_जिस दिन वह गया...-एक सुबह के बाद सबकुछ बदल गया।
वह अपनी लाचारी पर भावुक हो चुकी थी ,उस रात विकास नगर के बादल ही नहीं नारायणी की आँखें भी बरस रही थीं। टिप टिप टिप...बिजली कड़कने की आवाजें...और यह रात का सन्नाटा उसके शरीर को किसी आंधी में झकझोरे जा रहे वृक्ष के भांति तन से जड़ उखाड़ फेंकने की ताक में थे।जैसे-जैसे दीवारों पर सीलन पसर रही थी वैसे वैसे उसकी आँखें बंद हो गईं, वह गहरी नींद में सो गई।रात भर की किचकिचाहट के बाद सुबह फिर वही बारिश,अगली भोर तो इतवार की थी, इस लिए उसने बच्चों को सुबह जगाया नहीं यहां तक कि खुद भी देर तक सोती रह गई।किन्तु कहां पता था उसे कि आज देर तक का सोना उसके लिए उसके किस्मत का सो जाना होगा।दस बाई नौ के उस छोटे से कमरे की छत जब बरसात में टपकने लगे,तो समझ लेना चाहिए कि अब सिर्फ दीवारें नहीं,किस्मत भी दरकने वाली है।नारायणी की आँखें खुली तो उसकी पहली नजर नारायण वाली खाली जगह पर पड़ी। वह वहां नहीं है...!जाने क्यों पर उसके सीने पर जैसे कोई धक्का लगा हो वह चिहंक कर उठी..।वह सोचने लगी फ्रेश होने गए होंगे पर काफी देर के बाद भी वह नहीं लौटा।नारायणी कमरे के बाहर नंगे पांव दौड़ी,छत पर खोजने लगी,पड़ोसियों से पूछा पर हार गई ।वह बार-बार फोन कर रही थी पर कोई कॉल नहीं उठा रहा था और अब तो फोन भी स्विच ऑफ आने लगा।" शायद बरसात से भींग गया होगा आते ही होंगे।"नारायणी ने सोचा।लेकिन नारायणी के भीतर की बेचैनी उसके मन में घमासान उथल पुथल मचाए हुए थी कि आखिर इतवार के दिन नारायण गया तो गया कहां..?आज तो कंपनी भी बंद है, इससे पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ।सुबह से शाम हो गया था पर नारायण का कोई पता नहीं लगा। नारायणी ने पड़ोसी के भरोसे बच्चों को सौंप कर दिल्ली के किचकिच में कदम आगे बढ़ाया।आंधी भी जोरों की थी,छतरी संभाल में आने से रहा।नारायणी दर-दर भटकती रही, गोल चक्कर,मेट्रो स्टेशन, बस स्टैंड उसकी पहुंच से कुछ भी दूर न रह सका।धीरे-धीरे बरसात की किचकिचाहट रात के अंधेरे सन्नाटे में बदलने लगी उधर तीनों बच्चों का रो-रो कर बुरा हाल हो गया।आखिरकार नारायणी थक हार के घर वापस आ जाती है।तीन वर्षों की चुप्पी के सन्नाटे के बाद आज यकायक उसका घर गूंज उठा।बच्चों का कौतूहल,तीज त्यौहार की यादें।गांव की स्मृतियां,नारायण और नारायणी के विवाह से लेकर अब तक के हर सुखद लम्हे सब एक साथ घर की दीवारों पर उकेरा गया हो जैसे।जिस दिन नारायण गया उसे अहसास हुआ कि कई बार व्यक्ति का कुछ बोलना या करना नहीं केवल साथ रहना भी उसकी मूक उपस्थिति भी हृदय को प्रिय हो जाती है।आज वह कोना खाली था , जहां अक्सर नारायण ऑफिस से लौट कर बैठा करता था।वह दीवारें सूनी थीं जिसके सहारे नारायण झपकियां लेता था।वह बिस्तर...जिस पर रुणिया झुनिया और रौनक सभी थे फिर भी खाली था क्योंकि नारायण वहां नहीं था।उसके लिए बच्चों से नज़रे मिला पाना काफी कठिन होने लगा।वह मन ही मन यही मनाती है कि 'कही ये यह न पूछ ले कि इनके पिता कहां गए हैं और कब तक आयेंगे..?'रुणिया को भूख लगने लगा,बाकी बच्चे भी मुरझाए चेहरे लेके मां को देखते ही ,उससे लिपट गए।आखिर पड़ोसी ने खिलाया भी होगा तो कितना, रात्रि के भोजन का समय बीत चुका था।पर नारायणी बेमन से ही सही पर तीनों बच्चों के लिए भोजन पकाती है और खिला कर खुद खाली पेट इन्हें लेकर सोने का प्रयास करती है।किन्तु जिसके अकेले माथे पर तीन बच्चों की जिम्मेदारी आ गई हो उसे अब नींद आएगी भी तो कैसे?रात के 10 बजे जब तीनों बच्चे सो चुके थे नारायणी ने चुपके से फोन उठाया और कंपनी में साथ काम करने वाले हर सह-कर्मी और मालिक से फोन लगाकर पूछ लिया। मायके-ससुराल ननिहाल-बहिनौरा सब जगह एक एक करके पूछ लिया कहीं भी नारायण की कोई खबर नहीं मिली।दिन बीतता गया नारायणी की परेशानियां बढ़ती गई और साथ ही बढ़ते गए तो बच्चों के मन में पिता के लिए उत्पन्न ढेरों सवाल...।