Dushmani ke Darmiyaan ishq - 1 in Hindi Love Stories by Shivraj Bhokare books and stories PDF | दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग -1)

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दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग -1)

Part 1: वो रात, जहाँ सब शुरू हुआ

उस रात की खामोशी में एक अजीब सा तूफान छुपा था।
हवा ठंडी थी, मगर उसके भीतर एक अनकही बेचैनी थी, जैसे कोई राज धीरे-धीरे परतों से बाहर आने को तैयार हो।
शहर की गलियाँ आम दिनों की तरह नहीं थीं। हर मोड़ पर सन्नाटा था, और हर सन्नाटे में एक अनसुनी कहानी।

कबीर ने अपनी कार को उस तंग गली के बाहर रोका।
उसे यहाँ नहीं आना चाहिए था।
वो जानता था कि ये इलाका उसके परिवार के लिए हमेशा से मना रहा है।
मगर फिर भी, आज वो यहाँ था।

कभी-कभी इंसान उन रास्तों पर चल पड़ता है, जिनका अंजाम उसे खुद भी नहीं पता होता।

कबीर कार से बाहर निकला।
उसकी आँखें सतर्क थीं, जैसे हर कोने में खतरा छुपा हो।
उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, लेकिन वो डर नहीं था… कुछ और था, जो उसे यहाँ खींच लाया था।

उसने अपने कदम धीरे-धीरे आगे बढ़ाए।
गली के दोनों तरफ पुराने मकान थे, जिनकी दीवारें समय की थकान को अपने भीतर समेटे खड़ी थीं।
कुछ खिड़कियाँ खुली थीं, मगर उनमें से कोई झांक नहीं रहा था।
जैसे इस जगह ने इंसानों को नहीं, सिर्फ राजों को जिंदा रखा हो।

कबीर खुद से पूछ रहा था, वो यहाँ क्यों आया है।
मगर हर सवाल का जवाब उस सन्नाटे में कहीं खो जाता।

तभी…
एक हल्की सी आहट हुई।

कबीर के कदम रुक गए।
उसने अपने आसपास नज़र दौड़ाई, मगर कुछ दिखाई नहीं दिया।

फिर से वही आवाज़ आई।
इस बार थोड़ी साफ।

जैसे कोई किसी से छुपने की कोशिश कर रहा हो।

कबीर ने बिना सोचे उस आवाज़ की दिशा में कदम बढ़ा दिए।
उसका हर कदम उसे उस सच्चाई के करीब ले जा रहा था, जिससे वो अभी तक अनजान था।

गली के आखिरी छोर पर एक पुराना मकान था।
दरवाज़ा आधा खुला हुआ था, और अंदर से हल्की रोशनी बाहर झांक रही थी।

कबीर वहीं ठहर गया।
उसने एक पल के लिए सोचा कि वापस लौट जाए।
मगर कुछ था… जो उसे आगे बढ़ने से रोक नहीं रहा था।

उसने धीरे से दरवाज़ा धक्का दिया।
दरवाज़ा चरमराया, जैसे उसे भी इस रात का हिस्सा बनने में डर लग रहा हो।

अंदर अजीब सा सन्नाटा था।
कमरे में एक पीली सी रोशनी जल रही थी, और दीवारों पर परछाइयाँ नाच रही थीं।

कबीर अंदर गया।
उसकी नज़रें हर कोने को परख रही थीं।

और तभी…
उसने उसे देखा।

वो लड़की कमरे के बीचों-बीच खड़ी थी।
उसकी पीठ कबीर की तरफ थी, और वो खिड़की के बाहर देख रही थी।

उसके लंबे बाल हवा के साथ हल्के-हल्के हिल रहे थे।
उसकी मौजूदगी में एक अजीब सी शांति थी, मगर उसी शांति में एक गहरी उदासी भी छुपी थी।

कबीर कुछ पल के लिए वहीं ठहर गया।
जैसे समय ने खुद को रोक लिया हो।

उसने कभी किसी को इस तरह महसूस नहीं किया था।
जैसे वो लड़की सिर्फ सामने नहीं खड़ी थी… बल्कि उसके भीतर उतर रही थी।

“तुम कौन हो?”
कबीर की आवाज़ धीमी थी, मगर उस सन्नाटे में साफ सुनाई दी।

लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उसकी तरफ घुमाया।

और उसी पल…
कबीर की सांसें थम गईं।

उसकी आँखें…
वो आँखें किसी कहानी की तरह थीं, जिनमें दर्द भी था और सुकून भी।

वो खूबसूरत थी, मगर उसकी खूबसूरती में एक अजीब सा रहस्य था।
जैसे उसे समझना आसान नहीं होगा।

कुछ पल दोनों खामोश रहे।
उनकी नज़रें एक-दूसरे में उलझी हुई थीं।

“मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था,” कबीर ने धीमे से कहा।

लड़की हल्का सा मुस्कुराई।
मगर उसकी मुस्कान में खुशी नहीं थी… सिर्फ एक सच्चाई थी।

“तुम्हें सच में नहीं आना चाहिए था,” उसने कहा।

उसकी आवाज़ में कोई डर नहीं था, मगर एक चेतावनी जरूर थी।

कबीर ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“क्यों?”

लड़की ने कुछ पल तक उसे देखा।
जैसे वो तय कर रही हो कि उसे कितना सच बताना है।

“क्योंकि ये जगह… और मैं… दोनों तुम्हारे लिए खतरा हैं।”

कबीर हल्का सा हंसा।
“मुझे खतरे से डर नहीं लगता।”

लड़की की आँखों में एक अजीब सी चमक आई।
“हर किसी को लगता है… बस देर से समझ आता है।”

कबीर उसके और करीब आया।
“और तुम? तुम कौन हो?”

लड़की ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“एक ऐसी कहानी… जिसका अंजाम अच्छा नहीं होता।”

कबीर कुछ बोल नहीं पाया।
उसकी बातों में कुछ ऐसा था, जो उसे भीतर तक छू रहा था।

“नाम तो बताओ,” कबीर ने आखिरकार कहा।

लड़की ने एक पल के लिए अपनी नजरें झुका लीं।
जैसे वो इस एक सवाल से बचना चाहती हो।

फिर उसने धीरे से कहा,
“Myra.”

कबीर ने उसके नाम को अपने होंठों पर दोहराया।
“Myra…”

जैसे ये नाम उसके लिए नया नहीं था…
जैसे वो इसे पहले भी कहीं सुन चुका हो।

अचानक बाहर से कुछ आवाज़ें आईं।
जैसे कोई इस तरफ आ रहा हो।

Myra का चेहरा बदल गया।
उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

“तुम्हें जाना होगा,” उसने जल्दी से कहा।

“क्यों? क्या हुआ?” कबीर ने पूछा।

“कबीर…”
उसने पहली बार उसका नाम लिया।

कबीर चौंक गया।
“तुम मेरा नाम कैसे जानती हो?”

मगर Myra ने उसके सवाल का जवाब नहीं दिया।

“अगर तुम यहाँ रुके… तो सब खत्म हो जाएगा,” उसकी आवाज़ अब तेज़ थी।

बाहर की आवाज़ें और करीब आ रही थीं।

कबीर समझ नहीं पा रहा था कि क्या हो रहा है।
मगर उसके अंदर कुछ कह रहा था कि ये मज़ाक नहीं है।

“Myra, ये लोग कौन हैं?” उसने पूछा।

Myra ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में अब सिर्फ एक ही चीज़ थी… डर।

“वो लोग… तुम्हारे अपने हैं,” उसने कहा।

कबीर का दिल एक पल के लिए रुक गया।

“और मैं…”
Myra की आवाज़ धीमी पड़ गई,
“मैं तुम्हारी दुश्मन हूँ।”

दरवाज़े के बाहर कदमों की आवाज़ अब साफ सुनाई दे रही थी।

कबीर और Myra एक-दूसरे को देख रहे थे।
उनकी आँखों में हजार सवाल थे, मगर जवाब एक भी नहीं।

उस रात…
दो लोग मिले थे, जिन्हें कभी मिलना नहीं चाहिए था।

और शायद उसी पल…
उनकी किस्मत ने उनके लिए एक ऐसी कहानी लिख दी थी,
जिसका अंत सिर्फ दर्द था।

दरवाज़ा ज़ोर से खुला।

और कहानी… यहीं से शुरू हुई।