एपिसोड 1: पहली नज़र का जादू
पटना की गलियों में सुबह की पहली किरणें चाय की दुकानों को जगातीं। कचौड़ी-समोसे की खुशबू हवा में घुली हुई थी। इस जीवंत मोहल्ले में रिया का छोटा सा घर था – पुरानी ईंटों की दीवारें, लेकिन प्यार से सजा हुआ। 24 साल की रिया, लंबे काले बाल, बड़ी-बड़ी आंखें और मुस्कान जो किसी को भी अपना बना ले। कॉलेज खत्म होने के बाद वो लोकल गर्ल्स स्कूल में टीचर बनी थी। बच्चे उसे 'मैम रिया दीदी' कहते, क्योंकि वो कहानियां सुनाती और सपने बुनती।
सुबह के 7 बजे, रिया चाय की दुकान पर पहुंची। उसके दोस्त – प्रिया और नेहा – पहले से बैठे थे। "अरे रिया, आज फिर लेट? शादी कब कर रही है बता!" प्रिया ने चिढ़ाते हुए कहा। नेहा हंस पड़ी, "हां यार, तेरी उम्र हो गई। कोई अमीर लड़का ढूंढ ले, पटना में तो ढेर सारे हैं!" रिया ने चाय का घूंट लिया और मुस्कुराई, "प्यार तो दिल से होता है, पैसे से नहीं। मैं वो इंतज़ार करूंगी जो मेरी सादगी को पसंद करे, न कि मेरी जेब को।" लड़कियां हंस दीं, लेकिन रिया के दिल में एक अधूरी सी ख्वाहिश थी। घर की तंगी, मां की चिंता – सब कुछ शादी के बोझ तले दबा था।
उधर, पटना के सबसे बड़े मॉल 'फ्रेशवर्ल्ड मॉल' का उद्घाटन हो रहा था। हजारों लोग उमड़ पड़े थे। बैंड बज रहा था, रिबन कटिंग की तैयारी। तभी एक लग्ज़री कार से उतरा आरव – 28 साल का हैंडसम बिज़नेसमैन। मुंबई से पटना लौटा था फैमिली के टेक्सटाइल बिज़नेस को संभालने। लंबा कद, स्लेटी सूट, गहरी भूरी आंखें और वो कॉन्फिडेंट स्माइल जो मीटिंग्स में करोड़ों का सौदा पक्का कर देती। उसके पीछे बॉडीगार्ड्स, लेकिन आरव अकेला महसूस करता। "पापा की विरासत संभालनी है, लेकिन दिल कहां है?" वो सोचता।
मॉल के अंदर शॉपिंग का माहौल था। रिया अपनी सहेली प्रिया के साथ घूम रही थी। "प्रिया, ये ड्रेस देख, कितनी सुंदर है! लेकिन पैसे..." रिया ने अफसोस से कहा। प्रिया ने हंसकर कहा, "चल ट्राय तो कर ले। आज उद्घाटन है, डिस्काउंट मिलेगा।" रिया मुस्कुराई और दुकान में घुसी। लेकिन सीढ़ियों पर उसका पर्स फिसल गया। लिपस्टिक, पैसे, फोन – सब बिखर गया। लोग हंसने लगे। रिया शरम से लाल हो गई, झुककर सामान उठाने लगी।
तभी एक मजबूत हाथ ने उसका पर्स थमाया। "ये लो, मिस...?" आवाज़ गहरी और गर्म थी। रिया ने सिर उठाया – सामने आरव खड़ा था। उनकी नज़रें मिलीं। दुनिया जैसे रुक गई। हंगामा, भीड़ – सब गायब। सिर्फ दो आंखें, दो दिल। "रिया... थैंक यू!" रिया की आवाज़ कांप रही थी। आरव मुस्कुराया, "आरव। कोई बात नहीं, होता है।" उसने बाकी सामान भी उठाया – एक छोटा सा डायरी भी, जिसमें रिया की कविताएं लिखी थीं। "ये आपकी? 'प्यार की पहली नज़र में...' वाह, क्या लिखती हो!" आरव ने पढ़ा। रिया चौंक गई, "वो... प्राइवेट है।" आरव ने कार्ड निकाला, "अगर कभी मदद चाहिए, या कॉफी पीने का मन हो, तो कॉल करना।" वो चला गया, लेकिन रिया का दिल धड़क रहा था।
शाम ढलते ही रिया घर लौटी। मां रसोई में थीं। "बेटी, आज पड़ोस के राजेश की मां आई थीं। शादी की बात चल रही है। राजेश अच्छा लड़का है, सरकारी नौकरी। घर की हालत सुधर जाएगी।" मां की आंखें नम थीं। पिता की मौत के बाद घर चलाना मुश्किल था। रिया ने सिर झुका लिया, "मां, मैं सोचती हूं।" लेकिन दिमाग में आरव का चेहरा घूम रहा था। वो कार्ड जेब में था। "क्या ये प्यार है? पहली मुलाकात में ही?"
दूर मुंबई में, आरव की कोठी में उसकी मां फोन पर चिल्ला रही थीं। "आरव बेटा, तू पटना कब लौट रहा? शादी की बात पक्की कर। हमारी फैमिली को परफेक्ट बहू चाहिए – पढ़ी-लिखी, अमीर घर से। कोई गरीब लड़की मत लाना!" आरव ने हंसकर कहा, "मां, सब सेट हो जाएगा।" लेकिन उसकी आंखों में रिया की तस्वीर थी। "कौन थी वो लड़की? इतनी सादगी..."
रात के 10 बजे, रिया बिस्तर पर लेटी सोच रही थी। फोन की स्क्रीन चमकी – अननोन नंबर: "हाय रिया, आज का मिलना याद रहेगा। कल कॉफी मिलेंगे? – आरव।" रिया का दिल जोरों से धड़का। क्या करे? राजेश की बात? या ये अनजान जादू?
(एपिसोड समाप्त। अगले एपिसोड में: कॉफी डेट का रोमांस और पहला राज़ खुलने वाला है।)