Do Patiyo ki Ladli Patni - 24 in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | दो पतियों की लाडली पत्नी - 24

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 24

Shreya सोफे पर अकेली बैठी थी।
उसके चेहरे पर आँसू सूखते-सूखते फिर बह जाते।
कमरा पहले जैसा नहीं था…
ना वही गर्माहट, ना वही हँसी।
तभी—
उसके फोन पर एक टन की आवाज़ आई।
वह चौंककर उठी।
फोन में उनके तीनों का private group chat खुला।

Kabir (गुस्से में टाइप करता है—) 
श्रेया मेरे साथ रहेगी।
मैं छोटा हूँ पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं पीछे हट जाऊँ।

Shreya फोन पकड़े काँप रही थी।

तभी Karan का मैसेज आया—
नहीं। श्रेया मेरे साथ रहेगी।
मैं इसका पति हूँ। और मुझे उसकी ज़िम्मेदारी ज्यादा समझ आती है।

Kabir तुरंत जवाब दे बैठा—
ज़िम्मेदारी का मतलब ये नहीं कि तुम श्रेया को मुझसे दूर कर दो!
वो मुझसे भी उतना ही प्यार करती है, जितना आपसे।

अब चैट में आग लग चुकी थी।

Karan ने लिखा —
तो ठीक है!
श्रेया खुद बता दे कि किसके साथ रहना चाहती है!

Shreya के हाथ काँपने लगे।

Shreya (टाइप करती हुई, रोते हुए) बोली —
बस करो… दोनों, प्लीज़ चुप हो जाओ…
मुझे इस तरह मत खींचो… मैं टूट जाऊँगी…।

पर दोनों का गुस्सा चरम पर था।

Karan ने लम्बा मैसेज टाइप किया—
आज फैसला हो ही जाना चाहिए।
कल से श्रेया एक महीने मेरे साथ रहेगी,
फिर अगले महीने Kabir के साथ।
ये rotation चलता रहेगा।

Kabir उबल पड़ा—

Kabir ने लिखा —
हाँ, ठीक है!
अगर आपको ये गेम खेलना ही है तो मैं भी तैयार हूँ!
एक महीना श्रेया मेरी होगी—
और आप interfere नहीं करोगे।
ना प्यार, ना हाथ लगाना, ना बातों में घुसना।

Karan भी पीछे हटने वाला नहीं था।

Karan ने लिखा —
बिल्कुल।
और जब श्रेया मेरे साथ होगी, तब तुम्हारा उस पर कोई हक़ नहीं होगा।
एक महीने के लिए श्रेया सिर्फ़ मेरी होगी।

Shreya की आँखें फटी रह गईं।
Shreya का दिल टूटता है
वह सोफे पर बैठी थी…
फोन हाथ से लगभग छूट रहा था।

Shreya (टाइप करते हुए, टूटी आवाज़ में) बोली - 
ये क्या कर रहे हो आप दोनों…?

पर एक और मैसेज आ गया—
Kabir —
श्रेया, तुम्हारी मर्ज़ी चलेगी—पर rules clear हैं।
एक महीने एक के साथ,
दूसरा किसी भी तरह interfere नहीं करेगा।

Karan —
पहले महीने मेरी बारी।
मैं बड़ा हूँ।

बस… यह पढ़कर Shreya के आँसू रुक नहीं पाए।
उसने फोन जोर से सोफे पर फेंक दिया।
थड़ाम!
आवाज़ पूरे घर में गूँज गई।
Shreya घुटनों में चेहरा छिपाकर रोने लगी—
फूट-फूटकर…
जैसे उसके दिल को किसी ने दो हिस्सों में फाड़ दिया हो।

Shreya (दर्द में फुसफुसाती हुई) बोली - 
मैं कोई चीज़ हूँ क्या…
जिसका बँटवारा कर दिया आप दोनों ने…
क्यों… क्यों कर रहे हो ऐसा…

कमरे में सन्नाटा था।
और Shreya का दर्द उस सन्नाटे को चीर रहा था।
Shreya फोन पटककर रो रही थी।
उसके काँधे काँप रहे थे…
आँखें सूज चुकी थीं।

उसी समय—
धड़ाक!
Karan के कमरे का दरवाज़ा जोर से खुला।
वह अंदर आया…
चेहरा लाल, आँखें गुस्से से भरी हुई।
Karan को कभी किसी ने इतना क्रोधित नहीं देखा था।
Shreya ने उठकर देखा—
पर बोल न सकी।
उसकी सिसकियाँ ही उसकी आवाज़ थीं।
Karan झटके से Shreya की ओर बढ़ा।
उसने एक पल भी सोचे बिना Shreya को गोद में उठा लिया।

Shreya (हकबकाकर, आँसू रोकते हुए) बोली - 
क …क…करण जी … क्या—?

Karan ने कुछ नहीं कहा। उसकी जबड़े कसे हुए थे।
गुस्सा चेहरे पर साफ लिखा था।
वह Shreya को चुपचाप अपने कमरे में ले गया—
और बेड पर बहुत हल्के से लिटा दिया।
Shreya की सिसकियाँ और तेज़ हो गईं।
वह करवट लेकर रोने लगी।

Shreya (टूटे शब्दों में) बोली - 
मैं कोई चीज़ नहीं हूँ…
तुम दोनों ने मेरा बँटवारा कर दिया…
मैं मर जाऊँगी अगर तुम दोनों अलग हो गए…

उसकी हर बात Karan के दिल में तीर की तरह चुभ रही थी। पर वह बोल नहीं पा रहा था—
गुस्सा, दर्द और डर… सब कुछ आपस में उलझा हुआ था।
वह खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया—
बाँहें सीने पर बाँधे,
गुस्से में साँसें तेज़ चलती हुईं।

Karan (मन में खुद से) बोला - 
मैं ऐसा क्यों बोल गया?
क्यों मैंने कबीर पर इतना गुस्सा निकाल दिया?
कहीं उसे तकलीफ़ तो नहीं दी…?

उसकी आँखें लाल होने लगीं—
गुस्से से नहीं, पछतावे से।

Kabir अपने कमरे में अकेला बैठा था।
अंधेरा, बंद कमरा… सिर्फ उसकी हल्की सिसकियाँ।
Kabir दीवार से टिककर फर्श पर बैठ गया।
उसकी आँखों में पानी भर गया था।

Kabir (बहुत धीमी, टूटी आवाज़ में) बोला - 
भैया ने… मुझ पर इतना गुस्सा क्यों किया?
मैंने क्या गलत किया था…?
मैं तो बस श्रेया के लिए ही लड़ रहा था…।

उसने अपनी आँखों पर हाथ रख लिए।
वह बच्चें की तरह रोने लगा।
Kabir को Karan का इतना तेज़ गुस्सा ज़िंदगी में पहली बार देखने को मिला था।
और Karan का हर शब्द उसे चीर गया था।

Kabir (रोते हुए खुद से) बोला - 
श्रेया को भी रुला दिया…
क्या मैं भी गलत हूँ…?
एक ही पल में सब कुछ क्यों टूट गया…।

Shreya बेड पर लेटी थी,
उसके आँसू तकिये में भीग रहे थे।
Karan खिड़की से Shreya को देख रहा था।
उसके चेहरे पर फर्क साफ था—
गुस्सा अब सिर्फ डर में बदल चुका था।
वह धीरे-धीरे Shreya के पास आया,
पर कुछ बोलने की हिम्मत नहीं थी।
Shreya ने उसकी तरफ देखा—
आँखें लाल, दर्द से भरी।

Shreya (रोते रोते फुसफुसाकर) बोली - 
करन जी… अगर आप दोनों अलग हो गए…
तो मैं ज़िंदा कैसे रह पाऊँगी…।

Karan का दिल वहीं टूट गया।
उसने पूरा सिर झुका लिया।
उसकी आँखें भी भर आईं।

रात का सन्नाटा… खिड़की से आती हल्की ठंडी हवा… कमरे की बत्ती धीमी जल रही है। हवा में भारीपन घुला हुआ है।
श्रेया बिस्तर पर लेटी है। आँखों से आँसू लगातार बह रहे हैं।
उसकी सिसकियाँ दबे-दबे फूट रही हैं, जैसे वो किसी को सुनाना भी नहीं चाहती… और खुद रोक भी नहीं पा रही।
उसके चेहरे पर दो चोटें हैं—
एक कबीर की बातों से लगी…
और दूसरी करण के गुस्से से।

करण कमरे में आता है। उसकी साँस तेज़ है, आँखें अब भी गुस्से से भरी, पर थकान भी साफ दिख रही है।
वो श्रेया को रोते हुए देखता है।

करण (धीरे, पर भारी आवाज़ में) बोला - 
बस… अब और मत रो, श्रेया।

उसके करीब आकर लेट जाता है और उसे अपनी बाहों में ज़ोर से खींचकर कसकर पकड़ लेता है—
जैसे वो उसे मजबूर कर रहा हो कि वो उसकी बाहों में ही शांत हो जाए।
श्रेया कुछ नहीं बोलती…
पर उसके आँसू और तेज़ बह पड़ते हैं।

श्रेया मन में बोली —
"ये कैसी ज़िंदगी है मेरी…
एक का गुस्सा मुझे जलाता है…
दूसरे का अहंकार मुझे तोड़ देता है…
और मैं बस इन दोनों के बीच पिसती जा रही हूँ।"

करण, थका हुआ… गुस्से से भरा हुआ…
कुछ ही मिनटों में गहरी नींद में चला जाता है।
लेकिन श्रेया जागती रहती है। रात भर श्रेया को वो नहीं छोड़ता। 
उसके आँसू करवट भी नहीं ले पाती। उसके आंसु करण की शर्ट को गीला कर देते हैं।
पर करण तो गहरी नींद में था।
वो करण को सोता हुआ देखती है—

वो मन में बोली - 
जिस इंसान से मैं सबसे ज़्यादा हक की उम्मीद करती हूँ, वही मुझे सबसे गहरी चोट दे जाता है…"

उसके दिमाग में कबीर का चेहरा भी घूमता है—
वो कबीर, जो उसकी कमज़ोरी भी था और उसका डर भी।

श्रेया खुद से बुदबुदाती है—
कबीर जी… करण जी… आप दोनों ने मुझे अकेला कर दिया है।
आपके झगड़ों के बीच मैं कहीं खो गई हूँ।
मैं किसके साथ ठीक हूँ… और किसके खिलाफ?
मुझे खुद नहीं पता…।

उसकी सिसकियाँ फिर से तेज़ हो जाती हैं,
पर वो आवाज़ दबा देती है—
क्योंकि करण सो रहा है, वो भी उसे सीने से लगाकर।
और वो उसे फिर परेशान नहीं करना चाहती।

उस रात श्रेया नहीं सोई।
करण के गुस्से और कबीर के अहंकार ने उसके दिल को दो हिस्सों में बाँट दिया था।
वो दोनों दूर जा चुके थे…
और बीच में सिर्फ श्रेया पिस रही थी।
टूटी हुई… अकेली…
पर फिर भी किसी से कुछ न कह पाने वाली।