शानवी की आँखों में गुस्सा और चोट का मिश्रण था।
उसने महसूस किया कि कार्तिकेय ने उसकी भावनाओं को बहुत करीब से छू लिया था, लेकिन अब अचानक उसके सामने सच सामने आने पर उसका दिल डर और गुस्से से भर गया।
शानवी (कड़क आवाज़ में, आंसू रोकते हुए) बोली -
कार्तिकेय! तुम इस हद तक गिरोगे…मैने कभी नहीं सोचा था कि तुम ऐसा करोगे!
कार्तिकेय ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन उसके भीतर डर और बेचैनी भी थी। उसने धीरे-धीरे सिर झुका लिया।
कार्तिकेय (धीरे, केवल अपने आप से) बोला -
शानवी… मैं… मैं सिर्फ़ तुम्हें बचाना चाहता हूं…”
शानवी ने उसे देखकर हाथ हिला दिया, और गुस्से में कहा—
जाओ… अब मत आना!
कार्तिकेय ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर उसकी तरफ आखिरी बार देखा।
उसकी आँखों में दर्द और पछतावा था। फिर…वो धीरे-धीरे बालकनी से कूदकर अंधेरे में खो गया। शानवी वहीं खड़ी रह गई।
दिल में गुस्सा था, लेकिन अंदर… थोड़ा डर और खालीपन भी था।
टुक-टुक का इंसान रूप अब उसके सामने चला गया था,
लेकिन उसका असर… शानवी के दिल पर गहरा था।
शानवी और पारितोष धीरे-धीरे एक-दूसरे के करीब आने लगे थे।
उनकी हँसी, बातें, और छोटे-छोटे पल अब रोजमर्रा का हिस्सा बन चुके थे। लेकिन कार्तिकेय…वो टुक-टुक की मासूम बिल्ली की शक्ल में छिपा हुआ इंसान, अंदर ही अंदर बेचैन था। उसका दिल बार-बार डर से भर जाता। जो पहले जन्म में हुआ था… वही डर उसे सताता था। यदि पारितोष के इरादे सही नहीं हुए, तो शानवी फिर उसी खतरनाक जाल में फँस सकती थी।
पारितोष ने धीरे-धीरे शानवी को propose किया।
कुछ ही समय में उनकी शादी तय हो गई। शानवी खुश थी, लेकिन कहीं न कहीं उसका दिल हल्का सा गड़बड़ा रहा था। कार्तिकेय को यह सब देखते हुए बहुत तकलीफ हो रही थी। टुक-टुक के छोटे पंजों ने फर्श पर हल्का फुर्र-फुर्र किया,
जैसे कह रहा हो—
मैं अब भी तुम्हें बचा सकता हूँ…अगर समय मिला तो… अभी भी मौका है।
लेकिन…वो इंसान और बिल्ली दोनों रूप में अकेला था।
उसके पास शानवी तक सीधे पहुँचने का कोई रास्ता नहीं था।
और पारितोष… धीरे-धीरे उसके मकसद के जाल में शानवी को फँसा रहा था। शानवी के लिए सब सामान्य लग रहा था।
लेकिन कार्तिकेय की आँखों में एक छुपा हुआ डर और urgency साफ़ नजर आ रही थी।
शादी का दिन आया। मंडप फूलों से सजा हुआ था, हर तरफ़ खुशियों का माहौल था। शानवी हल्की मुस्कान के साथ अपने दुल्हे पारितोष की तरफ देख रही थी। लेकिन उसके मन में एक सवाल लगातार घूम रहा था—
शानवी (धीरे से, चिंता में) बोली -
पारितोष जी… टुक-टुक कहाँ है? मैंने उसे आज सुबह से नहीं देखा।
पारितोष (हल्की मुस्कान के साथ) बोला -
शायद… खेल रहा होगा कहीं। तुम चिंता मत करो। अब सब कुछ ठीक है।
शानवी ने मन ही मन टुक-टुक की ओर नजर दौड़ाई, लेकिन बिल्ली का कोई निशान नहीं मिला। दिल में हल्की बेचैनी थी, पर शादी की हलचल ने उसे कुछ समय के लिए शांत कर दिया।
रात के ठीक 12 बजे, जैसे ही मंदिर की घंटियाँ बजीं, टुक-टुक अचानक…बिल्ली से इंसान में बदल गया। कार्तिकेय का इंसानी रूप सामने आया—मजबूत, तेज़, और बेहद गंभीर। उसने जल्दी से बाइक ली और मंडप की ओर बढ़ा।
रास्ते में उसके कुछ साथी—कुछ गुंडे—उसके साथ थे। उनका काम साफ था—शानवी को सुरक्षित हटाना, लेकिन उसी समय डर और confusion फैलाना।
मंडप में खुशियों का माहौल था। अचानक…दरवाज़ा खुला तेज़ हवा आई, और कार्तिकेय, अपने गुंडों के साथ, मंडप में घुस गया
शानवी (चौंककर) बोली -
क्या… क्या हो रहा है?!
गुड्डे तेजी से मंडप में घुसे। शानवी को पकड़ लिया गया। भीड़ में शोर मच गया। लोग डर से इधर-उधर भागने लगे। कार्तिकेय ने शानवी को अपनी बाँहों में उठाया। उसकी आँखों में डर नहीं…बल्कि एक मिश्रित चिंता और urgency थी।
कार्तिकेय (धीरे से, गंभीर स्वर में) बोला -
शानवी… तुम्हें खतरे से बचाने के लिए मैं ये सब कर रहा हूँ।
अब मुझे केवल तुम्हारा भरोसा चाहिए।
शानवी की आँखों में डर और confusion था। वो समझ नहीं पा रही थी, क्या ये सच में उसका protector है या फिर… कुछ और।
कार्तिकेय ने शानवी को अपनी बाँहों में कसकर पकड़ा।
वो डर से नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा के लिए पूरी तरह alert था।
गाड़ियां सड़क पर तेज़ी से दौड़ रही थीं। गुड्डे ड्राइविंग सीट पर थे, उनकी आँखों में केवल काम पूरा करने की ठानी हुई गंभीरता।
शानवी छटपटा रही थी, गुस्से और डर में।
शानवी (चिल्लाकर, गुस्से में) बोली -
कार्तिकेय! छोड़ो मुझे! क्या कर रहे हो? मेरी शादी होने वाली है! लोग क्या कहेंगे?!
कार्तिकेय ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में खतरनाक गंभीरता थी। उसकी आवाज़ अब नरम नहीं थी, बल्कि… खतरनाक, तीव्र और निर्णायक।
कार्तिकेय (धीरे से, खतरनाक स्वर में) बोला -
शादी तो तुम्हारी होगी… पर पारितोष से नहीं होगी।
शानवी की आँखें फटी की फटी रह गईं। दिल में डर और confusion ने एक साथ जगह बना ली।
उसने धीरे से पूछा—
तुम… क्या बोल रहे हो? क्यों? ये… ये क्या मतलब है?
कार्तिकेय ने एक पल के लिए सड़क की तरफ देखा,
फिर फिर से शानवी की आँखों में झाँकते हुए कहा—
मैं तुम्हें बचा रहा हूँ। पारितोष… वो सही नहीं है।
अगर तुम उसके साथ चली गई, तो तुम… बर्बाद हो जाओगी।
मैं इसे कभी होने नहीं दूँगा।
शानवी की साँसें तेज़ हो गईं। गाड़ी की तेज़ रफ्तार, कार्तिकेय की गंभीरता, और गुंडों की मौजूदगी सब मिलकर उस पल को सस्पेंस और डर से भर चुके थे। टुक-टुक का इंसान रूप अब पूरी तरह सामने था। उसकी आँखों में केवल एक बात साफ़ थी—शानवी को किसी भी कीमत पर सुरक्षित रखना।