Present Time –
सृष्टि सॉफे पर लेटी थी। चेहरा उदास, आँखें लाल। उसका दिल भारी था। धीरे-धीरे उसके मन में यादें लौट आईं—
Past Time –
वो दिन जब सब कुछ टूट गया था। सृष्टि गुस्से में अपने कमरे में गई थी। दिल में आग और आँखों में आँसू। उसने अपना बैग उठाया।
सब कुछ पैक करने लगी जैसे अब उसके लिए वहाँ कोई जगह ही न रही हो। कबीर कमरे में आया। चेहरा गंभीर, आँखों में डर और पछतावा।
उसने धीरे से कहा—
सृष्टि… रुको… कुछ भी करोगी तो नुकसान होगा।
मैं हूँ ना… मैं सब संभाल लूंगा।
पर सृष्टि ने उसका हाथ झटक दिया।
वो बोली -
मैं अब और सह नहीं सकती।
आपने मेरा भरोसा तोड़ दिया…मेरा बच्चा गया…
और अब मैं आपसे दूर रहना चाहती हूँ।
कबीर ने एक बार और कोशिश की—
उसका हाथ पकड़ा, बैग को पकड़ने से रोका। लेकिन सृष्टि ने कोई सुनवाई नहीं की। धीरे-धीरे वो अपने बैग के साथ दरवाज़े की तरफ बढ़ी। कदम थिरकते हुए, लेकिन मन स्थिर और दृढ़।
कबीर बस पीछे खड़ा रहा। चेहरा टूटा, आँखों में दर्द। दिल जानता था सृष्टि का गुस्सा और उसका दर्द अभी इतना गहरा है कि उसे रोक पाना आसान नहीं।
Present Time –
सॉफे पर लेटी सृष्टि पिछले दिनों की यादों में खो गई। गुस्सा, दर्द, पछतावा…सभी भाव एक साथ उसके भीतर घूम रहे थे।
उसने सोचा—
मैं अब कबीर जी के पास कैसे रहूँ?
क्या भरोसा फिर बन पाएगा?
क्या मैं फिर कभी सुरक्षित महसूस कर पाऊँगी?
लेकिन दिल के एक कोने में फिक्र भी थी। और प्यार का वह छोटा सा हिस्सा जो अब भी जिंदा था।
वो पल था—
जब अतीत और वर्तमान एक-दूसरे से टकरा रहे थे। और सृष्टि को खुद से सवाल पूछना पड़ा, क्या वो अब भी कबीर के पास लौटना चाहेगी या अपने गुस्से और दर्द के साथ दूर चली जाएगी…?
Past Time –
सृष्टि धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ रही थी। बैग उसके हाथ में था, कदम लड़खड़ाते हुए। दिल धड़क रहा था, मन में गुस्सा और दर्द दोनों। जैसे ही वो घर के बाहर निकली, रास्ते में कुछ गुंडे उसका रास्ता रोकने लगे। चेहरे पर मुस्कान, आँखों में खतरनाक चमक।
एक बोला -
ओये… कहीं भागने की कोशिश मत करना।
सृष्टि डर गई। लेकिन उसने अपनी हिम्मत जुटाई। पर गुंडों ने उसे उठा लिया। बैग छीन लिया और उसे एक गाड़ी में डाल दिया।
गाड़ी में सृष्टि चिल्ला रही थी -
छोड़ो मुझे! मुझे मेरे घर भेजो!
पर गुंडों ने उसकी आवाज़ को अनसुना कर दिया। सिर्फ़ मुस्कुराते रहे। कुछ ही मिनटों में वो एक सुनसान, वीरान जगह पर पहुँची।
हवा में डर की महक थी। और सामने उसके मम्मी-पापा बंधे हुए खड़े थे। चेहरे पर डर और दर्द साफ़ झलक रहा था। सृष्टि का दिल धड़क गया।
वो बोली -
नहीं… नहीं… ये क्या हो रहा है?
Papa Mummy आप लोग ठीक हैं ना?
तभी, एक बड़ा-सा आदमी, लगभग 40 साल का, वहाँ आया।
कद लंबा, कंधे चौड़े, और चेहरे पर जहरीली मुस्कान।
सृष्टि ने उसे देखा… उस समय उसे कोई पहचान नहीं थी।
वो वही आदमी था—
जो शुरू में कहानी की शुरुआत में सृष्टि से शादी करना चाहता था।
जो कबीर को धमकियाँ देता था। और जो इस पूरे षड्यंत्र का रचयिता था। सृष्टि अब भी नहीं जानती थी कि ये आदमी कौन है।
पर उसके दिल में डर पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गया था।
हर धड़कन में सिर्फ़ एक ही सवाल गूंज रहा था—
मैं… मैं सुरक्षित रह पाऊँगी क्या?
गुंडों ने उसे आगे धकेला।
उस आदमी ने धीरे से कहा—
अब सब मेरे हाथ में है।
और तुम्हारी शादी… मेरी शर्तों पर ही होगी।
सृष्टि के हाथ कांप रहे थे। आँखें भर आईं। लेकिन अंदर से उसने छोटा सा साहस जुटाया दिल की गहराई में उसे ये पता था कि कबीर कहीं न कहीं उसे बचाएगा।
वो पल था—
जब अतीत की सारी चोटें, डर, और षड्यंत्र एक साथ सामने आए।
और सृष्टि अकेली, लेकिन उम्मीद के साथ खड़ी थी।
सृष्टि को जब वहाँ ले जाया गया, तो कुछ औरतों ने उसे ज़बरदस्ती दुल्हन की तरह सजाया। सिर पर घूँघट, गहने, लाल जोड़ा सृष्टि के हाथ-पैर कांप रहे थे। वो खुद को बांधता और मजबूर महसूस कर रही थी। हर कदम पर डर, हर सांस में बेचैनी। फिर उसे मंडप की ओर ले जाया गया।
जहाँ पहले हम देख चुके थे—
वो पल जब उसकी शादी के लिए सब तैयार था।
सृष्टि ने अपने माँ-बाप को देखा बंद और डर से कांपते हुए।
उसके सामने वही 40 साल का आदमी था जो उसकी ज़िंदगी की कहानी बदलने आया था। सृष्टि का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। आँखें भर आईं। पर उसके भीतर एक छोटी सी उम्मीद भी थी। शायद कबीर कहीं न कहीं उसे बचाएगा। और कबीर आया भी। और उसे घर भी ले गया । जैसा कि हमने पहले देखा।
Present Time –
अब सृष्टि सॉफे पर लेटी थी। चेहरा थका और उदास। आँखों में हल्की सी नमी। वो बीते हुए दर्द और डर को याद कर रही थी।
हर याद उसे फिर से उस डर और मजबूरी की ओर ले जा रही थी—
कैसे उसे दुल्हन की तरह सजाया गया, कैसे उसे मंडप में ले जाया गया, और कैसे वो डर और बेबसी में थी।
पर साथ ही… उसके दिल के भीतर अब भी कबीर के पास लौटने की छोटी सी उम्मीद थी। भले ही अभी वो नाराज़ और चोटिल थी,
पर फिक्र और प्यार का वो धागा अभी भी जीवित था।
वो पल था—
जब अतीत और वर्तमान एक साथ उसकी आँखों के सामने थे,
और सृष्टि समझ रही थी कि भले ही उसकी ज़िंदगी में कितनी भी चोटें आई हों, उसकी सुरक्षा और प्यार अब भी कहीं न कहीं मौजूद था।
क्या सृष्टि अपनी नाराजगी खत्म करेगी?
क्या वो उसे sorry बोल पाएगी?
क्या उन दोनों की नजदीकियां बढ़ेगी?
अगले दिन सुबह सृष्टि ऑफिस पहुँची। दिल टूटा हुआ, मन भारी।
उसने अपने सभी सहकर्मियों से नम्रता से बातें की, लेकिन कबीर की तरफ नजर तक नहीं उठाई।
कबीर—जो उसका अपना बॉस और पति दोनों था—
उसकी ओर देखने की कोशिश कर रहा था। पर सृष्टि ने पूरी तरह से उसे इग्नोर किया। किसी तरह की मुस्कान, कोई हल्की सी झलक भी नहीं।
कबीर को महसूस हुआ इस नाराज़गी और दूरी ने उसके दिल में एक और दरार डाल दी है। पर आज उसने जल्दी घर आने की कोशिश की।
घर पहुँचते ही उसने देखा सृष्टि नहीं थी। वो तो office में थी। हॉल में खालीपन, चुप्पी, और उसका मन भारी। कबीर ने दीवार की तरफ देखा, सांसों को गहरा लिया।
दिल में सिर्फ एक ही सवाल था—
सृष्टि… तुम अब मुझसे दूर क्यों हो गई हो?
उसका मन बेचैन था। उसके लिए यह पहली बार था जब उसने महसूस किया कि सिर्फ़ मौजूद होना ही काफी नहीं। सृष्टि के दिल का भरोसा जीतना भी उतना ही मुश्किल था।
वो पल था—
जब प्यार और पछतावा एक साथ घर में मौजूद थे, और कबीर को एहसास हुआ सिर्फ़ अपनी उपस्थिति से सृष्टि का दिल नहीं जीता जा सकता।
रात थी। बारिश लगातार गिर रही थी। हर बूंद उसके दिल की चोटों को फिर से भिगो रही थी। सृष्टि एक खाली बेंच पर बैठी थी। सिर झुका, कपड़े पूरी तरह भीगे हुए। बाल गीले, चेहरे पर नमी… पर वह रो नहीं रही थी।
उसकी आंखों में खालीपन था। खामोशी गहरी थी। कोई शब्द, कोई आवाज़ नहीं। सिर्फ़ दिल का दर्द, जो भीगते कपड़ों और ठंडी हवा के साथ उसके भीतर फैल रहा था।
वो बोली -
हे भगवान! मैने तो आज तक किसी के साथ बुरा करना तो दूर बुरा सोचा भी नहीं था...।
फिर.... इतने दुख मेरी जिंदगी में ही क्यों ?
क्या गलती थी मेरी?
धीरे-धीरे उसके मन में यादें लौटने लगीं—
कबीर की वो हैवानियत, जो उसने हर रात उसके साथ दिखाई थी।
उसका डर, उसकी बेबसी, उसकी सिसकियाँ… सब कुछ आंखों के सामने तैरने लगा। लेकिन उसके साथ ही,
कुछ और भी याद आया—
कबीर की वही देखभाल और फिक्र, जो दर्द और डर के बीच कभी-कभी उसे सुकून देती थी। वो याद आया जब वह उसके हाथ पर पटी बांधता था, जब उसे अपनी बाहों में कसकर पकड़ता था,
और जब उसकी सुरक्षा के लिए उसने सब कुछ किया था। सृष्टि का दिल उलझ रहा था।
मन में सवाल उठ रहे थे—
क्या मैं उससे नफरत करूँ?
या क्या मैं अब भी उसे चाहती हूँ?
क्या यह प्यार है या बस यादें और फिक्र?
बारिश की ठंडी बूंदें उसकी पीठ पर गिर रही थीं। लेकिन भीतर एक अदृश्य गर्माहट भी महसूस हो रही थी। दिल और दिमाग़, दोनों लड़ रहे थे। एक तरफ डर और गुस्सा, दूसरी तरफ प्यार और फिक्र।
सृष्टि को खुद समझ नहीं आ रहा था कि अब कौन सा रास्ता चुने।
क्या वह कबीर के पास लौटे, या अपनी नाराज़गी और दर्द के साथ अकेली रह जाए?
वो पल था—
जब अतीत की चोटें और वर्तमान की उलझन सिर्फ़ बरसात और खामोशी के बीच उसके दिल को तोड़ रही थी।
रात के 12 बज गए थे। सृष्टि घर नहीं आई। कबीर घर के हॉल में परेशान बैठा था। कदम बढ़ा, फिर रुक गया। दिल में बेचैनी और गुस्सा दोनों थे। वो इंतजार करता-करता थक गया। उसने बार बार उसे call किया पर phone switch off था। अब उसका पारा बढ़ चुका था।
दिल और दिमाग़ में बस एक ही बात थी—
आज मैं उसे सब कुछ समझा दूँगा।
जो उसने मुझसे किया, उसका अंजाम अब भुगतना होगा।
वो खड़ा हुआ। कंधे ताने, आँखों में गुस्से की आग।
सोचा—
आने दो… जब वो एक बार घर आए,
फिर मैं उसे दिखाऊँगा कि मुझसे भागने का मतलब क्या होता है।
दिल में दर्द और गुस्सा दोनों थे। लेकिन साथ ही, उसके भीतर एक छोटा सा डर भी था , क्या सृष्टि अब भी उसके पास लौटेगी, या यह दूरी और बढ़ जाएगी?
वो पल था—
जब इंतजार और गुस्से ने कबीर को पूरी तरह निर्णय लेने पर मजबूर कर दिया था, और उसका मन अब सिर्फ सृष्टि को ढूँढने और उसे रोकने में लगा था।
रात के 1 बज चुके थे। घर की घंटी बजी। कबीर तेज़ कदमों से दरवाज़े तक पहुँचा। जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला सामने सृष्टि खड़ी थी। पूरी तरह भीगी हुई। बाल चेहरे से चिपके हुए। आँखें खाली… बेहद खाली। उसे उस हालत में देखकर कबीर का पारा और चढ़ गया। उसने तुरंत सृष्टि को अपनी तरफ खींचा, दरवाज़ा बंद किया और उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया।
गुस्से में उसकी आवाज़ भारी हो गई—
कहाँ थी तुम इतनी रात तक?
इतनी देर क्यों की आने में?
पागल हो क्या! पता भी है मैं कितना परेशान हो गया था?
सृष्टि ने उसकी पकड़ से खुद को छुड़ाने की कोशिश की।
और फिर उसे जोर से धक्का दे दिया।
सृष्टि बोली -
मैं कहीं भी जाऊँ…मरूँ या जिऊँ…आपको क्या?
कबीर सन्न रह गया।
कबीर बोला -
क्या मतलब है तुम्हारा?
तुम मेरी पत्नी हो, सृष्टि।
और मेरा पूरा हक बनता है।
सृष्टि की आँखों में अब आँसू नहीं थे बस आग थी।
वो बोली -
हक !
कौन सा हक?
ज़िंदगी को नर्क बनाने का हक?
या हर रात हैवानियत दिखाने का हक?
किस चीज़ का हक?
कमरे में सन्नाटा छा गया। बारिश की आवाज़ खिड़की पर अब भी पड़ रही थी। कबीर कुछ पल के लिए चुप हो गया। उसके पास शब्द नहीं थे। सृष्टि बिना एक और शब्द कहे सीधे बाथरूम में चली गई। दरवाज़ा बंद। कबीर वहीं खड़ा रह गया। उसके कानों में सिर्फ एक शब्द गूंज रहा था—
“हैवानियत…”
पहली बार उसने खुद को आईने में देखने जैसा महसूस किया।
क्या सच में वह वही बन गया था जिससे सृष्टि डरती थी? बाहर बारिश अब भी हो रही थी। अंदर… दो दिल पूरी तरह भीग चुके थे।
क्या कबीर अपने गुस्से के पीछे छिपे डर को समझ पाएगा?
या यह दरार अब हमेशा के लिए गहरी हो जाएगी…?
To be continued....
Aapko kya lagta hai -
Kya shristi kabir ko sorry bolegi ya nahin?
Kya kabir apni harkate sudharega ya nahin
Agar aap regular reader ho to follow button dabana mat bhoolna ❤️
Kyunki main daily update karti hoon.
Or Jo log yahan tak padh chuke hain aur chup ho… ek ❤️ drop karke jao. Main dekhna chahti hoon kitne silent readers hain.