Tutata hua Mann - 1 in Hindi Moral Stories by prem chand hembram books and stories PDF | टूटता हुआ मन - भाग 1

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टूटता हुआ मन - भाग 1

🌑 टूटता हुआ मन भाग :-1
(अहंकार से आत्मबोध तक की कथा)
रमेश घोष एक प्रतिष्ठित आईआईटी इंजीनियर था।
तेज बुद्धि, आधुनिक सोच और तर्कशील स्वभाव—वह उन लोगों में से था जो जाति, वर्ण और परंपराओं को पुरानी और निरर्थक मानते थे।
कॉलेज के दिनों में उसकी मुलाकात फरजाना से हुई—एक आत्मविश्वासी, स्वतंत्र विचारों वाली युवती।
विचारों का मेल हुआ… और वही मेल धीरे-धीरे प्रेम में बदल गया।
परिवारों ने विरोध किया—
धर्म, जाति, समाज—हर तर्क सामने आया।

रमेश के पिता—एक प्रतिष्ठित सेवानिवृत्त शिक्षक—बांकुड़ा जिले के घोष समाज में अत्यंत सम्मानित व्यक्ति थे।
वे कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जागरूकता फैलाते थे, समाज सुधार उनका जीवन था।
उन्होंने अपने बेटे के लिए केवल एक सपना देखा था—
👉 वह सफल ही नहीं, संस्कारवान भी बने।
जब रमेश ने अपने प्रेम संबंध की बात बताई—
उन्हें लगा जैसे किसी ने उनके जीवन की नींव हिला दी हो।
उन्होंने समझाने की हर कोशिश की—
साम, दाम, दंड, भेद—पर प्रेम के आगे सब निष्फल रहा।
एक दिन उन्होंने शांत, परंतु भारी स्वर में कहा—
“बेटा… एक पुत्र की सबसे बड़ी कमाई पिता का मान होता है।
मुझे तुम्हारे इंजीनियर बनने से अधिक खुशी तुम्हारे संस्कारवान बनने में होती…
पर शायद मैं तुम्हें वह दे नहीं पाया…
आज से तुम मेरे पुत्र नहीं… और मैं तुम्हारा पिता नहीं।”
पास खड़ी माँ फूट-फूटकर रो पड़ी।
रमेश बिना पीछे देखे घर से निकल गया।
पीछे से पिता की आवाज़ गूँजी—
“मेरी चिता को आग तुम नहीं दोगे… शानू देगा!”
शानू—घर का नौकर—रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़ा—
“काका… मुझे संपत्ति नहीं चाहिए… मुझे रमेश भैया चाहिए…”
पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

रमेश रेलवे स्टेशन पर बैठा फरजाना का इंतज़ार करता रहा।
फरजाना आई—शांत, संयत, पर भीतर से दृढ़।
दोनों ने मित्रों की सहायता से कोर्ट मैरिज कर ली।
कुछ वर्षों तक जीवन सुंदर था—
फरजाना डॉक्टर बन गई, रमेश अपने करियर में आगे बढ़ता गया।
घर, परिवार, बच्चे—सब कुछ पूर्ण लगता था।

पर समय के साथ कुछ बदलने लगा…
फरजाना अपने सहकर्मी डॉक्टर सुहैल के करीब आने लगी।
पहले मित्रता… फिर निकटता… और फिर एक ऐसा संबंध, जो सीमाओं को पार कर गया।
फरजाना अक्सर सुहैल से कहती "सुहैल बस अब और नहीं हम दोनों की रस्म रिवाज सब अलग हैं मै अपने धर्म को छोड़ नहीं सकती " 
सुहैल " फरजाना एक गलती करने का मतलब जिंदगी खत्म नही हो जाती '
अल्लाह जो करते हैं वो भले के लिए ही होता है " 
फरजाना के एक कोने में इसी तरह के अपनेपन का एक घर सुना था ,साहिल शादी शुदा था परंतु उसने फरजाना के उस सुने घर को रंगीन कर दिया था "
रमेश सब देखता था…
पर कह नहीं पाता था।
जब भी कुछ कहता—
उत्तर मिलता—
“मैं कमाती हूँ… मैं किसी की जूती नहीं हूँ…”
" तुम अपने रस्ते चलो में अपने रस्ते अगर निभै तो निभाओ नहीं तो रास्ता खुला है '
ये शब्द अब तर्क नहीं, घाव बन चुके थे।

एक दिन बेटे ने मासूमियत से पूछा—
“पापा… वो अंकल मम्मी के साथ अक्सर दिन को हमलोग के घर क्यों रुकते हैं?”
यह प्रश्न नहीं था—
यह रमेश के अस्तित्व पर प्रहार था।
उसने पहली बार महसूस किया—
अपमान केवल बाहर नहीं होता…
कभी-कभी वह आत्मा को भीतर से तोड़ देता है।

एक दिन वह अचानक घर लौटा…
और जो देखा—उसने उसके भीतर की अंतिम दीवार को भी गिरा दी।
वह बिना कुछ कहे लौट गया।
अब उसके भीतर केवल एक आवाज़ थी—
पछतावे की।
“क्या मैंने अपनी जड़ों को खुद काट दिया…?”
“क्या मैं गलत था…?”
उसका मन अब उसका सबसे बड़ा शत्रु बन चुका था।

उस रात वह बच्चों के पास बैठा।
आँखों में आँसू… मन में अंधकार…
उसने सोचा—अब मैं अपने आप को ही समाप्त कर दूँ…
तभी बड़े बेटे ने नींद में उसका हाथ पकड़ लिया।
"पाप आप रो रहे हैं " 
रमेश की सिसकी अब बढ़ने लगी 
"नहीं बेटा तेरे दादू दादी की याद आ गई " 
रमेश रूआंसी होकर बोला 
आजकल बच्चे बहुत तेज होते हैं ,बड़ा बेटा सब समझता था उसने अपने पिता के आंखों के आंसू पोंछते हुए बोला 
" पापा आप ही हम दोनों के मां और बाप हो आप कभी हम दोनों को छोड़ नहीं जाओगे "
रमेश अंदर तक कांप गया मासूमियत भरी इस सवाल ने उसे जिंदा रहने के लिए मजबूर कर दिया 
अगला भाग शीघ्र ही
Jayguru 🙏🙏🙏 
वंदे पुरुषोत्तमम