यात्रा के अंश से साहित्यिक रंगमंच…
यात्रा के इस अंश में मैं जिन अनुभवों को साझा करने जा रहा हूँ, उनके छोटे-से अंश में भी एक व्यापक सार छिपा हुआ है। यह केवल घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि लेखक के हृदय में उठते विचारों की वह लहर है, जो पाठकों को साहित्यिक मंच की आत्मा से परिचित कराती है।
कार्यक्रम स्थल पर पहुँचते ही जो दृश्य सामने था, वह सचमुच अचंभित कर देने वाला था। आयोजक मंडली के लोग स्वागत हेतु आतुर खड़े थे। उनके चेहरे पर सहज मुस्कान और आत्मीयता की झलक स्पष्ट दिखाई दे रही थी। यह केवल औपचारिक स्वागत नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस गहरी भावना का सजीव रूप था, जिसे हम “वसुधैव कुटुंबकम” के रूप में जानते हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो मैं किसी कार्यक्रम में नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के बीच आ पहुँचा हूँ।
जब मैं इस विषय पर चिंतन करता हूँ, तो लगता है कि यह सब हमारे पूर्वजों के प्रति हमारी अटूट श्रद्धा का परिणाम है। उनके विचारों और मूल्यों के प्रति जो समर्पण है, वही हमारे चरित्र निर्माण की आधारशिला है। यही कारण है कि हम आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं और भविष्य की ओर उत्साह व ऊर्जा के साथ अग्रसर होते हैं।
कार्यक्रम स्थल के भीतर लगे पुस्तक स्टॉल ने तो मन को एक अलग ही संसार में पहुँचा दिया। वहाँ कहानी, कविता और उपन्यासों का अद्भुत संग्रह सजा हुआ था। हर पुस्तक मानो अपने भीतर एक नई दुनिया समेटे हुए थी। उन पुस्तकों को देखते-देखते मन जैसे शब्दों और कल्पनाओं के सागर में डूबने लगा। वहीं पास में बना सेल्फी ज़ोन आधुनिक साहित्यिक युग का प्रतीक प्रतीत हो रहा था—जहाँ परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम देखने को मिला।
साहित्यिक वातावरण इतना प्रभावशाली था कि मन ठहर-सा गया। ऐसा लग रहा था मानो समय ने कुछ क्षणों के लिए अपनी गति धीमी कर दी हो, ताकि मैं इस आनंद को पूरी तरह अपने भीतर समेट सकूँ। किंतु यह भी एक सत्य है कि लेखक, कवि और साहित्यकार अपने अनंत भावों का केवल एक अंश ही शब्दों में ढाल पाते हैं। मन जहाँ-जहाँ तक विचरण करता है, कलम वहाँ तक पहुँच नहीं पाती। विवेक जितना अनुमति देता है, अभिव्यक्ति उतनी ही सीमित हो जाती है।
जब मैं कार्यक्रम स्थल के अंदर पहुँचा, तो कुछ परिचित और कुछ अपरिचित चेहरे दिखाई दिए। सभी के बीच एक आत्मीयता का वातावरण था, और अभिवादन का क्रम सहज ही प्रारंभ हो गया। इसी बीच मेरी दृष्टि मंच की ओर गई, और मैं उसके सौंदर्य में खो गया।
मंच पर एक ओर भगवान जगन्नाथ जी की दिव्य उपस्थिति थी, तो दूसरी ओर माइक और डेस्क सुसज्जित थे। बीच में सजे सोफे और टेबल उस गरिमा को और बढ़ा रहे थे। मंच की पृष्ठभूमि में एक पीपल का वृक्ष, उसके नीचे पत्थर की मूर्तियाँ, और एक ओर झोपड़ी का दृश्य—यह सब मिलकर भारत की प्राचीन वैदिक परंपरा का अद्भुत चित्र प्रस्तुत कर रहे थे।
भारत सदैव से प्रकृति पूजक देश रहा है, और यह परंपरा वैदिक काल से आज तक निरंतर प्रवाहित हो रही है। आज भी आदिवासी संस्कृति इस परंपरा को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। यह मेरे व्यक्तिगत अनुभव और विचार हैं—इनसे सहमति या असहमति होना स्वाभाविक है, किंतु जो मैंने अनुभव किया, वही यहाँ अभिव्यक्त किया है।
मंच को देखते ही मन के भाव जैसे उमड़ने लगे। ऐसे साहित्यिक मंच को बार-बार नमन करने की इच्छा होती है। जहाँ राजनीतिक मंचों पर भीड़ वक्ताओं का साहस होती है, वहीं साहित्यिक मंच स्वयं में विचारों और भावनाओं का महासागर समेटे होता है। यह केवल एक स्थान नहीं, बल्कि संवेदनाओं का जीवंत केंद्र है।
मुझे ऐसे अनेक मंचों पर जाने का अवसर मिला है—चाहे वह दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित Attic Place हो या पुस्तक मेलों के विविध मंच। हर स्थान पर एक ही बात स्पष्ट होती है कि हमारे चारों ओर जो कुछ भी विद्यमान है—चाहे वह प्रकृति हो, समाज हो, या हमारे मन में उठते विचार—वही साहित्य है। हम केवल उसे शब्दों का रूप देकर प्रस्तुत करते हैं।
इसी बीच, जब मैं मंच के सौंदर्य को अपने अंतस में समेट रहा था, तभी कविता प्रभा जी मेरे पास आईं और मुस्कुराते हुए बोलीं, “आप ही अनंत धीश अमन हैं?”
मैंने विनम्रता से उत्तर दिया, “जी।”
उन्होंने बताया कि “मेरी कविताएँ” कार्यक्रम का संचालन मुझे ही करना है। यह सुनकर मन में एक अलग ही उत्साह जागा, साथ ही एक हल्का संकोच भी।
कुछ देर उन्होंने मेरे बारे में जाना, परंतु मेरे भीतर एक अजीब-सा असमंजस था। ऐसा लग रहा था जैसे मैं सागर के बीच खड़ा हूँ, जहाँ चारों ओर महान साहित्यकारों का अथाह ज्ञान है—और मैं स्वयं को न नदी समझ पा रहा था, न दरिया, बल्कि एक छोटी-सी बूंद मात्र।
तभी इंक्डियू पब्लिकेशन के संस्थापक और मेरे मित्र मनोज किशोर नायक जी आए और उन्होंने स्नेहपूर्वक पूछा, “अनंत जी, कोई दिक्कत तो नहीं हुई?”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं भाई, बल्कि आपने जिस शहर—दामनजोड़ी—में बुलाया है, वह तो प्रकृति की गोद में बसा एक अद्भुत स्थान है। इसके लिए आपका धन्यवाद।”
उनकी व्यस्तता को देखते हुए मैंने आगे कहा कि हम बाद में विस्तार से संवाद करेंगे।
अपने उस क्षणिक असमंजस को मैंने अपने बुजुर्गों से सुने एक मुहावरे से समझाने का प्रयास किया—“बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।” उस समय मुझे इस मुहावरे का वास्तविक अर्थ समझ में आया कि हम सभी उसी घड़े की एक-एक बूंद हैं।
मैंने कविता जी को बधाई और शुभकामनाएँ दीं, और उसी क्षण मुझे लगा कि मैं एक ऐसे महासागर के बीच खड़ा हूँ, जहाँ हर व्यक्ति अपने भीतर एक सागर समेटे हुए है।
अनंत धीश अमन