Degree of rituals. in Hindi Women Focused by Jeetendra books and stories PDF | संस्कारों की डिग्री।

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संस्कारों की डिग्री।

शहर के मुख्य चौराहे पर एक बहुत बड़ा होर्डिंग लगा था। उस पर लिखा था कि अब लड़कियों को भटकने की जरूरत नहीं है। परम पावन भारतीय संस्कार यूनिवर्सिटी खुल चुकी है। यहाँ डिग्री केवल पढ़ाई की नहीं बल्कि चरित्र और आज्ञाकारिता की मिलेगी। हमारे यहाँ मेरिट लिस्ट इस आधार पर बनेगी कि लड़की कितनी चुप रहती है।

जैसे ही यह खबर फैली शहर के पिताओं में खुशी की लहर दौड़ गई। सब अपनी बेटियों को लेकर यूनिवर्सिटी की तरफ भागे। सबको डर था कि कहीं उनकी बेटी हाथ से न निकल जाए। सबको एक ऐसी डिग्री चाहिए थी जो शादी के मार्केट में सबसे ऊँची कीमत दिला सके।

यूनिवर्सिटी का गेट किसी मंदिर जैसा बनाया गया था। वहाँ गार्ड की जगह चार बूढ़ी औरतें खड़ी थीं। वे आने वाली हर लड़की के कपड़ों और चाल को देख रही थीं। अगर कोई लड़की बहुत तेज चल रही थी तो उसके दस नंबर पहले ही काट लिए जाते थे। धीरे चलना और नीची निगाहें रखना यहाँ का पहला नियम था।

यूनिवर्सिटी के चांसलर का नाम था पंडित धर्मरक्षक। वे सफेद कुर्ता पाजामा पहनते थे और हमेशा नैतिकता की बात करते थे। उनका मानना था कि समाज का पतन इसलिए हो रहा है क्योंकि औरतें सवाल पूछने लगी हैं। उन्होंने सिलेबस में ऐसे विषय रखे थे जो किसी ने सोचे भी नहीं थे।

पहला विषय था मौन साधना का विज्ञान। इसमें सिखाया जाता था कि पति की डांट सुनकर मुस्कुराना कैसे है। अगर पति कहे कि दाल में नमक ज्यादा है तो लड़की को कहना चाहिए कि यह उसका ही दोष है। उसे चुप रहकर अपनी गलती मान लेनी चाहिए। चुप्पी ही स्त्री का सबसे बड़ा गहना है।

दूसरा विषय था गर्दन का झुकाव और डिग्री। इसमें बाकायदा प्रोटेक्टर लेकर लड़कियों की गर्दन नापी जाती थी। जो लड़की अपनी गर्दन पैंतालीस डिग्री से ज्यादा ऊपर उठाती उसे फेल कर दिया जाता। आदर्श बहू वही है जिसकी नजरें हमेशा जमीन की मिट्टी तलाशती रहें।

जैसे ही दाखिला शुरू हुआ भीड़ लग गई। एक पिता अपनी बेटी को खींचते हुए लाए। वे कह रहे थे कि इसे जल्दी भर्ती कर लो। यह कल मुझसे तर्क कर रही थी कि उसे नौकरी करनी है। पंडित धर्मरक्षक ने मुस्कुराकर कहा कि आप फिक्र मत कीजिए हम इसे ठीक कर देंगे।

यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में पंखे नहीं थे। वहाँ बताया गया कि तपस्या से ही संस्कार आते हैं। लड़कियों को सुबह चार बजे उठकर गोबर से आँगन लीपना पड़ता था। इसे फिजिकल ट्रेनिंग कहा जाता था। पंडित जी का तर्क था कि जिम जाने से लड़कियां विद्रोही हो जाती हैं।

मैस का खाना भी बहुत खास था। वहाँ लड़कियों को सबसे बाद में बचा हुआ खाना मिलता था। तर्क यह था कि भारतीय नारी को त्याग की मूर्ति होना चाहिए। जो लड़की सबसे कम खाती उसे सेवा रत्न का मेडल दिया जाता था। भूख मारना ही यहाँ की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

एक दिन एक लड़की ने क्लास में हाथ उठाकर सवाल पूछा। उसने पूछा कि सर क्या लड़कों के लिए भी ऐसी कोई यूनिवर्सिटी है। पूरी क्लास में सन्नाटा छा गया। पंडित धर्मरक्षक के चेहरे का रंग उड़ गया। उन्होंने उसे क्लास से बाहर निकाल दिया। सवाल पूछना संस्कारों के खिलाफ माना जाता था।

उस लड़की का नाम शालिनी था। वह बहुत पढ़ाकू थी और उसे यह सब मजाक लग रहा था। लेकिन उसके पिता ने साफ कह दिया था कि डिग्री लेकर ही घर आना। बिना संस्कार की डिग्री के कोई तुमसे शादी नहीं करेगा। शालिनी को समझ नहीं आ रहा था कि शिक्षा और शादी का क्या संबंध है।

यूनिवर्सिटी में रोज शाम को प्रवचन होते थे। वहाँ बताया जाता था कि जींस पहनने से ओजोन परत में छेद हो जाता है। मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने वाली लड़कियां अगले जन्म में कबूतर बनती हैं। लड़कियां डायरी में यह सब नोट करती थीं ताकि एग्जाम में लिख सकें।

एग्जाम का दिन भी बड़ा अजीब था। कोई लिखित परीक्षा नहीं हुई। लड़कियों को एक कमरे में बिठा दिया गया जहाँ उनके सामने सास और ननद जैसी औरतें बिठाई गईं। वे औरतें लड़कियों को ताने दे रही थीं और गालियां दे रही थीं। जो लड़की बिना रोए और बिना बोले सब सह गई वह टॉपर थी।

मेरिट लिस्ट निकली तो पूरे शहर में ढोल नगाड़े बजने लगे। सबसे ऊपर नाम था उस लड़की का जो पिछले तीन महीने से एक शब्द भी नहीं बोली थी। उसे गोल्ड मेडल दिया गया। मेडल भी सोने का नहीं था बल्कि पीतल की एक बेड़ी थी जिसे पैर में पहनना था।

लोग कह रहे थे कि अब समाज सुधर जाएगा। अब घर घर में सुख शांति होगी क्योंकि लड़कियां शिक्षित हो गई हैं। हरिशंकर परसाई जी अगर आज होते तो देखते कि कैसे गुलामी को संस्कार का नाम देकर बेचा जा रहा है। लोग डिग्रियां खरीद रहे थे ताकि इंसानों को पालतू बनाया जा सके।

पंडित धर्मरक्षक ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। उन्होंने कहा कि हमारी यूनिवर्सिटी ने साबित कर दिया कि नारी का असली स्थान घर की चौखट है। हमने उन्हें वह सब भुला दिया जो उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों में सीखा था। अब वे कोरी स्लेट हैं जिस पर समाज अपनी मर्जी से कुछ भी लिख सकता है।

तभी भीड़ में से एक आवाज आई। क्या आप अपने बेटों को भी यह डिग्री दिलाएंगे। पंडित जी ने जोर से ठहाका लगाया। उन्होंने कहा कि पुरुष तो जन्म से ही संस्कारी होता है। उसे सुधारने की जरूरत नहीं होती। नियम केवल उनके लिए हैं जिन्हें कंट्रोल करना जरूरी है।

शालिनी ने अपनी डिग्री फाड़ दी और गेट से बाहर निकल गई। उसके पिता चिल्लाते रहे कि अब तेरा क्या होगा। शालिनी ने पलटकर कहा कि अब मैं इंसान बनूँगी। मुझे आपकी इस आज्ञाकारिता की मेरिट लिस्ट में नहीं रहना। वह बिना पीछे मुड़े सड़क पर तेज चलने लगी।

यूनिवर्सिटी के बाहर भीड़ अब भी बढ़ती जा रही थी। नए माता पिता अपनी बेटियों को लेकर लाइन में लगे थे। सबको डर था कि कहीं उनकी बेटी आजाद न हो जाए। सबको वही पीतल की बेड़ी चाहिए थी जिसे वे गर्व से संस्कार कह सकें।

शहर के अखबारों में बड़े बड़े लेख छपे। बुद्धिजीवियों ने कहा कि यह एक क्रांतिकारी कदम है। इससे परिवार बचेंगे और परंपराएं सुरक्षित रहेंगी। किसी ने यह नहीं पूछा कि क्या परंपराएं केवल औरतों के कंधों पर ही टिकी होती हैं। बोझ ढोना ही नारी का भाग्य बना दिया गया।

यूनिवर्सिटी का बिजनेस खूब चमकने लगा। पंडित धर्मरक्षक ने अब विदेशों में भी ब्रांच खोलने का मन बना लिया। उन्होंने कहा कि संस्कार एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसकी डिमांड कभी कम नहीं होगी। जितना ज्यादा दमन होगा उतना ही ज्यादा मुनाफा होगा।

बाजार में नई तरह की साड़ियां आईं जिन्हें संस्कारी साड़ी कहा गया। इन्हें पहनकर लड़कियां केवल रोबोट की तरह चल सकती थीं। फैशन और संस्कार का ऐसा मेल पहले कभी नहीं देखा गया था। दुकानदारों ने भी इस मौके का खूब फायदा उठाया।

एक दिन यूनिवर्सिटी में आग लग गई। कहा गया कि यह उन लड़कियों ने लगाई थी जो चुप रहना भूल गई थीं। लेकिन पंडित जी ने इसे दैवीय आपदा बता दिया। उन्होंने कहा कि यह अग्नि परीक्षा है जो हमारी शुद्धता को परखेगी। आग बुझ गई पर धुंआ बाकी रहा।

समाज के ठेकेदार अब भी खुश थे। उन्हें लगता था कि आग से संस्कार और भी पक्के हो जाएंगे। वे भूल गए थे कि आग जब लगती है तो सब कुछ भस्म कर देती है। 

डिग्री बांटने का सिलसिला चलता रहा। लड़कियां आती गईं और चुप होती गईं। उनकी आंखों की चमक गायब हो गई और वे चलती फिरती मूर्तियां बन गईं। इसे ही महान भारतीय संस्कृति की जीत बताया गया। लोग तालियां बजाते रहे और रूहें मरती रहीं।

अंत में बस वही डिग्रियां बचीं जो अलमारियों में बंद थीं। औरतों की अपनी कोई आवाज नहीं थी। वे बस वही बोलती थीं जो उन्हें सिखाया गया था। यूनिवर्सिटी का गेट आज भी खुला है और भीड़ आज भी वहीं खड़ी है। संस्कार बिक रहे हैं और लोग खरीद रहे हैं।

(कहानी समाप्त)