We are soldiers of the country in Hindi Children Stories by कमल चोपड़ा books and stories PDF | देश के हम सिपाही

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देश के हम सिपाही

​देश के हम सिपाही

 कमल चोपड़ा

​      माँ कह रही थी, “तुम तीन दिन घर से ही मत निकलो।”लेकिन सजग नहीं डर रहा था।​अगले दिन सजग सुबह-सुबह बाजार से ब्रेड लेने जा रहा था। जैसे ही वह सड़क पार करने लगा, उसने देखा थोड़ी दूरी पर एक काली कार खड़ी थी। उसमें बैठे ड्राइवर ने एकाएक कार को फुल रेस दी। गाड़ी तेजी से उसकी ओर दौड़ी। सजग ने पूरा जोर लगाकर बाईं तरफ छलाँग लगा दी। उसकी बैसाखी सड़क पर ही गिर गई। कार बैसाखी पर से होते हुए गुजर गई। फुटपाथ पर गिरने से सजग का घुटना छिल गया था। टूटी बैसाखी उठाकर धीरे-धीरे चलता हुआ वह किसी तरह घर पहुँचा तो वह समझ गया था वह काली कार बाबा के गुण्डों की ही होगी? एक्सीडेंट से मरा तो...! बाबा ने यह थोड़ी कहा था कि कैसे मरेगा? कैसे भी मरा........। मर तो गया? मुझे बहुत बचकर रहना पड़ेगा।​माँ कह रही थी, “तुम्हें मैंने कहा था न कि वो कोई ऐसी हरकत करेंगे? वे अपनी बात को सच करने के लिये.....। अगर तुम्हें कुछ हो गया तो? बाबा की मान्यता और बढ़ जायेगी?”​सजग बहुत देर तक सोचता रहा फिर उठकर घर से चल दिया। “मैं आश्रम के गेट के सामने धरना दूँगा?” सबने उसे समझाया पर वह नहीं माना।    ​श्रेयस, रोहण और कुणाल अपने-अपने घर से कुछ चादरें ले आये। उन्होंने आश्रम के गेट के सामने रोड के दूसरी तरफ कुछ चादरें नीचे बिछा दीं, कुछ चादरें साइडों में लटकाईं और एक चादर ऊपर तान दी। टेन्ट-सा बनाकर उसमें बैठ के वे समय बिताने लगे। कभी वे गाना गाते। कभी नारा लगाते- देश के दुश्मन नहीं बचेंगे ! नहीं बचेंगे! ढोंगी-फरेबी नहीं बचेंगे! नहीं बचेंगे! न्यूज चैनल वाले आ-आकर उनका यह विरोध प्रदर्शन रिकॉर्ड कर रहे थे। आते-जाते लोग भी वहाँ रुकते।​आने-जानेवालों का वहाँ ताँता लगा हुआ था। आश्रमवाले दूर-दूर से उन पर नजर बनाये हुए थे। दूर तक भीड़ थी। वे सजग तक पहुँचते भी तो कैसे? दिन ऐसे ही निकल गया। रात में वे टेन्ट में ही सोते। दीदी सुबह ही आ जातीं, पूरा दिन उनके साथ ही रहतीं, शाम को अपने घर चली जातीं।​रातभर सजग सो नहीं पाया था। सुबह-सुबह... अभी पूरी तरह दिन नहीं निकला था कि सजग की नजर उसी काले मोटे पेटवाले साधु पर पड़ी। सजग ने उसे पहचान लिया। उस दिन जगदीश राय की पिटाई में सबसे आगे यही था। वह आश्रम से दूर जा रहा था। एकाएक सजग उठकर उसकी तरफ जाने लगा तो उसके साथी ने उसे रोका पर वह नहीं रुका।​वह काले मोटे पेटवाले साधु के पास पहुँचा और बोला- “बाबा जी, आपको एक बात बतानी थी?”​“ओये! तू वही है न जिसने बाबा जी को चुनौती दे रखी है? अबे क्यों तू अपनी जान का दुश्मन बना हुआ है? वे खतरनाक लोग हैं? उनसे पंगा लेना अपनी मौत को बुलाने जैसा है? फिर भी तुझ में इतनी हिम्मत है?”​“तभी तो आपसे मिलने आया हूँ। लेकिन आप इतने शरीफ, दयावान, सच्चे, ईमानदार और भोले-भाले इनसान हैं। आप इन लोगों के यहाँ कैसे फँस गये?”      ​अपनी प्रशंसा सुनकर काले मोटे पेटवाले ने कहा- "मैं बाबा का सेवादार हूँ। भस्मानंद जी महाराज कई नाजायज काम करते है। मैं इनकी सेवा में दिन-रात जुटा रहता हूँ फिर भी बाबा मुझे गालियाँ देता रहता है। जब मैं दस साल का था तब मैं बहुत बीमार पड़ गया था। डॉक्टर मेरे इलाज के लिये पचास हजार रुपये माँगते थे। मेरा बापू गरीब आदमी था और कोई चारा न देख बापू मुझे लेकर भस्मानंद जी महाराज की शरण आ गया। बाबा ने मुझे देखकर कहा- 'इसका बचना मुश्किल है पर मैं कोशिश करता हूँ। लेकिन शर्त है कि अगर ये जीवित बच गया तो तुम इसे जिन्दगीभर के लिये मेरी सेवा में समर्पित कर दोगे। वैसे भी तो ये तुम्हारे लिये मर ही चुका है। अगर हमने इसे बचा लिया तो इसकी आगे की जिन्दगी के हम मालिक होंगे।' मेरे बापू ने शर्त मान ली। बाबा ने अपने किसी यजमान को फोन किया। उसकी जान-पहचान एक सरकारी अस्पताल में थी। उसने मुझे अस्पताल में दाखिल करवा दिया। वहाँ मेरा इलाज हुआ और मैं ठीक हो गया। मैं तब से इस आश्रम का नौकर बना हुआ हूँ। अब मैं तीस वर्ष का हो चुका हूँ। मेरे माँ-बाप भी मर चुके हैं। कई बार यहाँ से भागने की सोचता हूँ पर मुझे पता है इनके गुण्डे पकड़कर वापिस ले आयेंगे। मैं दिन-रात काम में जुटा रहता हूँ।" फिर अपने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा- "यहाँ खाने को तो बढ़िया मिल ही जाता है। बाबा ने मेरा नाम सदानंद रख दिया है। कई बार चिमटों से मेरी पिटाई कर चुका है।"​सजग ने उसके साथ हमदर्दी दिखाते हुए कहा, "मैं तो पहचान गया था। आप बहुत अच्छे इनसान हो और यहाँ किसी मजबूरी में फँस गये हो। ध्यान से सुनो- उस दिन वो आदमी जो अपने-आपको इस जमीन का मालिक बता रहा था, उसने बताया है कि ये जो लाल पत्थर की समाधि बनी हुई है ये किसी बाबा भभूतानन्द की समाधि नहीं है बल्कि इसमें सोने के गहनों से भरे ​हुए दो-तीन मटके दबा रखे हैं। अगर तुम मौका देखकर समाधि को खोद डालो तो सोने के गहनों से भरे मटके तुम्हारे?”​काले मोटे पेटवाले सदानंद जी की आँखें चमक उठीं, “अच्छा! मैं अब चलता हूँ। तुमसे बात करते हुए किसी ने देख लिया तो.....?” वह तेज-तेज ​कदमों से आश्रम की ओर लौट गया। तभी उसने देखा सामने से उसके साथी उसे ढूँढ़ते हुए आ रहे थे। उन्होंने पूछा- "क्या हुआ?""कुछ नहीं!" मैदान गया था।सारा दिन लोग आते-जाते रहे। शाम को दीदी भी लौट गईं। पीछे सजग और उसके साथी रह गये थे। सजग को नींद नहीं आ रही थी।​आधी रात के बाद दो आदमी टेन्ट में घुसे। दोनों ने अपना चेहरा कपड़े से ढका हुआ था। एक के हाथ में चाकू था और दूसरे के हाथ में पिस्तौल। सजग जाग रहा था। उसने कसकर अपनी बैसाखी का वार पिस्तौलवाले के हाथ पर किया। उसके हाथ से पिस्तौल छूट गई। तबतक उसके साथी भी जाग गये। पिस्तौल श्रेयस के पास गिरी, उसने उठाकर उन्हीं पर तान दी। सजग बैसाखी का दूसरा वार चाकूवाले पर करना चाहता था कि उसका पैर लड़खड़ा गया। सजग नीचे गिर पड़ा। चाकूवाले ने सजग पर प्रहार करने के लिये जैसे ही चाकू उठाया कि टेन्ट के पीछे से निकलकर दो आदमियों ने उन गुण्डों को धर-दबोचा। वे सादी वर्दी में पुलिसवाले थे जो उनकी सुरक्षा के लिये तैनात थे। दीदी ने ही पुलिस में उनकी सुरक्षा के लिये दरखास्त देकर उन्हें वहाँ पर तैनात करवा रखा था।​गुण्डे बार-बार गिड़गिड़ा रहे थे, "हमने कुछ नहीं किया। हमें छोड़ दीजिये।" पकड़े गये गुण्डे बता रहे थे- "हमें बाबा भस्मानंद जी ने सजग को मारने के लिये भेजा था, ताकि बाबा की भविष्यवाणी सच सिद्ध हो सके। बाबा ने हमें भी जान से मारने की धमकी दी थी!.....​"इसी बाबा ने बहुत पहले हमसे इसी जमीन पर खेती करनेवाले रामधन को मारकर फिंकवा दिया था और खेत पर कब्जा करके यहाँ आश्रम बनाकर बैठ गया। ये पूर्वी उत्तर प्रदेश का भागा हुआ डकैत है। ये भेष बदलकर यहाँ छिपा बैठा है। हमारा कोई कसूर नहीं। हमें छोड़ दो?"    ​पुलिस डंडे मारते हुए उन्हें थाने ले गयी।तभी वहाँ सदानन्द आया और सजग को थोड़ा परे ले जाकर बोला, "मैंने समाधि खोद डाली है।"हैरान होते हुए सजग ने पूछा, "खोद डाली? भस्मानंद और उसके चेलों ने कुछ नहीं कहा?""मैंने उन सबके खाने में नशे की गोलियाँ मिला दी थीं। सब गहरी नींद सो गये। अभी भी सो रहे हैं। हा हा।""क्या मिला?""तुमने तो कहा था कि सोने के गहनों से भरे घड़े मिलेंगे?"सजग ने हँसते हुए कहा, "मैंने तुम्हें झूठ-मूठ बहकाया था ताकि तुम समाधि खोद डालो और सच सामने आ सके? ये तो बताओ मिला क्या?""मिला कुत्ते की हड्डियों का ढाँचा।"तभी वहाँ पुलिस की दो जीपें और न्यूज चैनल की वैन आ पहुँची थी। फोटो खींची जाने लगी थीं। पुलिस ने पूरे आश्रम को कब्जे में लेकर तलाशी लेनी शुरू कर दी थी। आश्रम से हथियारों का जखीरा बरामद कर लिया गया था। पुलिस ने आश्रम से विदेश पैसा भेजने के हवाला के कागज भी बरामद कर लिये थे। बाबा भस्मानंद का भण्डा फूट चुका था।​उधर भस्मानंद जी बड़े आराम से नींद की गोली के असर से सो रहे थे। पुलिस ने भस्मानंद और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लिया था। वे सभी गोलियों के नशे में झूमते-झूमते पुलिस के साथ जा रहे थे। मौके पर आये असिस्टेन्ट पुलिस कमिश्नर एक चैनलवालों को कह रहे थे- "यह बाबा पकड़ा न जाता तो देश के लिये बहुत बड़ा खतरा बननेवाला था। इन बहादुर बच्चों ने अपनी जान की परवाह न कर बाबा का भण्डाफोड़ करके बहुत ​बड़ा काम किया है। सजग के लिये सरकार से बड़े से बड़े इनाम की हम सिफारिश करेंगे।”​तभी वहाँ जगदीश राय आ पहुँचा। उसे नर्सिंग होम से छुट्टी मिल गई थी। उसे बाबा भस्मानन्द के भण्डाफोड़ का पता लगा तो वह बहुत खुश हुआ। वह सजग से बोला, “तुमने एक असम्भव-सा काम कर दिखाया है क्योंकि इसमें धर्म और आस्था का मसला भी जुड़ा हुआ था। अब मैं इस जमीन पर डबलू की याद में बहुत बड़ा एक अस्पताल बनवाऊँगा, जिसमें इनसानों के साथ-साथ जानवरों का भी इलाज हो सके।”​उधर जब पुलिस भस्मानंद को पकड़कर ले जाने लगी तो वह गिड़गिड़ाते हुए रोने लगा, “मुझे मत ले जाओ! मैं शूगर का मरीज हूँ। मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ रहा है। मुझे चक्कर आ रहे हैं, सिरदर्द हो रहा है। मुझे माफ कर दो!”​सजग ने हँसते हुए कहा, “बाबा, आप तो भगवान हैं, दूसरों का रोग ठीक करते हैं। अपना नहीं ठीक कर सकते? बहत्तर घंटे भी पूरे हो चुके हैं पर मैं अभी जिन्दा हूँ?”​सभी हँस-हँसकर दोहरे होने लगे। न्यूज चैनलवालों ने सजग से कुछ कहने के लिये कहा तो वह बोला, “मैं कहना चाहूँगा कि ढोंगी बाबाओं के चक्कर में कभी मत पड़ो। ये भगवान कैसे हो सकते हैं! ये सभी ढोंगी देश के दुश्मन हैं। इनसे बचकर रहो ..... अपने देश को आगे ले जाना है तो हमें आस-पास छिपे हुए ऐसे गद्दारों को पकड़ना होगा। इसके लिये हमें हर वक्त चौकन्ना रहना पड़ेगा। पैर खराब होने के बावजूद मैं कुछ कर सका हूँ तो आप भी वहाँ कुछ कर सकते हैं। देश के हर नागरिक को अब सिपाही बनना होगा, इसके लिये हमें सजग, सचेत और सतर्क रहना होगा।”