प्रियांशी अचानक तेजी से आगे बढ़ी। इससे पहले कि वह आदमी कुछ समझ पाता, उसने पूरे जोर से अपने पैर से उसके गुप्त अंग पर वार कर दिया।
वह दर्द से तड़पकर वहीं गिर पड़ा।
मौका देखते ही हम सब बिना एक पल गंवाए तेजी से भागने लगे।
पीछे मुड़कर देखा तो वे चारों अपने घायल साथी को संभालने में लगे थे… और इसी बीच हम अंधेरे में कहीं दूर निकल चुके थे।
“आप लोग जल्दी से भागो!” प्रियांशी ने घबराते हुए कहा।
मैंने पीछे मुड़कर चिल्लाया, “अरे, तुम भी भागो!”
हम सब पूरी ताकत से दौड़ रहे थे कि तभी अचानक अंकिता लड़खड़ा कर गिर पड़ी।
“अब मुझसे दौड़ा नहीं जा रहा…” वह दर्द से कराहते हुए बोली।
मैंने तुरंत उसका हाथ थामा, “अंकिता, बस थोड़ा सा और… हिम्मत रखो!”
मैं उसे संभालते हुए आगे बढ़ने लगा। उधर प्रियांशी भी उस लड़की का हाथ पकड़कर तेजी से दौड़ रही थी।
तभी मेरी नजर अंकिता के पैरों पर गई—
उसके पैरों से खून बह रहा था…
यह देखकर मैं तुरंत रुक गया। बिना एक पल गंवाए मैंने उसे अपनी पीठ पर उठा लिया और फिर से दौड़ने लगा।
“भैया… मुझे नीचे उतार दो… मैं दौड़ लूंगी…” अंकिता ने धीमी आवाज में कहा।
“नहीं! तुम बस चुपचाप रहो,” मैंने दृढ़ आवाज में कहा और अपनी रफ्तार और बढ़ा दी।
पीछे से उन लोगों की आवाजें लगातार करीब आ रही थीं—
“कहाँ भागकर जाओगे… बच नहीं पाओगे!”
तभी भंते जी की आवाज आई,
“बेटा, जल्दी दौड़ो! वो लोग पास आ रहे हैं… मैं पुलिस को कॉल कर रहा हूँ!”
भंते जी ने बिना समय गंवाए तुरंत पुलिस को फोन करके सारी जानकारी दे दी।
हम अभी भी दौड़ ही रहे थे… सांसें तेज हो चुकी थीं… दिल जैसे सीने से बाहर निकलने को था…
तभी दूर से सायरन की आवाज सुनाई दी—
पुलिस आ चुकी थी।
और सायरन की आवाज सुनते ही वे लोग भी घबराकर भागने लगे।
पुलिस की गाड़ी हमारे पास आकर रुकी। एक पुलिस वाले ने जल्दी से उतरते हुए पूछा,
“वो लोग कौन थे? और कहाँ हैं?”
हम सब हांफते हुए उनकी तरफ इशारा करते हुए बोले,
“उधर… वो देखिए! भाग रहे हैं!”
पुलिस वालों ने बिना एक पल गंवाए उसी दिशा में दौड़ लगा दी।
कुछ पुलिस वाले हमारे पास ही रुक गए, ताकि हमारी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकें।
दूर अंधेरे में भागते हुए उन लोगों की परछाइयाँ साफ दिखाई दे रही थीं… और पीछे-पीछे पुलिस उनके करीब पहुंचती जा रही थी।
“रुको! पुलिस!” एक जोरदार आवाज गूंजी।
लेकिन वे रुकने वाले नहीं थे…
अचानक उनमें से एक ठोकर खाकर गिर पड़ा।
बाकी तीन उसे छोड़कर आगे भागने लगे…
तभी दो पुलिस वाले तेजी से आगे बढ़े और उस गिरे हुए आदमी को पकड़ लिया।
“भाग कहाँ रहा था!” पुलिस वाले ने उसे पकड़ते हुए कहा।
उधर बाकी तीनों भी ज्यादा दूर नहीं जा पाए…
कुछ ही देर में पुलिस ने चारों को घेर लिया।
अब उनके पास भागने का कोई रास्ता नहीं बचा था…
पुलिस वालों ने गुंडों को पकड़कर सख्ती से पूछा,
“क्यों भाग रहे थे तुम लोग? और इनका पीछा क्यों कर रहे थे?”
चारों चुप थे… सिर झुकाए खड़े रहे, जैसे अब उनके पास कोई जवाब ही न हो।
एक पुलिस वाले ने गुस्से में कहा,
“चलो, अब थाने चलते हैं… वहीं पता चलेगा सब!”
मैंने आगे बढ़कर कहा,
“सर, इन्हें अपने साथ ले जाइए… ऐसे लोगों को सख्त सज़ा मिलनी चाहिए, तभी ये सुधरेंगे।”
अंकिता और प्रियांशी ने भी मेरी बात का समर्थन करते हुए कहा,
“हाँ सर, इन्हें जरूर ले जाइए।”
पुलिस वालों ने बिना देर किए उन चारों को गाड़ी में बैठा लिया।
अब माहौल थोड़ा शांत होने लगा था…
मैंने उस लड़की की तरफ देखा—
उसके चेहरे पर हल्की सी राहत जरूर थी, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी डर साफ झलक रहा था।
वह बार-बार इधर-उधर देख रही थी, जैसे उसे अब भी भरोसा न हो कि खतरा पूरी तरह टल चुका है।
प्रियांशी धीरे से उसके पास गई और उसका हाथ थामते हुए बोली,
“अब डरने की जरूरत नहीं है… हम सब तुम्हारे साथ हैं।”
यह सुनकर वह लड़की कुछ पल के लिए चुप रही…
फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए—
शायद पहली बार उसे लगा कि अब वह सुरक्षित है।
वह लड़की कांपती हुई आवाज में बोली,
“आप लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया… आपने अपनी जान जोखिम में डालकर मेरी रक्षा की।
मैंने बहुत लोगों से मदद मांगी… लेकिन कोई भी आगे नहीं आया…”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
मैंने और प्रियांशी ने एक-दूसरे की तरफ देखा, फिर मैंने शांत स्वर में कहा,
“शुक्रिया कहने की कोई बात नहीं है… हमने बस इंसानियत का फर्ज निभाया है।”
प्रियांशी ने भी मुस्कुराते हुए कहा,
“अगर हम किसी की मदद नहीं करेंगे, तो इंसान होने का क्या मतलब…”
यह सुनकर वह लड़की कुछ पल के लिए चुप हो गई…
उसके चेहरे पर अब डर की जगह एक सुकून नजर आने लगा था…
जैसे उसे पहली बार यकीन हुआ हो—
दुनिया में अभी भी अच्छे लोग मौजूद हैं।
मैंने उससे धीरे से पूछा,
“तुम्हारा घर कहाँ है? बताओ, मैं तुम्हें छोड़ आता हूँ।”
लड़की ने तुरंत सिर हिलाया,
“मुझे… अपने घर नहीं जाना है…”
मैं थोड़ा हैरान हुआ,
“क्यों? क्या हुआ?”
प्रियांशी ने भी चिंता भरे स्वर में पूछा,
“पर फिर तुम जाओगी कहाँ?”
लड़की कुछ पल के लिए चुप रही… उसकी आँखें झुक गईं, जैसे वह कुछ छुपा रही हो या कहने से डर रही हो।
तभी भंते जी ने शांत आवाज में कहा,
“बेटी, अगर तुम चाहो तो अभी हमारे कुटिया की तरफ चलो… वहाँ आराम से बैठकर बात करेंगे।”
मैंने भी सहमति में सिर हिलाते हुए कहा,
“हाँ, यह सही रहेगा… यहाँ रास्ते में खड़े होकर बात करना ठीक नहीं है।”
लड़की ने धीरे से हमारी तरफ देखा…
उसकी आँखों में अब भी डर था, लेकिन साथ ही एक भरोसा भी झलक रहा था…
कुछ पल सोचने के बाद उसने हल्के से सिर हिला दिया—
जैसे उसने हम पर भरोसा करने का फैसला कर लिया हो।
हम सब धीरे-धीरे कुटिया की तरफ बढ़ने लगे।
रास्ते में माहौल थोड़ा शांत हो चुका था, लेकिन थकान अब साफ महसूस हो रही थी।
तभी अंकिता ने हल्के गुस्से और मज़ाक भरे अंदाज़ में कहा,
“चलो, अब दिल को थोड़ा आराम तो मिल ही गया…
सोचा था आज मज़े से घूमेंगे, लेकिन क्या करें… इन निकम्मों ने चैन से घूमने भी नहीं दिया!”
उसकी बात सुनकर हम सब हल्का सा मुस्कुरा दिए।
कुछ देर पहले तक जो डर और तनाव था, अब वह धीरे-धीरे कम होने लगा था।
प्रियांशी ने हंसते हुए कहा,
“सही कहा… आज का दिन तो एडवेंचर में ही निकल गया!”
मैंने भी मुस्कुराकर कहा,
“हाँ, लेकिन अच्छा हुआ कि सब ठीक-ठाक खत्म हो गया…”
हम सब बातें करते हुए आगे बढ़ते रहे…
लेकिन उस लड़की के चेहरे पर अभी भी एक अजीब सी खामोशी थी…