SHIKSHA YA SUVYAVASTHIT VYAVASAY in Hindi Magazine by उषा जरवाल books and stories PDF | शिक्षा या सुव्यवस्थित व्यवसाय ?

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शिक्षा या सुव्यवस्थित व्यवसाय ?

                   “बच्चा वही, स्कूल वही… फिर हर साल ‘एडमिशन फीस’ क्यों?”

 “जब मैंने अपने बच्चे का पहली बार स्कूल में एडमिशन कराया, तब सोचा था यह एक बार की प्रक्रिया है… लेकिन हर साल वही ‘एडमिशन फीस’ देखकर एक सवाल उठता है — आखिर क्यों?”

“हर साल ‘री-एडमिशन फीस’: क्या स्कूल शिक्षा दे रहे हैं या अभिभावकों की परीक्षा ले रहे हैं?”

कोलकाता जैसे महानगर में, जहाँ माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए हर संभव त्याग करते हैं, वहीं कई निजी स्कूलों की फीस संरचना अब एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर रही है।

एक बार एडमिशन के समय “एडमिशन फीस” देना समझ आता है। लेकिन जब वही बच्चा, उसी स्कूल में पढ़ते हुए, हर साल “री-एडमिशन” के नाम पर फिर से शुल्क देने को मजबूर किया जाता है, तो यह सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक पैटर्न बन जाता है। वार्षिक शुल्क, ट्यूशन फ़ीस, स्मार्ट क्लास चार्ज, क्लब एक्टिविटी, स्पोर्ट्स, रोबोटिक्स — इन सबके नाम पर हर वर्ष अलग-अलग शुल्क वसूले जा रहे हैं। बसों में ए. सी. लगाना, स्मार्ट क्लास देना — ये सब आधुनिक शिक्षा का हिस्सा हो सकते हैं लेकिन जब इन सुविधाओं की कीमत हर साल बिना विकल्प के अभिभावकों पर डाली जाती है, तो यह सुविधा कम और मजबूरी अधिक लगती है।

प्रश्न यह नहीं है कि स्कूल सुविधाएँ क्यों दे रहे हैं ?
प्रश्न यह है कि क्या इन सुविधाओं का बोझ हर साल एक ही अभिभावक पर डालना उचित है?

कोलकाता में रहकर पिछले दो वर्षों में मैंने एक बात बहुत गहराई से महसूस की है—
यहाँ शिक्षा अब सेवा नहीं, एक महँगा सौदा बनती जा रही है।

जब बेटे का पहली बार स्कूल में एडमिशन कराया, तो लगा कि यह एक जरूरी प्रक्रिया है। एडमिशन फ़ीस दी, वार्षिक शुल्क दिया—सब कुछ सहज लगा। लेकिन असली झटका तब लगा, जब छठी के बाद सातवीं में जाते समय फिर वही सवाल सामने खड़ा हो गया—

फिर से “एडमिशन फ़ीस” क्यों?

हर साल एक नई वसूली ! यानी हर साल, हर दिशा से फ़ीस का नया दबाव।

जब बच्चा उसी स्कूल में पढ़ रहा है, तो हर साल “री-एडमिशन” के नाम पर शुल्क क्यों?

मुझ जैसे एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए यह सिर्फ फ़ीस नहीं, बल्कि एक मानसिक और आर्थिक दबाव है। घर का बजट बिगड़ता है | बचत प्रभावित होती है और हर साल एक नई चिंता जन्म लेती है |

क्या अच्छी शिक्षा पाने की कीमत इतनी भारी होनी चाहिए?

एक बात मुझे समझ नहीं आई कि शहर बदलते ही नियम क्यों बदल जाते हैं?

दिल्ली जैसे शहरों में फीस संरचना पर नियंत्रण के प्रयास हुए हैं | वहाँ ऐसे बार-बार “एडमिशन फ़ीस” लेना आम नहीं है लेकिन कोलकाता में यह एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है।

क्या यह प्रशासनिक ढील है? या शिक्षा के नाम पर खुली कमाई?

👉 क्या हर साल “एडमिशन फ़ीस” लेना न्यायसंगत है?
👉 क्या यह शिक्षा का विस्तार है ?  या एक अनकहा शोषण?

यह लेख किसी एक अभिभावक की शिकायत नहीं, बल्कि हज़ारों परिवारों की आवाज़ है। हर वो माँ-बाप जो अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं, आज इसी दुविधा में हैं।

क्या स्कूल शिक्षा दे रहे हैं, या फिर शिक्षा के नाम पर एक व्यवस्थित व्यवसाय चला रहे हैं?

स्कूलों को यह समझना होगा कि शिक्षा का उद्देश्य बच्चों का भविष्य बनाना है, न कि अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ाना। उन्हें फीस संरचना को पारदर्शी एवं न्यायसंगत करना होगा |

 

शिक्षा, जिसे कभी समाज का आधार माना जाता था, आज धीरे-धीरे एक “सुव्यवस्थित व्यापार” में बदलती दिख रही है। यदि आज इस विषय पर संवाद शुरू नहीं हुआ, तो आने वाले समय में यह समस्या और गहराती जाएगी।

“बच्चा वही, स्कूल वही… फिर हर साल ‘एडमिशन फीस’ क्यों?”
क्या आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं? अपनी राय ज़रूर साझा करें।

 

उषा जरवाल ‘एक उन्मुक्त पंछी’

गुरुग्राम, हरियाणा