Present time....
कबीर सोफे पर अकेले बैठा था। चेहरा ठंडा, आँखें गंभीर। पर हाथ… हाथ से खून बह रहा था। हर एक बूंद जैसे उसके अंदर की दर्द और पछतावे की कहानी कह रही हो। दिल भारी था। दिमाग़ उलझा हुआ।
सिर्फ़ एक ही ख्याल—
सब कुछ… सब कुछ खो चुका हूँ।
कबीर दीवार को घूर रहा था। नीली-सी चमक आँखों में। लाल-सा गुस्सा और कड़वाहट उसके चेहरे पर। हाथ से खून लगातार गिर रहा था। फर्श पर बिखरते ही एक अजीब सी ठंडी और खाली सी आवाज़ छोड़ रहे थे। तभी…सृष्टि धीरे-धीरे कमरे में आई। पलकों के नीचे आँसू थे, पर कदम सावधान और तेज़ थे।
उसने देखा—
कबीर का हाथ… खून से लथपथ।
वो बोली -
कबीर जी…
उसकी आवाज़ काँप रही थी। उसकी नज़रें डर और फिक्र से भर गई थीं। फिर भी… उसका दिल उसकी नफ़रत और गुस्से से लड़ रहा था। वो जानती थी कि वह अभी भी उस आदमी से नफ़रत करती है। लेकिन… वो उसे चोट पहुँचते नहीं देख सकती थी।
वो दौड़ी। अपने हाथ में तुरंत पट्टी लेकर आ गई।
वो बोली -
बस… शांत रहो… मैं ठीक कर देती हूँ।
सृष्टि ने हिम्मत जुटाई और कबीर के हाथ पर पट्टी बांधना शुरू किया। लेकिन उसकी आँखों में डर और चिंता दोनों झलक रहे थे।कबीर ने नज़र नहीं हटाई। दीवार को घूरते हुए…शायद अपने अंदर की टूटन को, अपनी नफ़रत को, और अपनी बेबसी को देख रहा था। सृष्टि ने धीरे से उसकी बांह पकड़ी।
वो बोली -
कबीर जी… आप… रुकिए।
आप खुद को और चोट मत पहुँचाइए।
कबीर ने सिर्फ़ दीवार घूरते हुए सिर हिलाया। शब्द नहीं बोले।
पर उसके अंदर की आग सिर्फ़ कम हुई थी। सृष्टि ने धीरे से पट्टी बांधी। खून रोकने की कोशिश की।
उसने देखा—
कबीर अभी भी अंदर से टूट रहा था। पर अब उसे ये भी एहसास हुआ कबीर पर नफ़रत के साथ-साथ उसकी चिंता और प्यार भी जीवित था। सृष्टि ने उसके हाथ को हल्के से पकड़ा। इस वक्त, नफ़रत और गुस्सा सब कुछ पीछे छोड़कर सिर्फ़ ये पल ही अहम था।
कबीर ने धीरे से सिर झुकाया। पहली बार उसने महसूस किया
कि दर्द, गुस्सा और पछतावा… सिर्फ़ सृष्टि की मौजूदगी में
कुछ कम हो सकता है।
वो पल था—
जब नफ़रत और फिक्र एक साथ मिल गए। और दोनों ने एक दूसरे की जिंदगी में छोटा सा उजाला लाने की कोशिश की।
सृष्टि ने हाथ से पटी बांध दी। धैर्य और ताक़त जुटाते हुए वो धीरे-धीरे कमरे से बाहर चली गई। फर्श पर उसके कदम धीमे और असुरक्षित थे। हर कदम उसके भीतर के दर्द की गूँज ले रहा था।
बिस्तर पर लौटकर वो हल्की हल्की सिसकियाँ लेने लगी। आँखों में आँसू, गले में दर्द…हर साँस जैसे चुभ रही थी।
तभी कबीर कमरे में आया। उसने चुपचाप उसे देखा। सृष्टि ने तुरंत आँसू छिपा लिए। चेहरा कसकर मोड़ लिया। जैसे किसी ने उसे कुछ नहीं देखा।
वो बिस्तर पर चुपचाप लेटी। कबीर उसके पास आकर धीरे से बिस्तर पर बैठ गया। फिर उसकी ओर साइड में लेट गया, बिना कोई शब्द कहे। सृष्टि की साँसें अब अटक रही थीं। हर साँस दर्द से भरी। कबीर ने उसकी छाती के पास हाथ रखा, धीरे-धीरे उसे सहलाया।
उसने महसूस किया—
सृष्टि के भीतर जो डर और दर्द है, वो अभी भी ज़िंदा है। पर उसकी मौजूदगी कबीर के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती और जिम्मेदारी थी। सृष्टि ने धीरे-धीरे सिर पलटा। किसी तरह की शांति और सुरक्षा की तलाश में थी। कबीर ने बस उसे देखा। किसी शब्द की जरूरत नहीं थी। उसके हाथ की गर्माहट सृष्टि के भीतर थोड़ी राहत भर रही थी।
वो पल था—
जहाँ दर्द, डर और सिसकियाँ ख़ामोशी में भी साथ थे। और कबीर समझ गया सिर्फ़ उसके होने से सृष्टि का दर्द थोड़ी देर के लिए कम हो सकता है।
सृष्टि ने कुछ पल सोचा, फिर अपने भीतर के डर और दर्द को महसूस किया। वो चाहती थी कि कबीर के सीने से लगकर जी भरकर रो ले, सभी डर, दर्द और टूटन को उसके पास बहा दे।
पर उसकी नाराज़गी अभी भी ज़िंदा थी। वो उसके ऊपर गुस्से और तकलीफ़ की तरह बैठी थी।
धीरे-धीरे वो बिस्तर से उठी। सांसें भारी थीं। पैर फर्श पर लड़खड़ाते हुए वो हॉल की तरफ चली गई। सॉफे पर बैठ गई। चेहरा झुका हुआ, आँसू बह रहे थे। सिसकियाँ हल्की और टूटती हुई।नकभी खुद को पकड़ती, कभी ढह जाती।
कबीर कमरे में अकेले बैठा था, सीने पर हाथ रखे,बआँखें झुकी हुईं।नसिसकियाँ रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। दिल में पछतावा और डर के साथ वो बस खुद से जूझ रहा था।
अब दोनों अलग-अलग जगह थे—
एक हॉल में दर्द और नाराज़गी लिए, दूसरा कमरे में पछतावे और अकेलेपन के साथ। लेकिन दिल की गहराई में
दोनों जानते थे कोई भी दूरी कितनी भी लंबी क्यों न हो, उनकी ज़िंदगी अब एक दूसरे से जुड़ी हुई थी।
वो पल था—
जब प्यार और नाराज़गी, दर्द और फिक्र साथ-साथ मौजूद थे।
और दोनों ने खामोशी में ही एक-दूसरे को महसूस किया।
क्या उनकी ये नाराजगी खत्म होगी ?
सृष्टि कैसे उस शादी वाले मोड तक पहुंची?
क्यों सृष्टि की बंदूक की नोक पर शादी कराई जा रही थी?
To be continued.....
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Kya sristi ko kabir ko maaf kar dena chahiye ya nahin?
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