देश हमारा, घर हमारा
कमल चोपड़ा
सरला मैडम के दायें हाथ में पट्टी बँधी हुई थी। पढ़ाते-पढ़ाते वे बार-बार अपने बायें हाथ से अपनी दाईं कलाई को दबा रही थीं। जाहिर था उन्हें हाथ में दर्द हो रहा था। पढ़ाते-पढ़ाते मैडम ने चॉक उठाकर बोर्ड पर कुछ लिखने की कोशिश की तो दर्द के मारे उनसे लिखा नहीं गया। मैडम को चुपचाप कुछ देर योंही खड़ा देखकर सजग ने पूछ ही लिया कि मैडम आपके हाथ पर चोट कैसे लग गई?धीरे से मैडम ने कहा कि आज सुबह मैं स्कूल आ रही थी कि रास्ते में मैंने देखा दो आदमी पार्क की दीवार तोड़कर ईंटें निकाल रहे हैं। मैंने पूछा—“क्या कर रहे हो?” उनमें से एक बोला, “मेन रोड पार्क के उस तरफ है न, हमें उधर जाना होता है तो पूरा पार्क घूमकर जाना पड़ता है। इसलिये हम पार्क की दीवार तोड़कर इधर से जाने का रास्ता बना रहे हैं। फिर हम पार्क के अन्दर से निकलकर जाया करेंगे, घूमकर नहीं जाना पड़ेगा।” दूसरा आदमी खी-खी करता हुआ बोला, “मुझे तो भाई अपने घर पर लगाने के लिये कुछ ईंटें चाहिये थीं। मैंने सोचा यहीं से कुछ ईंटें उखाड़ लेता हूँ। मुझे खरीदनी नहीं पड़ेंगी? खी-खी-खी।” मैंने गुस्से में कहा—“नहीं, ये गलत है? अपराध है? ऐसे दीवार तोड़ दोगे तो आवारा गाय-भैंस पार्क में घुसकर फल, फूल, घास और पत्तियाँ सब चर जायेंगी। आने-जाने का रास्ता बन जायेगा। ऐसे तो योग करनेवाले बड़ों और खेल रहे बच्चों, सबको परेशानी बन जायेगी और आप...? ईंटें चुराकर ले जाओगे आपको शर्म नहीं आती?” वह आदमी गुस्से से मुझपर चिल्लाया, “तुझे क्या? ये दीवार तेरी है क्या?” मैंने कहा कि हाँ, ये दीवार मेरी है। ये पार्क मेरा है। ये मुहल्ला मेरा है। ये शहर मेरा है। ये देश मेरा है। आप मेरे देश को नुकसान पहुँचा रहे हो। आप चोर हैं। देशद्रोही हैं। गद्दार हैं। ये दीवार हम सबकी है। ये पार्क, स्कूल, अस्पताल, पुल, सड़क, रेलवे स्टेशन, बाँध सबकुछ हमसब के हैं। हमारे सामने कोई हमारी चोरी कैसे कर सकता है? आप देश को नुकसान पहुँचा रहे हैं? आप देश के दुश्मन हैं? मैं यह सब देखकर भी अनदेखा कैसे कर सकती हूँ? मेरे मना करने के बावजूद वह फिर से दीवार तोड़ने लगा तो मैंने उस आदमी को धक्का मारा तो उसने मुझे भी धक्का मारकर गिरा दिया। मैं हाथ के बल गिर गई। मुझे चोट लग गई। शोर सुनकर आस-पास के लोग इकट्ठे हो गये। मुहल्लेवालों ने उन दोनों को खूब झाड़ लगाई और पुलिस को बुलाने लगे तो दोनों माफी माँगते हुए गिड़गिड़ाने लगे। दीवार को फिर से ठीक करके पहले जैसा बनवाकर देने का वायदा करने लगे। बस इसी सब में आज मुझे स्कूल आने में भी देर हो गई। पूरी कक्षा बड़े ध्यान से दीदी की बात सुन रही थी। कुछ देर चुप रहने के बाद दीदी फिर बोलीं, “हम अपने ही घर में अपनी ही चोरी कैसे कर सकते हैं? जैसे हम अपने घर की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखते हैं न, वैसे ही हमें देश की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिये।” एक बहुत मालदार सेठ मालचंद की किरयाने की बहुत भारी दुकान थी। बहुत बड़ा गोदाम और मकान भी था। कस्बे के दुकानदार उन्हीं से माल ले जाते थे। सेठ मालचंद कुछ बूढ़े और अशक्त हो गये तो उन्होंने अपने तीनों बेटों को बुलाकर कहा, “अब मैं बहुत कमजोर हो गया हूँ। अब मुझ से चला-फिरा नहीं जाता। अब सारा कारोबार तुम तीनों भाई मिलकर सँभालो। हमारे पास धन तो इतना है कि हमारी पचास पीढ़ियाँ आराम से बैठकर खा सकें। लेकिन तुम तीनों को बहुत ईमानदारी से अपनी दुकान, मकान आदि पर निगरानी रखनी पड़ेगी। पूरी सच्चाई और ईमानदारी से अपनी संपत्ति की सुरक्षा का ध्यान रखना होगा। ईमानदारी से तुम तीनों मिलकर ही कारोबार सँभालो।” सेठ ने बड़े बेटे भालचन्द को दुकान, मँझले बेटे डालचन्द को गोदाम और सबसे छोटे बेटे लालचन्द को शहर से माल खरीदकर लाने का काम सौंप दिया। कारोबार अपने हाथ में आ जाने से तीनों भाई खुशी-खुशी अपना-अपना काम सँभालने लगे। अब बड़े बेटे भालचन्द के मन में आ रहा था कि हमारे पास इतना पैसा है। अगर हमने ऐश नहीं की तो इतने पैसे का क्या फायदा? अपनी इच्छा पूरी करने का यही वक्त है। इच्छा पूरी करने के लिये पैसा चाहिये। बाकी के दोनों भाई तो मुझे अपने मन की करने नहीं देंगे। भालचन्द रोजाना जितनी भी सेल करता उसमें से कुछ रुपये जेब में डाल लेता। अगर दो लाख की सेल हुई तो उसमें बीस-पच्चीस हजार रख लेता और हिसाब में लिख देता पौने दो लाख की सेल हुई है। मँझले भाई डालचन्द ने भी सोचा अभी तो सभी कुछ साझे में चल रहा है। कल को हम भाई अलग होंगे तो पता नहीं क्या हो? मौके का फायदा न उठाया तो बेकार है। अभी मौज करने के दिन हैं। वह भी अपने दो भाइयों से छिपकर गोदाम का कुछ माल चोरी-छिपे बाहर बेच देता और पैसे अपनी जेब में डाल लेता। छोटे भाई लालचन्द ने भी सोचा अपने मन की इच्छाएँ पूरी करने का यही मौका है। वह माल की खरीद में बेईमानी करने लगा। जितना भी माल खरीद कर लाता बिल ज्यादा का बनवा लेता। बीच में से पैसे मार जाता। इस तरह तीनों अपने ही कारोबार में हेरा-फेरी और बेईमानी करने लगे। उनकी देखा-देखी वहाँ काम करनेवाले नौकर-चाकर भी हेरा-फेरी करने लगे। नौकरों की चोरी का उन्हें पता भी चल जाता तो तीनों भाई चुप रहते ताकि वे उनकी ही पोल न खोल दें। परिणाम यह हुआ कि कारोबार में घाटा होने लगा, आगे काम चलाने के लिये उन्हें कर्जा लेना पड़ा। काम चलने लगा लेकिन उन्होंने अपनी बेईमानी नहीं छोड़ी। फिर घाटा होने लगा। कर्ज की किश्तें जमा नहीं हो रही थीं और ब्याज दिन पर दिन बढ़ने लगा। उन्हें फिर से कर्ज लेना पड़ा। पर उन्होंने अपनी बेईमानी नहीं छोड़ी। कर्जा चुकाने के लिये उन्हें पहले दुकान बेचनी पड़ी। फिर गोदाम बेचना पड़ा और आखिर में घर भी बेचना पड़ा। उन्हें रोड पर आना पड़ गया। वे दर-दर की ठोकरें खाने लगे। बेटों की बेईमानी की वजह से कस्बे के सबसे मालदार सेठ मालचन्द ने फुटपाथ पर दम तोड़ दिया।कुछ क्षण चुप रहने के बाद दीदी ने फिर कहा, “कोई जिस डाल पर बैठा हो वह उसी डाल को काटने लगे तो क्या होगा?” घुन जिस लकड़ी में रहता है वह उसी को खा-खाकर खोखला कर देता है। फिर एक दिन उस लकड़ी को बेकार समझकर हर कोई जला देता है। उसके साथ घुन भी जलकर खाक हो जाता है। हम भी घुन की तरह जिस देश में रहते हैं उसे ही खोखला कर दें तो क्या होगा? देश नहीं रहेगा तो हम भी नहीं रहेंगे। देश है तो हम हैं! हम देश के साथ चोरी या बेईमानी न करें, ना किसी को करने दें क्योंकि देश ही हमारा घर है। अपने घर, अपने देश की सुरक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है।