Godan-Aj Bhi Sarthak Upnyas in Hindi Book Reviews by Prafulla Kumar Tripathi books and stories PDF | गोदान - आज भी सार्थक उपन्यास

Featured Books
Categories
Share

गोदान - आज भी सार्थक उपन्यास

        प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य के जाने पहचाने साहित्यकार हैं |इनका बचपन संघर्षपूर्ण बीता | इन्होने अपनी आजीविका एक अध्यापक के रूप में शुरू की और 04 दिसम्बर 1907 को ये डिप्टी इंस्पेक्टर आफ स्कूल बने | इन्होने 16 फरवरी 1921 को इस पद से त्यागपत्र दे दिया | इन्होने 13 वर्ष की आयु से ही लिखना शुरू कर दिया था |

      “गोदान” नामक उपन्यास 10 जून 1936 को प्रकाशित हुआ जो इनकी लगभग 289 प्रकाशित कहानियों / उपन्यास या अन्य सभी रचनाओं  में अद्वितीय मानी जाती है | वास्तव में “गोदान” आधुनिक भारतीय जीवन का उपन्यास है जिसके सभी पात्र जीवंत और सुख दुःख भोगते दिखाई देते हैं और उनका यह भोगा हुआ यथार्थ आज भी प्रासंगिक बना हुआ है | इसके पात्र भले ही काल्पनिक  हों लेकिन प्रेमचन्द के कथाशिल्प ने प्राणों के स्पंदन से संपृक्त उनके व्यक्तित्व से पाठकों को अनुप्राणित करते हैं |इनके संवाद सरल, स्वाभाविक और सार्थक हैं और उनमे  देश, काल और वातावरण का पूरा ध्यान रखा गया  है |उपन्यास का प्रमुख पात्र ‘होरी’ वंचित समाज के संघर्ष का प्रतीक बन कर  सामने आया है | वह  सब कुछ झेलता , भोगता हुआ अपनी पत्नी धनिया ,पुत्र गोबर, दो पुत्रियाँ सोना और  रूपा के साथ अपने जीवन की गाड़ी खींचता रहता है |उसकी चाह है कि उसके घर के दरवाजे पर अपनी  एक गाय हो  | संकटों से जूझते हुए अंत में सामर्थ्यहीन होकर एक दिन लू की चपेट में आ जाता है | फलस्वरूप उसके मन की साध अधूरी रह जाती  है |

कथानक :

          भ्रष्टाचारी  और सामन्तवादी ताकतों के बीच पिस रहे आम आदमी के नियति की सच्ची और तल्ख़ तस्वीर आपको इस उपन्यास में देखने को मिलेगी और आप इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पायेंगे | “गोदान”  का नायक होरीराम पांच बीघे खेतों वाला किसान है और धनिया उसकी पत्नी | सोलह साल का एक बेटा गोबर , बारह साल की सोना और  आठ साल की रूपा तीन संताने हैं |जमींदारी प्रथा का ज़माना था और अन्य किसानों की तरह होरी को भी  हर फसल में लगान भरने के लिए कठिन  मशक्कत करनी पडती थी | होरी तमाम  कठिनाइयों के बावजूद सपने देखता रहता था |सबसे बड़ी लालसा एक अदद गाय घर लाने की थी |होरी की मुराद पूरी हो जाती है जब भोला उसे अपनी कबरी गाय अस्सी रूपये में उधारी पर  बेंच देता है |लेकिन यह जानकर कि उसके पास चूंकि गाय को खिलाने वास्ते  भूसे नहीं है इसलिए वह गाय बेंच रहा है होरी गाय लेने से इनकार कर देता है और उससे घर आकर भूसे ले जाने को कहता है |अपने राय साहब की ड्योढी पर चला जाता है |कई दिन बाद भोला आकर भूसा ले जाता है |और बदले में एक दिन होरी का बेटा गोबर उसके घर से गाय ले आता है और नाम रखा जाता है सुंदरिया |गाय आने पर सभी प्रसन्न होते हैं |लेकिन यह प्रसन्नता ज्यादा दिन नहीं रह पाती है और कर्ज़ में लदे होरी को उसके कर्जदार विवश कर  देते हैं कि वह  गाय उन्हें दे दे |प्रेमचन्द की सम्मोहक शैली देखिये –

     “वह गाय के सामने जाकर खड़ा हुआ तो उसे ऐसा जान पड़ा कि    उसकी काली काली सजीव आँखों में आंसू भरे हुए हैं और वह कह रही है –             

“क्या चार दिन में तुम्हारा मन मुझसे भर गया  ? तुमने तो वचन दिया था कि जीते जी इसे न बेचूँगा | यही वचन था तुम्हारा |मैंने तो तुमसे कभी किसी बात का गिला नहीं किया |जो कुछ रूखा सूखा तुमने दिया , वही खाकर संतुष्ट हो गई | बोलो | “

                        

        लेकिन एकदिन गाय घर के बाहर मरी पड़ी मिलती है |होरी घोर पश्चाताप में पड  जाता है |थाने  से दारोगा आते हैं | इसी तरह गाव के अनेक प्रसंगों से होकर होरी के व्यक्तित्व के ढेर सारे पहलुओं से पाठक परिचित होते हैं |

उपन्यास का अंत दुखद है जब नायक होरी की लू लग जाने से मृत्यु निकट आ  जाती है |धनिया , उसकी पत्नी उसे अचेतावस्था में देख कर सुध बुध खोकर बोलती है –

“मेरी ओर देखो , मै हूँ , क्या मुझे नहीं पहचानते ?”होरी की चेतना लौटती है , आँख के दोनों कोनों से आंसुओं की दो बूंदे ढलक पडती हैं और अत्यंत हल्की आवाज़ में कहता है –

“मेरा कहा सुना माफ़ करना धनिया ! अब जाता हूँ ! गाय की लालसा मन में ही रह गई | अब तो यहाँ के रूपये क्रिया करम में जायेंगे | रो मत धनिया , अब कब तक जिलायेगी ? सब दुर्दशा तो हो गई | अब मरने दे |.”

......धनिया सामने खड़े दातादीन से बोली – “महाराज घर में न गाय है , न बछिया , न पैसा | यही पैसे हैं ,यही इनका गोदान है |”

............................और पछाड़ खाकर गिर पड़ी |

आज भी भारतीय जन मानस में ‘होरी’ नामक पात्र ज़िंदा है जो जी- तोड़ मेहनत करने के बावजूद  अपनी जिन्दगी में ढेर सारी विसंगतियों के साथ जी रहे है |सामन्तवाद और पूंजी वाद का नया चेहरा सामने आ रहा है और बावजूद तमाम आश्वासनों के समाज में दबे कुचले लोगों के जीवन में कोई बदलाव नहीं दिखाई देता है | इस उपन्यास को पढकर, इस व्यवस्था और सामाजिक संरचना के विरुध्ध आज भी पाठकों का मन कसैला हो उठता है |शायद इसी शाश्वत सत्य के कारण यह रचना विश्व की अनन्यतम रचनाओं में से एक है |