ढोंग-फरेब का एक आश्रम
कमल चोपड़ा
दशहरे की छुट्टियाँ हो गई थीं। छुट्टी का आज पहला दिन था। सजग अपने दोस्तों श्रेयस और रोहण के साथ घूमने निकल पड़ा। घूमते-घूमते वे शहर के बाहरी तरफ आ पहुँचे थे। उन्होंने देखा कि वहाँ एक बहुत बड़ा आश्रम है। वहाँ मेला-सा लगा हुआ था। आश्रम के अन्दर-बाहर भक्तों की भीड़ लगी हुई थी और बाहर फल-फूल, प्रसाद, धूपबत्ती आदि बेचनेवालों की दुकानें बनी हुई थीं। पता चला वहाँ किन्हीं बाबा भभूतानंद जी महाराज की समाधि है। उन्हें पंच तत्त्व में विलीन हुए काफी वक्त हो चुका है। अब उनके शिष्य बाबा भस्मानंद जी महाराज आश्रम की गद्दी पर विराजमान हैं। भक्त लोग आते हैं। समाधि पर माथा टेकते हैं। फिर पास ही बने एक मंदिरनुमा हॉल में बैठे बाबा भस्मानंद जी महाराज को अपने-अपने दुख बताते हैं। बाबा उनके दुख सुनकर उन्हें पास ही पड़ी राख की ढेरी से थोड़ी भभूत उठाकर भक्तों को देते हैं और कहते हैं कल्याण हो ! लोग उन्हें माथा टेकते हैं और खुशी-खुशी चले जाते हैं। उत्सुकतावश वे तीनों आश्रम के अन्दर घुस गये और घूम-घूमकर आश्रम को देखने लगे। अंदर एक बहुत बड़े पेड़ के नीचे लाल पत्थरों की एक समाधि बनी हुई थी। पता चला वह बाबा भभूतानंद जी महाराज की समाधि है। आश्रम में जगह-जगह दान पेटियाँ लगी हुई थीं। लोग अपने सामर्थ्य अनुसार उनमें सिक्के, नोटों की गड्डियाँ डालते और चले जाते। कोई-कोई भक्त जिनकी संयोग से मन्नत पूरी हो जाती वे सोने के गहने तक दान पेटियों में डाल जाते।आश्रम को देख लेने के बाद वे आश्रम के बाहर सड़क के दूसरी तरफ एक छायादार पेड़ के नीचे आकर बैठ गये। श्रेयस बोला, “मुझे तो किसी भी बाबा-वाबा पर विश्वास नहीं होता......।”उसकी बात काटकर रोहण ने कहा— “क्यों नहीं? इतने लोगों की मुरादें पूरी होंगी तभी तो लोग आकर इनको माथा टेक रहे हैं।”दोनों में काफी बहस होने लगी। सजग पहले तो चुप था फिर बोला, “यहाँ जो लोग आ रहे हैं, वे बेचारे भोले-भाले दुखी परेशान लोग हैं। मान लो यहाँ जो लोग आते हैं उनमें से कुछ की समस्यायें उनके अपने प्रयासों से हल हो जाती हैं। वे समझते हैं बाबा भभूतानंद जी महाराज की भभूत का कमाल है। फिर वे और लोगों को बताते हैं कि बाबा तो भगवान हैं, आगे-आगे और भक्त लोग आते रहते हैं। इनका धंधा चलता रहता है। जिनकी मुराद पूरी नहीं होती है वो दो-चार चक्कर काटकर निराश होकर बैठ जाते हैं। इक्का-दुक्का का काम संयोग से बन जाता है तो उसका श्रेय बाबा को मिल जाता है। जिनका काम नहीं बनता वे बाबा से आकर लड़ते तो हैं नहीं कि कहीं श्राप ना दे दें। बस इनका ढोंग-पाखंड का धंधा चलता रहता है। ये बाबा भगवान थोड़ा ही न है, आखिर हमारी-तुम्हारी तरह इनसान ही तो हैं।”सड़क पर आश्रम से थोड़ा आगे जाकर सुनसान-सी जगह थी। उन्होंने देखा आश्रम के दो-तीन भगवा कपड़ेवाले हट्टे-कट्टे सेवादार एक आदमी को मार-मारकर भगा रहे हैं। वह आदमी चिल्ला रहा था—तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? भाग साले भाग वरना हम तुझे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे। लोग दूर-दूर से देख रहे थे, पर कोई कुछ नहीं बोला। वे उसे मारते-पीटते आश्रम से काफी दूर ले गये। उसे लाठी से मार-मारकर उन्होंने अधमरा कर दिया। वह सड़क पर गिर पड़ा। काले मोटे एक सेवादार ने उसे धमकाया—“आज के बाद हमारे आश्रम के नजदीक दिख गया तो हम तुझे जान से मार देंगे।”तीनों दोस्तों ने देखा तो उनसे रहा नहीं गया। वे उनकी तरफ चल दिये। उन्हें अपनी तरफ आता देख वे सेवादार साधु उसे वहीं छोड़ चुपचाप वहाँ से वापिस आश्रम के तरफ चल पड़े।उस आदमी के जगह-जगह चोटें लगी हुई थीं। चोटों से खून निकल रहा था। उन्होंने उसे सहारा देकर एक छायादार पेड़ के नीचे बिठाया और पास ही कहीं से पानी लाकर पिलाया। उसे थोड़ी सुध आई तो सजग ने पूछा, “आप कौन हैं? कहाँ रहते हैं? ये लोग आपके पीछे क्यों पड़े हुए हैं?”“मेरा नाम जगदीश राय है। मैं इसी शहर का रहनेवाला हूँ। मैं अमेरिका से बाईस वर्ष बाद यहाँ लौटा हूँ। हमारा यहाँ रोशनपुरा में मकान था। मेरे पिता जी यहाँ खेती करते थे। आश्रम की ये पाँच एकड़ जमीन हमारी है। मैं नौवीं में पढ़ता था, एक दुर्घटना में मेरे माँ-बाप दोनों का निधन हो गया था। रिश्तेदारों की सलाह से मैं अपना यह खेत अपने एक वफादार मजदूर रामधन को बटाई पर दे गया था। वह मुझे वर्षभर में तीन बोरी अनाज और बीस हजार रुपये देता था। उससे मेरा और डब्लू का खर्चा आराम से चल जाता था। डब्लू मेरे कुत्ते का नाम था। वह मुझे जान से भी प्यारा था। मैंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। जब मैं बारहवीं में पढ़ता था एकाएक डब्लू बीमार पड़ गया। बहुत इलाज करवाया पर वह नहीं बच सका। उसके जाने के बाद मैंने कई दिन तक रोटी नहीं खाई। डब्लू को मैंने अपने खेत में बरगद के पेड़ के नीचे दफना दिया और ऊपर कीमती लाल पत्थर लगवाकर उसकी समाधि बनवा दी। आज मेरे उसी प्यारे कुत्ते डब्लू की समाधि को ये ढोंगी लोग किसी बाबा की समाधि बता रहे हैं। किसी भभूतानंद जी की समाधि नहीं है। ये मेरे कुत्ते डब्लू की समाधि है। बारहवीं पास करने के बाद मुझे दिल्ली में इंजिनियरिंग में दाखिला मिल गया। मैं दिल्ली में कमरा किराये पर लेकर रहने लगा। मेरी पढ़ाई अच्छी चल रही थी। एक साल मैं खुद बीमार हो गया। मेरी आँतों में गाँठ हो गयी थी। डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिये बताया। इलाज बहुत महँगा था। उसके लिये मुझे बहुत ढेर-सारे पैसों की जरूरत थी। मैंने रोशनपुरा वाला अपना मकान बेचकर इलाज करवाया। ठीक होने के बाद मैंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। इंजिनियर बनने के बाद मुझे अमरीका की एक कम्पनी में नौकरी मिल गई। मैं अमरीका चला गया, तबतक सब ठीक था। अमरीका में मैं लगातार तरक्की करता रहा पर अब मैं बाईस वर्ष बाद लौटा हूँ तो........? यहाँ आकर देखा तो यहाँ इन ढोंगियों ने मेरी इस जमीन पर आश्रम भी बना लिया है। रामधन का तो कुछ पता ही नहीं कहाँ गया? इन ढोंगियों को नहीं छोडूंगा... चाहे मुझे कितना भी खर्चा क्यों न करना पड़ जाये। पैसों की मुझे कोई परवाह नहीं, मैंने अमरीका में बहुत कमाया है। मेरे पास इस जमीन के पक्के कागज हैं। मुझे पता है पुलिस इसमें कुछ दखल नहीं दे सकती। मैं इन ढोंगियों... साधुओं पर कोर्ट में केस करूँगा पर यह लड़ाई आसान नहीं होगी। मुकदमा लम्बा खिंच सकता है। फिलहाल आप लोग मुझे आसपास किसी अच्छे नर्सिंग होम पहुँचवा दो ताकि मैं अपने जख्मों का इलाज करवा सकूँ।”“हाँ चलिये, आपकी बातों में हम इतने मशगूल हो गये कि हमें आपकी चोटों का ध्यान ही नहीं रहा।”उन तीनों ने उसे रिक्शा में बैठाया और अस्पताल लेकर चल दिये।