The last page of the diary - 1 in Hindi Drama by Std Maurya books and stories PDF | डायरी का वो आखरी पन्ना - 1

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डायरी का वो आखरी पन्ना - 1

मैंने उत्सुकता से कहा,

“भंते जी, चलिए ज़रा करीब से देखते हैं… दूर से तो कुछ साफ दिखाई ही नहीं दे रहा…”

प्रियांशी का चेहरा डर के मारे सफेद पड़ गया था। उसने घबराते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली,

“आप पागल हो गए हैं क्या? पता नहीं वहाँ क्या होगा! अगर कुछ अनहोनी हो गई तो? आप लोग मत जाइए वहाँ…”

उसकी आँखों में मेरे लिए साफ़ फिक्र दिख रही थी।

मैंने मुस्कुराते हुए प्रियांशी के कंधों पर हाथ रखा और कहा,

“कुछ नहीं होगा प्रियांशी… तुम बस देखती जाओ…”

मेरी बातों से वह थोड़ा शांत तो हुई, लेकिन उसका दिल अभी भी तेज़ धड़क रहा था।

मैं धीरे-धीरे दबे पाँव उस जगह की ओर बढ़ा, जहाँ से सरसराहट आ रही थी…

जैसे-जैसे मैं करीब पहुँच रहा था, मेरी दिल की धड़कनें और तेज़ होती जा रही थीं…

वहाँ पहुँचकर मैंने जो देखा… उसने मेरी साँसें थाम दीं…

पत्थरों के बीच से एक पंछी फड़फड़ाकर उड़ गया…

लेकिन असली चौंकाने वाली बात वो नहीं थी…

उस पंछी के ठीक बगल में…

एक काली सी आकृति बैठी थी…

ध्यान से देखने पर लगा… जैसे कोई लड़की वहाँ झाड़ियों के बीच छिपकर बैठी हो…

अँधेरा और झाड़ियाँ इतनी घनी थीं कि उसका चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था…

फिर भी मैं हिम्मत करके उसके और करीब गया…

और आस-पास की झाड़ियों को धीरे-धीरे हटाने लगा…

जैसे ही मैंने झाड़ियों को हटाया…

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई…

अंकिता दूर से आवाज़ लगाते हुए बोली,

“अरे भैया! क्या हुआ? वहाँ कुछ है क्या?”

लेकिन मैं कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गया…

अंकिता ने फिर आवाज़ दी,

“भैया… बताओ ना, क्या हुआ?”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया…

अंकिता घबरा गई और मेरी तरफ बढ़ने लगी…

उसके पीछे-पीछे प्रियांशी और बाकी लोग भी आने लगे…

मैंने उन्हें आते देखा तो तुरंत हाथ से इशारा करते हुए कहा,

“रुको…! अभी मत आओ…”

मेरी आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट थी…

जिसे सुनकर सब वहीं रुक गए…

चारों तरफ सन्नाटा छा गया था…

और सबकी नज़रें मेरी तरफ थीं…

लेकिन… जो मैंने देखा था… वह इतना आसान नहीं था…

अचानक झाड़ियों में बैठी लड़की ने मेरा हाथ पकड़ लिया…

और ज़ोर से अपनी तरफ खींचने लगी…

मेरी साँसें जैसे थम गईं…

वह काँपती आवाज़ में बोली,

“मेरी मदद करो… प्लीज़… नहीं तो वो लोग मुझे मार देंगे…”

उसकी आवाज़ में इतना डर था कि मेरे रोंगटे खड़े हो गए…

मैंने खुद को संभालते हुए पूछा,

“तुम कौन हो? यहाँ क्या कर रही हो?

और कैसी मदद चाहती हो?”

वह चारों तरफ घबराकर देखने लगी…

फिर उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया और फुसफुसाई,

“वो लोग… यहीं आस-पास हैं…”

मैंने इधर-उधर देखा…

आख़िर वह कौन थे…?

दिल अभी भी तेज़ धड़क रहा था…

मैंने आवाज़ लगाई,

“अंकिता… प्रियांशी… इधर आओ!”

मेरी आवाज़ सुनते ही दोनों मेरी तरफ दौड़ पड़ीं…

अंकिता हाँफते हुए बोली,

“भैया… यह कौन है?”

प्रियांशी ने उसे देखा और चौंककर बोली,

“तुम यहाँ क्या कर रही हो?

और तुम्हारी ये हालत… किसने की?”

वह लड़की सहमी हुई थी…

उसके कपड़े मैले थे, बाल बिखरे हुए…

और आँखों में डर साफ झलक रहा था…

वह बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी…

तभी भंते जी भी हमारे पास आ गए…

उन्होंने कहा,

“इस लड़की के कपड़े फट गए हैं… इसे कुछ ओढ़ा दो…”

उन्होंने अपने बैग से एक वस्त्र निकालकर हमारी तरफ बढ़ाया…

प्रियांशी बोली,

“आप रहने दीजिए… मैं अपना सूट दे देती हूँ…”

उसने अपना एक सूट निकाला…

और अंकिता के साथ मिलकर उसे दुपट्टा ओढ़ा दिया…

अब वह थोड़ी संभली हुई लग रही थी…

लेकिन उसकी आँखों में डर अभी भी था…

प्रियांशी ने उसका हाथ पकड़कर पूछा,

“यह हाल किसने किया है?

क्या तुम्हें पता है वो कौन लोग हैं?”

अंकिता बोली,

“डरो मत… हम तुम्हारे साथ हैं…”

वह कुछ पल चुप रही…

उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं…

मैंने कहा,

“तुम चिंता मत करो… हमें सब बता दो…

तुम्हें कुछ नहीं होगा…”

मेरी बात सुनकर वह मेरी तरफ देखने लगी…

भंते जी बोले,

“बेटा… डरने की बात नहीं है…

हम तुम्हारी मदद करेंगे…”

प्रियांशी ने भी उसका हाथ कसकर पकड़ा,

“तुम अकेली नहीं हो…”

अंकिता उसके पास गई…

और उसके आँसू पोंछते हुए बोली,

“मत रो… हम तुम्हारे साथ हैं…”

लड़की काँपती आवाज़ में बोली,

“वो… लोग यहीं आस-पास हैं…

वो मुझे मार देना चाहते हैं…”

यह सुनकर हम सब एक-दूसरे की तरफ देखने लगे…


भंते जी ने गंभीर स्वर में कहा,

“बेटा… इस लड़की को पहले यहाँ से ले चलते हैं…

यह जगह सुरक्षित नहीं है…”

फिर उन्होंने सबकी तरफ देखते हुए कहा,

“चलो बेटा… हम लोग यहाँ से निकलते हैं…”

मैंने तुरंत हामी भरते हुए कहा,

“हाँ… बिल्कुल सही कह रहे हैं आप…

चारों तरफ झाड़ियाँ हैं…

हमें यहाँ से जितनी जल्दी हो सके निकल जाना चाहिए…”

हम सब उस लड़की को साथ लेकर आगे बढ़ने ही वाले थे…

कि तभी अचानक…

कुछ अनजान लोग हमारे सामने आकर खड़े हो गए… 

उन्होंने हमारा रास्ता रोक लिया…

उनमें से एक आदमी मुस्कुराते हुए बोला,

“अरे… ऐसे कैसे जा रहे हो तुम लोग…?”

उसकी आवाज़ में एक अजीब सा डर और घमंड दोनों था…

वह आगे बढ़ा और लड़की की तरफ इशारा करते हुए बोला,

“बिना हमसे मिले तो तुम जा सकते हो…

लेकिन… इस लड़की को यहीं छोड़ दो…” 


मैंने गुस्से और सख़्ती से कहा,

“तुम लोग कौन हो…?

और इस लड़की को क्यों रोकना चाहते हो?”

मेरी आवाज़ अब पहले से ज़्यादा तेज़ और दृढ़ थी…

उनमें से एक आदमी हँसते हुए आगे बढ़ा और बोला,

“अरे… तुम्हें जाना है तो चले जाओ…

हमें कोई फर्क नहीं पड़ता…”

फिर उसने लड़की की तरफ घूरते हुए कहा,

“हमें तो बस इसके साथ कुछ पल बिताने हैं…” 

यह सुनते ही मेरे अंदर गुस्सा उबल पड़ा…

मैंने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा,

“ज़ुबान संभाल के बात करो…

यह कोई चीज़ नहीं है… समझे?”

अंकिता भी गुस्से में बोली,

“शर्म नहीं आती तुम लोगों को…?”

प्रियांशी लड़की के पास खड़ी हो गई और उसका हाथ कसकर पकड़ लिया…

भंते जी ने शांत लेकिन सख़्त आवाज़ में कहा,

“बेटा… गलत रास्ते पर मत चलो…

अभी भी समय है… वापस लौट जाओ…”

लेकिन वे लोग हँसने लगे…

उनमें से एक बोला,

“लगता है तुम लोग समझ नहीं रहे हो…”

और उसने धीरे-धीरे आगे कदम बढ़ाना शुरू किया…

मैंने एक कदम आगे बढ़ते हुए गुस्से में कहा,

“जब तक हम यहाँ हैं… इस लड़की को कोई हाथ नहीं लगा सकता…”

मेरी बात सुनकर वे लोग एक-दूसरे की तरफ देखकर हँसने लगे…

उनमें से एक बोला,

“लगता है हीरो बनने का शौक चढ़ा है तुम्हें…”

यह कहकर वह धीरे-धीरे हमारी तरफ बढ़ने लगा…

मेरे दिल की धड़कनें तेज़ हो रही थीं…

लेकिन इस बार डर नहीं था… सिर्फ गुस्सा था…

मैंने पीछे मुड़कर देखा…

प्रियांशी उस लड़की का हाथ पकड़े खड़ी थी…

उसकी आँखों में डर था… लेकिन भरोसा भी था…

अंकिता भी मेरे साथ खड़ी हो गई और बोली,

“भैया… जो भी करना… अब पीछे मत हटना…”

मैंने सिर हिलाया…

उधर वो आदमी और करीब आ गया…

उसने अचानक मेरा कॉलर पकड़ लिया…