Enemies are lurking nearby in Hindi Children Stories by कमल चोपड़ा books and stories PDF | छिपे हैं दुश्मन आस-पास

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छिपे हैं दुश्मन आस-पास

​छिपे हैं दुश्मन आस-पास   

कमल चोपड़ा​

    काफ़ी देर तक वे दोनों प्लेटफार्म पर खड़े रहे। पगड़ी-मूंछों वाले को देखते रहे पर वह कहीं नहीं दिखा। सजग बोला, "मुझे तो लगता है अटैची में ज़रूर कुछ गड़बड़ चीज़ है। तभी तो वह आदमी छोड़कर चला गया। वरना कौन अपना सामान इस तरह छोड़कर जाता है? चाहे वह सामान कितना भी मामूली या सस्ता क्यों न हो? जबकि वह तो कह रहा था कि इसमें उसका कीमती सामान है।"​विक्की भी सोच में पड़ गया। क्या पता वह आदमी रास्ते में किसी स्टेशन पर उतरा हो और गाड़ी चल दी हो और चढ़ नहीं पाया हो या चलती गाड़ी में चढ़ने के चक्कर में गिर पड़ा हो। चोट-चपेट खाकर वहीं कहीं अस्पताल पहुँच गया हो।"​हँसते हुए सजग बोला—"होने को तो कुछ भी हो सकता है। क्या पता इस अटैची में बम हो?" दोनों कुछ देर खामोश रहे फिर एकाएक विक्की बोला, "भाई मैं तो इस अटैची को अपने घर लेकर जा रहा हूँ। मैं तो गरीब परिवार से हूँ। मेरी माँ के पित्ताशय में पथरी है। उसे पेट दर्द और उल्टियाँ होने लगती हैं। डॉक्टर ने कह रखा है कि इसका ऑपरेशन करवाओ। जिस पर चालीस हजार रुपये खर्च होंगे। उतने पैसे हमारे पास हैं नहीं। मैं इस ​अटैची को ले जाकर इसके अंदर का सामान निकाल कर बेच दूँगा। क्या पता इतने पैसे मिल जायें जिनसे मेरी माँ का इलाज हो जाये नहीं तो कुछ तो होगा। मेरे लिये वही बहुत होगा।"​हैरान होते हुये सजग ने कहा, "और अगर इसमें बम या विस्फोटक सामग्री हुई तो? मेरी मानो तो ले जाकर पुलिस के हवाले कर दो। दिन-रात रेडियो, टी.वी. पर दिखाया जाता है कि लावारिस वस्तुओं को छुएँ नहीं। उनकी सूचना तुरंत पुलिस को दें।"​लेकिन यह लावारिस नहीं है। उस आदमी की चीज है जो पता नहीं कहाँ रह गया है। मैं तो इसे लेकर अपने घर जा रहा हूँ।" वह जाने लगा तो सजग ने उसकी बाँह पकड़कर रोका। काफी देर दोनों में बहस होती रही। सजग उसे समझाता रहा। अंत में विक्की मान गया। एक रेलवे कर्मचारी से उन्होंने पूछा, "रेलवे पुलिस चौकी कहाँ है?" उसने बताया कि प्लेटफार्म नम्बर तीन पर है। दोनों उस अटैची को लेकर पुलिस के पास पहुँचे। वहाँ पहुँच कर उन्होंने पूरी बात बताई तो वहाँ मौजूद पुलिस अफसर ने कहा, "तुम्हें इस अटैची को लेकर इस तरह नहीं घूमना चाहिये था, बल्कि छूना भी नहीं चाहिये था। बस इसकी सूचना पुलिस को देनी चाहिये थी। फिर भी तुम दोनों ने एक अच्छे नागरिक होने का कर्त्तव्य निभाया। इसके लिये तुम्हें शाबाशी देता हूँ। पुलिस ऑफिसर ने उन दोनों लड़कों के नाम-पते और उस आदमी के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि उस आदमी की बड़ी-बड़ी मूँछें थीं। उसने पीली पगड़ी पहनी हुई थी।​जानकारी लेने के बाद ऑफिसर ने कहा, "तुम दोनों जाना चाहते हो तो जा सकते हो।" लेकिन उन को उत्सुकता हो रही थी कि देखें इस अटैची में है क्या? इस लिये वे दोनों अभी वहीं डटे हुये थे। पुलिस ऑफिसर ने फोन करके पास के पुलिस स्टेशन से पुलिस और बम डिटेक्शन और​डीफ्यूजन विशेषज्ञों को बुलवाया। कुछ ही देर में वे आ पहुँचे। उन्होंने आकर अटैची को एक खुली जगह पर रखवाया और बड़ी सावधानी से अटैची को ​खोला। अटैची खुली तो सब देखते रह गये। दो पिटारी थी। जिसमें से एक में कोबरा साँप था और दूसरी में दुर्लभ जाति के छोटे-बड़े कई तरह के साँप थे और एक जालीदार पिंजरा था जिसमें कुछ बिच्छू थे। इन सबके अतिरिक्त दो कछुवे भी अटैची में पड़े थे। दुर्लभ जातियों के वे वन्य जीवों में से कुछ जिन्दा थे और कुछ मरे हुये थे। अटैची के पिछली तरफ छोटे-बड़े कई छेद थे। ताकि जीवों को हवा मिलती रहे और वे साँस ले सकें।​फुसफुसाते हुये विक्की ने सजग से कहा, "मैं यह अटैची घर ले जाता तो मुसीबत ले जाता। शुक्र है मैं बच गया।" तभी वहाँ दो लम्बे-तगड़े जवान आये और रेलवे पुलिस अधिकारी से बोले, "हम राजस्थान पुलिस के सिपाही हैं। हमें सूचना मिली थी कि राजस्थान से एक साँपों का तस्कर एक अटैची लेकर दिल्ली जा रहा है। उसे पता चल गया कि हम उसका पीछा कर रहे हैं। वह रास्ते में ही उतर कर लखनऊ जाने वाली ट्रेन पर चढ़ गया। हम भी पीछा करते हुये लखनऊ पहुँचे। पता चला कि वह दिल्ली वाली ट्रेन पर चढ़ गया है। पीछे-पीछे हम भी उसी ट्रेन में चढ़े पर वह हम से बचता-बचाता रास्ते में ही कहीं गायब हो गया। हमें विश्वास है वह इस स्टेशन पर पहुँच चुका है। आप हमारी मदद करें। स्टेशन से बाहर निकलने वाले सभी रास्तों पर अपने सिपाही तैनात कर दें ताकि वह यहाँ से भाग न सके और हम उसे पकड़ सकें।" जब उन्हें पता चला कि अटैची तो मिल चुकी है तो उन्हें खुशी हुई। बिना वक्त गँवाये स्थानीय पुलिस हरकत में आई। और स्टेशन से निकलने वाले सभी रास्तों पर तैनात हो गई। विक्की बोला, "मैं तो घर जा रहा हूँ। मेरे माँ-बाप मेरी चिन्ता कर रहे होंगे।"​जिस गाड़ी से वे आये थे वह अभी प्लेटफार्म पर ही खड़ी थी। गाड़ी एकदम खाली हो चुकी थी। सजग ने देखा जिस डिब्बे में बैठ कर आये थे उसमें एक आदमी चढ़ा और डिब्बे की सीटों के नीचे-ऊपर कुछ ढूँढ़ता ​हुआ नजरें दौड़ा रहा है। कुछ ही देर बाद वह डिब्बे से नीचे उतरा और प्लेटफार्म पर बेचैन सा घूमता हुआ इधर-उधर नजरें दौड़ने लगा। सजग को शक हुआ—"हो न हो यह उसी मूँछों वाले का ही कोई साथी है। तभी उस आदमी की नजर सजग पर पड़ी तो वह उसके पास आकर बोला, "अरे तुम वही हो न जो उस लड़के के पास बैठे थे?... हाँ-हाँ तुम वही तो हो जब मैं अपनी बड़ी अटैची सीट के नीचे रख रहा था तब मैंने तुम्हारी यह बैसाखी वहीं नीचे पड़ी देखी थी।"​"लेकिन आप?"​"अरे मैं वही मूँछों वाला हूँ। रास्ते में मेरे पीछे गुण्डे पड़ गये थे। इसलिये मुझे रास्ते में एक स्टेशन पर उतरना पड़ा। मैं स्टेशन के बाहर गया। बाहर एक नाई से मैंने मूँछें मुंडवाईं। वहीं पास ही एक दुकान से पेंट-टीशर्ट खरीदी और अपना हुलिया बदल लिया और वापिस स्टेशन पर आकर एक फास्ट ट्रेन पकड़ी ताकि मैं तुम्हारी गाड़ी से पहले पहुँचकर अपनी अटैची तुमसे ले लूँ पर मेरी ट्रेन तुम्हारी ट्रेन से दस मिनट लेट पहुँची और.....?"​सजग के मन में आया कि कह दे कि तुमने गुण्डों से नहीं पुलिस से बचने के लिये ये हुलिया बदला है। पर सजग ने कुछ नहीं कहा।​उस आदमी ने पूछा, "वह लड़का कहाँ गया जिसे मैंने अपनी अटैची का ध्यान रखने के लिये कहा था?"​सजग कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, "वह तो प्लेटफार्म नम्बर तीन पर खड़ा है। अटैची भी उसी के पास है। चलो, मैं मिलवा देता हूँ।"​खुशी-खुशी वह आदमी सजग के साथ प्लेटफार्म नम्बर तीन पर पहुँचा। वहाँ रेलवे पुलिस चौकी के पास पहुँचते ही सजग ने पुलिस वालों को आवाज देकर बुलाया और उसे पकड़वा दिया। बड़े थाने में ले जाकर उसकी अच्छी तरह धुनाई की गई तो उसने अपना अपराध स्वीकार करते हुये बताया ​कि उनका चौदह-पन्द्रह आदमियों का गिरोह है जो जंगलों में घूम-घूम कर दुर्लभ जाति के छोटे-बड़े साँपों और दूसरे वन्य जीवों को पकड़ते हैं। फिर उन्हें लेकर दिल्ली-बम्बई के बड़े-बड़े विदेशी तस्करों को बेच देते हैं। लाखों रुपये कमाते हैं। विदेशी इन जीवों से तरह-तरह की नशीली दवाइयाँ तैयार कर लोगों को बेचते हैं और करोड़ों कमाते हैं।​पुलिस ने उसकी निशानदेही पर धड़ाधड़ छापे मार कर उसके गिरोह के बाकी सदस्यों और कई देशी और कुछ विदेशी तस्करों को भी धर दबोचा था।​सभी न्यूज चैनलों पर यह खबरें दिखाई जा रही थीं। चारों तरफ पुलिस की वाहवाही हो रही थी। एक न्यूज चैनल के इंटरव्यू में डी.एस.पी. साहब कह रहे थे—"बहुत बड़े गिरोह का भंडा फोड़ हुआ है। ऐसे देश और मानवता के दुश्मनों को पकड़ा गया है। इनकी वजह से लाखों नासमझ लोग जहरीले नशे कर-करके अपनी जान गँवा रहे थे। हमारे देश की जैव-विविधता और प्रकृति की फूड चेन का चक्र भी नष्ट हो रहा था, जिससे मानव के अस्तित्व को भी खतरा पैदा हो गया था।" रिपोर्टर ने डी.एस.पी. साहब को बधाई और धन्यवाद दिया।​डी.एस.पी. साहब ने कहा, "पुलिस ने तो अपनी ड्यूटी की है। इसका श्रेय उस लड़के सजग को दिया जाना चाहिये।"​रिपोर्टर ने सजग को शाबाशी देते हुए पूछा, "इतनी कम उम्र और एक टाँग में दिक्कत के बावजूद तुमने इतना बड़ा कारनामा कैसे कर दिखाया?"​"इसका श्रेय मेरी दीदी को जाता है, जिन्होंने मुझे प्रेरणा दी, हिम्मत दी। मेरे आत्मविश्वास को जगाया। मुझे सजग सचेत और सतर्क रहने का मंत्र दिया और हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया। अगर आप भी सजग रहें तो आप भी बड़े से बड़ा कारनामा कर सकते हैं।"