the wall of glass in Hindi Moral Stories by राज बोहरे books and stories PDF | काँच की दीवार

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काँच की दीवार

काँच की दीवार

 

रामनाथ जी एक सेवानिवृत्त शिक्षक थे। चालीस वर्षों तक उन्होंने बच्चों को पढ़ाया, उन्हें जीवन के मूल्य सिखाए। उनकी कक्षा में अनुशासन और आत्मीयता दोनों का अद्भुत मेल था। गाँव और कस्बे के लोग उन्हें “गुरुजी” कहकर सम्मान देते थे।

सेवानिवृत्ति के बाद वे चाहते थे कि अपने अनुभवों को परिवार और समाज के साथ साझा करें। वे अक्सर अपने बेटे और बहू से कहते— “बच्चों को केवल किताबें नहीं, जीवन की कहानियाँ भी चाहिए। मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि कठिनाइयों से कैसे जूझा जाता है।”

लेकिन बेटे का उत्तर होता— “पिताजी, अब जमाना बदल गया है। आपकी बातें पुरानी हो चुकी हैं। आजकल बच्चे इंटरनेट से सब सीख लेते हैं।”

रामनाथ जी चुप हो जाते। उनकी आँखों में एक अदृश्य पीड़ा उतर आती।

धीरे-धीरे उन्हें महसूस होने लगा कि उनके और परिवार के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई है—काँच की दीवार। वे सबको देख सकते थे, सुन सकते थे, लेकिन उनकी आवाज़ उस दीवार को पार नहीं कर पाती थी। उनके अनुभवों को “पुरानी सोच” कहा जाता, उनकी सलाह को “बेकार” समझा जाता।

वे पड़ोस के बच्चों को बुलाकर कहानियाँ सुनाने की कोशिश करते। लेकिन माता-पिता कहते— “गुरुजी, बच्चों का समय बर्बाद मत कीजिए। उन्हें ट्यूशन जाना है।”

रामनाथ जी के भीतर एक गहरी खामोशी उतरती चली गई।

एक दिन मोहल्ले में बिजली चली गई। बच्चे मोबाइल और टीवी के बिना बेचैन हो उठे। रामनाथ जी बरामदे में बैठे थे। उन्होंने धीरे से कहा— “आओ, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।”

पहले तो बच्चों ने हिचकिचाया, लेकिन धीरे-धीरे सब उनके पास आ गए। उन्होंने अपने शिक्षक जीवन की घटनाएँ सुनानी शुरू कीं—किस तरह एक गरीब छात्र ने मेहनत से डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया, किस तरह अनुशासन ने जीवन बदल दिया।

बच्चों की आँखें चमक उठीं। वे मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे।

उस रात रामनाथ जी ने महसूस किया कि उनके अनुभव बेकार नहीं हैं। समस्या यह नहीं कि वे पुरानी बातें करते हैं, बल्कि यह कि समाज ने सुनना बंद कर दिया है।

काँच की दीवार टूट सकती है—अगर परिवार और समाज वृद्धजनों को सुनने का धैर्य रखें।

 

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काँच की दीवार

 

रामनाथ जी एक सेवानिवृत्त शिक्षक थे। चालीस वर्षों तक उन्होंने बच्चों को पढ़ाया, उन्हें जीवन के मूल्य सिखाए। उनकी कक्षा में अनुशासन और आत्मीयता दोनों का अद्भुत मेल था। गाँव और कस्बे के लोग उन्हें “गुरुजी” कहकर सम्मान देते थे।

सेवानिवृत्ति के बाद वे चाहते थे कि अपने अनुभवों को परिवार और समाज के साथ साझा करें। वे अक्सर अपने बेटे और बहू से कहते— “बच्चों को केवल किताबें नहीं, जीवन की कहानियाँ भी चाहिए। मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि कठिनाइयों से कैसे जूझा जाता है।”

लेकिन बेटे का उत्तर होता— “पिताजी, अब जमाना बदल गया है। आपकी बातें पुरानी हो चुकी हैं। आजकल बच्चे इंटरनेट से सब सीख लेते हैं।”

रामनाथ जी चुप हो जाते। उनकी आँखों में एक अदृश्य पीड़ा उतर आती।

धीरे-धीरे उन्हें महसूस होने लगा कि उनके और परिवार के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई है—काँच की दीवार। वे सबको देख सकते थे, सुन सकते थे, लेकिन उनकी आवाज़ उस दीवार को पार नहीं कर पाती थी। उनके अनुभवों को “पुरानी सोच” कहा जाता, उनकी सलाह को “बेकार” समझा जाता।

वे पड़ोस के बच्चों को बुलाकर कहानियाँ सुनाने की कोशिश करते। लेकिन माता-पिता कहते— “गुरुजी, बच्चों का समय बर्बाद मत कीजिए। उन्हें ट्यूशन जाना है।”

रामनाथ जी के भीतर एक गहरी खामोशी उतरती चली गई।

एक दिन मोहल्ले में बिजली चली गई। बच्चे मोबाइल और टीवी के बिना बेचैन हो उठे। रामनाथ जी बरामदे में बैठे थे। उन्होंने धीरे से कहा— “आओ, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।”

पहले तो बच्चों ने हिचकिचाया, लेकिन धीरे-धीरे सब उनके पास आ गए। उन्होंने अपने शिक्षक जीवन की घटनाएँ सुनानी शुरू कीं—किस तरह एक गरीब छात्र ने मेहनत से डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया, किस तरह अनुशासन ने जीवन बदल दिया।

बच्चों की आँखें चमक उठीं। वे मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे।

उस रात रामनाथ जी ने महसूस किया कि उनके अनुभव बेकार नहीं हैं। समस्या यह नहीं कि वे पुरानी बातें करते हैं, बल्कि यह कि समाज ने सुनना बंद कर दिया है।

काँच की दीवार टूट सकती है—अगर परिवार और समाज वृद्धजनों को सुनने का धैर्य रखें।