kashti me kharabi hai in Hindi Poems by sushil yadav books and stories PDF | कश्ती में ख़राबी है

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कश्ती में ख़राबी है

 

13.1.26

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

221  2121 12 21 21 2

घर फूंकने की  हमको  इजाजत न मिल सकी

रुसवाइयों से  फिर कभी राहत  न मिल सकी

 

बर्बादियों  का  जश्न  मनाने  चले थे हम

माना बहार आई तो फुरसत न मिल सकी

 

अफ़सोस  ज़ोरदार  हमे होता ये रहा

राहत की मंडियों कोई राहत न मिल सकी

 

लाशें  बिछा  के कौन ये गलियों  में घूमता

कातिल सभी मिले हैं हकीकत न मिल सकी

 

माहौल इस बसंत का अब  क्या बताएं हम

बीमार को वो पहली तबीयत न मिल सकी

 

अब फूल  कुछ उमंग  भरे   खिलते भी नहीं

हम  हार  तो पहन   लिए  चाहत न मिल सकी

 

क्या- क्या नहीं मिला है हमे इस जमाने से

बस आख़िरी सी मांग थी इज्जत  न मिल सकी

 

तुझसे थी  दोस्ती  की  तलब  हमको ज़िन्दगी

मौका ए वारदात हिदायत न मिल सकी

 

पूजा है बारहा कहीं पत्थर रखा मिला

मुझको  नसीब  की लिखी  दौलत  न मिल सकी

 

तुझपे  ही  था  हमें   तो  भरोसा बहुत सुशील

अब दोस्ती  जरा भी सलामत न मिल सकी

 

मिलती  हमें  भी आज  जमाने की सब ख़ुशी

पर राजसी अकड़ की सहूलत न मिल सकी

सुशील यादव  दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

 
16.1.26

Ramal musamman saalim maKHbuun mahzuuf

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilun

2122 1122 1122 22

घर में तख्ती जो लगी बस वो मेरे नाम की थी

और फैली हुई तन्हाई वही  काम की थी

 

बस अँधेरो से  डरा बैठा था कोने में चुप

कुछ इनायत कहीं मेरे छिपे घनश्याम की थी

 

तुम लगे बाग़ बगीचों को सलामत देखो

ये इजाजत तुझे हासिल  बड़े आराम  की थी

 

फिर मुझे तोड़ के रख देती है मेरी चाहत

तेरी यादों  बसी  रुसवाई सुब्हो शाम की थी

 

कोई  माने या ना माने कि इमारत चिपकी

इश्तिहारों में  छिपी  बात  वो पैगाम की थी

सुशील यादव  दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

motdarik saalim musamman

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

212212212212212212

खून के घूँट पीते, नही तुम, जहर  जायका जानते

शहर  में क्यूँ भटकते भला गर मिरा तुम पता जानते

 

फूल से  रंज रखते नहीं गंध परहेज होता कहाँ

तुम भी मेरी तरह तितलियाँ भी कभी पालना जानते

 

ये गरीबी का आलम नहीं सामने  भी  कहीं देखते

काश सरकार  की  योजना पास से ताकना  जानते

 

वक्त  ने क्या घड़ी भर कहीं इस जनम मुँह  दिखाने दिया

उम्र की  हर  उतरनें कभी  टांकना सीलना जानते

 

लोग  वो हैं मजे में वहाँ जिन्दगी   खौफ बिन कट रही

हम भी सारे  जहाँ  के उसूलों   से मुँह  मोड़ना  जानते

 

सुशील यादव  दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

 
426

1212 1122 1212 22

 तमाम    हम हदें औ दायरा समझते हैं

अगर कहो भी नहीं  मशवरा  समझते हैं

 

मिरी समझ में जो आती नहीं  समझते हैं

उडी - उडी रंगतें हर  दफा समझते हैं

 

जो मन-पसन्द कभी आइना  बना लो तुम

ये लोग फर्क  असल आइना समझते हैं

 

जो रूठ के गई हो तुम बुझे हुए मन से

कि लोग कब  इसे ही  रूठना  समझते हैं

 

बढ़ी हुई मिरी दीवानगी कभी देखो

हकीम मर्ज को  बेइंतिहा  समझते हैं

 

तिरी गली की मै गर्दिश  में  रोज रहता हूँ

मुझे बे हाल कहीं शर्तिया  समझते हैं

 

मैं नासमझ कहीं  बस्ती में अब  अकेला हूँ

करीब आ के वो कीमत जुदा समझते हैं

 22 22    22     22 22   22    22 

नजरों     में हो  चमक  ,  होठो  की हंसी ले के आओ

हो सके तो, क़मज़र्फ़ो के लिए,ज़िन्दगी  ले के आओ

#

अज्ञानी  तुम  अँधियारे   दो कदम ना चल पाओगे

धुंध  सही, समझौते की  कोई    रौशनी ले के  आओ

#

हट जाए  पर्दा आखों से  कुछ वो काम करो   तुम

थोड़ी    तजुर्बे की मीठी   सी  चाशनी ले के आओ

#

कोई फैसला   हम कर लें  कहीं   रुतबा  आप रखें जी

सोच है योज़ना में क़ाग़ज़  क़श्ती है नदी लेके आओ

#

हम तो   पढ़ नहीं पाते  चाह के ख़ुदग़र्ज़ो का चेहरा

या तो  हमसे बीस बनो  या  हममे   कमी ले के आओ

#

सिमटे हुए हैं   अपने दायरे में उम्मीद  सभी के

पारस की जाओ ढूढो  कोई   क़नी ले के आओ

#

तेरे मयख़ाने में  ऐ खुदा कब से     रिंद ये  प्यासा

कोई  बोतल यादों की  जो   बची ज़रा सी ले के आओ

 

#457

Hazaj musamman aKHrab makfuuf mahzuuf हज़ज मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन

221 1221 1221 122

 

कश्ती में  ख़राबी  है  उतर क्यों नहीं जाते

हो दूर मुसाफ़िर तो ठहर क्यों नहीं जाते

 

सीखा नहीं तुमने भी अंधेरों कभी लड़ना

आगे ही उजाले हैं उधर  क्यों नहीं जाते

 

अफ़सोस कि मिलता नहीं रखवाला तुम्हे भी

बस्ती के घरौदों  से उबर क्यों नहीं जाते

 

हमने नहीं जाना किसे कहते  हैं मुहब्बत

जो जान  गए  होते  तो मर क्यों नहीं जाते

 

क्या खूब कहा है किसी ने मरने से पहले

माटी का बदन माटी   उतर क्यों नहीं जाते

 

अफ़वाह सी फैली  है ज़माने में  अभी तक

दरवाजे खुले देख  वो घर क्यों नहीं जाते

 

कमजोर सी  फरियाद है शायद वो भुला दे

वादा जो निभाना है मुकर क्यों नहीं जाते

 

मंजर नहीं जो भूल सकें शहर की  हालत

तुम खौफ़ के आलम में सिहर क्यों नहीं जाते

 

क्यूँ करते  नुमाइश यहाँ दौलत की हमेशा

आफत में फँसे हो तो  सुधर क्यों नहीं जाते

 

सब लोग  गए  हैं  किसी जल्लाद की महफ़िल

तुम भी लगा के आग गुजर क्यों नहीं जाते

490 रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212

लोग  हैं मासूम  कितने बस ये बतलाना मुझे

किस की होती है  हज़ामत रोज समझाना  मुझे

 

मौत पर बरगद में मेरी अस्थियाँ बाँधो भले

रूह ने जीते कभी सीखा न दफ़नाना  मुझे

 

ये हमारे  बीच आपस की हैं बातें जानिये

सब किनारा कर गए, कब आया  कतराना मुझे

 

मैं  भटकता आदमी मुझको नहीं मंजिल मिली

कोई बतलाता नहीं ,है किस पते जाना मुझे

 

सामने  में जिंदगी की क्या मुरादें  हैं बची

बस अधूरा  सा भरा  खुशियों  का पैमाना मुझे

 

दफ्न कर दो तुम यहाँ मासूम  हरकत  आज ही

तेरी  करनी की वजह पड़ता है  शर्माना  मुझे

 

इक तुम्हारी  याद की तस्वीर  मेरे दिल में थी

तुम जो छूटे  तो लगा है दूर  याराना  मुझे

13.2.26

मुज्तस मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मस्कन

मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन

1212  1122  1212  22/112

 

पुरानी  याद के भंवर  में डूब जाना था

वही  तो इश्क का सुलझा हुआ ठिकाना  था

 

वो लम्हों की पड़ी  हर सिलवटें मिटा देना

वो यादगार  जो  बीता  हुआ  जमाना था

 

यूँ नींद में कभी गाफिल न ज़िंदगी  को रख

इसे फरेब  जमाने का आजमाना था

 

हमी ने तोड़ दिए हैं तमाम  रिश्ते  अब

करार  था कहीं   इतना   यही  बहाना था

 

मिरा  वजूद  मियादों में  नापने वाले

तिरा  सटीक बहुत तीर का निशाना था

 

मुझे उबार ले गुमनाम ज़िन्दगी से अब

कि नाम भी  मुझे  बेइंतिहा   कमाना था

 

उसे पड़ी है क्या देखे मिरी तरफ  हरदम

मुझे बे हाल सा  इक दिन  यहीं  बिताना  था

 

सुशील यादव दुर्ग (cg)

12.2.26

हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

1222 1222 122

कयामत का मेरा  सपना नही था

बुरे ख्यालो  तुझे देखा नही था

 

भरी महफिल में कितना  देखते हम

तुम्हारे बाद कुछ  चाहा नहीं था

 

शिकायत है तिरी वाजिब कहीं से

महल  बाहर मुझे  सोना नहीं था

 

बबूलो  शहर में फूलों की खेती

सिवा काटों वहां बिकता नहीं था

 

बना के हार फूलो से सजाना

कहीं तो रिश्ता  ऐसा भी नहीं था

 

उसूलों  साथ  चलना जानते  सब

हुनर केवल हमें आता नहीं था

 

गुजारी ज़िन्दगी जैसी मिली थी

हमे भी ज़िन्दगी  शिकवा नहीं था

 

जिसे तुम मैल कहते   हाथ  की सब

वही बस मैल सा पैसा नहीं था

 

प्यास इतनी, मुझे सपने में, दरिया दिखाई देता है

हर सिम्त  बिछाया, तेरा, काँटा  दिखाई देता है

 

तेरी रहमत के तलबगारों , तेरा मिलना न हुआ

हर एक वजीफ़े में उनको,  घाटा दिखाई देता है

 

मैं हूँ वो शख़्स जिसे तकदीर से ,  हरदम धोखे मिले

गालों  रहबर का  मेरे, तमाचा दिखाई देता है

 

तेरे खुदा ने तबियत से सीरत बख़्शी औ  ये बदन

उस मालिक का तो खुद ही तराशा   दिखाई देता है

 

चाहे जितना तेरी ख़ातिर  लिख दूँ वो भी कम है

ये  मेरी अकीदत साफ़  क़सीदा दिखाई देता है

 

उसकी अफ़सोस  तमन्ना मयकदे  में  कौन करे पूरी

जी भर के जो पी ले तब भी प्यासा दिखाई देता है

 

मेरे   मालिक  मुझको   भी ये तौफ़ीक़  सदा फ़रमा

ये दिल    कब से मेरा रूआँसा दिखाई देता है

 

मत लादो और    उसी के  पीठ कोई   वजनी  गठरी

पहले से वो कुछ ज्यादा थका सा दिखाई देता है

सुशील यादव दुर्ग (cg)

484

12.2.26

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

221 2121 1221 212

 

पत्थर के सामने कभी सर को झुका लिया

तन्हाई  बोझ को यूँ ही हरदम उठा लिया

 

सीढ़ी  सफ़लता की हमे ढूँढे  कहाँ मिली

छत एक जो मिली वहीं ख़ुद को टिका लिया

 

अक्षर भी ढाई जो पढ़े मिलते हैं लोग वो

मज़मा ही कारबार  का अपना लगा लिया

 

है देर फैसले में अभी कर गुनाह और

माटी का तूने सब को ही पुतला बना लिया

 

वंचित गरीब को यहाँ ,उम्मीद भी नहीं

शहरों  में योजना  का यूँ  जंगल सजा लिया

 

सुशील यादव दुर्ग (cg)

 

483

222 212  122

रिश्ते  में वो  बड़ा न होता

आगे  मेरे  खड़ा  न होता

 

फैला मिलता हमें ज़माना

मिटटी मज़हब बटा न होता

 

रहमत बारिश हुई न होती

वो इतना भी फला न होता

 

सड़को  घूमे  वो भटके होते

प्यासा टूटा घड़ा  न होता

 

मेरे हिस्से की धूप सेको

घाटे का आँकड़ा  न होता

 

दावत उनकी गले न उतरे

खाना गरचे सड़ा न होता

 

387रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212

#

वक्त  का कोई  तमाचा तो  करारा भी न था

वक्त से पहले  हमे तुमने   पुकारा भी न था

#

मंजिलो ज़ानिब जो बढ़ते जा रहे थे जब कदम

तोड़ना भी ख़ामुशी तुमको गवारा भी न था\

#

इस तरह कोई भुलाता है किसी को  आए दिन

हम गरीबों का  सिवा तेरे सहारा भी न था

#

खैरिअत भी जानकर तुमको नहीं होगी ख़ुशी

मैं  दरो- दीवार का तेरा  सहारा भी न था

#

कब बदल  जाती बनी  तक़दीर अपने आप ही

ख़ेल किस्मत का किसी लहज़े इशारा भी न था

#

दौड़ के थकता गया दीवानगी  में मैं  तिरी

मेरे हिस्से  में  लिखा खेला दुबारा भी न था

#

खुद मुझे मझधार  की चाहत हुई मैं क्या करूँ

सादगी  मेरी लकीरों में किनारा भी न था

#

424

2.12.25

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212

शहर में बुलडोज़रों  की ख़ूबियाँ  महफूज है

पर इनायत तेरे होते बस्तियां महफूज है

#

बस शिकारी की तरह निकले हुए  थे राह में

भेड़- बकरे जानवर सब बिल्लियां महफूज हैं

#

हद जुगाली  की हुई है आज सरकारी अमल

डस्ट बीनो  में  डली  कुछ अर्जियां  महफूज़ हैं

#

सीख लेते बेवफाई  का  हुनर थोड़ा बहुत

बस  वफा के नाम पे  रुसवाइयाँ  महफूज हैं

#

हम चले थे जंग  आज़ादी की  शाही जीतने

क्या पता था आदतों में झिड़कियाँ महफूज़ हैं

#

सुशील यादव  दुर्ग (छ.ग.)

 
26.12.25

रमल मुसद्दस मख़बून

फ़ाएलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन

2122 1122 1122

दर्द की हम से वकालत नहीं होती

और अच्छी कभी हालत नहीं होती

 

झूठ हमने कभी   बोला भी  नहीं है

और सच से  भी  अदावत  नहीं होती

 

इस तरह  हमको फँसाया है किसी ने

मेरी मिलती सी  लिखावट नहीं होती

 

हमने बोए हुए, फ़सलें  नहीं काटे

अब के मौसम बड़ी कीमत नहीं होती

 

आरज़ू  थी तुझे खुशियों से बिदा दें

साल बीते  की इजाजत नहीं होती

 

आने वाला हो  नया साल  मुबारक

आगे बादल की बगावत नहीं होती

 

Hazaj musaddas mahzuuf

mufaa'iilun mufaa'iilun fa'uulun

1222 1222 122

मुहब्बत की  जहाँ   बुनियाद रख्खो

उसी के पास घर  आबाद  रख्खो

 

कभी तफ्सील  से खुद को  भुला दो

पता मेरा ज़हन में  याद  रख्खो

 

वही दरिया हूँ  बहता ही  मिलूँगा

पुरानी  कोई है फ़रियाद रख्खो

 

मेरे बहकावे में आने पड़ी क्या

खुले दिल जारी तुम इमदाद रख्खो

 

कमी है  धूप  की पेड़ों उदासी

वो साए सब्ज़ लम्हे याद रख्खो

 

सुशील यादव

7000226712

 

maf'uul mufaa'iil mufaa'iil fa'uulun

221 1221 1221 122

रस्मों को जमाने में  निभाने के लिए  आ

फिर साल नया  साथ  मनाने के लिए आ

#

बीते हुए  लम्हे जहां तुमने था सताया 

रुसवाई का हर राज  बताने  के लिए आ

मकसद मुझें मालूम नहीं साल नए  का

पिछला था अगर कम तो सजाने  के लिए आ

#

ऐ साल पुराने कई अहसान थे मेरे---

चाहत है जरा बाकी  गिनाने के लिए आ

#

गुजरी सी उदासी  तिरी देखी नहीं जाती

आते हुए दिन फूल खिलाने के लिए आ

#

है  पास  जो यादों का जख़ीरा गए सालों

मेरी उन्हीं यादों के खजाने के लिए आ

#

हर साल दिलासे हुए हम संग रहेंगे

क्या-क्या हुआ अब के नहीं जाने के लिए आ

#

दम है तो मुझें  छोड़ दे तन्हाई में हरदम

उल्फ़त है अगर  आग बुझाने के लिए आ

#

1222 1222 1222 1222

इधर जब से  हसीं सूरत को दिल ने आजमाया  है

ख़ुशी के चार पल, उम्मीद  के घर बांध आया है

 

शराफ़त से उसी  दहलीज़ पे, सच को रखा मैंने

जहाँ  हर रहगुजर तक , दीप मैंने ही  जलाया है

 

मिरी  बातें  कही होगी  ,कई ताने सुनी होगी

उसे   सीने, इसी ख़ूबी के ,चलते तो  लगाया  है

 

मिरी कुछ अन-सुनी बातों का भी अफ़सोस हो शायद

तमाशा कुछ  बुझे शोलों  की जानिब ये बताया  है

 

खताये मेरी  माफी के कभी काबिल  नहीं होती

कहीं   बर्दाश्त से बाहर कोई  इल्जाम आया  है

 

मै हसरत को हवाले ,फिर कहाँ कर दूँ तिरे  जद में

मुझे अक्सर ही धमकाया  डराया  औ सताया है

 

कहीं वीरान सन्नाटे में आवाजें  उठी तेरी

मिरा दिल बारहा  बस बेसबब ही  तिलमिलाया है

#491

14.2.26 shivratri

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

221 2121 1221 212

जीते  हैं  हम किसी भी  सहारे  बगैर भी

आवाज़ अब तो  सुन लो पुकारे बगैर भी

#

हम थे परेशा  रात किवाड़ों की शोर  से

उसकी  शरारतें  थी ये समझे बगैर भी

#

दरिया को देख के हमे होता  गुमान ये

हम मुतमइन  खड़े हैं किनारे बगैर भी

#

जो इम्तिहान  आज सियासत  में  हो रहा

वो बाजियां  भी जीते  हैं हारे बगैर भी

#

सर्दी  जुकाम कोई असर डालता नहीं

राहत भी मिल रही  है गरारे बगैर भी

#

आसान यूँ नहीं था गुजर जाती ज़िंदगी

तेरी मदद  बिना  औ , गुजारे बगैर भी

#

हम बे लिबास क्या  हुए  माना न आदमी

कपडे निचोड़ ले क्या उतारे बगैर भी

#

इतिहास कौन लिख रहा आजादी का यहाँ

जेलों में बंद था वो  सहारे बगैर भी

#

दहशत सी हो रही तिरी दुनिया को देख के

ज़िन्दा  हूँ ज़िन्दगी को सँवारे बगैर भी

#

तेरी  ये दाल  और  परोसी नहीं गई

खाई नहीं गई जो बघारे बगैर भी

#

पुर्जा  दुरुस्त है तो चलेगा ये साल  भी

वर्ना ये मान लो हो  खटारे बगैर भी

#

बुलडोजरों   सवार चले घर को रौदने

अभियान हो ये बंद उजारे बगैर भी

#

सुशील यादव दुर्ग (cg)

7000226712

 

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212

इतने भीगे हम भी तनहा यादों की बरसात में

वो ही छोटी कुटिया अपनी वैसे ही हालात में

 

कौन  आजीवन हमे दे आदमी की जिंदगी

नर्क की कुछ यातना पाने लगे  जज्बात में

 

बस  सजा सी बनती जाती दुःख की दीवारें बड़ी

लाँघ पाते हम कहाँ रिश्ते उसी औकात  में

 

पेड़ की  छाया में हमने, तब बिताये बचपने

अब उन्हें ही काटने, बैठे  रहे हैं घात में

 

छीन  लेता  कोई तुमसे जब खज़ाना  प्यार का

कुछ विकल्पों रोने सा रखते कभी तुम हाथ में

 

हम तनावों  में रहा करते हैं ज्यादा ही कहीं

कुछ पलों की दूरियां ढोते रहे सौगात में

 

घर का भेदी जब से लंका को ढहाने में गया

हम कलाये धोखा देने सीख लें अनपात में

Rajaz musamman saalim

mustaf'ilun mustaf'ilun mustaf'ilun mustaf'ilun

2212 2212 2212 2212

इस सादगी से हम, किनारा करके कब, अक्सर गए

तुझको कहीं  से ढ़ूढ़ने, चक्कर लगाते घर गए

 

मायूस  भी होना, लिखा था जो, नसीबों में यहाँ

यूँ ही किसी दिन हम निचोड़ें सोच ले  पत्थर गए

 

बाजार सा कोई लगाया,    बांटने को ज़िंदगी

ख़ुशियों  की कुछ उम्मीद में, खुद को  वहां  लेकर गए

 

अंदाज सा कोई लगा बैठा  कभी जो दूर से

कब  जर्द से अरमान  टूटे और सारे झर गए

 

मकसद मेरा है खात्मा होगा यहीं जानो इसे

ये सामने के  सूरमा बाहूबली सब  डर गए

 

ले के जो निकले  कारवां जो साथ दे वो ही चले

हम हिन्द के हैं वो  सजग ,डर दूर से का'यर गए

 

सुशील यादव दुर्ग (cg)

482

maqtzb musamman matvii makto_h

faa'ilaat maf'uulun faa'ilaat maf'uulun

2121 222 2121  222

तुम  मिली न होती तो कारवां कहाँ होता

फूल स्वप्न के झरते देखना  कहाँ होता

 

जग तमाम  रोशन कर डाले जात आदम ने

बोल ऐसे  में फिर जुगनू  बसा  कहाँ  होता

 

मंद सा हो पड़ा दिल बैठा बुझे चिरागो सा

हो बहार  मौसम सारा, खिज़ा  कहाँ होता

 

हैसियत  के खेलों  में आदमी रुलाते तुम

माथे पे पसीना भी सोचना कहाँ होता

 

दश्त में सियासी शेरो  जमात आई है

एक उस अकेले का फ़ायदा  कहाँ होता

 

मैं  सलीक़े  से जीता जिंदगी मगर मुझको

पांव दर्द  काँटे का  तजरबा  कहाँ  होता

 

कुछ थकी लगी मुझको, राह देखती मेरी

जिंदगी  सफ़र  फिर से दूसरा कहाँ होता

 

तू इसे सलीके से जिंदगी समझ जीना

आम है मुसाफ़िर यानी थका कहाँ होता

 

लापता  विवादों  में  तू रहा हकीकत है

हम कहाँ  तुझे ढूढ़े औ पता कहाँ होता

 

तुझको छोड़ देते हम आसमा में कोई दिन

कुछ खबर  नहीं मिलती क्या उड़ा कहाँ होता

 

पांव में  जँजीरें हाथो न खुलने आज़ादी

इन बुरे झमेलों में नाचना कहाँ होता

20.2.26

हज़ज मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन

221 1221 1221 122

मफ़लर  वही  सर्दी  के पुराने निकल आए

जज़्बात तहों गुम थे  खजाने निकल आए

 

वो  वक्त  जिसे हमने ही बर्बाद किया था

बालों की सफेदी  में जमाने निकल आए

 

मैं  सोचता हूँ मिल लूँ शराफ़त की गली में

कोई परिचय के यूँ  बहाने निकल आए

 

सादा  दिली  के  हम जहाँ कायल हुए जाते

फ़ुरसत मिले उसको वो सताने निकल आए

 

जुल्फ़े  तिरी  सावन की घटा बन  गई होती

हम गैर  , बहारों को   सजाने निकल आए

 

हद  होती रही तेरे नहीं आने की हरदम

हम ही तुझे घर से लो बुलाने निकल आए

 

नज़दीक ही  टूटे कभी बिखरे  मिरे रिश्ते

वैसे ही कई रिश्ते  बनाने निकल आए

 

कदमो में जग़ह दे ए खुदा मुझ को जरा सा

ताबीर में ख्वाबों को भुनाने  निकल आए

16.10.25

12122 12122 12122 12122

कहीं कुहासा कहीं  ये बदली ही  जिंदगी से लिपट रही  है

हमारे हिस्से की  धूप क्या जाने  किन  घरों  आज  बट रही है

 

शराफ़तों  पे शराफ़तें कब कहाँ हमे अब दिखाई जाती

यहां सियासत में आजकल अब तमाम तहज़ीब घट रही है

 

वे लोग  करते रहे जुगाली , सड़क नुमा बात  पर दे गाली

समझ  रही है अजीब जनता नसीब- किस्मत पलट रही है

 

महल पे साया  नहीं पड़ा है कभी दुखों का ये जानते हम

ये झोपड़ी कुछ दिनों से दानों के वास्ते ही सिमट रही है

 

मुझे अभी तक  नहीं मिली है  कोई भी राहत जनाब- आली

अदालतें तो किताब -कानून  बेसबब ही उलट रही है

 

22 22 22 22 22

Njm

अब तो वो कतरा के निकल जाता है

ख़ुद ही बस शरमा के निकल जाता है

 

चक्कर काटे नहीं गली में फिर कोई

शातिर  सर को  झुका के  निकल जाता है

 

है  हालात अभी  फ़क्त   तरस के क़ाबिल

लम्हा लम्हा   सताके निकल जाता है

 

बस चुपचाप मैं देख रही रगों तन्हाई

सिलवट दिल में   बिछा के निकल जाता है

 

उसको उसकी   ही ख़ामियाँ  भी तो घेरे

यादों जंगल उगा के निकल जाता है

 

नज़रें बोलो गड़ाऊँ मैं पुस्तक  कितनी

कुछ फूलों को दबा के निकल जाता है

 

1222 1222 122

ये बीमारी है खुजलाता बहुत है

सियासत झंडे  फहराता बहुत है

 

यहाँ कमजोर सी जादूगरी है

मगर खेला  वो दिखलाता बहुत है

 

हमी आँधी से टकराते रहे हैं

वो तूफानों को बहकाता बहुत है

 

गड़े मुर्दे  उखाड़ा   ही  नहीं  फिर

वही  आफत में इतराता  बहुत है

 

मरीजों को    तसल्ली ही बहुत है

नए  नुस्खे  क्यों  बतलाता  बहुत  है

 

नहीं अब मार  पाओगे  उसे  तुम

भले दलदल में वो फँसता  बहुत है

 

इलाजों पैसा पानी सा बहाया

इजाफा है  दमा खाँसा बहुत  है

 ##

बहर-ए-ज़मज़मा मुतदारिक मुसम्मन मुज़ाफ़

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन

22  22  22  22  22  22  22  22

दर्द जहाँ मैं टांगा करता, टूटी आज वो खूंटी लगती                  

सारे संबल सभी आसरे,बिना असर की बूटी लगती

 

लेकर चलना उसी गली में,यादों का भरता हो मेला

बचपन खेल घरोंदे वाले,  नाव डुबाता रहूं अकेला

उम्र क़े इस पड़ाव में, कितनी बातें छूटी  लगती

##

अरमानों  के  पँख़ नहीं थे, आकाश लगा करता छोटा

उड़ने की  ताकत आई तो  ,व्यवधानो ने रोका टोका

शेष बचा क्या कहने को ,  नगीन बिना  अंगूठी लगती

 

##

इन बाजुओं का दम तो देखो ,पहले जैसा आज भी क़ायम

तुझसे  मिलने की चाहत में ,रत्ती भर उत्साह नहीं कम

अरमानों की दुनियां तुझ बिन, खाली - खाली झूठी लगती

##

उमंग उजालों  से सजती  ,सदा रहे पहचान दिवाली

मुस्कान बांटते जाना तुम ,तमाशबीन  बजा दे ताली

मंहगाई बस पीठ छोलती ,  विपदाओ की  सूटी लगती

 

##

 
16.10.25

12122 12122 12122 12122

कहीं कुहासा कहीं  ये बदली ही  जिंदगी से लिपट रही  है

हमारे हिस्से की  धूप क्या जाने  किन  घरों  आज  बट रही है

 

शराफ़तों  पे शराफ़तें कब कहाँ हमे अब दिखाई जाती

यहां सियासत में आजकल अब तमाम तहज़ीब घट रही है

 

वे लोग  करते रहे जुगाली , सड़क नुमा बात  पर दे गाली

समझ  रही है अजीब जनता नसीब- किस्मत पलट रही है

 

महल पे साया  नहीं पड़ा है कभी दुखों का ये जानते हम

ये झोपड़ी कुछ दिनों से दानों के वास्ते ही सिमट रही है

 

मुझे अभी तक  नहीं मिली है  कोई भी राहत जनाब- आली

अदालतें तो किताब -कानून  बेसबब ही उलट रही है

 

502

27.2.26

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212

तू  चले गर राह मेरी कायदा हो जाएगा

सूखे रिश्तों का शज़र सींचो हरा हो जाएगा

#

जो तबीयत  में उदासी  छाई  रहती है मिरी

तुम दिखो बीमार को बस फायदा हो जाएगा

#

जिंदगी दुश्वारियों का महज़ दूजा नाम है

शोहरतों की जिद हुई तो तहलका हो जाएगा

#
भूत को तेरा  दफ़न कर दे,अगर निकला कहीं

तो जमाने में हँगामा सा खड़ा हो जाएगा

#

मत  समझ  अपने  को  ऊँचे  ओहदों का आदमी

कर तजुर्बा  और हासिल, कद बड़ा हो जाएगा

#

भागती  या  दौड़ती दुनिया को जीता कौन है

ज़िन्दगी में भर इरादे  फ़लसफ़ा  हो जाएगा

#

कौन जाने पास की उसकी जमा- पूँजी कहाँ

छेड़ दो बातें  बरहना बावला हो जायगा

#

सुशील यादव  दुर्ग

 

 
497

22.2.२६

मुज्तस मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मस्कन

मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन

1212  1122  121 2 22

तिरी  गली की  हिफाजत में मारा जाऊँगा

मै आदमी  हूँ बगावत में मारा जाऊँगा

#

ये लोग सब मिरे साथी हैं बीते बचपन के

भडक गए तो अदावत में मारा जाऊँगा

#

अभी करीने  से लेता   हूँ ज़िन्दगी साँसे

तिरे इलाज की  आदत  में  मारा जाऊँगा

#

न जाने कितने हैं इल्जाम मुझ पे हैं बाकी

मै आफताब की सूरत में मारा जाऊँगा

#

कोई सबूत नहीं  है मिरे गुनाहों  की

क्या फिर कहीं  मै लिखावट में मारा जाऊँगा

#

वजूद की यहाँ  होती लड़ाइयां लेकिन

बिना सबूत शिकायत में  मारा जाऊँगा

#

सुशील यादव दुर्ग (cg)

7000226712

496  20.2.26

हज़ज मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन

221 1221 1221 122

मफ़लर  वही  सर्दी  के पुराने निकल आए

जज़्बात तहों गुम थे  खजाने निकल आए

 

वो  वक्त  जिसे हमने ही बर्बाद किया था

बालों की सफेदी  में जमाने निकल आए

 

मैं  सोचता हूँ मिल लूँ शराफ़त की गली में

कोई परिचय के यूँ  बहाने निकल आए

 

सादा  दिली  के  हम जहाँ कायल हुए जाते

फ़ुरसत मिले उसको वो सताने निकल आए

 

जुल्फ़े  तिरी  सावन की घटा बन  गई होती

हम गैर  , बहारों को   सजाने निकल आए

 

हद  होती रही तेरे नहीं आने की हरदम

हम ही तुझे घर से लो बुलाने निकल आए

 

नज़दीक ही  टूटे कभी बिखरे  मिरे रिश्ते

वैसे ही कई रिश्ते  बनाने निकल आए

 

कदमो में जग़ह दे ए खुदा मुझ को जरा सा

ताबीर में ख्वाबों को भुनाने  निकल आए

सुशील यादव दुर्ग (cg)

 
491

14.2.26 shivratri

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

221 2121 1221 212

जीते  हैं  हम किसी भी  सहारे  बगैर भी

आवाज़ अब तो  सुन लो पुकारे बगैर भी

#

हम थे परेशा  रात किवाड़ों की शोर  से

उसकी  शरारतें  थी ये समझे बगैर भी

#

दरिया को देख के हमे होता  गुमान ये

हम मुतमइन  खड़े हैं किनारे बगैर भी

#

जो इम्तिहान  आज सियासत  में  हो रहा

वो बाजियां  भी जीते  हैं हारे बगैर भी

#

सर्दी  जुकाम कोई असर डालता नहीं

राहत भी मिल रही  है गरारे बगैर भी

#

आसान यूँ नहीं था गुजर जाती ज़िंदगी

तेरी मदद  बिना भी  , गुजारे बगैर भी

#

हम बे लिबास क्या  हुए  माना न आदमी

कपडे निचोड़ ले क्या उतारे बगैर भी

#

इतिहास कौन लिख रहा आजादी का यहाँ

जेलों में बंद था वो  सहारे बगैर भी

#

दहशत सी हो रही तिरी दुनिया को देख के

ज़िन्दा  हूँ ज़िन्दगी को सँवारे बगैर भी

#

तेरी  ये दाल  और  परोसी नहीं गई

खाई नहीं गई जो बघारे बगैर भी

#

पुर्जा  दुरुस्त है तो चलेगा ये साल  भी

वर्ना ये मान लो हो  खटारे बगैर भी

#

बुलडोजरों   सवार चले घर को रौदने

अभियान हो ये बंद उजारे बगैर भी

#

 
490

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212

लोग  हैं मासूम  कितने बस ये बतलाना मुझे

किस की होती है  हज़ामत रोज समझाना  मुझे

 

मौत पर बरगद में मेरी अस्थियाँ बाँधो भले

रूह ने जीते कभी सीखा न दफ़नाना  मुझे

 

ये हमारे  बीच आपस की हैं बातें जानिये

सब किनारा कर गए, कब आया  कतराना मुझे

 

मैं  भटकता आदमी मुझको नहीं मंजिल मिली

कोई बतलाता नहीं ,है किस पते जाना मुझे

 

सामने  में जिंदगी की क्या मुरादें  हैं बची

बस अधूरा  सा भरा  खुशियों  का पैमाना मुझे

 

दफ्न कर दो तुम यहाँ मासूम  हरकत  आज ही

तेरी  करनी की वजह पड़ता है  शर्माना  मुझे

 

इक तुम्हारी  याद की तस्वीर  मेरे दिल में थी

तुम जो छूटे  तो लगा है दूर  याराना  मुझे

सुशील यादव दुर्ग (cg)

7000226712

487

22 22 22 22 22 22 22

प्यास इतनी, मुझे सपने में, दरिया दिखाई देता है

हर सिम्त  बिछाया, तेरा, काँटा  दिखाई देता है

 

 रहमत के तलबगारों से , तेरा मिलना न हुआ

हर वजीफ़े में जिनको,  घाटा दिखाई देता है

 

मैं हूँ वो शख़्स जिसे तकदीर से , मिले हरदम धोखे

गालों मेरे रहबर का  , तमाचा दिखाई देता है

 

तुझको  खुदा ने तबियत से सीरत बख़्शी औ  ये बदन

उस मालिक का  खुद ही तराशा   दिखाई देता है

 

चाहे जितना तेरी ख़ातिर  लिख दूँ वो भी कम है

  मेरी अकीदत ये  साफ़  क़सीदा दिखाई देता है

 

उसकी अफ़सोस  तमन्ना मयकदे  में  कौन करे पूरी

जी भर के जो पी ले तब भी प्यासा दिखाई देता है

 

मेरे   मालिक  मुझको   भी ये तौफ़ीक़  अता  फ़रमा

ये दिल    कब से मेरा रूआँसा दिखाई देता है

 

मत लादो और    उसी के  पीठ कोई   वजनी  गठरी

पहले से वो कुछ ज्यादा ही थका  दिखाई देता है

 
२७२

2122 1122 1122 22

हम ही चोरों कि तरह ख्वाब में आने लगते

तुमको ये बात बताने में जमाने लगते

#

फिर पलट के नहीं आया मुझे  छोड़ा मौसम

हम कयासों  में जिसे और बुलाने लगते

#

आजमा लो मैं  वही शोर बियाबानों का

ये  मुक़द्दर कहीं  ढूढो तो घराने लगते

#

मै जो  बदनाम हुआ  बोलो खतायें किसकी

मेरे भीरत के कई  घाव पुराने लगते

#

हैं  मुसाफिर इसी  दुनिया में अकेले हम तो

लोग ये  मुझ को   सरे आम हटाने लगते

खून के घूँट पीते, नही तुम, जहर  जायका जानते

शहर  में क्यूँ भटकते भला गर मिरा तुम पता जानते

 

फूल से  रंज रखते नहीं गंध परहेज होता कहाँ

तुम भी मेरी तरह तितलियाँ भी कभी पालना जानते

@@

घर फूंकने की  हमको  इजाजत न मिल सकी

रुसवाइयों से  फिर कभी राहत  न मिल सकी

 

बर्बादियों  का  जश्न  मनाने  चले थे हम

माना बहार आई तो फुरसत न मिल सकी

 

अफ़सोस  ज़ोरदार  हमे होता ये रहा

राहत की मंडियों कोई राहत न मिल सकी

 

लाशें  बिछा  के कौन ये गलियों  में घूमता

कातिल  मिले खंजर मिले , हकीकत न मिल सकी

 

@@

घर में तख्ती जो लगी बस वो मेरे नाम की थी

और फैली हुई तन्हाई वही  काम की थी

 

बस अँधेरो से  डरा बैठा था कोने में चुप

कुछ इनायत कहीं मेरे छिपे घनश्याम की थी

 

फिर मुझे तोड़ के रख देती है मेरी चाहत

तेरी यादों  बसी  रुसवाई सुब्हो शाम की थी

@@

दर्द की हम से वकालत नहीं होती

और अच्छी कभी हालत नहीं होती

 

झूठ हमने कभी   बोला भी  नहीं है

और सच से  भी  अदावत  नहीं होती

 

इस तरह  हमको फँसाया है किसी ने

मेरी मिलती सी  लिखावट नहीं होती

 

हमने बोए हुए, फ़सलें  नहीं काटे

अब के मौसम बड़ी कीमत नहीं होती

@@

 
431

behre-e-saat-felun odd split

fe'lun fe'lun fe'lun fe'lun fe'lun fe'lun fe'lun

 

22 22 22 22 22 22 22

जो बरग़द –पीपल, बूढ़े पिता के बारे में सोचता है

वो अकेले में     हर सू   ख़ुदा के बारेमें सोचता है

#

देखा है  हिला के  किसी ने   सियासी अंग़द का पाँव

फिर तू नाहक़ क्यों    इन्सा के बारे में सोचता है

#

किस मजबूरी बहती है   लाशें , अपनो की  गंगा में

बोझिल  रिश्ते में कौन ,  चिता के बारे में सोचता है

#

जो  मयक़दे में  , बेआबरू हो कर जीने का आदी

वो   लुढका   खुद कब अस्मिता के बारे में सोचता है

#

किस तरह बनाते हर आफत बाजार  अवसरो का

खोटी नीयत वाला क्या  सजा के बारे में सोचता है

#

नजरों     में हो  चमक  ,  होठो  की हंसी ले के आओ

हो सके तो, क़मज़र्फ़ो के लिए,ज़िन्दगी  ले के आओ

#

- अँधेरे में  दो –चार कदम  चल न  पाओगे,बैठो चुपचाप

धुंध  सही, समझौते की  कोई  रौशनी ले के  आओ

#

हट जाए  पर्दा आखों से  कुछ वो काम करो   तुम

तजुर्बे की किसी दूकान से , मीठी   चाशनी ले के आओ

#

कुछ  फैसला   हम पे छोडो ,कोई  रुतबा  आप रखो  जी

कागज़ है  योज़ना है  क़श्ती है , कहीं नदी लेके आओ

#

हम तो   पढ़ नहीं पाते , चाह के ख़ुदग़र्ज़ो का चेहरा

या तो  हमसे बीस बनो  या  हममे   कमी ले के आओ

#

सिमटे हुए हैं   अपने दायरे में उम्मीद  सभी के

पारस की जाओ ढूढो  कोई   क़नी ले के आओ

#

तेरे मयख़ाने में  ऐ खुदा कब से     रिंद ये  प्यासा

कोई  बोतल यादों की    बची ज़रा सी ले के आओ

 

 

 
हज़ज मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन

 

221 1221 1221 122

मेरे किए  की  मुझको सज़ा  क्यों नहीं देते

इक  आग सुलगती है  बुझा क्यूँ  नहीं देते

 

अब कौन किसे याद  कभी आता है हरदम

हूँ  भूलने की चीज भुला क्यूँ नहीं देते

 

इस शहर  के हम  भी अभी भटके  हैं  मुसाफिर

रहबर हैं  अनेकों  ये   पता क्यूँ नहीं देते

 

जज्बात  पे काबू  हमें रखना नहीं आया

फिसलन  मिरी जी भर के बढ़ा  क्यूँ नहीं देते

 

पत्थर जिसे पूजा ,नहीं देता कभी चाहा

मन्दिर से इसे मन के ,हटा क्यूँ नहीं देते

 

पीतल की तरह  मुझको हमेशा कहीं माना

सोना हूँ अगरचे  मै,  तपा  क्यूँ नहीं देते

 

दादागिरी चलती नहीं हरदम किसी की अब

बन्दूक चला इनको बिदा क्यूँ नहीं देते

 

बस्ती अभी हर रोज  उजाड़ी हुई मिलती

ये जान लिवा  जंग मिटा क्यूँ नहीं देते

 

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf maskn

mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun

1212 1122 1212 22

कहीं  पे दिल हुआ उलझा जरूर  निकलेगा

नुमाइशों  के  नशे में वो चूर  निकलेगा

 

भरोसे से यही हम जी रहे हैं आगे अब

कि बारुदों से मिरा घर भी दूर निकलेगा

 

ये आइना  यहाँ इतराता भी बहुत  ज्यादा

हाँ  देखना  कहीं इसका गुरूर निकलेगा

 

ये लालची  है बहुत  लोमड़ी  सा मन इसको

खटास से भरा  काला अँगूर  निकलेगा

 

गरीब मांग रहा  हक़ में फैसला  लिख्खो

जुनून की ये समझ बस   फितूर निकलेगा

 

सलवटें सी  पड़ी है  आज उनके दामन में

बिना नशा किए उनका कुसूर  निकलेगा

 

 ##

 
रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212

आओ नफ़रत  को मिटा  दें हम जमाने के लिए

प्यार गंगा में बहा दें अम्न  लाने के लिए

 

खास तलवारें खिची है  आदमी दर  आदमी

सब्र  से सर को झुका दें फिर   उठाने के लिए

 

आओ दो- दो हाथ हम भी सामने   कर  ले अभी

शौक फ़रमाते हो ताक़त  आजमाने के लिए

 

कोई भी तहजीब में हिंसा नहीं  मुद्दा अहम

बस सदारत की लड़ाई है सताने के लिए

 

सर -फिरा  कोई तुम्हे रोजाना  उकसा जाता है

उसकी नीयत भी गडी है  तो खजाने के लिए

 

एक वो अभियान  चल जाए  धरा पर फिर कहीं

बम मिसाइल ना दहाड़ें  कुछ मिटाने के लिए

 

है खरा सोना वही उसको  तपाने में लगो

व्यर्थ  पीतल के पड़े ज्यादा गलाने के लिए

 

जुर्म की सीमा   तबाही  की हो भरपाई सभी

सब गुनहगारों चुने    फाँसी चढाने के लिए

 

सुशील यादव  दुर्ग

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

221 2121 1221 212

चिलमन  की  आड़ में मुझे वो ताकती तो है

कुछ  आहटें ये राज कभी खोलती  तो हैं

 

जो वक़्त  सीढ़ियाँ  चढ़ा, थक कर उतर  गया

शोहरत में   इन दिनों , हुई शायद कमी तो है

 

बातों को पेट  में  ही छुपाओ न चाह कर

ये उम्र  भर हिदायतें देती चुभी तो है

 

मौसम यहाँ वहाँ  से अभी लौट कर गया

बीमार  सी  हवावों मगर  ताज़गी  तो है

 

खिड़की खुली हुई  दिखी मुझको किसी भी दिन

तू इंतिजार  में मिरे बैठी रही तो है

 

सदमा लगा  है मुझको  उदासी को देख के

फसना भँवर  में अब क्या ,किनारा कहीं तो है

 

आओ करीब तुम मिरे जादूगरी करो

जलता  हुआ ये   दिल है  बुझी  ज़िन्दगी तो है

 

सुशील यादव  दुर्ग

 
मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

221 2121 1221 212

तिनकों  से डूबते  को सहारा  नहीं रहा

कश्ती  बही तमाम किनारा नहीं रहा

 

साथी नहीं बचे कोई  बचपन के इन दिनों

रुख़सत पे अख़्तियार हमारा नहीं रहा

 

हम  चाँट  लें किताब  सहूलत  रही कभी

वो वास्ता  कहीं तो दुबारा नहीं रहा

 

नक्शा  लकीर  सिर्फ़ खिंचा  फायदा नहीं

वो आसमाँ  बुलंद सितारा नहीं रहा

 

सर्दी की  रात  क्यों  न  गुजरती है चुप के से

कम्बल  बिना कही से  गुज़ारा  नहीं रहा

 

कैदी से  मुन्शिफ़ो की यहाँ भीड़ हो गई

अब फैसला मिया वो - करारा नही रहा

 

बोए थे  तेरी राह में हम आरजू के दिन

जब काटने को आए हमारा नहीं रहा

 

आखें मिरी  तलाशती महफूज दिल कहाँ

मालूम तब हुआ जो शिकारा नहीं रहा

 

बस वक्त ने बुझा दिया भीतर का जोश भी

कुछ आग थी मगर वो  शरारा  नहीं रहा

सुशील यादव  दुर्ग

रोजगारी भी दिलाओ तो कहूँ होली है

फिर गरीबी को हटाओ तो कहूँ होली है

 

तुम सियासत के  हो दमदार  वफा वाले जब

इस सियासत को हिलाओ  तो कहूँ होली है

 

घूंट पीकर  न रहो रोज जहर के प्यालों

जाम से जाम  लगाओ तो कहूँ होली है

 

वक्त के साथ  कभी  वक्त बिताने वालो

आइना वक्त दिखाओ  तो कहूँ होली है

 

ये शिकायत  नहीं   तुम दर्ज  कराओ  थाने

रंग   गालों को  मलाओ  तो कहूँ होली है

 

भाँग इतनी चढ़ी हमको कि उतर कब पाई

अपने आगोश सुलाओ  तो कहूँ होली है

 

क्या तमाशा  लगा रख्खा  है महीनो पहले

अब खुलासा भी कराओ  तो कहूँ होली है

 

बाटते जाना  हमें भी वो  बताशे ताजे

मुफ्त का माल दिलाओ तो कहूँ होली है

 

बारहा बच के निकल जाती  कभी  होली में

इस दफा पैर   जमाओ तो कहूँ होली है

 

तुमने  काटे यहाँ पेड़ों को  जो छाया देते

पेड़  फिर एक  लगाओ तो कहूं होली है

 

अब मरीजों  को नहीं सांस भी लेने फुरसत

कुछ हिदायत भी गिनाओ तो कहूं होली है

 

दौड़ने वाले  कहाँ  घोड़े  बचे मिलते हैं

और बारात नचाओ तो कहूं होली है

 

वक़्त  के साथ  तुम्हारा किया धुल जाएगा

रोक फिर  जंग सुझाओ तो कहूं होली है

  

रोज जुम्मन को सताया है यहाँ जी भर के

यो ही अलगू को सताओ तो कहूँ  होली है

  
मोर दास कबीरा….होली छीटे

मेरे  रहते  कर लो तुम ,खूबे   सैर सपाटा

फिर मेरे बाद देना, जी एस  टी  आन  आटा

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

तेरी सूरत  को  गली -गली में पहचाने है कौन

भगवा चोला पहन  के भाया  धूम मचा ले  मौन

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

कल को तुम ख़ाक छानना और बजाना बीन

मंहगा ढोलक और मंजीरा, पीट कनस्टर टीन

बोलो सारा रा रा कबीरा सारा रा रा

 

कुछ तो पढ़ इतिहास जरा , कुछ तो हो तल्लीन

चाय के संग तू सीख बेचना , मीठा औ नमकीन 

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

कब तक देकर राज करेगा ,नेहरु जी को गाली

एक हाथ से बजा बजा के थक जाएगा ताली

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

छतीसगढ़ी में ...

ऐ गांव के  भालू  रोही , आने गांव के बघुवा

छ्त्तीसगढ़ के मज़दूर  ले जावव कोरी कोरी बँधवा

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

कोन राजा कोन परजा , काखर राज  सिराही

ऐ  दारी के दंगल म मुरख कोनो अगुवाही

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

अब्बड़ तै  मता  डरे हस, गोठ- गोठ के गारा

कोनो दिन के मंम- हैय्या , अब बस्सावत  पारा

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

अतेक दिन ले  सित्परहा  बइठे,  लुका -लुका के भाँटो

आते देख चुनाव ला बइहा, कंबल -सारी  कहिथे बांटो

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

हमर किसान  धरे हवे  जम्मो बीजहा फोकला

अउ गुजराती मन  खावत मिलथे खम्मन ढोकला

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

हमर किसान के मेहनत पाछू,  हवे बोरे- बासी

तुहर आइ एस कोच्कैय्या , बुलडोजर सन्यासी

बोलो सारा रा रा ....कबीरा सारा रा रा....

 

जेती जाबे ओती  चीख़त हे  मनखे मारे पीरा

तब्भो ले कोदा -भैरा  बन गए मोर दास कबीरा

बोलो सारा रा रा कबीरा सारा रा रा

सुशील यादव दुर्ग

7000226712

 
14.3.26

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

221 2121 1221 212

*

आदत नहीं मैं  खोल दूँ, बातें हजार की

अब जिक्र  क्या  करूँ मिरे, शब इंतिजार  की

*

हर एक ज़िन्दगी  में ,कई मोड़ आते हैं

आई थी ऐसी  रातें ,हमारे क़रार की

*

तेरी तरफ से मै नहीं, सदका भी कर सका

क्या हाल देख ले ,तेरे कातिल शिकार की

*

राहत नहीं मिली हमें, रहमत के दौर में

हासिल  नहीं हुई , कभी  रोटी जुआर की

*

बाजी लगा के हम, यूँ ही बैठे थे सामने

गलती तिरी कमाल की, हमने सुधार की

*

अब फैसला भी  आएगा ,कोई तिरे खिलाफ

होगी  ढलान पे सभी, राहें उतार की

*

अब वक्त आ गया हमे, रुखसत मिले यहाँ

पहनी हुई तमाम, कमीजें उधार की

*

सुशील यादव दुर्ग

रमल मुसद्दस महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 212

,

भीड़ में शायद कहीं तन्हा हूँ मै

रोज़  ज़न्नत  को ज़हन  रखता हूँ मैं

,

है ख़्यालो की सभी जादूगरी

मुझमें  दरिया भी बहा, प्यासा हूँ मैं

,

ये कमाई मेरी  दौलत है यहाँ

आदमी हूँ आदमी, थकता हूँ मैं

,

मेरी जेबों में किसी का ख़त नहीं

ख़ुद किसे कब कोई ख़त  लिखता हूँ मैं

,

सब मुझे  देकर ,थके हैं मशवरा

शर्त ख़ुद की ही रखे ज़िन्दा हूँ मैं

,

कोई भी  इतिहास है मौजूद अब

किस मुसीबत  का अभी  मारा हूँ मैं

,

मेरे साथी अलविदा  कहते  गए

पर अभी  टहनी  कहीं बैठा हूँ मैं

,

और धरती रोज दहलाओ  अभी

बस हिसाबों पाप को गिनता हूँ मैं

,

सुशील यादव दुर्ग

7000226712

 

 

 
2212 1212

.जाने कहाँ गए वो दिन

मुझको  खुदा करार  दे

हाँ ज़िन्दगी में  प्यार दे

 

हम भी पड़े हैं राह में

हमको कभी तो तार दे

 

पहने फटी कमीज हैं

ये  सादगी को धार दे

 

नगदी में आज दे दिया

कल से मुझे उधार दे

 

प्यासा है रिंद रात से

तू पीने एक बार दे

 

कश्ती  तिरी  ख़राब है

ऐ  नाखुदा  उतार दे

 

घायल पड़ा हुआ  यहीं

तू खून एक बार  दे

 

दुल्हे सा सज लिया हूँ मै

बस हाथ में कटार दे

 

यूँ चाहिए करोड़ में

लेकिन अभी हजार दे

सुशील यादव दुर्ग

2212 1212

.जाने कहाँ गए वो दिन

जब से ये दिल शिकार है

बीमार मन उदार है

 

राहों के सब तो यार हैं

उल्फत भी रोजगार है

 

 

पूछो न मुझ  गरीब का

कुरता भी तार- तार है

 

हो भले वो खटारा भी

कहने  को  कार -कार है

 

ये सामने पडौस भी

लड़ने को बे करार  है

 

किडनी मेरी खराब है

लेना मुझे उधार है

 

कौड़ी नहीं है जेब में

लाखों का बस उधार है

 

सब्जी  ले कर गया नहीं

बेलन की मार- मार है

 

तेरे बिना ये दिल मिरा

दुखता भी  बार- बार है

 

 
रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मक़तू

फ़ाएलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन

2122 1122 1122 22

,

दिल पे गुजरी है अभी , तुमको सुनाऊं कैसे

एक राहत की किरन  ,उतरी दिखाऊँ कैसे

,

ज़र जमीने मिरी, छीनी है यहाँ भाई ने

दिल को भरपूर लगी, चोटें छुपाऊँ कैसे

,

मेरे अहबाब में शामिल, मेरे प्यारे लोगो

जख्म खाए है,निगाहों से हटाऊँ कैसे

,

क्या गरज मुझको, अगर मुझसे वही रूठा अब

गर ये तकदीर मिरी , उसको  मनाऊं कैसे

,

और भी होंगे जमाने में ,यहाँ दिल वाले

कांध हर एक जनाजे , को  लगाऊँ कैसे

,

अब घुटन सी तिरी  महफिल,  में हुआ करती है

मेरे  अशआर सरे आम , सुनाऊं कैसे

 

ये मिसाइल की धमक, शोर भी  दहशत वाली

रोज  दुनिया की तबाही, यूँ  गिनाऊँ कैसे

,

सुशील यादव दुर्ग

Ramal musaddas maKHbuun mahzuuf maskn

faa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

2122 1122 22

झुकती है दुनिया झुका कर देखो

थोड़ा सा दम  तो लगा कर देखो

#

तुम खिलौना जिसे समझा करते

जंग सामान  चला कर देखो

#

फेर  के मुँह  कहाँ  जाते हो अब

है  कुआँ  आग  बुझा  कर देखो

#

तुम भी क्या रहनुमा बनते -बनते

क्या से क्या  होगे बता कर देखो

#

मुल्क में होवे अमन  जारी फिर

इस बगीचे को सजा कर देखो

#

बाज आते  नहीं ओछी हरकत

तहलका सा ही मचा कर देखो

#

आदमी  कुछ हैं   अनमने -उँघते

दम  है  इनको ही जगा कर देखो

#

जो पढ़ाए जा रहे नफ़रत को

वो किताबें भी  हटा कर देखो

#

सुशील यादव  दुर्ग

 
कांसा के थारी अउ तांबा के गगरी

चकचक ले टूरी मन्जाय सही लागे M

#

-बटकी के बासी आमा के चटनी

बकबक ले टूरा रिसाय  सही लागे F

#

डनचकहा के नटनी, देख के जी

जिनगी ह रस्सी रेगाय  सही लागे

#

एसो के  ब्यारा म  फसल रच रच

टेक्नी में गाड़ा टेकाय  सही लागे

#

धाने बेचाही त करधन लेवाहूँ

मोगरा ह मोर  महमाय  सही लागे

#

आवत हे दाई के सुरता अब्बड़

नदिया के पूरा छेकाय  सही लागे

#

घेंच पिरात जे सेती नेवना निकालेव

फइटिका  ओखरे ओधाय सही लागे

#

कतेक ल सुनबे , किस्सा कहानी

गोठ के गारा बड मताय सही लागे

#

ऐ खानी कतको अंधन  चढ़ा ले

कबे सुरता के पेट अघाय सही लागे

#

तोरो कोती टोनही मटामट करत हे

मोर कोती बईहा बघवाय सही लागे

#

एसो तिहार के का ठेठरी अउ खुर्मी

जम्मा ह मनखे जस सिताय सही लागे

#

जरत हे अंगना तीपत भोभरा म भाटो

अन्ते तंते मने मन भूंजाय  सही लागे

 

 सुशील यादव दुर्ग

7000226712

12.3.26

गजल  धनाक्षरी

पर जिनके कटे थे , परिन्दे कहाँ गए

सीधे वो गांव के सभी  , बाशिन्दे  कहाँ गए

 

जमीन खा गई  उसे , कि निगला आसमान

चुपचाप  कर रहे , काले  धंधे  कहाँ  गए

 

शेर की खाल  पहन, एक  आया था भेड़िया

लूट  मचा दी गांव  में , पर चंदे  कहाँ गए

 

बेचता इंसानियत, कोई तो सुब्हो शाम

अक्ल  के बचे हुए , सब अंधे कहाँ गए

 

इश्तिहार है  लगा , चौराहे में आजकल

गुंडे मवाली देश के, दरिन्दे कहाँ गए

 

सुशील यादव  दुर्ग

 
मुतकारिब मुसम्मन सालिम

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

122 122 122 122

#

बड़े ना समझ हैं ये  हम देखते हैं

तुम्हारी शिकायत बे -दम देखते हैं

#

न तुम देखते  हो  न हम देखते हैं

हैं कमजोर आँखें जो कम देखते हैं

#

चलो नाव खोलो, चला  के भी देखें

सितम क्या हवा में, सनम देखते हैं

#

लगा है कहीं  दाग़, ओढ़ो न चादर

बिना दाग़ -धब्बा, करम  देखते हैं

#

वो मायूस बैठे ,हुए हैं न जाने

कि बातों से घायल, क़सम  देखते हैं

#

भरोसा उठा है ,कहीं खुद से अब तो

अदावत में डरते, क़दम देखते हैं

#

पिटा कोई मुहरा,  या चालें  पिटी हैं

अदालत  में अगला,  जनम देखते हैं

#

वो फूलें- फलें और, आबाद रह लें

भलाई के सपने, नरम देखते हैं

#

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

10.3.26

कामिल मुसम्मन सालिम

मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन

11212 11212 11212 11212

#

तेरी याद का  कहीं  शाम से, बड़े शान से  है जला दिया

तू इसे कहीं  से बहाल रख, नहीं देखना है बुझा दिया

#

मिरे जुर्म की सजा भी कहीं लिखी भी नहीं गई आज तक

यही  शहर  खौफ में ज़ायक़ा  सा समझ के ही क्यों भुला दिया

#

तुझे  सर्दियों  की वो रात में  कहीं भूलना भी मुहाल था

तुझे  कंबलों  या लिहाफ़ में बड़े जोर से ही दबा दिया

#

जो करीब से कभी पूछते हमें हाल दिल का पता कोई

हाँ उसे लिखा  यूँ ही रेत  पर किसी जिद में आके मिटा दिया

#

मैं  गुनाह रू ब रु क्या करुँ ये इनायतें कहाँ बेच दूँ

यूँ ही रहमतों की तलाश में दिली ख्वाहिशों को हटा दिया

#

सुशील यादव  दुर्ग

 

 
11.3.26
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf

maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun

2212  1211 2212  12

#

मैं  रामधुन में रोया  बस इतनी  खबर नहीं

भूखा पड़ौस   सोया  बस इतनी खबर नहीं

#

शायद कहीं से आप मुझे ढूढ़ दीजिए

उसको कहाँ हूँ खोया बस इतनी खबर नहीं

#

दुनिया  ये अब  मिसाइलो से चल रही  कहीं

इल्जाम क्या है ढोया बस इतनी खबर नहीं

#

काँटे लगा के हम कहीं अपने ही खेत में

सबको सुई चुभोया बस इतनी खबर नहीं

#

धोखे पे लग  गए  कहीं  पहरे यहां वहाँ

घोड़ों को बेच सोया  बस इतनी खबर नहीं

#

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

10.3.26

KHafef musaddas maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun

2122 12 12   22

फिर वही कायदा नहीं होता

जीत का सिलसिला नहीं होता

#

छू  न पाते उचाई कोई भी

खेलना जो हुआ  नहीं होता

#

तुम नहीं जाती छोड़ के मुझको

मैं मुसीबत घिरा नहीं होता

#

ये है जादूगरी हमारी भी

आज  मौसम खुला नहीं होता

#

एक तू ना मिली जमाने में

फिर सबक सा मिला नहीं होता

#

घूम आओ  हरे भरे जंगल

शेर शायद दिखा नहीं होता

#

आज  वीरान है यहाँ बस्ती

काश घर इक जला नहीं होता

#

बस हिफाजत की खैर मानो तुम

छत मिसाइल  गिरा नहीं  होता

#

अब ग़ज़ल  रीढ़ ही नहीं मिलती

शेर हमसे जुड़ा नहीं होता

#

सुशील यादव  दुर्ग

 
Mutqaarib musamman saalim

fa'uulun fa'uulun fa'uulun fa'uulun

122 122 122 122

मिला है नहीं ,आज  तक  तो ठिकाना

हमी  ने न  ढूढ़ा , गड़ा  था खजाना

 

कहाँ तक बतायें , किसे हम बतायें

मुहब्बत  भी सीखा,  नहीं है  छुपाना

 

झड़ी  आँसुओं  की,  लगी है यहाँ पे

उधर जल रहा है मिरा आशियाना

 

बहारों  ने वादा,  किया था  मुझी से

कि फूलों   लदेगा, तिरा  शामियाना

 

बचा के रखा है, खुदा ने मिरा भी

किसी छत के नीचे, मिरा आबो-दाना

 

यही है  हमारी , उजालों  की महफ़िल

यहीं पे  हमे , हाले  दिल है सुनाना

 

बताओ कहाँ तक चले साथ तेरे

बताओ  कहाँ शहर गाँवों से  जाना

 

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

हज़ज मुसम्मन मक़बूज़

मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन

1212 1212 1212 1212

अभी न जाओ छोड़कर .....

हमारी सांस चल रही मगर कहीं हवा नहीं

चिराग हौसला जला , जो खौफ में बुझा नहीं

 

किनारे  आ के हम रुके, नदी के छोर  पर डरे

अभी  हमारे ख्वाब में ,कहीं तो पर लगा नहीं

 

हमारी बात और थी ,तुम्हारी बात और है

तुम्ही ने कुछ कहा नहीं, हमी ने कुछ सुना  नही

 

मिरे  मुकाम आके बस  , वो  मुझको   आजमा चुके

मुझे  तो राहतों का हक़ , कभी  उठा  दिया नहीं

 

फटी कमीज है मिरी , फटे हुए से हाल है

मगर शिकायतें  रही  ,फटी  रिदा  सिया नहीं

 

वो  हाथ  में लिए  ,बजा रहे,  जो   बासुरी कहीं

वो धड़कनो  की ख़ैर , दिल से भी कभी सुना नहीं

 

मुझे मिरे भी हाल पर, कभी तो छोड़ देखना

कि जिंदगी  को ठीक –ठाक, मैंने  है जिया नहीं

 

ये चादरे  नसीब की, लकीर हाथ है बिछी

इसे क़रीब  ठीक से,हमी  ने कल  बुना  नहीं

 

भुला दे तू मुझे,  अगर है शौक, ये तिरी अभी

तिरी गुलाबी होठ को, मना किया छुआ नहीं

 

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 
9.3.26

 

हज़ज मुसद्दस सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

 

1222 1222 1222

हया के परदे में पर यूँ क़तर देगा

वो आग़ाजे मुहब्बत की खबर देगा

 

किसी दरवाजे  दम ना हौसला टूटे

लिखा है तो , बुला हाथो   हुनर देगा

 

मुझे भी टूट कर आया बिखरना जो

किसी दिन देख लेना हमको  घर  देगा

 

खतावारो हमी पर टूट बरसो तुम

गुनहगारों से बचने को नजर देगा

 

मेरे हक़ फैसला करना जरा वाजिब

कहीं राहत  मुसाफिर सा अगर देगा

 

हमारे साथ चल के देख लो तुम भी

हमारा ही तजुर्बा  सब कुतर देगा

 

मुज्तस मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मस्कन

मुफ़ाइलुन मफ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन

1212 222  1212  22

जो  सामना  हथियारों  तिरा  नहीं होता

मकान बादल से फिर घिरा नहीं होता

 

कहाँ -कहाँ गोले दागते रहोगे तुम

किसी का जंग से हरगिज भला नहीं होता

 

तमाम सरहद पर खौफ का तिरा साया

बे-कार मक़सद में फैसला  नहीं होता

 

ग़रीब को  जीवन भर सता नहीं सकते

गरीब इतना भी बावला नहीं होता

 

ए  मुल्क  के सोये  लोग  उठ पड़ो अब भी

दहाड़ना उनका शेर सा  नहीं होता

 

 

हो जुर्म दुनिया में अब मिसाइलें बेचो

मिसाइलों  का कर्जा   अदा  नहीं  होता

 

बिछा  के लाशें  कैसे तो  नींद आती है

हमी से उम्मीदों  रत जगा नहीं होता

 

क्यों  सब्र तू मेरा इम्तिहान  लेता है

बँदूक से  रिश्ता  तो मिरा नहीं होता

 

 

 
रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मक़तू

फ़ाएलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन

2122 1122 1122 22

#

और तड़फाओ मुझे इतना  कि  घायल कर दो

दूर तक मैं न दिखूँ तुमको यूँ ओझल कर दो

#

कुछ  इरादों का तमाशा ही बनाया  जग ने

कोई कालिख भी लगे तो उसे काजल कर दो

#

चीज भारी  नहीं हमसे भी उठाई जाती

तुम  तो हल्के में बुलाओ हमें पागल कर दो

#

मुझको रुसवाई के डर ने ही सताया हरदम

नाम मेरे  ये खनकती  हुई पायल कर दो

#

ज़िन्दगी में उगा करते कई खर- पतवारें

अब की बारिश  जरा भीगो इसे समतल कर दो

#

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

मेरे शहर में .....
#
22 22 22 22 22 2

मेरे शहर में दूध  का कोई धुला नहीं है

या कि  आदमी मुझसा मुझको   मिला नहीं है
#
तुझको कभी  देखे जरा आता करार सा था

और  मै  मानता  औरों से तू   जुदा  नहीं है

#
खींचा   है तेरी खातिर लड़ के नभ  से

मेरे हिस्से  में   हासिल बाकी हवा नहीं है

#

माना   कभी यादों से   हो  जाएगी दूरी

कैसे कहूँ जाना तेरा  अखरा नही है
#

कैदी  हैं पिंजरों के हम भी     गोया हमने

आजादी का जैसे सपना बुना नहीं है

#
जो हालात   हुए बे -काबू दंगो में

मेरे दौर का लेकिन ये हिस्सा नहीं है


#
खुशबू उठा  लाई क्यों पुराने दिनों को आज

मेरा बदन, तू रु ब रु ,गोया छुआ नहीं है

#

मै भाइयों  से खूब लड़ के  थक गया इसीसे
सोचा अदावत से किसी को फायदा नहीं है
#
सुशील यादव

 

 
6.3.26

धनाक्षरी गजल  ८,८,८,७वर्ण

अँधेरे में दुआ करूँ, ऐ ख़ुदा परछाई दे

बेख़्याली कहीं निकले,वो नाम सुनाई दे

 

करवट ना बदलूँ, सपनो में ना गाफिल

नीद से उठते तेरी, याद जुम्हाई दे

 

ना क़समों का क़सीदा  , ना  हो वादों का भी  ताना

यादों में तुझे बुन लूँ , इतनी तन्हाई दे

 

उजड़े गुलशन में  , ना टूटा शजर होवे

साथ   तकदीर  मेरी  , यूँ रोज  ख़ुदाई दे

 

रिश्तों की अदालत  , बेजान हलफ़नामे

या मुझको ज़िंदा रख,या  मेरी रिहाई दे

 

सुशील यादव दुर्ग

 

हज़ज मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन

221 1221 1221 122

बिगड़ी हुई कश्ती से ,उतर जाओगे तुम भी

हालात ये कहता है , किधर  जाओगे तुम भी

 

फसलें हुई बर्बाद ,मुकर जाओगे तुम भी

मौसम की ख़राबी से ही, डर जाओगे तुम भी

 

महफिल अभी ताने दिए जाता  है, सभी को

बख़्शेगा नहीं कोई , अगर जाओगे तुम भी

 

बस्ती  अभी वीराने में, तब्दील हुई है

हिंसा  में हिफ़ाजत  से,  ठहर जाओगे तुम भी

 

आसान  नहीं वक्त से,  लोहा तिरा लेना

टकराने पे मुमकिन है , बिखर जाओगे तुम भी

 

तारीख़   बदलते  हुए  मौसम की गवाही

दिन एक  यूँ ही  बच के गुजर जाओगे   तुम भी

 

गावों की तबाही  से कहाँ बच सका कोई

लड़ने को  गरीबी   से  नगर  जाओगे तुम भी

 

बदमाश शरीफों  में तिरा नाम लिया है

हालात के चलते तो सुधर जाओगे तुम भी

 

पीछा कभी   छोड़ा  नहीं जाएगा तुम्हारा

हम रुख वही  जायेंगे  जिधर  जाओगे तुम भी

 

 

सुशील यादव  दुर्ग

 
हज़ज मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन

221 1221 1221 122

मेरे किए  की  मुझको सज़ा  क्यों नहीं देते

इक  आग सुलगती है  बुझा क्यूँ  नहीं देते

 

अब कौन किसे याद  कभी आता है हरदम

हूँ  भूलने की चीज भुला क्यूँ नहीं देते

 

इस शहर  के हम  भी अभी भटके  हैं  मुसाफिर

रहबर हैं  अनेकों  ये   पता क्यूँ नहीं देते

 

जज्बात  पे काबू  हमें रखना नहीं आया

फिसलन  मिरी जी भर के बढ़ा  क्यूँ नहीं देते

 

पत्थर जिसे पूजा ,नहीं देता कभी चाहा

मन्दिर से इसे मन के ,हटा क्यूँ नहीं देते

 

पीतल की तरह  मुझको हमेशा कहीं माना

सोना हूँ अगरचे  मै,  तपा  क्यूँ नहीं देते

 

दादागिरी चलती नहीं हरदम किसी की अब

बन्दूक चला इनको बिदा क्यूँ नहीं देते

 

बस्ती अभी हर रोज  उजाड़ी हुई मिलती

ये जान लिवा  जंग मिटा क्यूँ नहीं देते

 

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

2121 1122 1122 22

हम जो भटके हुए राही हैं हमारा क्या है

फिर सवालों  घिरे   मतलब ये दुबारा क्या है

 

खर्च कर लो  यहाँ  बातों की जमा पूँजी सब

देखना बाद में जीवन का इशारा क्या है

 

चाँद  की वो हसी सूरत भी तुम्हारी होती

लाख झिलमिल  हुआ चमका ये सितारा क्या है

 

हम गरीबो की लो फूटी रही किस्मत अपनी

आग बाकी ही नहीं हो तो शरारा क्या है

 

अब तो रहती  नहीं कोई भी गरज तुमको भी

कितना पानी बहा दरिया में नज़ारा क्या है

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 

 

 
Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf maskn

mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun

1212 1122 1212 22

कहीं  पे दिल हुआ उलझा जरूर  निकलेगा

नुमाइशों  के  नशे में वो चूर  निकलेगा

 

भरोसे से यही हम जी रहे हैं आगे अब

कि बारुदों से मिरा घर भी दूर निकलेगा

 

ये आइना  यहाँ इतराता भी बहुत  ज्यादा

हाँ  देखना  कहीं इसका गुरूर निकलेगा

 

ये लालची  है बहुत  लोमड़ी  सा मन इसको

खटास से भरा  काला अँगूर  निकलेगा

 

गरीब मांग रहा  हक़ में फैसला  लिख्खो

जुनून की ये समझ बस   फितूर निकलेगा

 

सलवटें सी  पड़ी है  आज उनके दामन में

बिना नशा किए उनका कुसूर  निकलेगा

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 2122 212

आओ नफ़रत  को मिटा  दें हम जमाने के लिए

प्यार गंगा में बहा दें अम्न  लाने के लिए

 

खास तलवारें खिची है  आदमी दर  आदमी

सब्र  से सर को झुका दें फिर   उठाने के लिए

 

आओ दो- दो हाथ हम भी सामने   कर  ले अभी

शौक फ़रमाते हो ताक़त  आजमाने के लिए

 

कोई भी तहजीब में हिंसा नहीं  मुद्दा अहम

बस सदारत की लड़ाई है सताने के लिए

 

सर -फिरा  कोई तुम्हे रोजाना  उकसा जाता है

उसकी नीयत भी गडी है  तो खजाने के लिए

 

एक वो अभियान  चल जाए  धरा पर फिर कहीं

बम मिसाइल ना दहाड़ें  कुछ मिटाने के लिए

 

है खरा सोना वही उसको  तपाने में लगो

व्यर्थ  पीतल के पड़े ज्यादा गलाने के लिए

 

जुर्म की सीमा   तबाही  की हो भरपाई सभी

सब गुनहगारों चुने    फाँसी चढाने के लिए

 

सुशील यादव  दुर्ग

7000226712

 

 
17.3.26

हज़ज मुसम्मन सालिम

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 1222

,

इशारों में कहीं पर कुछ, निशानी  छोड़ आते हैं

जिसे समझो तुम्ही मन से, कहानी  छोड़ आते हैं

,

ये अपनी कोई आदत है, नहीं मालूम हमको भी

अदावत जिससे  करते हैं,  जवानी  छोड़ आते हैं

,

हुआ ये हाल अपना भी ,बगीचे में किसी दिन तो

घड़ी भर  राह तकने, ख़ुद के मानी  छोड़ आते हैं

,

हमी तो मोल ठहराते कहीं, सामान की हरदम

हमी सौदा कहीं पे ,बद-जुबानी  छोड़ आते हैं

,

पटाना  बस नहीं आया ,कहीं क़िस्मत हमें अपनी

ये ऐसी शय जहाँ  पे , जिंदगानी  छोड़   आते हैं,

,

सुशील यादव दुर्ग

7000226712

 

16.3.26

मुज्तस मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मस्कन

मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन

1212 1122 1212 22

.

ये ज़िन्दगी का बहाना बहुत  पुराना था

तुझे तो साथ मिरे चल के दूर  आना था

.

शिकायतों का लँबा सिलसिला  चलेगा कल

बग़ावती सभी मुखबिर   यहीं  ठिकाना था

.

पसीने छूट रहे  कातिलों  के    थाने में

सिपाहियों  का दिखा बंदुके  सजाना था

.

यहां किसी को विरासत जमीन  मिलती है

हमे तो खंडरें ही नाम का खजाना था

.

क्या बोते और  कभी  काटते फ़सल क्या- क्या

कहीं तो धार भी सीखा नहीं लगाना था

.

ये चालबाजियां  को देख के गुमा होता

कतार  में  तिरा  होना  फ़क़त  बहाना था

.

तमाम  शहर है  चस्पा ये इश्तिहार  मेरा

बुराइयों  यहीं नामोनिशा  हटाना था

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वो आंकते  भी  नहीं  हैसियत का गुब्बारा

'सुशील' कितने दबाओं इसे फुलाना था

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सुशील यादव दुर्ग

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17.3.26

Hazaj musamman aKHrab makfuuf mahzuuf

maf'uul mufaa'iil mufaa'iil fa'uulun

221 1221 1221 122

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जब दिल मिरा टूटा मुझे आराम ना आया

ये  भी तो  कबाड़ी के किसी  काम ना  आया

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हम दर्द के मारों का नहीं ठौर- ठिकाना

हद से भी गुजरता हुआ पैग़ाम ना  आया

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क्या खास मुलाकातें, बिताई हुई रातें

कुछ आम सी हरक़त किसी के काम ना  आया

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जीने   का मज़ा और हुआ करता था मुझको

जाने का जहाँ तक   तिरा फ़रमान ना  आया

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साँसे  भी लिया करते हमी  पूछ जहाँ से

बाज़ार  में  राहत  नया सामान ना आया

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हम अजनबी सूरत लिए बैठे रहे  दिन- भर

बातें सुनी अपनी   कोई   पहचान ना  आया

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उम्मीद हज़ारों की मिली  फूलती- फलती

किस्मत का  धनी था वहीं   मेहमान ना आया

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बे- दर्द जमाना,   कहाँ  फहराते  हो झंडे

बारूद का  मलमा दबा फिर  जान ना  आया

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बस जंग न बेचो  ये मिसाइल  के  बताशे

बरबादियों  का जश्न से मुस्कान ना आया

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सुशील यादव दुर्ग

 

आँख मेरी अब लगी है

ज़िन्दगी क्या खोजती है

 

हम ने किनारा भी  किया

बस यही तो दुर्गति है

 

खूब है डर   शहर तिरे

गाव की राहजनी है

 

वक्त की बातूनी  घड़ी

बस यही सच बोलती है

 

सुशील यादव दुर्ग

 
 

14.3.26

मुज़ारे मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

221 2121 1221 212

*

आदत नहीं मैं  खोल दूँ, बातें हजार की

अब जिक्र  क्या  करूँ मिरे, शब इंतिजार  की

*

हर एक ज़िन्दगी  में ,कई मोड़ आते हैं

आई थी ऐसी  रातें ,हमारे क़रार की

*

तेरी तरफ से मै नहीं, सदका भी कर सका

क्या हाल देख ले ,तेरे कातिल शिकार की

*

राहत नहीं मिली हमें, रहमत के दौर में

हासिल  नहीं हुई , कभी  रोटी जुआर की

*

बाजी लगा के हम, यूँ ही बैठे थे सामने

गलती तिरी कमाल की, हमने सुधार की

*

अब फैसला भी  आएगा ,कोई तिरे खिलाफ

होगी  ढलान पे सभी, राहें उतार की

*

अब वक्त आ गया हमे, रुखसत मिले यहाँ

पहनी हुई तमाम, कमीजें उधार की

*

सुशील यादव दुर्ग

 

रमल मुसद्दस महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 212

,

भीड़ में शायद कहीं तन्हा हूँ मै

रोज़  ज़न्नत  को ज़हन  रखता हूँ मैं

,

है ख़्यालो की सभी जादूगरी

मुझमें  दरिया भी बहा, प्यासा हूँ मैं

,

ये कमाई मेरी  दौलत है यहाँ

आदमी हूँ आदमी, थकता हूँ मैं

,

मेरी जेबों में किसी का ख़त नहीं

ख़ुद किसे कब कोई ख़त  लिखता हूँ मैं

,

सब मुझे  देकर ,थके हैं मशवरा

शर्त ख़ुद की ही रखे ज़िन्दा हूँ मैं

,

कोई भी  इतिहास है मौजूद अब

किस मुसीबत  का अभी  मारा हूँ मैं

,

मेरे साथी अलविदा  कहते  गए

पर अभी  टहनी  कहीं बैठा हूँ मैं

,

और धरती रोज दहलाओ  अभी

बस हिसाबों पाप को गिनता हूँ मैं

,

सुशील यादव दुर्ग

7000226712

 

 
2212 1212

.जाने कहाँ गए वो दिन

मुझको  खुदा करार  दे

हाँ ज़िन्दगी में  प्यार दे

 

हम भी पड़े हैं राह में

हमको कभी तो तार दे

 

पहने फटी कमीज हैं

ये  सादगी को धार दे

 

नगदी में आज दे दिया

कल से मुझे उधार दे

 

प्यासा है रिंद रात से

तू पीने एक बार दे

 

कश्ती  तिरी  ख़राब है

ऐ  नाखुदा  उतार दे

 

घायल पड़ा हुआ  यहीं

तू खून एक बार  दे

 

दुल्हे सा सज लिया हूँ मै

बस हाथ में कटार दे

 

यूँ चाहिए करोड़ में

लेकिन अभी हजार दे

 

सुशील यादव दुर्ग

 

2212 1212

.जाने कहाँ गए वो दिन

जब से ये दिल शिकार है

बीमार मन उदार है

 

राहों के सब तो यार हैं

उल्फत भी रोजगार है

 

पूछो न मुझ  गरीब का

कुरता भी तार- तार है

 

हो भले वो खटारा भी

कहने  को  कार -कार है

 

ये सामने पडौस भी

लड़ने को बे करार  है

 

किडनी मेरी खराब है

लेना मुझे उधार है

 

कौड़ी नहीं है जेब में

लाखों का बस उधार है

 

सब्जी  ले कर गया नहीं

बेलन की मार- मार है

 

तेरे बिना ये दिल मिरा

दुखता भी  बार- बार है