How can one change the habit of loneliness? in Hindi Poems by sushil yadav books and stories PDF | कोई तन्हाई की आदत को कैसे तो बदल डाले

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कोई तन्हाई की आदत को कैसे तो बदल डाले

280

3-4-25

KHafef musaddas maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun

2122 1212 22

क्या हैं क्या तो  दिखाना पड़ता है

खुद को कितना सजाना पड़ता है

#

कौन खुदगर्ज को बताए ये

वक्त पे आजमाना पड़ता है

#

मय-कदे का नियम यही  जानो

हैसियत से  पिलाना पड़ता है

#

आप तशरीफ लाइए तो अब

बारहा क्यों बुलाना पड़ता है

 

सुशील यादव दुर्ग


 

281

8.4.25

Rajaz musaddas matvii

mufta'ilun mufta'ilun mufta'ilun

2112 2112  2112

आस्था  के अंगद अड़े है साहब

अर्जी ले ये अपनी खड़े है साहब

#

बाज नहीं आते हो  मनमानी से

देखो हमी कद में बड़े है साहब

#

तुम तो बनाओ कोई पैसों के ही पुल

रस्ते कहाँ खंबे गड़े है साहब

#

लूटने वाले सभी दल मिल जाते

पकड़े गए  लोग छड़े है साहब

#

पक्के सियासत  कहाँ होते वादे

इल्म पुराने ही  कड़े है साहब

#

व्यर्थ है पानी यहां  खर्चा करना

ये सभी चिकने से घड़े है साहब

#

जुर्म की दुनिया से निकल आए है हम

जुल्म किताबें जो पढ़ें है साहब

#

सुशील यादव दुर्ग

 


 

283

Ramal musamman saalim maKHbuun mahzuuf

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilun

2122 1122  1122 112

नर्म लहज़े का कहीं  खेल तुम्हारा ही न हो

हम मुसाफ़िर यहाँ  क़िस्सा ये  हमारा ही न हो

#

यूँ नहीं खौफ़ में तुझको भी पुकारा ही न हो

दौरे- उल्फ़़त में मिला  जैसे किनारा ही न हो

#

हम भी  बेचैन रहा करते थे तन्हाई में

मेरी ज़ानिब तेरा कोई तो इशारा ही  न हो

#

इन ज़मातों में कहीं शोर शराबा ही नहीं

ये फ़टे हाल जियें इनका  ग़ुजारा ही  न हो

#

डूब  जाती वहीं  क़श्ती उसी मझ़धार जहाँ

जब भँवर पास में  वाज़िब सा किनारा ही  न हो

#

हम ज़ुदा हो के भी यादों में कभी मिल लेते

तुझको अहसास का मंज़र ये गवारा ही न हो

#

और मुझको कहीं  जी  भर के सता लेना कभी

मेरी किस्मत में लिखा कोई सितारा  ही न हो

#

गम की आँधी से बचा लाया हूँ  उम्मीद सभी

क्या पता कल यहाँ बैठा तिरा मारा ही न हो

#

हौसला है तो तबीयत से भी जीना सीखो

जिन्दगी रोज महरबान  दुबारा ही न हो

# सुशील यादव दुर्ग

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

284..

14.4.25

Hazaj musamman maqbuuz mahzuuf

mufaa'ilun mufaa'ilun mufaa'ilun fa'al

12121212121212

#

कहाँ पे ख़ोई औऱ क़़ब ग़ुमी ये  ज़िंदगी

जो फासले  करीब आ  रुकी ये ज़िंदगी

#

कहाँ  कसे रक़ाब ,जीन भी चढ़ी नहीं

जो हौसलों की दौड़ में खड़ी ये ज़िंदगी

#

हमी नकाब  में कहीं  बुरे फँसे हुए

उतार  भी सके क़्या हथकड़ी ये जिंदगी

#

है ज़श्न का, ज़वान  मामला, यहाँ अभी

लिखा है किसके नाम दो घड़ी ये ज़िंदगी

#

क्या बात थी कि दूर  तुम खफा हुए चले

बता दूँ मुझ  से खुद  गले  पड़ी ये ज़िंदगी

#

मुसीबतों  कभी पहाड़ टूटता यहाँ

अमीर  बन के देख़ फ़ुलझड़ी ये ज़िंदगी

#

 सुशील यादव दुर्ग

 


 

285...

15.4.25

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

2122 1122 1122 22

आरज़ू  को अभी चाहत में ज़गाते रहिये

कौन कहता  है कि  वादा भी निभाते रहिये

#

हम जो नज़दीक़ तिरे आ नहीं सकते लेकिन

दिल नज़ाकत लिए  ख़ुद आप ही आते रहिये

#

ज़ुल्म के दौर में कितने यहां ज़ालिम होंगे

कोई अंदाज़ कभी आप लगाते रहिये

#

है शिकंज़ा  अभी जोरों से कसा लगता मगर

फ़िक्र अपनी  क़िसी को रोज बताते रहिए

#

दौरे उल्फ़त ये सिखाता रहा मजबूती से

इल्म  के धुंधले परदों को हटाते रहिये

#

पूछते है वफ़ा के माने जहाँ में उनको

हाल- किस्सा कोई मज़नू का सुनाते रहिये

#

दाग़- धब्बे  हटा दो सामने से मेरे तुम

साफ चेहरे से दिलासा ही दिलाते रहिये

#

आग लगती  रही  ज़िद की कहीं हम उफ़ न किए

आग दिल में जो लगी है वो बुझ़ाते रहिये

#

नींद ग़हरी जिसे आयी है वही सोया है

एक तूफ़ान कहीं पास उठाते रहिये

# सुशील यादव दुर्ग

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

286

15.4.25

Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf maskn

mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun

1212  1122 1212  22

बहाने कुछ तो बनाने में देर लगती है

पता भी पूछ के आने में देर लगती है

#

ये  ख़ामुशी  के भी  मतलब  तो जानते होंगे

अदा से बात बताने में देर लगती है

#

वो पूछते रहे  सब्रो-क़रार की बातें

इसे निग़ाहों छुपाने में देर लगती है

#

वो फ़ैसला हमी पे छोड़े  बैठा है  अब तो

क़्या फ़ासला  है बताने में देर लगती है

#

कहाँ लिखा है ख़ज़ाने का  रास्ता लफ्जों

ये इल्म को कहीं पाने में देर लगती है

#

लो इश्तिहार  के माफ़िक  हमें  तो चिपका लो

मगर इसे ही हटाने में देर लगती है

#

है कौन क़ातिलों के शहर में अभी ज्यादा

बग़़ावतों को मनाने में देर लगती है

#

सुशील यादव दुर्ग

 


 

287

15.4.25

Mutdaarik musamman saalim

faa'ilun faa'ilun faa'ilun faa'ilun

212 212 212 212

जिन्दगी खुद की अर्थी बना ले गई

अपने काधों पे खुद को उठा  ले गई

#

ताकते रह गए  हम नसीबो में सुख

आँधियां  वक्त की  सब  उड़ा ले गई

#

आज बीमार नसलों से क्या फायदा

फिर कहाँ हमको  आखें दिखा ले गई

#

रोज बुनियाद को सब  हिलाते रहे

कल  इमारत जमी से  गिरा ले गई

#

सनसनी फैलती शहर में जब कहीं

बस शराफत- हिना ही  चुरा ले गई

#

हम विचारों  उसे आजमाते रहे

वो सितारों की  बातें बना ले गई

#

लोचा था  पर कहीं परदे से  लापता

वो बड़ी चीज़ थी ख़ुद हटा ले गई

#

सुशील यादव दुर्ग

 


 

288..

15.4.25

Madiid musamman saalim maKHbuun

faa'ilaatun fa'ilun faa'ilaatun fa'ilun

2122  1122  112222

आज जाना  तिरे बिन अपनी  हालत क्या है

क्या है तक़लीफ़- ए- ज़़माना  मुसीबत क्या है

#

छोड़ आए तिरे दम पे  उजालों  को हम

रौशनी की तिरी महफ़िल जरूरत क्या है

#

रोकता कोई नहीं  अज़नबी का  रस्ता

फिर  दलीलों हुआ  ज़ाहिर शराफ़त क्या है

#

वक्त  रफ़्तार से आगे  चले इस क़ोशिश

और बचने  तिरी ज़ानिब से सूरत क्या है

#

होंगे मशहूर ज़माने में ये अफ़साने

फिर यही  बात  उठाना  हक़ीक़त क्या है

#

सुशील यादव दुर्ग

 


 

289

16.4.25

Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf

maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun

221 2121 1221 212

हर काम हो रहा है बड़ी बेदिली के साथ

हम तंग़ आ चुके हैं यहाँ  ज़िन्दगी के साथ

#

देखे थे हमने  रोज बहारों के सपने जो

टूटे हैं  वो सभी मेरी दरियादिली के साथ

#

तुमने लिख़ा था  नाम से मेरे जो ख़़त कभी

सब जर्द हो गए यहाँ पे   सादगी के साथ

#

ख़ुदग़र्ज  भीड़ पे  किसी  सूरत नज़र रखें

खो जाते हैं ये देखते  ही तीरगी के  साथ

#

कुछ तो पता चले मेरे जीने का क्या सबब

कोई सुराग़ तो मिले फिर रौशनी के साथ

#

हम जी रहे  सुशील सहारे बिना अभी

होता  है हादसा ज़हाँ में हर किसी के साथ

#

मै सोचता  सुकून से अपनो के बीच में

बेखौफ़ ज़िन्दगी लूँ   मज़ा आदमी के साथ

#

सुशील यादव दुर्ग

 

 


 

290..

20.4.25

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

21221122112222

वो  उसूलो को  हिलाते  है चले जाते है

रुतबा खुद  रोज दिखाते है चले जाते है

#

आदमी को कभी पढ़ना  भी नहीं आ पाया

अपनी मजबूरी सुनाते है चले जाते है

#

मै हकीकत से उसे क्या करूं वाकिफ ज्यादा

घूँट दो मय की  पिलाते हैं चले जाते हैं

#

एक वादा  जहाँ  लोगों का भरोसा होता

तोड़ने को वही आते  हैं चले जाते हैं

#

हमने इंसाफ की सूरत में चुना था उसको

फायदा खूब  गिनाते हैं चले जाते हैं

#

सुशील यादव दुर्ग

 

 

 


 

291

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

2122  1122  1122  2220.4.25

कौंधती जो  तेरी यादें तो वफा कहते हैं

इस सलीके से चलो  बाद-ए-सबा कहते हैं

#

हमने ढूढा  उसे महफिल  भरी  उम्मीदों से

एक पुर्जा   नहीं मिलता जो पता कहते हैं

#

नाव कागज़ की ही  रेतों में बहा दी तुमने

लोग तकदीर को जोड़ें तो जुड़ा कहते हैं

#

पांव अंगद के  यहाँ आज भी कायम होते

योजना  में दिखे तो लोग अड़ा कहते हैं

#

एक किरदार निभाना  उसे आता जोरों

आदमी जो मरे लाशों की अदा कहते हैं

#

ये कहानी घरों  घर में कही  जाती होगी

दबदबा रोज   दिखाती वो बुआ कहते हैं

#

हम बुढ़ापे की सफेदी बचा पाते कब तक

चीज बालों को मिला करती हिना कहते हैं

#

आज साहेब की गाड़ी नहीं चलती रुककर

रोज दफ्तर में भले  सिर्फ  बुरा  कहते हैं

#

कामयाबी  के हिसाबो में उसे परखो तुम

लोग  तकदीर सिकन्दर को   जुदा कहते हैंसुशील यादव दुर्ग

 


292

19.4.25

KHafef musaddas maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun

2122 1212  22

मन जो तस्वीर है हटा दूँ क़्या

आग  चाहत की अब बुझ़ा दूँ क़्या

#

इश्तिह़ारों सा मुझ़को चिपकाया

आग बस्ती  कहो लगा दूँ क़्या

#

आज लहज़ानहीं बदल पाया

फिर वही बात दोहरा दूँ क़्या

#

लोग कैसे बिना वज़ह जीते

कुछ हुनर जीने का सिखा  दूँ क्या

#

लापता है सुशील जादूगर

जानता हूँ मैं कुछ पता दूँ क्या

 

सुशील यादव दुर्ग

 

 

 

 

 


 

293

17.4.25

KHafef musaddas maKHbuun mahzuuf

faa'ilaatun mufaa'ilun fa'ilun

21221212112

#

एक पत्ता भी जबहिला ही नहीं

कोई बीमार को हवा ही नहीं

#

जिद है मर्जी से जाने की उसकी

और उसकोमैं रोकता ही नहीं

#

खून भी खौलता नहीं मेरा

बे- सबब सब्र टूटता ही नहीं

#

और होंगे मेरी अदावत में

बैर ले के मै घूमता ही नहीं

#

अब तो मौसम भी खुशनुमा हो गया

क्या पता ऐसा कलहुआ ही नहीं

#

सुशील यादव दुर्ग


 

294

21.4.25

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

1212 1122 1212 22

नसीब तुमने  पुकारा  कभी इनायत से

वो  ग़र्दिशों  रखा करता हमें  हिफ़ाज़त से

#

जो लूटने को यहाँ आते  लोग बंजारे

क्यूँ  ख़ातिरें ज़रा होती बड़ी तबीयत से

#

किसी ज़रूरतों  उसकी तरफ मुड़ा होगा

हाँ  इंक़लाब सा आया उसी बदौलत से

#

हमें तो लुटने की आदत थी लूटते तुम भी

सियासती क्यों बिसातें बिछी   मुहब्बत  से

#

तुम्हारे शहर में ऐसा कहीं भी होता क्या

कोई उज़ाड़ दे बस्ती ख़याली ताकत  से

#

सुशील यादव दुर्ग

 


 

295

Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf maskn

mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun

 (1212 1122 1212 22)

`है कौन जो कहीं हमको तराशता होगा

किसी के पास तो उसका कहीं पता होगा

#

ये आग सी लगी रहती  बदन में मेरे फिर

किसी की सोच में ग़हरे अभी ज़ला  होगा

#

मुसीबतें कभी कह के नहीं गि़रा करती

ज़रूर  ही कोई धोक़ा तुझे हुआ  होगा

#

उसूल खूब निभाते चले थे तुम राहों

नजर हटी वहीं काँटा तुझे चुभा होगा

#

ज़नाब को नहीं हासिल हुआ कभी रुतबा

इसीलिए वही बुलँदी से चीख़ता होगा

#

मेरे हिसाब में वाज़िब नहीं लगा कोई

तेरे हिसाब ख़रा कोई तो बैठता होगा

#

अदावतें कहाँ आपस की मानती बातें

ये फ़ैसला भी अदालत का मामला होगा

#

मलाल हमको था कि शक़ इमानदारी पर

वो आदमी भरी महफ़िल  में अध-मरा होगा

#

मैं जानता नहीं कैसे तुझे भुलाना है

यूँ ही ख़याल मुझ़े तेरा आ गया होगा

#सुशील यादव दुर्ग

 

 

 

 

 

 

 

 

 

296..

24.5.25

Ramal musamman maKHbuun mahzuuf maqtuu.a

faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilaatun fe'lun

(2122 1122 1122 22)

मैं   जो कहता  ही नहीं, ठीक अग़र रहने दे

फिर भी ग़ुस्ताख़ निग़ाहों  का  असर  रहने  दे

 

आज मुमकिन दिखा हमको तेरा तनहा होना

इस सियासत को लगी कोई नज़र रहने  दे

 

शाख़ से फूल  गिरा करते बे-मौसम अब तो

पेड़ कब होती  सज़ा से बा- ख़बर रहने दे

 

फिर वो फूले- फ़ले से दिखने लगे हमको अब

सज रही, उनकी जो दीवारें, ठहर रहने दे

 

एक हम हैं , दिलो जॉ से  तुझे चाहें,  पर तू

मशवरा लेने लगी रहती, मगर रहने दे

 

सुशील यादव दुर्ग

 


 

297

25.4.25

Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf maskn

mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun

1212 1122 1212  22

#

ख़ुदा  तरफ़ से तराशा हुआ नहीं आया

हाँ बावज़ूद ये रोता हुआ नहीं आया

#

तलाश  थी  मुझे मंज़िल की दूर दरिया में

क़रीब मेरे पहुंचा हुआ नहीं आया

#

किसी- किसी के तरफ़़दार होने से पहले

सौ बार से मेरा परख़ा हुआ नहीं आया

#

उसे भी वक़्त ने बेरहमी से कुचल डाला

वो  ज़िंदगी में  अकेला हुआ नहीं आया

#

यहाँ वही रहे दरियादिली से मस्ती में

उसी के नाम तमाशा हुआ नहीं आया

#

मैं  आदमी कहीं पहचान पा नहीं सकता

सही- ग़लत ही निखरता हुआ नहीं आया

#

क़बूतरों  के  अभी  दिन कहाँ रहे बाकी

तेरा  लिख़ा मुझे भेजा हुआ नहीं आया

#

 

सुशील यादव दुर्ग

 

 


 

298

 

(1212 1122 1212 22)

Mujtas musamman maKHbuun mahzuuf maskn

mufaa'ilun fa'ilaatun mufaa'ilun fe'lun

#

वतन की राह अमन  फैसला  जरूरी है

हमारी सोच में कागज़ बता जरूरी है

#

वो देखते रहे हाँ आसमान  की जानिब

गो मुल्क में कहीं तो आपदा  जरूरी है

#

ख़िज़ाब को लगा लेते  क़िसी तरह छुप के

सरों में  बाल का होना सदा  जरूरी है

#

लो मौत का अभी फरमान भी हुआ जारी

कि आदमी हुआ  तो मुस-लमा जरूरी है

#

सबक यही  है जमाने से जूझना सीखो

अगर  हो पार  नदी तैरना जरूरी है

#

सुशील यादव दुर्ग

 


 

299

 

28.4.25

Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf

maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun

22121211221212

#

आँधी  तुफ़ान औऱ ये बारिश तो देखिए

फ़िर आग को बुझ़ाने की कोशिश तो देखिए

#

ख्वाहिश  मिरी  ग़ुनाह सभी रोक दूँ अभी

मुझ पर लगी हुई  यहाँ बंदिश तो देखिए

#

माना  अदावते कभी मरती नहीं मग़र

ये आप  कायराना सा रंजिश तो देखिए

#

इस्लाम  इस्तमाल किया खूब अपने हक़़

दहशत के नाम पे ज़रा जुम्बिश  तो देखिए

#

क़ायर  की ज़मात   यूँ  शामिल नहीं करो

बर्बाद  कर रखें उसे   ख्वाहिश तो देखिए

#

सुशील यादव दुर्ग

 

 


 

300

 

29.4.25

Hazaj musamman saalim

mufaa'iilun mufaa'iilun mufaa'iilun mufaa'iilun

1222 1222 1222 1222

#

कोई तन्हाई की आदत को कैसे तो बदल डाले

वही  यादें वही मौसम है  सोने में ख़लल डाले

#

तुझ़े हक़़ है मिरे जीने या मरने  की ख़बर  रख ले

तू  चाहे तीरग़ी में  रौशनी लेकर दख़ल डाले

#

मै फूलों को सहेजे  रखता हूँ अब भी   क़िताबों में

मेरी फ़ितरत  कहाँ  जो  ज़र्द पत्तों को मसल डाले

#

अभी तक दर्द के जंगल भटकता  पूछता  तुमको

ख़ुदा भी रहमतों  का कुछ इनायत  से अक़ल डाले

#

उसे आता मज़ा गाहे ब-गाहे बस सताने में

हमारी ज़िंदगी में ख़ौफ़ के हरदम  दँगल डाले

#

सुशील यादव दुर्ग

#