That's all I don't know - Ghazal Collection in Hindi Poems by sushil yadav books and stories PDF | बस इतनी खबर नहीं - गजल संग्रह

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बस इतनी खबर नहीं - गजल संग्रह

501

26.2.26

 Ramal musamman saalim maKHbuun mahzuuf

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilun

2122 1122  1122  112

 

कौन अब रोज,  खयालो में सताता है मुझे

फिर बियाबान कहीं  ,छोड़ के आता है मुझे

#

रंग होली  का लिए  ,पास कहीं वो   छिपता

उसकी हरकत  का ये कैसा कहूं,  नाता  है मुझे

#

कई  रातें जिसे करवट में गुजारी मैंने

ख्वाब दिन में दिखा बस वो ही जगाता है मुझे

#

जब  हलफनामे  वही   नाम लिखा देखूं मै

एक  सदमा कहीं  अफसोस  चिढ़ाता है मुझे

#

अब शराफ़त का  ढिंढोरा  नहीं पीटा जाता

वो शिकायत के ही लहज़े में  बुलाता है मुझे

#

मेरे ख़ुद्दार  से मन का   ये नमूना  देखो

मेरा अरमान ही नाज़ुक सा बनाता  है मुझे

#

उसको  तकलीफ में फिर देख मिरा मन अक्सर

ख़ास मंजर की कई याद दिलाता है मुझे

#

कोई  तो  पीट रहा  ढोल समझ के होली

कोई  मंजीरा समझ खूब  बजाता है मुझे

#

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712


 

502

27.2.26

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ा

एलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212

तू  चले गर राह मेरी कायदा हो जाएगा

सूखे रिश्तों का शज़र सींचो हरा हो जाएगा

#

जो तबीयत  में उदासी  छाई  रहती है मिरे

तुम दिखो बीमार को बस फायदा हो जाएगा

#

जिंदगी दुश्वारियों का महज़ दूजा नाम है

शोहरतों की जिद हुई तो तहलका हो जाएगा

#

भूत को तेरा  दफ़न कर दे,अगर निकला कहीं

तो जमाने में हँगामा सा खड़ा हो जाएगा

#

मत  समझ  अपने  को  ऊँचे  ओहदों वाला कभी

कर तजुर्बा  और हासिल कद बड़ा हो जाएगा

#

भागती  या  दौड़ती दुनिया को जीता कौन है

कुछ इरादे जिंदगी भर फ़लसफ़ा  हो जायगा

#

कौन जाने पास की उसकी जमा- पूँजी कहाँ

छेड़ दो बातें  बरहना बावला हो जायगा

#

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 


 

503

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

2122,1122,1122,22

कब  कहीं  लौट के  बीती ये जवानी आई

फिर वही  दिन कभी आए  कि  कहानी आई

#

ये शिकायत मुझे तुमसे रहा करती हरदम

वो जो  दस्तूर निभाना था , निभानी आई

#

खूब मजबूत बुने थे कभी रिश्ते- धागे

चोट कितनी लगी गहरी कि निशानी आई

#

एक पथ्थर जिसे पूजा था कभी हद ज्यादा

भूल बचपन की गई उम्र सयानी  आई

#

तल्ख बातों से कहाँ जी को सुकून आता गर

इश्तिहारो छपी मिलती या  जुबानी आई

#

तुमने देखा है बबूलों को यहाँ बोकर भी

सिर्फ  काँटे ही मिले फसलें  पुरानी आई

#

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 


 

504

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

21221122112222

रोजगारी भी दिलाओ तो कहूँ होली है

फिर गरीबी को हटाओ तो कहूँ होली है

 

तुम सियासत के  हो दमदार  वफा वाले जब

इस सियासत को हिलाओ  तो कहूँ होली है

 

घूंट पीकर  न रहो रोज जहर के प्यालों

जाम से जाम  लगाओ तो कहूँ होली है

 

वक्त के साथ  कभी  वक्त बिताने वालो

आइना वक्त दिखाओ  तो कहूँ होली है

 

ये शिकायत  नहीं   तुम दर्ज  कराओ  थाने

रंग   गालों को  मलाओ  तो कहूँ होली है

 

भाँग इतनी चढ़ी हमको कि उतर कब पाई

अपने आगोश सुलाओ  तो कहूँ होली है

 

क्या तमाशा  लगा रख्खा  है महीनो पहले

अब खुलासा भी कराओ  तो कहूँ होली है

 

बाटते जाना  हमें भी वो  बताशे ताजे

मुफ्त का माल दिलाओ तो कहूँ होली है

 

बारहा बच के निकल जाती  कभी  होली में

इस दफा पैर   जमाओ तो कहूँ होली है

 

 

तुमने  काटे यहाँ पेड़ों को  जो छाया देते

पेड़  फिर एक  लगाओ तो कहूं होली है

 

अब मरीजों  को नहीं सांस भी लेने फुरसत

कुछ हिदायत भी गिनाओ तो कहूं होली है

 

दौड़ने वाले  कहाँ  घोड़े  बचे मिलते हैं

और बारात नचाओ तो कहूं होली है

 

वक़्त  के साथ  तुम्हारा किया धुल जाएगा

रोक फिर  जंग सुझाओ तो कहूं होली है

 

 

रोज जुम्मन को सताया है यहाँ जी भर के

यो ही अलगू को सताओ तो कहूँ  होली है

 

सुशील यादव दुर्ग

506

मोर दास कबीरा….होली छीटे

मेरे  रहते  कर लो तुम ,खूबे   सैर सपाटा

फिर मेरे बाद देना, जी एस  टी  आन  आटा

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

तेरी सूरत  को  गली -गली में पहचाने है कौन

भगवा चोला पहन  के भाया  धूम मचा ले  मौन

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

कल को तुम ख़ाक छानना और बजाना बीन

मंहगा ढोलक और मंजीरा, पीट कनस्टर टीन

बोलो सारा रा रा कबीरा सारा रा रा

 

कुछ तो पढ़ इतिहास जरा , कुछ तो हो तल्लीन

चाय के संग तू सीख बेचना , मीठा औ नमकीन 

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

कब तक देकर राज करेगा ,नेहरु जी को गाली

एक हाथ से बजा बजा के थक जाएगा ताली

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

 

 

507

छतीसगढ़ी में ...

ऐ गांव के  भालू  रोही , आने गांव के बघुवा

छ्त्तीसगढ़ के मज़दूर  ले जावव कोरी कोरी बँधवा

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

कोन राजा कोन परजा , काखर राज  सिराही

ऐ  दारी के दंगल म मुरख कोनो अगुवाही

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

अब्बड़ तै  मता  डरे हस, गोठ- गोठ के गारा

कोनो दिन के मंम- हैय्या , अब बस्सावत  पारा

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

अतेक दिन ले  सित्परहा  बइठे,  लुका -लुका के भाँटो

आते देख चुनाव ला बइहा, कंबल -सारी  कहिथे बांटो

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

हमर किसान  धरे हवे  जम्मो बीजहा फोकला

अउ गुजराती मन  खावत मिलथे खम्मन ढोकला

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

हमर किसान के मेहनत पाछू,  हवे बोरे- बासी

तुहर आइ एस कोच्कैय्या , बुलडोजर सन्यासी

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

जेती जाबे ओती  चीख़त हे  मनखे मारे पीरा

तब्भो ले कोदा -भैरा  बन गए मोर दास कबीरा

बोलो सारा रा रा कबीरा सारा रा रा

 

508

2.3.26

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

221 2121 1221 212

तिनकों  से डूबते  को सहारा  नहीं रहा

कश्ती  बही तमाम किनारा नहीं रहा

 

साथी नहीं बचे कोई  बचपन के इन दिनों

रुख़सत पे अख़्तियार हमारा नहीं रहा

 

हम  चाँट  लें किताब  सहूलत  रही कभी

वो वास्ता  कहीं तो दुबारा नहीं रहा

 

नक्शा  लकीर  सिर्फ़ खिंचा  फायदा नहीं

वो आसमाँ  बुलंद सितारा नहीं रहा

 

सर्दी की  रात  क्यों  न  गुजरती है चुप के से

कम्बल  बिना कही से  गुज़ारा  नहीं रहा

 

कैदी से  मुन्शिफ़ो की यहाँ भीड़ हो गई

अब फैसला मिया वो - करारा नही रहा

 

बोए थे  तेरी राह में हम आरजू के दिन

जब काटने को आए हमारा नहीं रहा

 

आखें मिरी  तलाशती महफूज दिल कहाँ

मालूम तब हुआ जो शिकारा नहीं रहा

 

बस वक्त ने बुझा दिया भीतर का जोश भी

कुछ आग थी मगर वो  शरारा  नहीं रहा

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 

 

 

509

5.3.26

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

221 2121 1221 212

चिलमन  की  आड़ में मुझे वो ताकती तो है

कुछ  आहटें ये राज कभी खोलती  तो हैं

 

जो वक़्त  सीढ़ियाँ  चढ़ा, थक कर उतर  गया

शोहरत में   इन दिनों , हुई शायद कमी तो है

 

बातों को पेट  में  ही छुपाओ न चाह कर

ये उम्र  भर हिदायतें देती चुभी तो है

 

मौसम यहाँ वहाँ  से अभी लौट कर गया

बीमार  सी  हवावों मगर  ताज़गी  तो है

 

खिड़की खुली हुई  दिखी मुझको किसी भी दिन

तू इंतिजार  में मिरे बैठी रही तो है

 

सदमा लगा  है मुझको  उदासी को देख के

फसना भँवर  में अब क्या ,किनारा कहीं तो है

 

आओ करीब तुम मिरे जादूगरी करो

जलता  हुआ ये   दिल है  बुझी  ज़िन्दगी तो है

 

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 

 

 

510

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212

आओ नफ़रत  को मिटा  दें हम जमाने के लिए

प्यार गंगा में बहा दें अम्न  लाने के लिए

 

खास तलवारें खिची है  आदमी दर  आदमी

सब्र  से सर को झुका दें फिर   उठाने के लिए

 

आओ दो- दो हाथ हम भी सामने   कर  ले अभी

शौक फ़रमाते हो ताक़त  आजमाने के लिए

 

कोई भी तहजीब में हिंसा नहीं  मुद्दा अहम

बस सदारत की लड़ाई है सताने के लिए

 

सर -फिरा  कोई तुम्हे रोजाना  उकसा जाता है

उसकी नीयत भी गडी है  तो खजाने के लिए

 

एक वो अभियान  चल जाए  धरा पर फिर कहीं

बम मिसाइल ना दहाड़ें  कुछ मिटाने के लिए

 

है खरा सोना वही उसको  तपाने में लगो

व्यर्थ  पीतल के पड़े ज्यादा गलाने के लिए

 

जुर्म की सीमा   तबाही  की हो भरपाई सभी

सब गुनहगारों चुने    फाँसी चढाने के लिए

 

 

 

 

 

 

511

Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf maskn

mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun

1212 1122 1212 22

कहीं  पे दिल हुआ उलझा जरूर  निकलेगा

नुमाइशों  के  नशे में वो चूर  निकलेगा

 

भरोसे से यही हम जी रहे हैं आगे अब

कि बारुदों से मिरा घर भी दूर निकलेगा

 

ये आइना  यहाँ इतराता भी बहुत  ज्यादा

हाँ  देखना  कहीं इसका गुरूर निकलेगा

 

ये लालची  है बहुत  लोमड़ी  सा मन इसको

खटास से भरा  काला अँगूर  निकलेगा

 

गरीब मांग रहा  हक़ में फैसला  लिख्खो

जुनून की ये समझ बस   फितूर निकलेगा

 

सलवटें सी  पड़ी है  आज उनके दामन में

बिना नशा किए उनका कुसूर  निकलेगा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

512

हज़ज मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन

221 1221 1221 122

मेरे किए  की  मुझको सज़ा  क्यों नहीं देते

इक  आग सुलगती है  बुझा क्यूँ  नहीं देते

 

अब कौन किसे याद  कभी आता है हरदम

हूँ  भूलने की चीज भुला क्यूँ नहीं देते

 

इस शहर  के हम  भी अभी भटके  हैं  मुसाफिर

रहबर हैं  अनेकों  ये   पता क्यूँ नहीं देते

 

जज्बात  पे काबू  हमें रखना नहीं आया

फिसलन  मिरी जी भर के बढ़ा  क्यूँ नहीं देते

 

पत्थर जिसे पूजा ,नहीं देता कभी चाहा

मन्दिर से इसे मन के ,हटा क्यूँ नहीं देते

 

पीतल की तरह  मुझको हमेशा कहीं माना

सोना हूँ अगरचे  मै,  तपा  क्यूँ नहीं देते

 

दादागिरी चलती नहीं हरदम किसी की अब

बन्दूक चला इनको बिदा क्यूँ नहीं देते

 

बस्ती अभी हर रोज  उजाड़ी हुई मिलती

ये जान लिवा  जंग मिटा क्यूँ नहीं देते

 

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 

 

 

 

 

 

513

221 1221 1221 122

बिगड़ी हुई कश्ती से ,उतर जाओगे तुम भी

हालात ये कहता है , किधर  जाओगे तुम भी

 

फसलें हुई बर्बाद ,मुकर जाओगे तुम भी

मौसम की ख़राबी से ही, डर जाओगे तुम भी

 

महफिल अभी ताने दिए जाता  है, सभी को

बख़्शेगा नहीं कोई , अगर जाओगे तुम भी

 

बस्ती  अभी वीराने में, तब्दील हुई है

हिंसा  में हिफ़ाजत  से,  ठहर जाओगे तुम भी

 

आसान  नहीं वक्त से,  लोहा तिरा लेना

टकराने पे मुमकिन है , बिखर जाओगे तुम भी

 

तारीख़   बदलते  हुए  मौसम की गवाही

दिन एक  यूँ ही  बच के गुजर जाओगे   तुम भी

 

गावों की तबाही  से कहाँ बच सका कोई

लड़ने को  गरीबी   से  नगर  जाओगे तुम भी

 

बदमाश शरीफों  में तिरा नाम लिया है

हालात के चलते तो सुधर जाओगे तुम भी

 

पीछा कभी   छोड़ा  नहीं जाएगा तुम्हारा

हम रुख वही  जायेंगे  जिधर  जाओगे तुम भी

 

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 

514

6.3.26

धनाक्षरी गजल  ८,८,८,७वर्ण

अँधेरे में दुआ करूँ, ऐ ख़ुदा परछाई दे

बेख़्याली कहीं निकले,वो नाम सुनाई दे

 

करवट ना बदलूँ, सपनो में ना गाफिल

नीद से उठते तेरी, याद जुम्हाई दे

 

ना क़समों का क़सीदा  , ना  हो वादों का भी  ताना

यादों में तुझे बुन लूँ , इतनी तन्हाई दे

 

उजड़े गुलशन में  , ना टूटा शजर होवे

साथ   तकदीर  मेरी  , यूँ रोज  ख़ुदाई दे

 

रिश्तों की अदालत  , बेजान हलफ़नामे

या मुझको ज़िंदा रख,या  मेरी रिहाई दे

सुशील यादव दुर्ग

515मेरे शहर में .....
#
22 22 22 22 22 2

मेरे शहर में दूध  का कोई धुला नहीं है

या कि  आदमी मुझसा मुझको   मिला नहीं है
#
तुझको कभी  देखे जरा आता करार सा था

और  मै  मानता  औरों से तू   जुदा  नहीं है

#
खींचा   है तेरी खातिर लड़ के नभ  से

मेरे हिस्से  में   हासिल बाकी हवा नहीं है

#

माना   कभी यादों से   हो  जाएगी दूरी

कैसे कहूँ जाना तेरा  अखरा नही है
#

कैदी  हैं पिंजरों के हम भी     गोया हमने

आजादी का जैसे सपना बुना नहीं है

#
जो हालात   हुए बे -काबू दंगो में

मेरे दौर का लेकिन ये हिस्सा नहीं है


#
खुशबू उठा  लाई क्यों पुराने दिनों को आज

मेरा बदन, तू रु ब रु ,गोया छुआ नहीं है

#

मै भाइयों  से खूब लड़ के  थक गया इसीसे
सोचा अदावत से किसी को फायदा नहीं है#
सुशील यादव

516

10.3.26

कामिल मुसम्मन सालिम

मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन

11212 11212 11212 11212

#

तेरी याद का  कहीं  शाम से बड़े शान से  है जला दिया

तू इसे कहीं  से बहाल रख नहीं देखना है बुझा दिया

#

मिरे जुर्म की सजा भी कहीं लिखी भी नहीं गई आज तक

यही  शहर  खौफ में ज़ायक़ा  सा समझ के ही क्यों भुला दिया

#

तुझे  सर्दियों  की वो रात में  कहीं भूलना भी मुहाल था

तुझे  कंबलों  या लिहाफ़ में बड़े जोर से ही दबा दिया

#

जो करीब से कभी पूछते हमें हाल दिल का पता कोई

हाँ उसे लिखा  यूँ ही रेत  पर किसी जिद में आके मिटा दिया

#

मैं  गुनाह रू ब रु क्या करुँ ये इनायतें कहाँ बेच दूँ

यूँ ही रहमतों की तलाश में दिली ख्वाहिशों को हटा दिया

#

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 

517

Mutqaarib musamman saalim

fa'uulun fa'uulun fa'uulun fa'uulun

122 122 122 122

मिला है नहीं ,आज  तक  तो ठिकाना

हमी  ने न  ढूढ़ा , गड़ा  था खजाना

 

कहाँ तक बतायें , किसे हम बतायें

मुहब्बत  भी सीखा,  नहीं है  छुपाना

 

झड़ी  आँसुओं  की,  लगी है यहाँ पे

उधर जल रहा है मिरा आशियाना

 

बहारों  ने वादा,  किया था  मुझी से

कि फूलों   लदेगा, तिरा  शामियाना

 

बचा के रखा है, खुदा ने मिरा भी

किसी छत के नीचे, मिरा आबो-दाना

 

यही है  हमारी , उजालों  की महफ़िल

यहीं पे  हमे , हाले  दिल है सुनाना

 

बताओ कहाँ तक चले साथ तेरे

बताओ  कहाँ शहर गाँवों से  जाना

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 

518

हज़ज मुसम्मन मक़बूज़

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212

अभी न जाओ छोड़कर .....

हमारी सांस चल रही मगर कहीं हवा नहीं

चिराग हौसला जला , जो खौफ में बुझा नहीं

 

किनारे  आ के हम रुके, नदी के छोर  पर डरे

अभी  हमारे ख्वाब में ,कहीं तो पर लगा नहीं

 

हमारी बात और थी ,तुम्हारी बात और है

तुम्ही ने कुछ कहा नहीं, हमी ने कुछ सुना  नही

 

मिरे  मुकाम आके बस  , वो  मुझको   आजमा चुके

मुझे  तो राहतों का हक़ , कभी  उठा  दिया नहीं

 

फटी कमीज है मिरी , फटे हुए से हाल है

मगर शिकायतें  रही  ,फटी  रिदा  सिया नहीं

 

वो  हाथ  में लिए  ,बजा रहे,  जो   बासुरी कहीं

वो धड़कनो  की ख़ैर , दिल से भी कभी सुना नहीं

 

मुझे मिरे भी हाल पर, कभी तो छोड़ देखना

कि जिंदगी  को ठीक –ठाक, मैंने  है जिया नहीं

 

ये चादरे  नसीब की, लकीर हाथ है बिछी

इसे क़रीब  ठीक से,हमी  ने कल  बुना  नहीं

 

भुला दे तू मुझे,  अगर है शौक, ये तिरी अभी

तिरी गुलाबी होठ को, मना किया छुआ नहीं

 

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 

519

KHafef musaddas maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun

2122 12 12   22

फिर वही कायदा नहीं होता

जीत का सिलसिला नहीं होता

#

छू  न पाते उचाई कोई भी

खेलना जो हुआ  नहीं होता

#

तुम नहीं जाती छोड़ के मुझको

मैं मुसीबत घिरा नहीं होता

#

ये है जादूगरी हमारी भी

आज  मौसम खुला नहीं होता

#

एक तू ना मिली जमाने में

फिर सबक सा मिला नहीं होता

#

घूम आओ  हरे भरे जंगल

शेर शायद दिखा नहीं होता

#

आज  वीरान है यहाँ बस्ती

काश घर इक जला नहीं होता

#

बस हिफाजत की खैर मानो तुम

छत मिसाइल  गिरा नहीं  होता

#

अब ग़ज़ल  रीढ़ ही नहीं मिलती

शेर हमसे जुड़ा नहीं होता

#

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

520

कामिल मुसम्मन सालिम

मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन

11212 11212 11212 11212

तिरे हुस्न की कहाँ चर्चा मैं करू बोलने से मैं  डरता हूँ

कहीं लोग ही  अनुमान कर लें  तलाश में तिरी रहता हूँ

 

मुझे कैद कर लिया  है किसी ने ये वहम का  भी गुबार है

कोई पास आने तरस  रहा कोई दूर से बे क़रार  है

 

मिरी  आँख की नमी सूखती नहीं इस लिए तो बहार है

जहां दर्द से मैं बे- हाल था वही मरजे  इश्क़  बुख़ार   है

 

तिरी जीत में है मिरी ख़ुशी तिरि सादगी भरी जिंदगी

तिरे दम से शाम में रौनकें तू जो बुझ गया वहीं हार है

##

 

521

10.3.26

कामिल मुसम्मन सालिम

मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन

11212 11212 11212 11212

#

तेरी याद का  कहीं  शाम से बड़े शान से  है जला दिया

तू इसे कहीं  से बहाल रख नहीं देखना है बुझा दिया

#

मिरे जुर्म की सजा भी कहीं लिखी भी नहीं गई आज तक

यही  शहर  खौफ में ज़ायक़ा  सा समझ के ही क्यों भुला दिया

#

तुझे  सर्दियों  की वो रात में  कहीं भूलना भी मुहाल था

तुझे  कंबलों  या लिहाफ़ में बड़े जोर से ही दबा दिया

#

जो करीब से कभी पूछते हमें हाल दिल का पता कोई

हाँ उसे लिखा  यूँ ही रेत  पर किसी जिद में आके मिटा दिया

#

मैं  गुनाह रू ब रु क्या करुँ ये इनायतें कहाँ बेच दूँ

यूँ ही रहमतों की तलाश में दिली ख्वाहिशों को हटा दिया

#

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 

522

Mutqaarib musamman saalim

fa'uulun fa'uulun fa'uulun fa'uulun

122 122 122 122

मिला है नहीं ,आज  तक  तो ठिकाना

हमी  ने न  ढूढ़ा , गड़ा  था खजाना

 

कहाँ तक बतायें , किसे हम बतायें

मुहब्बत  भी सीखा,  नहीं है  छुपाना

 

झड़ी  आँसुओं  की,  लगी है यहाँ पे

उधर जल रहा है मिरा आशियाना

 

बहारों  ने वादा,  किया था  मुझी से

कि फूलों   लदेगा, तिरा  शामियाना

 

बचा के रखा है, खुदा ने मिरा भी

किसी छत के नीचे, मिरा आबो-दाना

 

यही है  हमारी , उजालों  की महफ़िल

यहीं पे  हमे , हाले  दिल है सुनाना

 

बताओ कहाँ तक चले साथ तेरे

बताओ  कहाँ शहर गाँवों से  जाना

 

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

523

 

11.3.26
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf

maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun

2212  1211 2212  12

#

मैं  रामधुन में रोया  बस इतनी  खबर नहीं

भूखा पड़ौस   सोया  बस इतनी खबर नहीं

#

शायद कहीं से आप मुझे ढूढ़ दीजिए

उसको कहाँ हूँ खोया बस इतनी खबर नहीं

#

दुनिया  ये अब  मिसाइलो से चल रही  कहीं

इल्जाम क्या है ढोया बस इतनी खबर नहीं

#

काँटे लगा के हम कहीं अपने ही खेत में

सबको सुई चुभोया बस इतनी खबर नहीं

#

धोखे पे लग  गए  कहीं  पहरे यहां वहाँ

घोड़ों को बेच सोया  बस इतनी खबर नहीं

#

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712