The Cat Who Turned Into a Human - 17 in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | बिल्ली जो इंसान बनती थी - 17

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बिल्ली जो इंसान बनती थी - 17

कार्तिकेय की गाड़ी मंदिर के पास रुकी।नरास्ते पर खड़ा एक गुंडा था, हाथ में बंदूक थामे। पंडित की कनपटी पर बंदूक लगाई गई थी।

गुंडा (धीरे, धमकी भरे स्वर में) बोला - 
जैसा जैसा बोला है वैसा ही करना है पंडित जी।
मंत्र पढ़ो, या… परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो।

कार्तिकेय ने तुरंत शानवी को अपनी बाँहों में पकड़ लिया। शानवी ने उसके तेज़ हाथों में खुद को फँसा पाया।

कार्तिकेय (धीरे, गंभीर स्वर में, शानवी से) बोला - 
बोला था ना… तुम्हारी शादी होगी।
पर पारितोष से नहीं, मुझसे।

शानवी ने उसके चेहरे को देखा, 

गुस्से और डर के बीच चिल्लाते हुए बोली—
ये क्या मजाक है, कार्तिकेय!
तुम भूलो मत… तुम इंसान नहीं हो!

कार्तिकेय ने एक पल के लिए उसके आँखों में देखा। फिर उसकी आवाज़ और भी गंभीर हो गई।

कार्तिकेय (धीरे, लेकिन निर्णायक स्वर में) बोला - 
शानवी… शायद तुम नहीं समझोगी।
लेकिन मेरे पास इंसान बनने का और तुम्हें बचाने का यही रास्ता है।
अगर मैं नहीं करूँगा… तो तुम्हें वही खतरनाक जाल फँसा देगा।
इसलिए… मुझे भरोसा करना पड़ेगा।

शानवी के दिल में डर, गुस्सा और थोड़ी हिम्मत—तीनों मिल गए।
वो जान गई थी कि अब सिर्फ़ कार्तिकेय ही उसे सुरक्षित बचा सकता है। मंदिर की घंटियाँ शांत थी, लेकिन वातावरण में तनाव और खतरनाक सस्पेंस था। गुंडा पंडित के पीछे खड़ा था,

और कार्तिकेय की आँखों में केवल एक बात साफ़ थी—
मैं इसे किसी भी कीमत पर सुरक्षित निकालूँगा। चाहे कुछ भी करना पड़े।

टुक-टुक का इंसान रूप अब पूरी तरह सामने था, और उसकी चाल, उसकी शक्ति, और उसकी बुद्धि, शानवी को बचाने के लिए सब कुछ तैयार था।

कुछ ही देर में शादी पूरी हो गई। मंडप में fource का माहौल था, लेकिन शानवी के मन में गुस्सा और confusion अभी भी भरपूर था। उसने पारितोष और पूरे chaos को पीछे छोड़ दिया, पर अब भी दिल हल्का नहीं था। कार्तिकेय ने धीरे-धीरे शानवी को अपनी बाँहों में उठाया। उसकी आंखों में सिर्फ़ प्यार, urgency और बचाने की गंभीरता झलक रही थी।

कार्तिकेय (धीरे, गंभीर स्वर में) बोला - 
अब से… तुम सिर्फ मेरी हो।
चलो… शादी की पहली रात के लिए।

शानवी के चेहरे पर गुस्सा और disbelief साफ़ था।

उसने तुरंत अपने हाथ खींचते हुए कहा—
छोड़ो मुझे, कार्तिकेय!
तुम सोचते हो कि तुम सब तय कर सकते हो?
मैं अभी भी बहुत गुस्से में हूँ!

कार्तिकेय ने हल्की मुस्कान दी, लेकिन उसका स्वर अभी भी गंभीर था।

कार्तिकेय (धीरे, मजबूरी और प्यार के मिश्रित स्वर में) बोला - 
मैं जानता हूँ… तुम गुस्से में हो।
लेकिन ये सिर्फ़ तुम्हारे लिए है।
अब तक जो भी हुआ… वो सब तुम्हें सुरक्षित रखने के लिए था।
अब मैं तुम्हें अपने पास रखना चाहता हूँ। सिर्फ़ तुम्हें।

शानवी ने पलभर के लिए उसकी आँखों में झाँका।
उसके भीतर डर और गुस्सा अभी भी था, पर धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि…कार्तिकेय का प्यार और उसका डर सच में शानवी के लिए था। टुक-टुक का इंसान रूप अब पूरी तरह सामने था।
उसकी हर एक हरकत, हर एक शब्द। शानवी के मन में धीरे-धीरे विश्वास और उलझन पैदा कर रहा था।

कार्तिकेय जैसे ही शानवी को गोद में लेकर अपनी ओर ले जाने लगा, अचानक उसने कदम रोक दिया। सामने खड़ा था… पारितोष। उसकी आँखों में केवल गुस्सा और पागलपन झलक रहा था। उसकी उपस्थिति ने पूरी माहौल को बदल दिया—खुशियों का मंडप अब खतरे से भर गया।

कार्तिकेय (धीरे, तिरछी मुस्कान के साथ) बोला - 
ओह! तो तुम यहाँ भी आ गए।

पारितोष (गुस्से में, चीखते हुए) बोला - 
कार्तिकेय! उसे मेरे हवाले कर दे!
वो मेरा शिकार है!

कार्तिकेय ने तुरंत शानवी को अपनी गोद से नीचे उतारा और अपने पीछे खड़ा कर लिया।

कार्तिकेय (सख्त आवाज़ में) बोला - 
ये तेरा शिकार नहीं… मेरी बीबी है।

लेकिन पारितोष अब डरने वाला नहीं था। उसके गुस्से में छुपा हुआ सच फूट पड़ा।

पारितोष (भयंकर स्वर में, हर शब्द धमकी की तरह) बोला - 
कार्तिकेय… इसे मुझे दे दे।
आज अमावस्या है। मुझे उसकी बलि चढ़ानी है…और फिर… मैं अमर हो जाऊँगा।

शानवी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसके दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। अभी तक वो जिस लड़के पर इतना भरोसा कर रही थी , जिससे शादी करने वाली थी वो उसकी बलि चढ़ाना चाहता था। सामने खड़ा था… पारितोष, जिसके इरादों में केवल और केवल अंधेरा और खतरा था।
कार्तिकेय ने एक कदम आगे बढ़ाया, अपनी बाँहें फैलाते हुए।
टुक-टुक का इंसानी रूप अब पूरी तरह सामने था—शानवी को बचाने के लिए तैयार, चाहे कुछ भी करना पड़े।

कार्तिकेय (धीरे, लेकिन सख्त स्वर में) बोला - 
शानवी… तुम्हें अब कोई भी नहीं छू सकेगा।
मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर सुरक्षित रखूँगा।
चाहे इसके लिए मुझे अपनी जान भी देनी पड़े।

मंदिर की घंटियाँ धीमी पड़ गईं, हवा में खतरनाक सन्नाटा और suspense फैल गया। शानवी महसूस कर रही थी इस रात का खतरा केवल उसका नहीं, बल्कि दोनों के लिए जीवन-मृत्यु का फैसला था।

कार्तिकेय और पारितोष के बीच जंग छिड़ गई। हवा में बिजली सी कड़क रही थी, और मंदिर के पास का माहौल जैसे अंधेरे और खतरे का केंद्र बन गया था। लेकिन समस्या ये थी कि पारितोष के पास तांत्रिक शक्तियाँ थीं। और कार्तिकेय? वो सिर्फ़ एक साधारण इंसान, अपने प्यार और हिम्मत के दम पर लड़ रहा था।
धीरे-धीरे उसकी ताकत कम होती जा रही थी। खून से लथपथ, चोटों में जकड़ा, लेकिन दिल में शानवी की सुरक्षा की चिंता हर दर्द को सह रहा था।

पारितोष बोला - 
उसे मुझे दे दे कार्तिकेय।

कार्तिकेय बोला - 
बिल्कुल नहीं। ये सिर्फ मेरी है। 

परितोष बोला -
ले तो तुझे ही मैं मार दूंगा।

कुछ ही घंटों में सुबह का उजाला आने वाला था, और जैसे ही सूरज निकलेगा, कार्तिकेय फिर बिल्ली में बदल जाएगा।
समय तेजी से भाग रहा था। कार्तिकेय ने जल्दी से शानवी को अपनी गोद में उठाया। उसकी सांसें तेज़ थीं, और चोटें उसके शरीर में दर्द फैला रही थीं। वो किसी खुफिया और सुरक्षित जगह की तरफ भागा।
वहाँ पहुँचकर, दोनों एक कोने में बैठ गए।
कार्तिकेय की चोटें स्पष्ट थीं, और उसके चेहरे पर दर्द के साथ-साथ बेचैनी भी झलक रही थी।

शानवी (धीरे, आँसुओं भरी आवाज़ में) बोली - 
मुझे माफ़ कर दो, कार्तिकेय…
मुझे नहीं पता था कि पारितोष इतना धोखेबाज़ निकलेगा।

वो कार्तिकेय के सीने से चिपक गई। सिसकियाँ लेती हुई, उसके दर्द को थोड़ा कम करने की कोशिश कर रही थी। कार्तिकेय ने उसे हल्का सा गले लगाया। उसकी आँखों में प्यार और दर्द का मिश्रण साफ़ था।

कार्तिकेय (धीरे, कमजोर स्वर में) बोला - 
शानवी… अब सब ठीक होगा।
मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर खोने नहीं दूँगा।
चाहे मैं इंसान रहूँ या बिल्ली, तुम हमेशा सुरक्षित रहोगी।

शानवी ने अपने सिर को उसके कंधे पर रखा।
उसके दिल की धड़कनें अब धीरे-धीरे शांत हो रही थीं।
लेकिन हवा में अब भी एक सस्पेंस और खतरनाक अनुभूति थी—
क्योंकि पारितोष और तांत्रिक अभी भी कहीं न कहीं अपने इरादों को अंजाम देने की योजना बना रहे थे।