mera hindustan mujhe fir lauta do by dheerendr dheer in Hindi Book Reviews by ramgopal bhavuk books and stories PDF | धीरेंद्र धीर - मेरा हिंदुस्तान मुझे फिर लौटा दो

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धीरेंद्र धीर - मेरा हिंदुस्तान मुझे फिर लौटा दो

राष्ट्रीय चेतना की सुगन्ध बिखेरता मेरा हिन्दुस्तान मुझे फिर लौटा दो।
रामगोपाल भावुक
धीरेन्द्र गहलोत ‘धीर’ की कृति मेरा हिन्दुस्तान मुझे फिर लौटा दो पर एक चिन्तनीय काव्य संग्रह हैं। यह मेरा दुर्भाग्य कहें यह कृति वर्ष 2009 में प्रकाशित कृति को सन् 2026 में पढ़ पा रहा हूँ।
धीर जीने इसमें राष्ट्रीय चेतना की ऐसी सुगन्ध बिखेरी है कि इसे बारम्बार पढ़ने का मन करने लगता है। डॉ. भगवान स्वरूप् शर्मा ‘चैतन्य’ ने इसकी भूमिका में कहा है -‘ गीत में रस,प्रीति, अनुराग, विराग ओर वेदना का तत्व तो प्रभावी होता ही है किन्तु गीत में इसके साथ राष्ट्रीयता का भाव और जुड़ जाये तो गीत निखर उठता है। गीत में सामाजिक संवेदना के राथ राष्ट्रीय चेताना का प्रेरक तत्व विद्यमान होने से गीत की राष्ट्र के लिए उपादेयता और अधिक बढ़ जाती है।’
इसी उपादेयता ने जो राष्ट्रीय भावना की सुगन्ध बिखेरी है, इससे रचनाओं का पाठ करते समय देश का वर्तमान सुगन्धित हो उठता है।
कवि स्वीकारता है-‘आज आधुनिकता की अंधी दौड़ और पाश्चात्य सभ्यता की हावी होती अपसंस्कृति ने उसे अपने मूलभाव से दूरका ‘इण्डिया’ बना दिया।’ कवि की व्यथा इन पक्तियों में देखिये-‘
तह.जीव मिट न जाये कहीं अपने देश की
आँगन में भी आने लगी खुषबू विदेश की।
कवि की विवशता देखिये-
एक कुटिया सेभवन का फासला,
तय न कर पाये चरण हम क्या करें।
‘धीर’ डिस्को कैबरों के षोर में,
मौन मीरा के भजन हम क्या करें।

इस संकलन में देश के चर्चित विद्वानों की अनुशंसा के साथ तीस गजलें एवं चौबीस गीत कुछ चतुष्पदीं साथही दोहों की बानगी समाहित है। रचना के पहल गीत की पक्ति शीर्षक बनकर सम्पूर्ण काव्य का प्रतिनिधित्व कर रही है-
जिस लहू से सींचा अमर शहीदों ने,
वो वंदित बलिदान मुझे फिर लौटा दो।
था जिसका ईमान हिमालय से ऊँचा,
मेरा हिन्दुस्तान मुझे फिर लौटा दो।
आपने इा संकलन में देश की अस्मिता के गीत तो गाये ही हैं साथ ही आपने इसमें मानव की मनोवृति को भी गहराई से अंकित किया है। जीकर तो देखिये में- हम उनको दरिंन्द नहीं कहें तो क्या कहें,
जो जिस्म बेचते हैं और जान बेचते हैं।
उनकी कन्दराओं में जिये में-
गीत वो अनुराग के गायेंगे क्या,
जो सदा दुर्भावनाओं में जिये।
आपने अपने गीतों में मन की तरंगों से व्यवस्था की शल्य क्रिया की है।
आपका मीत द्वदय की हर घडकन में समाहित है-‘
हर मौसम सावन सा मुझको प्यारा लगता है,
हर दिन आज दिवाली सा उजियारा लगता है।
राधे सी प्रियतमा सुनों, घनश्याम तुम्हारा है।
मीत द्वदय की हर धड़कन में नाम तुम्हारा है।
आपके अधिकांश गीत ऐसी ही भावनाओं में सरावोर हैं।
आपकी इस चतुष्पदी में भी देखिये-

निज स्वार्थ तज, परमार्थ से ज्यों तर हुआ।
जुगनू सा था जो मन मेरा, दिनकर हुआ।
हर बुराई का किया विषपान शंकर सा तभी,
सुनसान था मरघट सा मन, मन्दिर हुआ।।
संकलन के दोहों पर भी दृष्टि डाली जाये-
कण-कण में जो रम रहा, तृण-तृण में अविराम,
बँधा प्रेम के पास में, वो दाता श्री राम।
कवि ने राष्ट्रीय चेतना की सुगन्ध बिखेरता मेरा हिन्दुस्तान मुझे फिर लौटा दो में व्यवस्था की शल्य क्रिया की है।

है जिनका शौक ही पीना लहू गरीबों का,
तमाम लोग मसीहा उन्हें कहा करते
आंगन में भी आने लगी रचना में-

तहजीब मिट न जाय कीजिये अपने देश की,
आंगन में भी आने लगी, खुशबू विदेश की।
और कैसे गुजर हो में-
खूं करके जो जमीर का ईमान बेचते,
गीता भी बेचते हैं वो कुरआन बेचते।
कवि दुःखित है ‘मौन मीरा के भजन ’में भी-
‘धीर’ डिस्को, कैबरों के शोर में,

मौन मीरा के भजन हम क्या करें।
इस सब के बावजूद कवि का आत्मविष्वास है-
हर एक आत्मा में बैठा है वो दीवानो।
गर चाहते वतन हो,
अपनाप सभी से ऊँचा।
तो प्रेम भाई-चारा,
फैलाओ कूँचा- कूँचा।
हम तोड़ने न देंगे, हिन्दुस्तां ये ठानो।
क्वि ने दोहे के माध्यम से भी यही स्वीकारा है-
तुम आषाओ के दिये, तुम कल की पहचान,
बच्चो गढ़ना है तुम्हें, सुन्दर, सुखी जहान।
डॉ. लखन लाल खरे के शब्दों ’में -
नित मिले प्रगति का पंथ नया,
भावी जीवन निष्कण्टक हो।
श्रद्वा- स्नेह मिले पावन,
चहे जैसा भी संकट हो।
आपकी इस पहली भाव-भूमि को मेरा हृदिक शुभाशीष। आप इसी तरह जीवन के लक्ष्य पूरे करते जाये, प्रभु से यही आकांक्षा।

कृति का नाम- मेरा हिन्दुस्तान मुझे फिर लौटा दो
रचनाकार का नाम-धीरेन्द्र गहलोत ‘धीर’
प्रकाशक-साहित्य अकादमी म.प्र. संस्कृति परिषद कें सहयेग से
वर्ष- 2009
मूल्य- 150रूः मात्र
समीक्षक- रामगोपाल भावुक मों- 9425715 707
कमलेश्वर कॉलोनी डबरा, भवभूति नगर जिला ग्वालियर म0.प्र.0 475110