साँझ का करघा
उस घर की लय घड़ी की सुइयों से नहीं, बल्कि करघे की उस निरंतर होने वाली 'खट-खट' से तय होती थी जो कभी रुकती नहीं थी। दीनू के उस संकरे और नीची छत वाले कमरे की हवा कभी साफ नहीं रहती थी। वहां हवा में रुई के महीन कणों का एक ऐसा जादुई सा कोहरा हमेशा तैरता रहता था, जो हर सांस के साथ शरीर के भीतर उतर जाता था। इसे वे 'रुई पीना' कहते थे—अपनी ही आजीविका का एक ऐसा धीमा सेवन, जो धीरे-धीरे फेफड़ों को सफेद धूल की कब्रगाह बना देता था।
दीनू की छाती करघे की गति के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी। उसकी आँखें, जो धागों के बीच रास्ता खोजते-खोजते अब धुंधलाने लगी थीं, पूरी एकाग्रता के साथ शटल (नाल) का पीछा कर रही थीं। दीवारें सीलन से भरी थीं और फर्श पर रंग-बिरंगे धागों के अवशेष ऐसे बिखरे थे जैसे किसी रूह की कटी हुई नसें हों।
"अब बस भी करो, ऋषभ सेठ के बंगले पर न जाना " मुन्नी की आवाज ने उस लयबद्ध शोर को काट दिया। वह कोयले से काले पड़ चुके चूल्हे के पास खड़ी थी। "दो घंटे काम बंद करोगे तो सेठ की डेडलाइन हाथ से निकल जाएगी। उधार का हिसाब पहले ही सिर चढ़ा हुआ है।"
दीनू रुका, करघे की अचानक शांति उसे किसी बोझ की तरह महसूस हुई। "ऋषभ सेठ ने जोर देकर कहा है, मुन्नी। उसने सात बजे अपने बंगले पर बुलाया है। सुना है शहर से बड़े लोग आ रहे हैं... शायद समंदर पार के भी।"
"और उससे हमें क्या मिलेगा?" मुन्नी ने खाली डिब्बे की तरफ इशारा करते हुए कहा। "क्या उनकी तारीफ से यह डिब्बा भरेगा? उस रोशनी वाले महल तक जाने में बिताया गया तुम्हारा हर घंटा हमारी एक रोटी कम कर देगा। शांत करघा यानी भूखा पेट।"
दीनू के पास कोई जवाब नहीं था। 'गरीबी का गणित' उसने बहुत पहले ही सीख लिया था। वह जानता था कि काम रुकने का मतलब है सुबह की चाय का फीका होना और रोटियों का कम हो जाना। फिर भी, उसके भीतर एक अजीब सी जिज्ञासा थी। वह उन साड़ियों को उस दुनिया में देखना चाहता था जहाँ के लिए वे बनी थीं।
जैसे ही सूरज डूबा और आसमान का रंग किसी गहरी चोट की तरह बैंगनी होने लगा, दीनू बाहर निकला। रास्ते में उसे जग्गा मिल गया। जग्गा उम्र में छोटा था, लेकिन उसके कंधे अभी से झुक गए थे—करघे के सामने झुककर काम करने की वह स्थायी निशानी, जो हर बुनकर की नियति थी।
"मुन्नी ने तुम्हें भी सुनाया?" जग्गा ने अपनी बांह से पसीना पोंछते हुए पूछा।
"वह सच ही तो कहती है, जग्गा। हम अपनी सुबह की रोटी दांव पर लगाकर जा रहे हैं," दीनू ने जवाब दिया।
महल के पास पहुंचते ही सब कुछ बदल गया। बुनकरों की उस बदबूदार और संकरी बस्ती से निकलकर जब वे 'सिविल लाइन्स' पहुंचे, तो चौड़ी सड़कों और इत्र की खुशबू ने उनका स्वागत किया। ऋषभ सेठ का बंगला किसी सितारे की तरह चमक रहा था। दरवाज़े पर खड़े दरबान ने उनकी फटे-पुराने कुर्ते और नंगे पैरों को देख कर उन्हें वहीं रोक दिया। उसकी नज़रों में वे उस खूबसूरत कपड़े पर लगे दाग की तरह थे जिसे वे खुद बुन कर लाए थे।
काफी मिन्नत के बाद जब वे भीतर घुसे, तो वहां की चकाचौंध देख कर दीनू की सांसें अटक गईं। वहां रुई की धूल नहीं थी, बल्कि ठंडी हवा और महंगे इत्रों का राज था।
वह हॉल एक जगमगाता समंदर था। यह कहना मुश्किल था कि दीवारों पर टंगी रेशमी साड़ियाँ ज़्यादा चमक रही थीं या वहां मौजूद मेहमान। सूट-बूट पहने पुरुष और सोने से लदी महिलाएं ऐसे घूम रही थीं जैसे वे किसी दूसरी ही दुनिया के जीव हों।
ऋषभ सेठ ने उन्हें देख लिया, लेकिन उसने उनका परिचय किसी से नहीं कराया। बस एक कोने की तरफ इशारा कर दिया, "वहां बैठो। इधर-उधर मत डोलना।"
दीनू और जग्गा किसी फर्नीचर की तरह चुपचाप बैठ गए। लोग उनके पास से गुजरते, उनके महंगे कपड़े दीनू के घुटनों को छूते, लेकिन कोई उनकी तरफ देखता तक नहीं। वे अपनी ही बनाई कला के बीच 'अदृश्य' थे।
तभी जग्गा ने कोहनी मार कर इशारा किया, "देख दीनू, वह गुलाबी साड़ी... वह मेरी है। इन रोशनी के नीचे वह कितनी दमक रही है!"
दीनू की नज़रें अपनी बनाई उस सुर्ख लाल साड़ी पर टिक गईं जो हॉल के केंद्र में थी। उसे याद था कि उस साड़ी को बुनने में उसे बाईस दिन लगे थे। उसे याद था कि कैसे लाल रंग उसकी उंगलियों के पोरों में समा गया था। ऋषभ सेठ सुबह उसके घर आया था और बड़े प्यार से उसे 'विशेष काम' बताकर कुल दो हजार रुपये थमा गया था।
पास ही खड़ा एक रईस आदमी उस साड़ी की तारीफ कर रहा था। दीनू साहस जुटाकर उसके पास गया, "साहब... यह लाल वाली... अच्छी है ना?"
उस आदमी ने दीनू को ऐसे देखा जैसे कोई मंदिर में घुसे आवारा कुत्ते को देखता है। "अच्छी? यह 'प्रिमिटिव आर्ट' का बेजोड़ नमूना है।"
जग्गा ने आगे बढ़कर पूछा, "साहब, इसकी कीमत क्या होगी यहाँ?"
उस आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा, "यह? चालीस हजार की है। और वह गुलाबी पचास हजार की। वैसे तुम्हें इसके इतना पास नहीं खड़ा होना चाहिए, दाग लग जाएगा।"
चालीस हजार।
दीनू को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो। जिस साड़ी के बदले उसे दो हजार मिले, उसे यहाँ बीस गुना ज़्यादा दाम पर बेचा जा रहा था। वह बिचौलिया, जिसने सिर्फ कपड़े को एक साफ कार में यहाँ तक पहुँचाया था, अड़तीस हजार का मुनाफा काट रहा था।
दीनू के दिमाग में वह अड़तीस हजार रुपये घूमने लगे। वह तीन साल का अनाज था। वह उसकी माँ का ऑपरेशन था जो पैसों की कमी की वजह से नहीं हो पाया था। वह एक नई छत थी जो बारिश में नहीं टपकती। वह उसके बेटे का स्कूल था, ताकि उसे 'रुई न पीनी' पड़े।
उसे अहसास हुआ कि ये लोग उसकी कला से तो प्यार करते थे, लेकिन कलाकार से नफरत। वह उस मशीन का एक अदृश्य पुर्जा मात्र था। उसके भीतर एक अजीब सा खालीपन—'वीतराग' का भाव—भर गया।
वहां उन्हें खाना खिलाया गया—शानदार पकवान, जो दीनू को राख की तरह बेस्वाद लगे। लौटते समय रास्ता शांत था। चकाचौंध पीछे छूट गई और बस्ती का अंधेरा उन्हें निगलने लगा।
घर पहुँचकर दीनू ने देखा कि मुन्नी फर्श पर सो चुकी थी। मेज पर दो सूखी रोटियां और थोड़ी सी दाल रखी थी। वह विरोधाभास किसी कोड़े की मार जैसा था।
दीनू खाना खाने नहीं बैठा। वह सीधे अपने करघे के पास गया। उसने उस लकड़ी को बड़ी श्रद्धा से छुआ—यही उसका मंदिर था और यही उसकी जेल। सुबह के चार बज रहे थे। पूरी बस्ती धीरे-धीरे जाग रही थी। जल्द ही हर घर से 'खट-खट' की आवाज आने वाली थी।
उसने शटल उठाई। उसके मन में चालीस हजार का आंकड़ा और उस रईस आदमी की हिकारत भरी आवाज़ गूंज रही थी। उसने अपनी आँखें बंद कीं और धीरे से बुदबुदाया: काश एक दिन ऐसा आए जब बुनने वाला हाथ ही बेचने वाला हाथ बने। काश मुझे अपनी ही मेहनत के टुकड़ों के लिए तरसना न पड़े।
"आमीन!" बुदबुदाया वह।
उसने पूरी ताकत से नाल फेंकी। खट। उसने कंघी खींची। खट।
वह सूना घर फिर से उस आवाज़ से भर गया। वह अब भी धूल पिएगा, वह अब भी मेहनत करेगा, लेकिन अब उसकी हर 'खट-खट' उस आने वाली सुबह की दस्तक थी जहाँ वह अब अदृश्य नहीं रहेगा।
साँझ का करघा अब आने वाले कल की बुनाई कर रहा था।
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