501
26.2.26
Ramal musamman saalim maKHbuun mahzuuf
faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilun
2122 1122 1122 112
कौन अब रोज, खयालो में सताता है मुझे
फिर बियाबान कहीं ,छोड़ के आता है मुझे
#
रंग होली का लिए ,पास कहीं वो छिपता
उसकी हरकत का ये कैसा कहूं, नाता है मुझे
#
कई रातें जिसे करवट में गुजारी मैंने
ख्वाब दिन में दिखा बस वो ही जगाता है मुझे
#
जब हलफनामे वही नाम लिखा देखूं मै
एक सदमा कहीं अफसोस चिढ़ाता है मुझे
#
अब शराफ़त का ढिंढोरा नहीं पीटा जाता
वो शिकायत के ही लहज़े में बुलाता है मुझे
#
मेरे ख़ुद्दार से मन का ये नमूना देखो
मेरा अरमान ही नाज़ुक सा बनाता है मुझे
#
उसको तकलीफ में फिर देख मिरा मन अक्सर
ख़ास मंजर की कई याद दिलाता है मुझे
#
कोई तो पीट रहा ढोल समझ के होली
कोई मंजीरा समझ खूब बजाता है मुझे
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
502
27.2.26
रमल मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ा
एलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212
तू चले गर राह मेरी कायदा हो जाएगा
सूखे रिश्तों का शज़र सींचो हरा हो जाएगा
#
जो तबीयत में उदासी छाई रहती है मिरे
तुम दिखो बीमार को बस फायदा हो जाएगा
#
जिंदगी दुश्वारियों का महज़ दूजा नाम है
शोहरतों की जिद हुई तो तहलका हो जाएगा
#
भूत को तेरा दफ़न कर दे,अगर निकला कहीं
तो जमाने में हँगामा सा खड़ा हो जाएगा
#
मत समझ अपने को ऊँचे ओहदों वाला कभी
कर तजुर्बा और हासिल कद बड़ा हो जाएगा
#
भागती या दौड़ती दुनिया को जीता कौन है
कुछ इरादे जिंदगी भर फ़लसफ़ा हो जायगा
#
कौन जाने पास की उसकी जमा- पूँजी कहाँ
छेड़ दो बातें बरहना बावला हो जायगा
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
503
Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a
faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun
2122,1122,1122,22
कब कहीं लौट के बीती ये जवानी आई
फिर वही दिन कभी आए कि कहानी आई
#
ये शिकायत मुझे तुमसे रहा करती हरदम
वो जो दस्तूर निभाना था , निभानी आई
#
खूब मजबूत बुने थे कभी रिश्ते- धागे
चोट कितनी लगी गहरी कि निशानी आई
#
एक पथ्थर जिसे पूजा था कभी हद ज्यादा
भूल बचपन की गई उम्र सयानी आई
#
तल्ख बातों से कहाँ जी को सुकून आता गर
इश्तिहारो छपी मिलती या जुबानी आई
#
तुमने देखा है बबूलों को यहाँ बोकर भी
सिर्फ काँटे ही मिले फसलें पुरानी आई
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
504
Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a
faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun
21221122112222
रोजगारी भी दिलाओ तो कहूँ होली है
फिर गरीबी को हटाओ तो कहूँ होली है
तुम सियासत के हो दमदार वफा वाले जब
इस सियासत को हिलाओ तो कहूँ होली है
घूंट पीकर न रहो रोज जहर के प्यालों
जाम से जाम लगाओ तो कहूँ होली है
वक्त के साथ कभी वक्त बिताने वालो
आइना वक्त दिखाओ तो कहूँ होली है
ये शिकायत नहीं तुम दर्ज कराओ थाने
रंग गालों को मलाओ तो कहूँ होली है
भाँग इतनी चढ़ी हमको कि उतर कब पाई
अपने आगोश सुलाओ तो कहूँ होली है
क्या तमाशा लगा रख्खा है महीनो पहले
अब खुलासा भी कराओ तो कहूँ होली है
बाटते जाना हमें भी वो बताशे ताजे
मुफ्त का माल दिलाओ तो कहूँ होली है
बारहा बच के निकल जाती कभी होली में
इस दफा पैर जमाओ तो कहूँ होली है
तुमने काटे यहाँ पेड़ों को जो छाया देते
पेड़ फिर एक लगाओ तो कहूं होली है
अब मरीजों को नहीं सांस भी लेने फुरसत
कुछ हिदायत भी गिनाओ तो कहूं होली है
दौड़ने वाले कहाँ घोड़े बचे मिलते हैं
और बारात नचाओ तो कहूं होली है
वक़्त के साथ तुम्हारा किया धुल जाएगा
रोक फिर जंग सुझाओ तो कहूं होली है
रोज जुम्मन को सताया है यहाँ जी भर के
यो ही अलगू को सताओ तो कहूँ होली है
सुशील यादव दुर्ग
506
मोर दास कबीरा….होली छीटे
मेरे रहते कर लो तुम ,खूबे सैर सपाटा
फिर मेरे बाद देना, जी एस टी आन आटा
बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....
तेरी सूरत को गली -गली में पहचाने है कौन
भगवा चोला पहन के भाया धूम मचा ले मौन
बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....
कल को तुम ख़ाक छानना और बजाना बीन
मंहगा ढोलक और मंजीरा, पीट कनस्टर टीन
बोलो सारा रा रा कबीरा सारा रा रा
कुछ तो पढ़ इतिहास जरा , कुछ तो हो तल्लीन
चाय के संग तू सीख बेचना , मीठा औ नमकीन
बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....
कब तक देकर राज करेगा ,नेहरु जी को गाली
एक हाथ से बजा बजा के थक जाएगा ताली
बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....
507
छतीसगढ़ी में ...
ऐ गांव के भालू रोही , आने गांव के बघुवा
छ्त्तीसगढ़ के मज़दूर ले जावव कोरी कोरी बँधवा
बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....
कोन राजा कोन परजा , काखर राज सिराही
ऐ दारी के दंगल म मुरख कोनो अगुवाही
बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....
अब्बड़ तै मता डरे हस, गोठ- गोठ के गारा
कोनो दिन के मंम- हैय्या , अब बस्सावत पारा
बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....
अतेक दिन ले सित्परहा बइठे, लुका -लुका के भाँटो
आते देख चुनाव ला बइहा, कंबल -सारी कहिथे बांटो
बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....
हमर किसान धरे हवे जम्मो बीजहा फोकला
अउ गुजराती मन खावत मिलथे खम्मन ढोकला
बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....
हमर किसान के मेहनत पाछू, हवे बोरे- बासी
तुहर आइ एस कोच्कैय्या , बुलडोजर सन्यासी
बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....
जेती जाबे ओती चीख़त हे मनखे मारे पीरा
तब्भो ले कोदा -भैरा बन गए मोर दास कबीरा
बोलो सारा रा रा कबीरा सारा रा रा
508
2.3.26
मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
221 2121 1221 212
तिनकों से डूबते को सहारा नहीं रहा
कश्ती बही तमाम किनारा नहीं रहा
साथी नहीं बचे कोई बचपन के इन दिनों
रुख़सत पे अख़्तियार हमारा नहीं रहा
हम चाँट लें किताब सहूलत रही कभी
वो वास्ता कहीं तो दुबारा नहीं रहा
नक्शा लकीर सिर्फ़ खिंचा फायदा नहीं
वो आसमाँ बुलंद सितारा नहीं रहा
सर्दी की रात क्यों न गुजरती है चुप के से
कम्बल बिना कही से गुज़ारा नहीं रहा
कैदी से मुन्शिफ़ो की यहाँ भीड़ हो गई
अब फैसला मिया वो - करारा नही रहा
बोए थे तेरी राह में हम आरजू के दिन
जब काटने को आए हमारा नहीं रहा
आखें मिरी तलाशती महफूज दिल कहाँ
मालूम तब हुआ जो शिकारा नहीं रहा
बस वक्त ने बुझा दिया भीतर का जोश भी
कुछ आग थी मगर वो शरारा नहीं रहा
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
509
5.3.26
मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
221 2121 1221 212
चिलमन की आड़ में मुझे वो ताकती तो है
कुछ आहटें ये राज कभी खोलती तो हैं
जो वक़्त सीढ़ियाँ चढ़ा, थक कर उतर गया
शोहरत में इन दिनों , हुई शायद कमी तो है
बातों को पेट में ही छुपाओ न चाह कर
ये उम्र भर हिदायतें देती चुभी तो है
मौसम यहाँ वहाँ से अभी लौट कर गया
बीमार सी हवावों मगर ताज़गी तो है
खिड़की खुली हुई दिखी मुझको किसी भी दिन
तू इंतिजार में मिरे बैठी रही तो है
सदमा लगा है मुझको उदासी को देख के
फसना भँवर में अब क्या ,किनारा कहीं तो है
आओ करीब तुम मिरे जादूगरी करो
जलता हुआ ये दिल है बुझी ज़िन्दगी तो है
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
510
रमल मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212
आओ नफ़रत को मिटा दें हम जमाने के लिए
प्यार गंगा में बहा दें अम्न लाने के लिए
खास तलवारें खिची है आदमी दर आदमी
सब्र से सर को झुका दें फिर उठाने के लिए
आओ दो- दो हाथ हम भी सामने कर ले अभी
शौक फ़रमाते हो ताक़त आजमाने के लिए
कोई भी तहजीब में हिंसा नहीं मुद्दा अहम
बस सदारत की लड़ाई है सताने के लिए
सर -फिरा कोई तुम्हे रोजाना उकसा जाता है
उसकी नीयत भी गडी है तो खजाने के लिए
एक वो अभियान चल जाए धरा पर फिर कहीं
बम मिसाइल ना दहाड़ें कुछ मिटाने के लिए
है खरा सोना वही उसको तपाने में लगो
व्यर्थ पीतल के पड़े ज्यादा गलाने के लिए
जुर्म की सीमा तबाही की हो भरपाई सभी
सब गुनहगारों चुने फाँसी चढाने के लिए
511
Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf maskn
mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun
1212 1122 1212 22
कहीं पे दिल हुआ उलझा जरूर निकलेगा
नुमाइशों के नशे में वो चूर निकलेगा
भरोसे से यही हम जी रहे हैं आगे अब
कि बारुदों से मिरा घर भी दूर निकलेगा
ये आइना यहाँ इतराता भी बहुत ज्यादा
हाँ देखना कहीं इसका गुरूर निकलेगा
ये लालची है बहुत लोमड़ी सा मन इसको
खटास से भरा काला अँगूर निकलेगा
गरीब मांग रहा हक़ में फैसला लिख्खो
जुनून की ये समझ बस फितूर निकलेगा
सलवटें सी पड़ी है आज उनके दामन में
बिना नशा किए उनका कुसूर निकलेगा
512
हज़ज मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन
221 1221 1221 122
मेरे किए की मुझको सज़ा क्यों नहीं देते
इक आग सुलगती है बुझा क्यूँ नहीं देते
अब कौन किसे याद कभी आता है हरदम
हूँ भूलने की चीज भुला क्यूँ नहीं देते
इस शहर के हम भी अभी भटके हैं मुसाफिर
रहबर हैं अनेकों ये पता क्यूँ नहीं देते
जज्बात पे काबू हमें रखना नहीं आया
फिसलन मिरी जी भर के बढ़ा क्यूँ नहीं देते
पत्थर जिसे पूजा ,नहीं देता कभी चाहा
मन्दिर से इसे मन के ,हटा क्यूँ नहीं देते
पीतल की तरह मुझको हमेशा कहीं माना
सोना हूँ अगरचे मै, तपा क्यूँ नहीं देते
दादागिरी चलती नहीं हरदम किसी की अब
बन्दूक चला इनको बिदा क्यूँ नहीं देते
बस्ती अभी हर रोज उजाड़ी हुई मिलती
ये जान लिवा जंग मिटा क्यूँ नहीं देते
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
513
221 1221 1221 122
बिगड़ी हुई कश्ती से ,उतर जाओगे तुम भी
हालात ये कहता है , किधर जाओगे तुम भी
फसलें हुई बर्बाद ,मुकर जाओगे तुम भी
मौसम की ख़राबी से ही, डर जाओगे तुम भी
महफिल अभी ताने दिए जाता है, सभी को
बख़्शेगा नहीं कोई , अगर जाओगे तुम भी
बस्ती अभी वीराने में, तब्दील हुई है
हिंसा में हिफ़ाजत से, ठहर जाओगे तुम भी
आसान नहीं वक्त से, लोहा तिरा लेना
टकराने पे मुमकिन है , बिखर जाओगे तुम भी
तारीख़ बदलते हुए मौसम की गवाही
दिन एक यूँ ही बच के गुजर जाओगे तुम भी
गावों की तबाही से कहाँ बच सका कोई
लड़ने को गरीबी से नगर जाओगे तुम भी
बदमाश शरीफों में तिरा नाम लिया है
हालात के चलते तो सुधर जाओगे तुम भी
पीछा कभी छोड़ा नहीं जाएगा तुम्हारा
हम रुख वही जायेंगे जिधर जाओगे तुम भी
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
514
6.3.26
धनाक्षरी गजल ८,८,८,७वर्ण
अँधेरे में दुआ करूँ, ऐ ख़ुदा परछाई दे
बेख़्याली कहीं निकले,वो नाम सुनाई दे
करवट ना बदलूँ, सपनो में ना गाफिल
नीद से उठते तेरी, याद जुम्हाई दे
ना क़समों का क़सीदा , ना हो वादों का भी ताना
यादों में तुझे बुन लूँ , इतनी तन्हाई दे
उजड़े गुलशन में , ना टूटा शजर होवे
साथ तकदीर मेरी , यूँ रोज ख़ुदाई दे
रिश्तों की अदालत , बेजान हलफ़नामे
या मुझको ज़िंदा रख,या मेरी रिहाई दे
सुशील यादव दुर्ग
515मेरे शहर में .....
#
22 22 22 22 22 2
मेरे शहर में दूध का कोई धुला नहीं है
या कि आदमी मुझसा मुझको मिला नहीं है
#
तुझको कभी देखे जरा आता करार सा था
और मै मानता औरों से तू जुदा नहीं है
#
खींचा है तेरी खातिर लड़ के नभ से
मेरे हिस्से में हासिल बाकी हवा नहीं है
#
माना कभी यादों से हो जाएगी दूरी
कैसे कहूँ जाना तेरा अखरा नही है
#
कैदी हैं पिंजरों के हम भी गोया हमने
आजादी का जैसे सपना बुना नहीं है
#
जो हालात हुए बे -काबू दंगो में
मेरे दौर का लेकिन ये हिस्सा नहीं है
#
खुशबू उठा लाई क्यों पुराने दिनों को आज
मेरा बदन, तू रु ब रु ,गोया छुआ नहीं है
#
मै भाइयों से खूब लड़ के थक गया इसीसे
सोचा अदावत से किसी को फायदा नहीं है#
सुशील यादव
516
10.3.26
कामिल मुसम्मन सालिम
मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
#
तेरी याद का कहीं शाम से बड़े शान से है जला दिया
तू इसे कहीं से बहाल रख नहीं देखना है बुझा दिया
#
मिरे जुर्म की सजा भी कहीं लिखी भी नहीं गई आज तक
यही शहर खौफ में ज़ायक़ा सा समझ के ही क्यों भुला दिया
#
तुझे सर्दियों की वो रात में कहीं भूलना भी मुहाल था
तुझे कंबलों या लिहाफ़ में बड़े जोर से ही दबा दिया
#
जो करीब से कभी पूछते हमें हाल दिल का पता कोई
हाँ उसे लिखा यूँ ही रेत पर किसी जिद में आके मिटा दिया
#
मैं गुनाह रू ब रु क्या करुँ ये इनायतें कहाँ बेच दूँ
यूँ ही रहमतों की तलाश में दिली ख्वाहिशों को हटा दिया
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
517
Mutqaarib musamman saalim
fa'uulun fa'uulun fa'uulun fa'uulun
122 122 122 122
मिला है नहीं ,आज तक तो ठिकाना
हमी ने न ढूढ़ा , गड़ा था खजाना
कहाँ तक बतायें , किसे हम बतायें
मुहब्बत भी सीखा, नहीं है छुपाना
झड़ी आँसुओं की, लगी है यहाँ पे
उधर जल रहा है मिरा आशियाना
बहारों ने वादा, किया था मुझी से
कि फूलों लदेगा, तिरा शामियाना
बचा के रखा है, खुदा ने मिरा भी
किसी छत के नीचे, मिरा आबो-दाना
यही है हमारी , उजालों की महफ़िल
यहीं पे हमे , हाले दिल है सुनाना
बताओ कहाँ तक चले साथ तेरे
बताओ कहाँ शहर गाँवों से जाना
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
518
हज़ज मुसम्मन मक़बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
1212 1212 1212 1212
अभी न जाओ छोड़कर .....
हमारी सांस चल रही मगर कहीं हवा नहीं
चिराग हौसला जला , जो खौफ में बुझा नहीं
किनारे आ के हम रुके, नदी के छोर पर डरे
अभी हमारे ख्वाब में ,कहीं तो पर लगा नहीं
हमारी बात और थी ,तुम्हारी बात और है
तुम्ही ने कुछ कहा नहीं, हमी ने कुछ सुना नही
मिरे मुकाम आके बस , वो मुझको आजमा चुके
मुझे तो राहतों का हक़ , कभी उठा दिया नहीं
फटी कमीज है मिरी , फटे हुए से हाल है
मगर शिकायतें रही ,फटी रिदा सिया नहीं
वो हाथ में लिए ,बजा रहे, जो बासुरी कहीं
वो धड़कनो की ख़ैर , दिल से भी कभी सुना नहीं
मुझे मिरे भी हाल पर, कभी तो छोड़ देखना
कि जिंदगी को ठीक –ठाक, मैंने है जिया नहीं
ये चादरे नसीब की, लकीर हाथ है बिछी
इसे क़रीब ठीक से,हमी ने कल बुना नहीं
भुला दे तू मुझे, अगर है शौक, ये तिरी अभी
तिरी गुलाबी होठ को, मना किया छुआ नहीं
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
519
KHafef musaddas maKHbuun mahzuuf maqtuu.a
faa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun
2122 12 12 22
फिर वही कायदा नहीं होता
जीत का सिलसिला नहीं होता
#
छू न पाते उचाई कोई भी
खेलना जो हुआ नहीं होता
#
तुम नहीं जाती छोड़ के मुझको
मैं मुसीबत घिरा नहीं होता
#
ये है जादूगरी हमारी भी
आज मौसम खुला नहीं होता
#
एक तू ना मिली जमाने में
फिर सबक सा मिला नहीं होता
#
घूम आओ हरे भरे जंगल
शेर शायद दिखा नहीं होता
#
आज वीरान है यहाँ बस्ती
काश घर इक जला नहीं होता
#
बस हिफाजत की खैर मानो तुम
छत मिसाइल गिरा नहीं होता
#
अब ग़ज़ल रीढ़ ही नहीं मिलती
शेर हमसे जुड़ा नहीं होता
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
520
कामिल मुसम्मन सालिम
मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
तिरे हुस्न की कहाँ चर्चा मैं करू बोलने से मैं डरता हूँ
कहीं लोग ही अनुमान कर लें तलाश में तिरी रहता हूँ
मुझे कैद कर लिया है किसी ने ये वहम का भी गुबार है
कोई पास आने तरस रहा कोई दूर से बे क़रार है
मिरी आँख की नमी सूखती नहीं इस लिए तो बहार है
जहां दर्द से मैं बे- हाल था वही मरजे इश्क़ बुख़ार है
तिरी जीत में है मिरी ख़ुशी तिरि सादगी भरी जिंदगी
तिरे दम से शाम में रौनकें तू जो बुझ गया वहीं हार है
##
521
10.3.26
कामिल मुसम्मन सालिम
मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
#
तेरी याद का कहीं शाम से बड़े शान से है जला दिया
तू इसे कहीं से बहाल रख नहीं देखना है बुझा दिया
#
मिरे जुर्म की सजा भी कहीं लिखी भी नहीं गई आज तक
यही शहर खौफ में ज़ायक़ा सा समझ के ही क्यों भुला दिया
#
तुझे सर्दियों की वो रात में कहीं भूलना भी मुहाल था
तुझे कंबलों या लिहाफ़ में बड़े जोर से ही दबा दिया
#
जो करीब से कभी पूछते हमें हाल दिल का पता कोई
हाँ उसे लिखा यूँ ही रेत पर किसी जिद में आके मिटा दिया
#
मैं गुनाह रू ब रु क्या करुँ ये इनायतें कहाँ बेच दूँ
यूँ ही रहमतों की तलाश में दिली ख्वाहिशों को हटा दिया
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
522
Mutqaarib musamman saalim
fa'uulun fa'uulun fa'uulun fa'uulun
122 122 122 122
मिला है नहीं ,आज तक तो ठिकाना
हमी ने न ढूढ़ा , गड़ा था खजाना
कहाँ तक बतायें , किसे हम बतायें
मुहब्बत भी सीखा, नहीं है छुपाना
झड़ी आँसुओं की, लगी है यहाँ पे
उधर जल रहा है मिरा आशियाना
बहारों ने वादा, किया था मुझी से
कि फूलों लदेगा, तिरा शामियाना
बचा के रखा है, खुदा ने मिरा भी
किसी छत के नीचे, मिरा आबो-दाना
यही है हमारी , उजालों की महफ़िल
यहीं पे हमे , हाले दिल है सुनाना
बताओ कहाँ तक चले साथ तेरे
बताओ कहाँ शहर गाँवों से जाना
सुशील यादव दुर्ग
7000226712
523
11.3.26
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun
2212 1211 2212 12
#
मैं रामधुन में रोया बस इतनी खबर नहीं
भूखा पड़ौस सोया बस इतनी खबर नहीं
#
शायद कहीं से आप मुझे ढूढ़ दीजिए
उसको कहाँ हूँ खोया बस इतनी खबर नहीं
#
दुनिया ये अब मिसाइलो से चल रही कहीं
इल्जाम क्या है ढोया बस इतनी खबर नहीं
#
काँटे लगा के हम कहीं अपने ही खेत में
सबको सुई चुभोया बस इतनी खबर नहीं
#
धोखे पे लग गए कहीं पहरे यहां वहाँ
घोड़ों को बेच सोया बस इतनी खबर नहीं
#
सुशील यादव दुर्ग
7000226712