Raat ki Raani - 1 in Hindi Mythological Stories by Upendra Bharti books and stories PDF | रात की रानी - भाग 1

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रात की रानी - भाग 1

रात का आखिरी पहर था।

घर के बाहर नीम का पेड़ सन्नाटे में खड़ा था — जैसे किसी अनहोनी का इंतज़ार कर रहा हो। अंदर से एक स्त्री की दबी हुई कराह आती, फिर चुप हो जाती। दीया टिमटिमा रहा था, जैसे उसकी भी हिम्मत जवाब दे रही हो।

फिर एक रोने की आवाज़ आई।

नई, कोमल, काँपती हुई।

गाँव की दाई नीलम काकी ने बच्ची को गोद में उठाया और हाँ भरी साँस ली। बच्ची के चेहरे पर एक अजीब रोशनी थी — जैसे पूर्णिमा की रात का चाँद किसी के माथे पर उतर आया हो। आँखें अभी बंद थीं, पर उन बंद पलकों में भी एक अजीब सी चमक थी।

नीलम काकी ने धीरे से कहा, "कमला बेटी, बेटी हुई है। बहुत सुंदर है। भगवान ने बड़ी कृपा की है।"

कमला की आँखों में आँसू आ गए। आँसू खुशी के थे या डर के — वो खुद नहीं जानती थी। उसने काँपते हाथों से बच्ची को थामा और उसके माथे को होठों से चूमा।

बाहर चौखट पर रामकिशन खड़ा था। सुना, तो उसके जबड़े भिंच गए। उसने दीवार पर मुक्का मारा — ऐसे, जैसे दीवार का कोई कसूर हो।

रामकिशन कोई बुरा इंसान नहीं था। बस एक ऐसा इंसान था, जिसके दिल में डर बहुत गहरा था। और वो डर एक पुरानी बात से आता था।

बात यह थी कि रामकिशन के गाँव में एक बुज़ुर्ग ओझा था — सोमदास। सोमदास ने सालों पहले भविष्यवाणी की थी कि "जिस घर में किसी लड़की का रूप इस गाँव की सीमा से बाहर की बात बने, तो समझ जाना उस घर पर आसमान रोएगा।" बचपन से रामकिशन यही सुनता आया था। उसने देखा था कि गाँव के कुछ घरों में सुंदर लड़कियाँ हुईं और उन घरों में आफतें आईं — कभी खेत सूखे, कभी मवेशी मरे, कभी कोई बीमार पड़ा।

बेशक वो सब इत्तेफाक था। बेशक उसमें और उन बच्चियों में कोई संबंध नहीं था। लेकिन जिसके मन में डर बैठ जाए, वो इत्तेफाक में भी निशान ढूँढता रहता है।

और अब यह बच्ची —

रामकिशन ने अंदर आकर बच्ची को देखा। एक पल के लिए उसके हाथ ठिठके। एक पल के लिए उसके भीतर भी कुछ हिला — शायद कोई कोमल सी भावना, जो हर बाप के सीने में होती है।

लेकिन फिर उसे सोमदास की कही बात याद आ गई।

और वो कोमल भावना कही दब गई।

रामकिशन ने धीमी, पर कठोर आवाज़ में कहा, "यह बच्ची इस घर में नहीं रह सकती।"

कमला ने चादर और कस ली बच्ची के ऊपर — जैसे उसके शब्दों की ठंड से बचाना हो।

"क्या कह रहे हो आप?"

"सोमदास की बात याद है ना तुम्हें? यह लड़की — इसका रूप देखो। यह साधारण नहीं है। यह जितनी सुंदर है, उतनी ही आफत लाएगी। यह श्राप है हमारे घर के लिए।"

कमला की आँखों में आग आ गई।

"यह हमारी बेटी है। हमारा खून है। इसे श्राप कैसे कह सकते हो? भगवान ने दी है, भगवान ही जानता है।"

"भगवान ने दी है तो भगवान पर छोड़ दो। मेरे घर में नहीं रहेगी बस।"

नीलम काकी चुपचाप सुन रही थीं। उनके हाथ मुट्ठी में बंद हो गए। उन्होंने मन में एक निर्णय किया।

रात को जब रामकिशन बाहर गया — किसी बहाने से — तब नीलम काकी ने कमला का हाथ थामा।

"बेटी, यहाँ से निकलो। जंगल के उस पार जो पुराना बरगद है। वहाँ एक साध्वी माँ रहती हैं। सब उन्हें 'अम्बे माँ' कहते हैं। बहुत दयालु हैं। जाओ — अभी जाओ, जब तक रामकिशन लौटे नहीं।"

कमला के पैर काँप रहे थे। उसकी बाँहें थकी थीं। उसका पूरा जिस्म एक थकान से भरा था जो सिर्फ जन्म देने से नहीं आती — वो थकान थी जो किसी की नफ़रत सहने से आती है।

फिर भी वो हिम्मत जुटा कर उठी।

बच्ची को सीने से लगाया। और अँधेरी रात में, नीम की पत्तियों की सरसराहट के बीच, वो चल पड़ी।

जंगल में रात गहरी थी।

पेड़ों की जड़ें रास्ते में उभरी थीं, जैसे ज़मीन ने जाल बिछाया हो। दूर कहीं एक उल्लू बोला — एक बार, दो बार, तीन बार फिर चुप।

कमला के पैरों तले पत्तियाँ चटखती थीं। बच्ची उसकी गोद में सो गई थी — निश्चिंत, बेखबर, उस दुनिया से जहाँ वो अभी-अभी आई थी।

कमला बेचारी रोती जाती थी और चलती जाती थी।

"मुझे माफ करना बेटी। मैं कमज़ोर माँ हूँ। तुझे बचाना चाहती हूँ — पर मुझे तरीका नहीं पता।"

तभी पुराना बरगद सामने आया।

उसकी जटाएँ ज़मीन तक लटकी थीं — जैसे बूढ़े बाबा की सफ़ेद दाढ़ी। और उसी बरगद की आड़ में एक छोटी सी धूनी जल रही थी। धूप की खुशबू हवा में थी।

एक वृद्ध साध्वी बैठी थीं।

उनकी आँखें बंद थीं, पर होठों पर एक हल्की मुस्कान थी — जैसे उन्हें पहले से पता था कि कोई आने वाला है।

कमला उनके पास गई और उनके पैरों में गिर पड़ी।

"माँ... माँ मेरी बच्ची को बचा लो। मेरे घर में इसे श्राप माना जा रहा है। इसकी सुंदरता ही इसका दुश्मन बन गई है। मेरे पति इसे स्वीकार नहीं करेंगे।"

साध्वी ने आँखें खोलीं। उनकी आँखें काली थीं — गहरी, शांत, जैसे उनमें पूरा आकाश समाया हो।

उन्होंने धीरे से कहा, "बच्ची को दिखाओ।"

कमला ने बच्ची को आगे किया।

साध्वी ने बच्ची के माथे को देखा — और उनके चेहरे पर एक अजीब भाव आया। करुणा और विस्मय का मिला-जुला भाव।

"इसका नाम क्या रखोगी?"

"नंदिनी।"

"नंदिनी।" साध्वी ने नाम दोहराया, जैसे उसे तौल रही हों। "बेटी, यह बच्ची सचमुच साधारण नहीं है। इसमें एक ऐसी शक्ति है जो इसकी सुंदरता से भी गहरी है। यह दूसरों का रास्ता रोशन करने के लिए आई है इस दुनिया में। पर दुनिया अभी इसे समझने के काबिल नहीं है।"

कमला ने रोते हुए कहा, "तो फिर माँ, क्या करूँ मैं ?"

साध्वी ने एक लंबी गहरी साँस ली और बोली

"एक ही उपाय है। कठिन है — पर सुरक्षित है।"

उन्होंने धूनी से एक चुटकी भभूत उठाई। कुछ मंत्र बुदबुदाने लगीं। हवा में एक अजीब सी हलचल आई — पत्तियाँ बिना हवा के हिलने लगीं। धूनी की आग हरी हो गई — एक पल के लिए।

और फिर —

कमला की गोद एकदम से हल्की हो गई।

जहाँ नंदिनी थी, वहाँ एक छोटी सी लता थी — रात की रानी की। नाजुक, सफ़ेद कलियों से भरी। और उससे एक ऐसी खुशबू उठ रही थी जो किसी ने पहले कभी नहीं सूँघी थी — मीठी, गहरी, जैसे हज़ार जन्मों की याद एक साथ आ जाए।

कमला की साँस रुक गई।

"माँ... मेरी नंदिनी..."

"घबराओ मत।" साध्वी ने उनका हाथ थामा। "वो जीवित है। हर रात जब यह फूल खिलेगा, तब नंदिनी की आत्मा जागेगी। वो देख सकेगी, सुन सकेगी, महसूस कर सकेगी। और जिस दिन कोई सच्चे मन से उसे बिना देखे — सिर्फ उसकी खुशबू से, सिर्फ उसकी आवाज़ से — अपनाएगा, उस दिन यह रूप टूट जाएगा। और जिस दिन तुम्हारे पति को अपनी गलती का सच्चा पछतावा होगा — वो दिन भी बहुत ज़रूरी है।"

"और तब तक?"

"तब तक यह लता तुम्हारे आँगन में रहेगी। इसकी देखभाल करना। इससे बातें करना। माँ बनी रहना — भले ही दुनिया को लगे कि तुम एक पौधे से बातें करती हो।"

कमला ने उस छोटी सी लता को अपनी छाती से लगाया।

और इस बार के आँसू — वो सिर्फ दर्द के नहीं थे। उनमें एक माँ का वादा भी था।


क्रमशः 
To be continue✍️