चैत्र माह में जैसे मौसम कुछ ठंडा कुछ गरम रहता हैं ऐसे ही कुछ है ये किस्सा, मैं मेरठ से ग्वालियर अपने बी.ए. के पेपर होने के बाद नानी के घर छुट्टियों के लिए ट्रेन से सफर करने जा रहा था। उस दिन ट्रेन में बैठने के लिए कुछ देर लेट हो गया था क्योंकि माँ ने पूरी तलने में अधिक समय लगा दिया था। मैंने तो उनसे मना किया कि कोई जरूरत नही खाने की परंतु वह कहाँ मेरी सुनने वाली। जैसे तैसे करके मैं गतिमान बन, एक अटैची, राई के आलू और कुछ पूरी लिए स्टेशन पहुँचा। स्टेशन पर अथाह भीड़ थी लोग जमीन पर चादरें बिछाए पिकनिक मना रहे थे और कुछ लोग बेंचों को अपना नरम गद्देदार बिस्तर समझ कर एक टांग ऊपर किए मीठी नींद ले रहे थे। मैं एक सज्जन इंसान हूँ, तो खुद को वामन अवतार समझे बिना मैं उन नीचे विराजमान यात्रियों के शीश पर पैर रखने से बचता बचाता किसी तरह अपने प्लेटफॉर्म पहुँचा। ट्रेन आने में कुछ आधा घंटा बाकी था। पर मुझे अपने पिताजी से विरासत में जल्दबाज़ी मिली है- समय से पहले आना ठीक है, पर समय से कुछ ज्यादा पहले आ जाना मेरे खलीयरपन को जगजाहिर कर देता है।
ट्रेन के इंतज़ार में मैं प्लेटफॉर्म पर ही भटकने लगा और भटकते-भटकते एक किताबघर जा पहुँचा - बड़ा ही विशाल। पर वहाँ का अटेंडेंट उससे भी विशाल था - कुछ सात फुट का बेडौल सा जानवर लगता था उसके केश और दाढ़ी किसी साधु से थे, कपड़े ऐसे जैसे तंबू से काटे हों, रंग भयावह अंधेरे के स्वरूप - यानी पहली मुलाकात में डर से आलिंगन।
मैंने घबराते हुए उसके कंधे की ओर हाथ बढ़ाया और कहा, 'सुनो भाई'। वह पलटा, क्षण भर मुझे देखा और किसी सूखी टहनी की तरह पतली आवाज़ में मुझसे कहा, 'बोलिए भैया'। मैं चौंक गया यह क्या, नाम बड़े दर्शन छोटे। अंग्रेज़ी में किसी विद्वान ने सही ही कहा है -"डोंट जज अ बुक बाय इट्स कवर।"
मैंने अपनी हँसी दबाते हुए उससे कहा कि पढ़ने के लिए कुछ रोचक मिलेगा ? तो उसने कहा "जी, हाँ।" उसकी आवाज़ सुनकर वहाँ खड़ा रहना मुश्किल हो रहा था , हँसी मुझे अपने वश में कर रही थी कि तभी मुझे शिष्ट आचरण मे रहने की अनुभूति हुई - चलो कहीं तो पाँचवीं में मास्टर जी से लगी पिटाई काम आई।
मैंने एक लंबी साँस भरी और उस विशाल व्यक्ति से उनकी पसंदीदा किताबें माँगी। चार - पाँच किताबें मेरे सामने रख दी गई। अब मसला यहाँ आकर अटका कि कौन सी किताब ली जाए, ट्रेन भी कुछ ही क्षण में आने वाली थी। तभी एक पुरवाई कोई मीठी सी खुशबू लिए मेरे समीप आ खड़ी हो गई , गुलाबी सूट ,आँखों में काजल, माथे पर एक छोटी काली बिंदी, हाथों में गिनी-चुनी चूड़ियाँ , मानो कोई अप्सरा परलोक से भूलोक पर ट्रेजिडी उपन्यास लेने आई हो । उसने अपनी किताब के पैसे पूछे और अटेंडेंट को वह पैसे देने लगी। इतने में उसने अपना हाथ पल भर के लिए मुझे दी उन चार किताबों में से एक किताब पर रखा । उस किताब का कवर सफेद था, इसलिये शायद उसके हाथों पर लगी पुरानी किताबों की धूल उस सफेद कवर पर लग गई।
मैं तुरंत मूर्ति मुद्रा से बाहर आया और वह किताब खरीद ली। ऐसा आजतक कभी हुआ नहीं - बड़ी ही अजीब किस्म की जल्दबाज़ी करी मैंने । ट्रेन का हार्न तेज़ी से बजा । ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लगने लगी , वो लड़की भी शायद इसी ट्रेन में जा रही थी। मेरा यह ख्याल जल्दी ही मैंने प्रार्थना में बदल लिया
" हे प्रभु, इस स्त्री को मेरे ही डिब्बे में मेरी ही सीट के पास भेज दीजिएगा।"
शायद उस दिन उस क्षण मेरी जिह्वा पर माँ सरस्वती विराजमान थी मेरी प्रार्थना सुन ली गई एस-चार डब्बे में बीस नंबर सीट उन मोहतरमा की थी और पच्चीस नंबर सीट मेरी मैं आँखें मूंदता हुआ सीट पर पहुँचा था जैसे ही अपनी आँखें खोली तो उन्हें वही बैठा पाया दोपहर की गर्मी के समय मैंने ठंड पहली बार महसूस करी थी गला सूख चुका था हाथ काँप रहे थे दिल जैसे लंबी दौड़ के बाद धड़कता है ऐसे धड़क रहा था मैंने खुद को संभाला, एकत्र किया और अपनी सीट पर जा बैठा मैं चोरी की नज़रों से उन्हें देखता और तुरंत ही नज़रें झुका लेता ट्रेन चल पड़ी थी वो अपनी किताब में व्यस्त हो गई, पर मैं तो व्याकुल बैठा रहा बस चाह रहा था कि किसी प्रकार इनसे बात हो जाए, फिर कुछ देर में मैं भी शांत हो गया हृदय अपनी परिचित गति पर वापस आ गया शायद ये खिड़की से आ रही हवा का कमाल था पर ये हवा ज्यादा देर मदद न कर सकी, एकदम से न जाने ट्रेन को धक्का सा लगा और उस अप्सरा की किताब मेरी ओर आकर गिरी, फिर वही हृदय का तेज दौड़ना शुरू , मैंने अपना हाथ किताब को उठाने के लिए बढ़ाया उस किताब को झाड़ा और अपने माथे से लगाया और उस अप्सरा की ओर किताब बढ़ाई उन मोहतरमा ने किताब मेरे हाथ से ली और विश्व की सबसे मधुर आवाज़ में मुझे धन्यवाद कहा, मैं सकपका सा गया और मुँह से अपना नाम बोल दिया जी मेरा नाम सुभाष, उसने मुझे बड़ी ही विचित्र नज़र से देखा जैसे सोच रही हो कोई पागल लगता है मैंने इसे धन्यवाद कहा और ये मुझे अपना नाम बता रहा है, पर वो निर्दयी मुझे 'जी अच्छा' बोलकर अपनी किताब की ओर मुड़ गई, विश्व युद्ध में जितनी क्षति किसी सैनिक को पहुँची होगी उससे कुछ कम क्षति ना थी ये मेरे लिए ऐसा लगा कि मैं महाभारत का भीष्म हूँ और मुझ पर 'जी अच्छा' स्वरूप के बाणों की वर्षा कर मुझे शैया पर लिटा दिया गया है
बड़ी दुविधा थी ना जाने क्या सोच कर मैंने उसे अपना नाम बताया मैं ये सब और सह ना पाया और अपनी सीट से उठ ट्रेन के दरवाज़े पर जा पहुँचा वहाँ खड़े-खड़े खुद को गालियाँ ग्लानि सब कुछ प्रदान की , बाहर पेड़ों को देखने लगा और इस ख़याल में पड़ गया कि कैसे इन पेड़ों को कोई ज़रूरत नहीं पड़ती होगी किसी की किताब उठाने की और न ही किसी को अपना नाम बताने की ये सब सोच ही रहा था कि मेरे कंधे पर एक कोमल स्पर्श आया मेरे सामने वो खड़ी थी मैं फिर से मूर्ति मुद्रा में खड़ा हो गया और उसकी ओर देख मुस्कुराने लगा उसने विश्व की सबसे मधुर आवाज़ में फिर कुछ कहा पर इस बार मैं खोया हुआ था पहली बार में ना सुन पाया उसने क्या कहा , उसने मेरे पैरों की ओर इशारा किया और बोली कि " आप मेरी चप्पलें पहन आए हैं बड़े अजीब है आपको स्त्री और पुरुष के चप्पलों के बीच का फर्क भी नहीं पता "
शायद किस्मत आज उतनी भी साथ नहीं जितनी मैंने समझी थी पहले अपना नाम ऐसे ही बता दिया और अब उसकी चप्पल ही पहन आया , ये तो शायद मृत्यु से भी ज्यादा बुरा है मैंने उससे तुरंत क्षमा माँगी और कहा कि मैं कुछ सोच रहा था और शायद गलती से आपकी चप्पल पहन आया उसने फिर वही विचित्र चेहरा बनाया , पर शायद मेरी हृदयपूर्ण माफी का कुछ असर हुआ और वह उन चप्पलों को लेकर वापस अपनी सीट की ओर चली गई, मैं कुछ देर नंगे पैर खड़ा रहा खुद को मन में थोड़ा और कोसा, गालियों की माला से खुद को आभूषित किया और फिर बढ़ चला अपनी सीट की ओर, सर झुकाए चुपचाप वहाँ जाकर बैठ गया, स्टेशन आने में कुछ चार घंटे बाकी थे बस यहीं सोच रहा था इतना ज्यादा समय इस गौरव-हीनता के साथ कैसे काटूँ , अब तो गलती से भी नज़रें उस ओर नहीं उठ रही थी ना जाने क्या सोच रही होगी मेरे बारे में, थोड़ी देर ये ही सब चलता रहा मेरे मन में ,फिर शायद किस्मत का पहिया घूमा होगा और एक चायवाला चाय - चाय का कोलाहल लिए डब्बे में आया, उन मोहतरमा ने उसे आवाज़ दी अरे भैया एक चाय दीजिएगा वो रुका अपनी पानी रूपी चाय केतली में से एक कुल्हड़ में उतारी और उन मोहतरमा को पकड़ा दी वो चाय को लिए बैठ ही रही थी कि ट्रेन में एक बार फिर धक्का-सा लगा और उस कुल्हड़ से चाय का कुछ भाग मेरे सीने से आ लगा, ऐसा महसूस हुआ मानो मुझ पर गरम लावा किसी ज्वालामुखी से आ गिरा हो वो मोहतरमा बहुत डर गई सॉरी सॉरी कह पूरे वातावरण को गूँजा दिया पर किसी सच्चे मर्द की तरह मैं ऐसा दिखाता रहा कि मुझे तो कुछ भी नहीं हुआ मेरा सीना तो पत्थर का है इसे किसी भी चीज से फर्क नहीं पड़ता पर अंदर ही अंदर मैं चीख रहा था रो रहा था जो छाले मेरे सीने में आ गए थे उनको सह रहा था मैंने ठंडा पानी डाल उस चाय को अपने सीने से साफ किया उन मोहतरमा के तो आँसू ही छलक पड़े पर मैं उन्हें समझाता रहा कि कोई बात नहीं गलती से ऐसा हो जाता है पर वो फिर भी चुप ना हुई मैंने उन्हें आश्वासन देने की पूरी कोशिश की , कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ जो कि मैं नहीं था, थोड़ी देर में वो चुप हुई मैं भी अपना दर्द भूल सा गया ,पर वा रे प्रभु चप्पल और नाम बताने से हुई बेइज्जती को क्या उल्टा किया तूने वाह रे तेरी लीला, उन मोहतरमा और मेरे बीच अब बात शुरू हो गई शायद उन्होंने मुझ पर तरस आने पर मुझ से बात करनी शुरू करी पर मेरे लिए तो ये मरहम से भी बढ़कर था जैसे शिव के विष पर भांग, धतूरा, जल, और दूध, बातें ना जाने कहाँ - कहाँ तक पहुँच गई कि कहाँ रहती है वो , कहाँ जा रही है , कहाँ तक पढ़ाई करी , क्या विषय थे उनके पास , राजनीति पर क्या विचार है, क्या विचार है चलचित्रों पर , मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि कैसे हमारे विचार इतने मिल सकते हैं, कोई अंजान सोच में इतना निकटतम निकल सकता है मैं तो मन ही मन उन मोहतरमा को अपनी अर्धांगिनी मान चुका था बस सात फेरे लेने की कमी थी चार यार, मंगलसूत्र , सिंदूर , एक पंडित वो तो मेरे घर में भी बहुत है किसी को भी ले आऊंगा गंगा किनारे मंत्रों के बीच खा लूंगा कसमें जीने मरने की, बातें चलती गई माँ ने जो आलू और पूरी दी थी वो सिर्फ मैंने ना खा कर उसने भी खाया, क्या ख़ूबसूरत पल था वो उसने माँ के हाथ बनाए खाने की इतनी प्रशंसा करी कि लगा ये मेरे घर मेरी बीवी बन आई तो कितना सुखमय जीवन हो जाएगा बस यही सब बातें सोचते - सोचते पता ही नहीं चला कि ना जाने कब स्टेशन आने लगा दस मिनट और, पर मैंने अभी भी इन मोहतरमा का नाम नहीं पूछा बातें सब खत्म हो चुकी थी सन्नाटा पसरा था , लो ग्वालियर भी आ गया वो अपना बैग उठा रही थी कि मैंने कहा लाइए मदद कर दू उन्होंने पहले मना किया पर फिर बैग का वजन देख हाँ भी तुरंत ही कर दी मैं अपना और उनका बैग लेकर आगे बढ़ा वो पीछे आई हम ट्रेन से उतरे उन्होंने अपना बैग लिया मुझे धन्यवाद कहा और एक बार फिर चाय गिराने के लिए माफी माँगी, मैं मूर्ति बन मुस्कुराता रहा वो मुड़ी और बाहर की ओर चलने लगी, बस यही समय है फिर कभी नहीं पूछ पाऊँगा जल्दी पूछ , ये ख़याल मेरे दिमाग में तेज़ गति से दौड़ने लगे और मैंने बिना कोई समय लिए ज़ोर से बोला ' सुनिए ' वो पीछे मुड़ी मुझे देखा मैं उनके पास गया और उनसे कहा की आपने अपना नाम तो बताया ही नहीं, वो रुकी मुस्कुराई और बोली ' गायत्री भारद्वाज 'और भीड़ में गायब हो गई, उस दिन मुझे कुछ ज्ञान हुआ कि मेरी किस्मत एक लतीफ़े के अलावा और कुछ नहीं , मैं फिर से मूर्ति स्वरूप खड़ा था क्योंकि मेरा पूरा नाम सुभाष भारद्वाज है।