विशाल जाग गया है।”
वो दौड़ी… सांसें थमी…
और जब कमरे में दाखिल हुई —
विशाल ने उसकी ओर देखा...
धीरे-धीरे उसकी आंखों में पहचान लौटी।
"क...कविता..."
उसकी बेतरतीब जुबान से बस इतना ही निकला।
कविता ने हाथ पकड़ लिया…
आँखों से बहते आँसू रुक नहीं रहे थे।
"मैं आ गयी विशाल... मैं यहीं हूँ..."
पर तभी…
मॉनिटर बीप करने लगा।
विशाल की साँसे फिर तेज़ और फिर धीमी होने लगीं।
डॉक्टर दौड़ पड़े —
कविता को हटाया गया।
कुछ ही मिनटों में,
डॉक्टर ने कहा —
"वो फिर से कोमा में चला गया है..."
कविता वहीं फर्श पर बैठ गई —
उसकी दुनिया फिर से बिखर चुकी थी।
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अगले दिन
पंकज की शादी टूट चुकी थी।
समाज और रिश्तेदारों ने ताने मारे।
कविता के माता-पिता शर्म और गुस्से में पिघल गए।
"जिसने हमारी इज्ज़त मिट्टी में मिला दी...
वो हमारी बेटी नहीं हो सकती..."
कविता को घर से निकाल दिया गया।
अब उसके पास ना घर था, ना नाम,
ना दुल्हन का श्रृंगार
और ना ही विशाल की आवाज़।
सिर्फ एक चीज़ थी —
इंतजार... उस एक दिन का…
जब विशाल फिर से उठेगा,
और कहेगा — 'कविता… मैं तुम्हें पहचानता हूँ।'
शादी टूटने के दो दिन बाद,
पंकज अचानक अस्पताल पहुँचा।
हाथ में न फूल थे, न शिकायत...
बस आंखों में सच्चाई और मन में एक बात —
"मोहब्बत अगर सच हो, तो वो स्वार्थ नहीं होती..."
वो कविता के सामने खड़ा हुआ —
जिसका चेहरा थक चुका था, जिसकी आंखें अब बस शून्य देखती थीं।
"कैसे हो?"
उसने बस इतना ही पूछा।
कविता चौंकी।
पर उसकी आँखों में कोई गुस्सा नहीं था —
बस थकावट... और शायद सुकून कि कोई तो समझा।
"तुम यहाँ क्यों आए?"
"क्योंकि जो रिश्ता बना ही विश्वास पर हो,
उसका टूटना सिर्फ मंडप में नहीं होता... दिल में होता है।
और मेरा दिल अब भी तुम्हारी जगह है।"
पंकज की आवाज़ में वो सच्चाई थी जो शब्दों से नहीं, आंखों से निकली।
वो वहीं बैठ गया।
कविता के पास।
विशाल के ICU रूम के बाहर।
फिर दिन, फिर हफ्ते बीतने लगे।
कविता ने कुछ नहीं कहा… पर धीरे-धीरे…
छोटी-छोटी बातें शुरू हुईं।
" तुमने शादी के लिए हां क्यों किया था?" पंकज ने पूछा
" पापा ने विशाल की कसम दी थी... इसलिए " कविता ने ऑंखे झुका कर कहा
" एक बात पुछु?सच सच जवाब देना" पंकज ने पूछा
" जी...."
" अगर शादी हों जाती ...फिर विशाल को होश आता तो फिर भी तुम भाग आती" आवाज मे इतना दर्द था पंकज की पर जो भी उतर हों सुनना चाहता था
" नही...कभी भी नही...नियति का फैसला समझ लेती"
कविता भारी आवाज मे बोली
पंकज के मन मे कविता के लिए एक खास जगह बन गयी
वो कविता का साथ देना चाहता था ...
कभी....
कॉफ़ी का कप लेकर पंकज आ जाता,
कविता कहती —
"आज बहुत कड़वी है"
पंकज मुस्कुराता —
"तुम्हारी आंखों जैसी..."
कभी किताबों की बातें,
कभी पुरानी फिल्मों की चर्चाएँ...
पर हर बातचीत के पीछे एक साया था —
विशाल।
कविता अब भी हर रोज ICU में झांकती,
उसी तरह जैसे पाँच साल से करती आई थी।
फिर एक सुबह…
ICU का अलार्म बजा।
डॉक्टर भागे, नर्सें दौड़ीं।
कविता और पंकज बाहर खड़े थे —
कविता की उंगलियाँ कांप रही थीं।
फिर डॉक्टर बाहर आए।
"I’m sorry... हमने पूरी कोशिश की..."
विशाल... चला गया था।
वो शरीर जो पाँच साल से मौन था,
अब स्थायी मौन में चला गया था।
कविता फर्श पर बैठ गई,
चेहरा हाथों में छुपा लिया।
पंकज ने आगे बढ़कर उसका सिर अपने कंधे पर टिका दिया।
वो रोई… फूट-फूट कर।
और पंकज बस चुपचाप बैठा रहा —
ना कोई सवाल, ना कोई जवाब।
कभी-कभी...
मोहब्बत जीतने के लिए किसी को पाना जरूरी नहीं होता।
कभी-कभी... बस साथ देना ही सब कुछ होता हैं
विशाल की मौत के बाद
कविता बिल्कुल शांत हो गई थी।
अब न आँसू थे, न शिकायत...
बस एक खालीपन था जो शब्दों में उतरता नहीं था।
ना माँ ने पुकारा ना पापा ने
नर्स तो वो थी ही अब हॉस्पितल् के हॉस्टल मे रहने लगी
ज्यादातर समय हॉस्पिटल मे बीतता..
पंकज हर दिन आता,
उसे खाना खिलाता, कभी पार्क तक ले जाता,
पर कुछ भी कहे बिना बस उसके साथ चलता।
कुछ हफ्तों बाद —
एक शाम अस्पताल की कैंटीन में,
चाय के दो कप सामने रखे थे।
कविता खिड़की से बाहर देख रही थी।
पंकज ने गहरी साँस ली और कहा:
"कविता, एक बात कहनी है..."
कविता ने बिना देखे कहा,
"मुझे नहीं सुनना, प्लीज़..."
"मैं जानता हूँ, तुम डरती हो...
अपने आपसे, समाज से, और सबसे ज्यादा — मुझसे।
पर मैं सिर्फ इतना पूछ रहा हूँ —
क्या मुझे तुम्हारी ज़िंदगी का हिस्सा बनने का मौका मिलेगा?"
कविता का दिल धड़क उठा।
उसने गर्दन घुमा कर उसकी आँखों में देखा और बोली:
"मैं वो लड़की हूँ जो शादी के मंडप से भागी,
जिसके कारण तुम्हारे परिवार की इज्ज़त चली गई,
जिसे सबने ताने मारे...
और तुम मुझसे अब भी शादी की बात कर रहे हो?"
पंकज मुस्कराया।
उसकी आँखें चमक रही थीं — प्यार से, सच्चाई से।
"कविता...
जिसके लिए तुमने पाँच साल इंतज़ार किया,
जिसके लिए सब कुछ त्याग दिया...
अगर मरते हुए इंसान के लिए तुम्हारे दिल में इतनी मोहब्बत थी —
तो क्या ज़िंदा इंसान के लिए थोड़ी सी जगह नहीं निकाल सकती?"
कविता की आँखें नम हो गईं।
उसने कुछ नहीं कहा —
बस धीरे से सिर झुका लिया।
पंकज ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया।
उस शाम न किसी माला का फेर हुआ,
न कोई मंत्र पढ़े गए,
न कोई गवाह था,
बस खामोशी थी और दो दिलों की सच्ची स्वीकृति।
नियति ने फिर एक बार मोड़ लिया था —
और वो मोड़ सुखद आया था।
कल्पिता 🌻
दिल से दुनिया तक ❤️