No revolution was ever made by imitation - 24 in Hindi Biography by Dr. Suryapal Singh books and stories PDF | नकल से कहीं क्रांति नहीं हुई - 24

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नकल से कहीं क्रांति नहीं हुई - 24

जीतेशकान्त पाण्डेय- आपने एक कविता में लिखा है-‘दशानन कब नहीं रहे हैं किस देश में, किन्तु राम छत्रकदंड की भांति उगते नहीं उगाए जाते हैं। कोई भी नया राम पुराने राम को दुहराता नहीं।’ इस कविता के माध्यम से आप क्या कहना चाहते हैं? 


डॉ0 सूर्यपाल सिंह- कविता मेरे सोचने का एक माध्यम है। किसी विचार को कविता की थोड़ी पंक्तियों में अच्छी तरह व्यक्त किया जा सकता है। इस कविता में भी मैंने क्रांति के सम्बन्ध में अपना विचार व्यक्त किया है। मैं यह सोचता रहा हूँ कि क्रांतियाँ पुराने औजारों से नहीं होतीं। हमें समय के अनुरूप नए औजार तैयार करने पड़ते हैं। इसका उदाहरण अक्सर मैं अपने यहाँ अवतारों के हथियारों से देता रहा हूँ। हमारे यहाँ अवतार की परिकल्पना है। अवतार प्रायः वह होता है जिसके अवतरण से समाज में कोई गुणात्मक परिवर्तन होता है या किसी समस्या का समाधान निकलता है। हमारे यहाँ किसी अवतार ने पुराने अवतार के हथियार से काम नहीं किया।

यह इस बात का संकेत है कि किसी नयी क्रांति के लिए हमें नए अस्त्र उपयोग में लाने होंगे, उन्हें गढ़ना होगा। इस कविता के माध्यम से इसी बात को स्पष्ट किया गया है। इसलिए इसकी अंतिम पंक्ति है-‘नव-जवानों नकल से किसी देश में क्रांति नहीं हुई।’ क्रांतियों पर मैंने और भी विचार व्यक्त किया है। मैं यह मानता रहा हूँ कि क्रांतियाँ कुछ दूर चलने पर पटरी से उतर जाती हैं। उनका लक्ष्य पूर्ण नहीं हो पता, कुछ न कुछ अधूरापन रह जाता है। कविता की वे पंक्तियां हैं- 

क्रांतियों के नाम को इन्सान,

पूजता है जैसे भगवान।

किन्तु वे चौराहे के पार ही,

पगडंडी पर उतार लिया करती हैं।

क्रांतियाँ अधूरी हुआ करती हैं।  

 

जीतेशकान्त पाण्डेय- अपने प्रभूत साहित्य रचा है। क्या आप अपने रचनात्मक लेखन से संतुष्ट हैं? आपकी भावी योजनाएँ क्या हैं ?

डॉ0 सूर्यपाल सिंह- अब तक जो लिखा गया है इसका अधिकांश ग्रंथावली के दस खंडों में समायोजित है। जिसमें आठ खंडों का प्रकाशन हो चुका है। संभवतः अगले वर्ष तक बचे दो खंड प्रकाशित हो सकेंगे। वर्तमान में ज्यादा समय ग्रंथावली के संशोधन आदि में देना पड़ता है। इस बीच नया लेखन जरूर कम हुआ है पर यदि स्वास्थ्य इसी तरह साथ देता रहा तो अभी बहुत कुछ लिखना शेष है। जो कुछ अब तक लिखा गया है, वह भी सार्थक है।

पर अभी और नया कुछ लिखने की योजना बनती रहती है। लेखक अपने लेखन से सन्तुष्ट नहीं होता, वह निरंतर कुछ नया लिखना चाहता है। सन्तुष्ट होने का अर्थ है हाथ-पाँव सिकोड़ कर बैठ जाना। एक सचेत लेखक ऐसा न सोचता है न करता है। मैं भी ग्रंथावली का काम निपट जाने पर लेखन की गति बढ़ाने पर विचार कर रहा हूँ। अभी पहले से ही उस पर कुछ चर्चा करना उचित नहीं है। 

जीतेशकान्त पाण्डेय-  हमने अभी तक आपके साहित्यिक जीवन पर चर्चा की। आप लगभग चालीस वर्षों तक माध्यमिक और उच्च शिक्षा में अध्यापक और प्राचार्य पद पर काम करते रहे। वर्तमान शिक्षा में क्या कमियाँ देख पा रहे हैं? 

डॉ0 सूर्यपाल सिंह- बच्चों को शिक्षित करना अत्यन्त आवश्यक होता है। इसके लिए अभिभावक, समाज और शासन को अपना दायित्व निभाना होता है। हमारे देश में शिक्षा केंद्र और राज्य दोनों का विषय है। दुनिया में कई विकसित देश अपने सकल राष्ट्रीय उत्पाद का सात-आठ प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करते हैं। कोठारी आयोग ने यह संस्तुति की थी कि भारतीय सकल राष्ट्रीय उत्पाद का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए। पर 2020-21 में 4.64 प्रतिशत ही खर्च हो पाया है।

शासकीय विद्यालयों एवं सहायता प्राप्त विद्यालयों से स्ववित्त पोषित विद्यालयों की संख्या कई गुना बढ़ गई है और उनकी सुविधाओं में बहुत अन्तर है। निजी संस्थानों में जहाँ अच्छा कार्य हो रहा है, उनका शुल्क बहुत अधिक है। सामान्य घरों के बच्चे उतना शुल्क दे पाने में सक्षम नहीं होते। इसलिए उन्हें सुविधाविहीन विद्यालयों में प्रवेश लेना पड़ता है। शासकीय या सहायता प्राप्त विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में सभी बच्चों को प्रवेश नहीं मिल सकता है। इसलिए पूरी शिक्षा व्यवस्था में समर्थ अधिक लाभ उठा पाते हैं।

जो आर्थिक रूप से सम्पन्न नहीं है वे गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्राप्त करने में पीछे रह जाते हैं और यहीं से बच्चों का दो वर्ग बन जाता है। गुणवत्ता युक्त शिक्षा पाने वाले और गुणवत्ताहीन शिक्षा पाने वाले। इसका प्रभाव उनकी अर्जन-क्षमता पर भी पड़ता है। एक वर्ग अधिक कमा पाता है और दूसरा कम कमा पाता है। जरूरत इस बात की है कि आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को भी गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान की जाए जिससे वे भी जीविका अर्जित करने में सक्षम हो सकें। संकट यह भी है कि हमारा पाठ्यक्रम दुहराव वाला अधिक है।

आज के युग के अनुरूप उसमें परिवर्तन नहीं हो पा रहा है। प्रायः यह देखा जाता रहा है कि नए परिवर्तन का विरोध अध्यापक ही करते रहे हैं। मैं एक उदाहरण देना चाहूँगा- भारत में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान केवल चालीस ट्रेडों का प्रशिक्षण देते हैं जबकि चीन में पाँच हजार ट्रेडों का प्रशिक्षण दिया जाता है उनमें वे ट्रेड भी है जिनकी जरूरत अगले वर्षों में होगी। समाज जिस गति से बढ़ रहा है इससे उसकी आवश्यकताओं में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। उसके अनुरूप हमें शिक्षा में परिवर्तन करना होगा।

यदि हम ऐसा नहीं कर पाते तो बच्चे न तो स्वरोजगार में सक्षम होंगे और न दूसरा ही कोई उन्हें रोजगार देगा। केवल समयपश्च सामग्री को पढ़़ाना पर्याप्त नहीं है। हमारी शिक्षा व्यवस्था इस संकट से जूझ रही है। शिक्षक शिक्षा की धुरी होता है। यदि शिक्षक अपने क्षेत्र में कुशल, नवोन्मेष करने वाले और परिश्रमी होंगे तो शिक्षा में सुधार होगा। अपने देश में यह देखा जाता है कि अधिकांश शासकीय और सहायता प्राप्त संस्थानों में अध्यापक यह समझ लेता है कि हमारा वेतन तो निश्चित हो ही गया है। काम में लापरवाही कौन कहे, उच्च शिक्षा में चार प्रतिशत प्रॉक्सी (चतवगल) अध्यापक काम करते देखे गए हैं।

प्राथमिक और माध्यमिक में यह संख्या और भी ज्यादा है। यह जरूरी है कि सभी बच्चों तक गुणवत्ता युक्त शिक्षा पहुँचे। पाठ्यक्रम नवीन आवश्यकताओं के अनुरूप हो। अध्यापक परिश्रमी हों और नवोन्मेष में रुचि लेने वाले हों। विद्यालय, विश्वविद्यालय का परिवेश बच्चों को प्रोत्साहित करने वाले हो। अध्यापक की मानसिकता में बदलाव के लिए समय-समय पर पुनश्चर्या कार्यक्रम का आयोजन होना चाहिए। उन्हें इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि वे पाँच-छह घंटे अध्यापन तथा सम्बद्ध कामों में दे सकें।  

जीतेशकान्त पाण्डेय- वर्तमान परीक्षा प्रणाली में क्या सुधार की जरूरत है? 


डॉ0 सूर्यपाल सिंह- राधाकृष्णन कमीशन (1948-49) ने संस्तुति की थी कि भारतीय शिक्षा में एक परिवर्तन करना हो तो वह परीक्षा में होना चाहिए। भारत सरकार ने अमेरिकन शिक्षा शास्त्री बी.एस. ब्लूम को बुलाकर सुझाव देने के लिए कहा। ब्लूम ने यहाँ की स्थितियों का अध्ययन कर यह सुझाव दिया कि पाठ्यक्रम को छोटे-छोटे शैक्षिक लक्ष्यों-संज्ञानात्मक, कौशल सम्बन्धी, भावात्मक आदि में विभाजित कर पढ़ाया जाना चाहिए। जिन लक्ष्यों को ध्यान में रखकर पाठ पढ़ाया जाता है उन्हीं के अनुरूप परीक्षा के प्रश्न होने चाहिए।

इसीलिए प्रश्नों की संख्या केवल पाँच, दस नहीं होगी बल्कि लक्ष्यों के अनुरूप इनकी संख्या बनेगी। ब्लूम के ही सुझाव पर प्रश्न पत्रों में कुछ अन्तर किए गए जिसमें वस्तुनिष्ठ, अतिलघु उत्तरीय, लघु उत्तरीय तथा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न निर्धारित किए गए। वर्तमान में अधिकांश परीक्षाओं में वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जा रहे हैं। इसका एक कारण यह है कि इनकी जाँच संगणक के माध्यम से आसानी से की जा सकती है लेकिन इसमें आत्मनिष्ठता का विलोपन हो जाता है। प्रायः यह कहा जाता है कि वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के माध्यम से परीक्षार्थी के सभी कौशलों, भावों आदि का मूल्यांकन नहीं हो पाता।

इसलिए उसके साथ कुछ लघु उत्तरीय और दीर्घ उत्तरीय प्रश्न जोड़े गए थे। अब विश्वविद्यालय का भी झुकाव वस्तुनिष्ठ प्रश्न की ओर हो रहा है। इसलिए अन्य कौशलों के विकास के लिए आंतरिक मूल्यांकन की व्यवस्था की गई है। परीक्षार्थी के संपूर्ण मूल्यांकन में वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के अंकों में आंतरिक मूल्यांकन के अंक भी जोड़े जा रहे हैं। यह शिकायत अवश्य मिलती रही है कि आंतरिक मूल्यांकन में अधिक अंक दिए जाते हैं। पर अनेक विश्वविद्यालयों में केवल आंतरिक परीक्षा ही होती है और उनका मूल्यांकन भी आंतरिक परीक्षक ही करता है। वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठ को जोड़कर जो प्रक्रिया नयी शिक्षा नीति में अपनायी गयी है यदि उसे सही ढंग से लागू किया जाता है तो इसके सकारात्मक परिणाम होंगे। क्रियान्वयन के स्तर पर हमें अधिक सजग, सचेत होना होगा।