इज्जत के साथ
कमल चोपड़ा
इतनी दिक्कत उसे जेल से गाँव तक अकेले पहुँचने में नहीं महसूस हुई थी, जितनी गाँव से अपने घर तक पहुँचने में महसूस हो रही थी। हालाँकि उसे कोई झेंप या झिझक महसूस नहीं हो रही थी, फिर भी उसने अपना मुँह दुपट्टे से ढक लिया था। वह नहीं चाहती थी कि उसका आना गाँववालों को चौंकाये और चटखारे लेने का मौका दे। लोगों को तो बात करने का मौका चाहिए। दूसरों का फटा देखने में लोगों को ज्यादा मजा आता है। सिर्फ आँखें छोड़कर उसने अपने चेहरे पर दुपट्टे की एक लपेट और लगा ली थी।
सारे रास्ते में वह यही सोचती आयी थी कि गाँववाले पता नहीं उसके साथ कैसा सलूक करेंगे। थू-थू करेंगे। जग-हँसाई का पात्र वह क्यों बने? उसकी तो चलो खैर है उसके घरवालों की इज्जत है, जिसके लिए उसे कत्ल जैसे इल्जाम में सात साल के लिए जेल जाना पड़ा। उसके चेहरे पर तो सात साल की भोगी हुई सजा की कालिख पुत ही चुकी थी।
उसे इस बात की भी चिन्ता थी कि अब दुनिया क्या कहेगी? दुःख इस बात का हो रहा था कि उसे कोई लेने नहीं आया था। जबकि उसकी रिहाई की खबर बाकायदा उन्हें भिजवा दी गयी थी।
इतना तो मुख्तारी पहले ही समझ चुकी थी, उसका पति रिसाल कुछ बदल-सा गया है। पिछली बार जब वह उससे मिलने जेल आया तो वह कह रहा था, “मुख्तारी, तुम घर तै के गयी म्हारे घर ते तै लक्ष्मी ही उठ गयी। कामधन्धा मेरा कुछ रहा नई। ईब तेरत्तै मिलण खातर बेर-बेर ना आ सकूँ? इतणी दूर आण खातर पीसे चहइये। ईब मैं किस तै कर्ज ठाता फिरूँ? मैं भी के करूँ? आगे भगवान ने चाहा तै आऊँगा, ना तै... अच्छा चालू हूँ...।”
इस बात को भी आज पाँच साल हो गये थे! मुख्तारी को अपने पति रिसाल में आये इस बदलाव का कारण समझ नहीं आया था। उसे उम्मीद थी कि मुलाकात के लिए नहीं आया ना सही, पर उसकी रिहाई के वक्त उसका पति उसे लेने जरूर आयेगा। लेकिन...
बेरियों के झुरमुट के बाद से ही भरतसिंह का खेत शुरू हो जाता था। खेत के आगे से होके ही गाँव को रास्ता था। खेत के आगे से गुजरते हुए मुख्तारी थरथराने लगी थी। उसे लगा जैसे कोई उसे पीछे धकेल रहा है। तेज हवा ने सात साल पहले का गुजरे वक्त का खूनी छींटों से भरा मटमैला-सा पन्ना उसकी आँखों के आगे कर दिया था...
इस खेत से सब्जियाँ खरीदने आयी थी मुख्तारी। उसके ससुर ने खुद भेजा था उसे लेकिन उसकी ननद आशा भी उसके साथ हो ली थी। उसने कहा भी, "तू के करैगी? मैं ले आऊँगी सब्जी। तेरी शादी को पाँच-छह दिन रह गये सै...।" पर वह नहीं मानी।
ट्यूबवैल के कोठड़े के बाहर भरतसिंह का छोटा लड़का राजबीर उन्हें खेत में घुसा देखकर खड़ा हो गया, "के बात सै..."
"दो-चार सब्जी चहइयें। घर में ब्याह सै। मैं रिसाल की घरवाली सूँ..."
"अच्छा-अच्छा... सब्जियाँ तो खेत के पाछले हिस्से में बो राखी सैं। तुम न्यूँ करो... एक जणा जाके तोड़ लाओ। इधर बीच में से जाने से बन्नी टूट जायेगी। इधर तार के साथ-साथ चली जाइयो। चार किल्ले छोड़ कै बायें नै घूम के इतना ही चाल के आखिर में बो राखी सै...! तोड़ ल्याओ। जाती बरिया दिखा दियो मन्नै। एक जणा चले जाइयो, एक आड़े डटा रहियो..."
उसके कहे अनुसार ही मुख्तारी ने अपनी ननद को वहीं खड़ा रहने को कहा और खुद सब्जी तोड़ने चल दी।
चारों तरफ ऊँचे-ऊँचे पेड़ और बीच-बीच में लहलहाती फसल। पैर सम्भाल-सम्भालकर रख रही थी ताकि क्यारी की मेढ़ ना टूट जाये। उसे लग रहा था जैसे हरे सोने की खान में घुस आयी है। बार-बार उसका मन करता फसल के घने झाड़ों के अन्दर घुसती चली जाये और इस स्वर्ग में कहीं गुम हो जाये! ऐसा नहीं था कि ऐसा लहलहाता हुआ खेत पहली बार देखा था पर जाने क्यों उसका दिल बच्चों की तरह मचल रहा था-काश! हमारा भी ऐसा एक खेत होता...
गोभी, तोरी, प्याज, धनियाँ... सबकुछ तो उगा हुआ था खेत में। सब्जी तोड़-तोड़कर अपने थैले में रखती हुई वह सोच रही थी कि जाते वक्त थैला राजबीर को दिखाना ही पड़ेगा। उसके पास तीस रुपये तो हैं पर... पता नहीं वह कितने माँग ले? पैसों की बात उसे पहले ही तय कर लेनी चाहिए थी।
उसका वह थैला जिसे कि एक बोरी के मुँह पर कपड़े की तनियाँ लगाकर बना लिया गया था, सब्जियों से भर गया था।
जैसे ही उसे अपने साथ आयी आशा का ख्याल आया, उसकी रूह काँपकर रह गयी। अरे, यो भूल मुझसे क्यूँकर हो गयी? जवान जहान लड़की को जवान लड़के धौरे एकला छोड़ के आ गयी अर लड़का भी कौण, राजबीर। दुनिया जहान का आवारा अर बदमाश...!
थैला उठाकर गिरती-पड़ती और लगभग दौड़ती हुई-सी ट्यूबवैल के कोठड़े की ओर लपकी। दूर से उसे कोठड़े के पास कोई भी नजर नहीं आया। उसका कलेजा जोर-जोर से धड़कने लगा था...
कोठड़े के पास पहुँचकर उसने आशा को आवाज लगाई। जवाब में कोठड़े के अन्दर से आशा के रोने की आवाज आयी...
पीला जर्द चेहरा लिए हुए आशा कोठड़े से बाहर निकल रही थी। मुख्तारी की रूह काँपकर रह गयी। आशा एकदम सुन्न बेजान पत्थर की तरह खड़ी थी। बेहद घबराई हुई आवाज में मुख्तारी ने पूछा, “के होया?”
आशा के मुँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे। उसने कोठड़े की ओर इशारा किया। मुख्तारी ने आगे बढ़कर देखा। उसकी साँस जहाँ-की-तहाँ अटक गयी। कोठड़े में राजबीर जमीन पर लहूलुहान पड़ा हुआ था। उसने हिलाकर देखा, “हैं... ये तो...”
आशा एकदम फट पड़ी, “यो कमीन मेरी इज्जत पै हाथ डाल रहा था। पैल्याँ त मन्नै इसको समझाया मैं तेरी बहन जैसी सूँ पर यो ना मान्या, अर लाग्या जबरदस्ती करण। यो मन्नै जब कोठड़े की ओर धकेलन लाग्या त मेरे भी चण्डी चढ़ गयी। मैंने जोर तै धक्का दिया ताँ यो मूँधा जा पड़्या। फेर मैंने ठा के यो डण्डा धैड़ दे सी इसके सिर पे दे मार्या। यो दो-चार मिनट छटपटाया, फेर शान्त होके पड़ गया...”
मुख्तारी ने आगे बढ़कर जमीन पर पड़े राजबीर को फिर से देखा, “यो तो मर गया!”
“भाभी... ईब के होगा?”
आशा की रुलाई फूट पड़ी थी। मुख्तारी ने इस बीच अपने-आपको सम्भाल लिया था। एकाएक वह चौकन्नी हो आयी थी।
“रो मत...तू नूँ कर चुपचाप आड़ै ते निकल जा। अर जा के अपणे बीरे ने आड़ै भेज दे...”
कुछ समझ नहीं आ रहा था आशा को, क्या करे क्या नहीं? भाभी को यहाँ अकेला छोड़कर ऐसे कैसे घर चली जाऊँ?
“ईब के करण लग री है तू? जल्दी जा अपने भाई नै भेज। मैं आड़े तै नहीं निकल सकती। सब्जी तोड़ते वक्त इनके खेत मजदूर राधू ने मन्नै देख लिया सै। मैं भज भी गयी तै बाद में पुलिस मन्नै घर तै ठा ल्यावेगी।”
मुख्तारी ने आशा को घर की ओर धकेल दिया। आशा के जाते ही खेत मजदूर राधू वहाँ आया। उसे इस घटना का पता चला और वह राजबीर के घरवालों को खबर करने दौड़ गया था।
थोड़ी देर बाद ही मुख्तारी का पति रिसाल और ससुर वहाँ आ पहुँचे। मुख्तारी से पूरी बात सुनकर वे उसे ही दोषी ठहराने लगे, “तू आशा नै अपनी गैल ल्याई ही क्यूँ? ल्याई भी ते उसने एकला छोड़ के क्यूँ गयी? पाँच दिन उसके ब्याह को रह रहे हैं। ईब के होवैगा? बेइज्जती बदनामी... यो तन्नै के चाला करवा दिया? ईब हम शादी के काम से निबटें या... हम तै कितै मुँह दिखाण लैक नई रैगे...”
“मैं तो सब्जी लेण गयी... दस मिनट भी ना लगै होंगे। मन्नै के बेरा था इतणी बड़ी बात बण जागी...”
कहते-कहते मुख्तारी की रुलाई फूट गयी। उसे रोता देखकर रिसाल उसे काटने को पड़ गया, “ईब रोण लग री सै। आशा का के होगा? उसका ब्याह क्यूँकर होवैगा? बदनामी वा अलग। छोरी की तै जिन्दगी बरबाद हो जागी...।”
कहते-कहते पत्थर की तरह बेजान बुत हो आये बापू ने एकाएक अपनी पगड़ी उतारकर मुख्तारी के पैरों पर रख दी और रोने लगा।
“यो के कर र्या सै बापू?”
“बेटी... ईब हमनै तू ई बचा सकै से। अगर तू कहे कि इस कंजर राजबीर ने आशा पे नई तेरी ही इज्जत पे हाथ डाला था अर तन्नै अपनी इज्जत बचाण खातर इसे डण्डा मार्या, अर यो मर गया। आशा का नाम ही ना आवै। छोरी की दुनिया जहान में बदनामी नई होवैगी... अर छोरी का ब्याह वी नई रुकेगा। ना तै छोरी की जिन्दगी बरबाद हो ई जावैगी, गैल म्हारी जिन्दगी भी जीते जी वीरान हो जागी। बेटी, ईब म्हारी इज्जत अर म्हारी जिन्दगी तेरे हाथ में सै...”
रिसाल ने भी बापू की हाँ-में-हाँ मिलाई, “बापू ठीक कवै सै... आशा पे इल्जाम लग गया तो हम तै मुँह दिखाण लैक नई रैंगे... तेरी बात और सै...”
वह पूछने को हुई कि बेटी घर की इज्जत है, बहू घर की इज्जत नहीं लेकिन वह चुप रही। मारे घबराहट के वह थरथरा रही थी, “लेकिन... मैं... मन्नै...।”
“तू घबरान क्यों लग रही है। ईब तै तू इस मुसीबत नै ओट ले। आगे की हम रये सलटण खातर। तन्नै जेल नई होण देंगे। अपणी सारी भैंस बेच के बड़ा वकील करके तन्नै बचा लेंगे। बस आशा का नाम नई आणा चहिये... देख, यो तेरा अर म्हारा जीण-मरण का सवाल सै...”
उसे लगा उसे फाँसी के तख्ते पर चढ़ाया जा रहा है। फाँसी का फन्दा उसके गले पर कसता जा रहा है। गला सूखने लगा उसका। उसे लगा, बचने का उसके पास कोई चारा नहीं है। आखिर घर की इज्जत उसकी भी इज्जत है। पति के खिलाफ गयी तो वो उसके खिलाफ हो गया तो वो क्या कर लेगी। वैसे भी वारदात के समय वह खेत में मौजूद थी और उसका एक गवाह भी मौजूद है।
पति और ससुर की बात मानकर बयान देने कि ‘उसी ने राजबीर को मारा है’ के सिवाय उसके पास कोई चारा नहीं था।
पुलिस जब उसे गिरफ्तार करके ले जा रही थी उस समय वहाँ पूरा गाँव जमा था। कोई गुस्से में गालियाँ दे रहा था तो कोई उस पर हँस रहा था।
गाँव अशान्त था। राजबीर के घरवालों ने दबी जुबान में घोषणा कर दी थी कि वो बन्दे के बदले बन्दा मारेंगे। रिसाल और उसका बापू बुरी तरह घबरा उठे। वे पंचायत की शरण में जा पहुँचे। पंचायत जुड़ी तो रिसाल ने सबके सामने कहा, “भरतसिंह के छोरे से म्हारी कोई दुश्मनी थी नई। मेरी औरत ही खराब सै। इसमें म्हारा तै कोई कसूर सै नई। हमने भरतसिंह के परिवार तै हमदर्दी सै। वा खूनी औरत अपणा किया पावैगी।”
पंचायत ने फैसला सुनाया था कि सब शान्त रहें। राजबीर के घरवाले ऐसा कदम ना उठायें जिससे ये घटना खानदानी दुश्मनी का रूप ले ले। उसी खूनी औरत को कानून के मुताबिक सजा दी जानी चाहिए। उसे छुड़ाने या बचाने के लिए रिसाल या उसके घरवाले कोई भी अपील या वकील नहीं करेंगे।
मुख्तारी को इस सबका पता चला तो मन-ही-मन उसने सोचा कि रिसाल ने उसके खिलाफ बयान देकर ठीक ही किया है। जो होना था वो तो हो गया अब वो अपनी जान बचाये या...उसे तो कानून भी न्याय देगा। कानून भी अन्धा तो होता नई। उसने कोई जानबूझकर तो खून किया नहीं। पूछेगी वह जज से, अपनी इज्जत बचाना गुनाह है क्या?
उसे जब पता चला था कि उसकी ननद आशा की शादी ठीक-ठाक हो गयी है तो बहुत खुशी हुई थी उसे कि उसका त्याग व्यर्थ नहीं गया है। एक-न-एक दिन कानून उसे मुक्त कर ही देगा। उसने कम-से-कम एक औरत की जिन्दगी बरबाद होने से बचा ली।
जाँच से यह सिद्ध नहीं हो पाया था कि राजबीर ने उसके साथ कोई रेप करने की कोशिश की थी, ना ही यह सिद्ध हो पाया था कि वो प्रहार जो कि राजबीर की मौत का कारण बना वो आत्मरक्षा के लिए किया गया था। लेकिन मुखतारी की उम्र और पिछली बेदाग जिन्दगी को देखते हुए कानून ने उसे सात वर्ष के कारावास की सजा सुना दी थी। जाने कितनी बार रोई-गिड़गिड़ाई थी कि वह निर्दोष है। उसने आदमी तो क्या कभी चींटी को भी नहीं मारा है। पर उसकी आवाज गाँव के उस अधकच्चे-से घर से लेकर जेल तक किसी को सुनाई नहीं दी थी।
दुनिया भर में वह असली मुजरिम सिद्ध हो चुकी थी। यहाँ तक कि मायके से उसका भाई उसे मिलने जेल आया तो उसकी बातों में हमदर्दी कम, हिकारत और गुस्सा ज्यादा था। शायद वो भी उसे मुजरिम मान बैठे थे। लेकिन उसके मन में हौसला था कि कम-से-कम मुझे तो पता है कि मैंने खून नहीं किया है।
शर्मसार चेहरा लिए हुए रिसाल भी उससे मिलने दो-तीन बार जेल आया था और रस्म-सी अदा करके चला गया।
शुरू-शुरू में जेल में दूसरी महिला अपराधियों से बात करते हुए भी डर लगता था उसे। धीरे-धीरे उसे अहसास होने लगा था कि ज्यादातर वे महिलाएँ खूँखार मुजरिम ना होकर उसीकी तरह परिस्थितियों की शिकार ही हैं।
उसे लगने लगा था कि चूल्हे-चौके, साफ-सफाई, पति-ससुराल, दुनिया और चौबीसों घण्टों की खटखट से जेल की जिन्दगी बहुत बेहतर है।
सात वर्षों का लम्बा अर्सा कैसे बीता था, यह वह ही जानती थी।
आज सजा पूरी होने पर घर लौट रही थी वह।
गाँव की गलियों में से होते हुए आखिर वह अपने घर के दरवाजे तक आ पहुँची थी। घर के अन्दर-बाहर हल्के रंग की सफेदी पुती हुई थी जोकि कुछ पुरानी पड़कर कुछ मटमैली-सी हो चुकी थी। मेरे बाद एकबार सफेदी हुई है इस घर की। उसका माथा ठनका-कहीं मेरे घरवाले आपणा यो घर किसी और ने बेच के कहीं और तै ना चले गये? भीतर बढूँ कि नई...? भीतर कोई और ही बैठा हो...?
थोड़ा झिझकने के बाद हिम्मत करके वह अन्दर घुस गयी। अन्दर चौक में चारपाई पर उसका पति रिसाल बैठा था, जिसे देखकर उसकी साँस-में-साँस आयी। उसे आया देखकर हाथ का चाय का कप जमीन पर हड़बड़ाकर रखकर उठ खड़ा हुआ।
“कौन?”
ज्योंही मुख्तारी ने मुँह से दुपट्टा उठाया, रिसाल चौंक उठा, “मुख्तारी?”
“शुकर है, पिछान तै लिया तन्नै...”
बुरी तरह हड़बड़ा गया रिसाल, “वो...मैं...तू...एकाएक...इतने दिनों बाद...आ-आ...खाट पे बैठी हो ले...मैं लस्सी ल्याऊँ तेरी खातर...”
मुख्तारी की आँखों से एकाएक आँसू बह निकले थे। समझ नहीं आ रहा था उसे इतने दिनों बाद अपने घर, अपने पति को फिर से देख पाने की खुशी के आँसू हैं या दुःखों के अन्त के...!
घर की चारदीवारी में साँस लेने के सुख ने कुछ क्षणों के लिए वो सभी कष्ट भुला दिये थे, जो उसने पिछले कुछ वर्षों में भोगे थे।
बैठकवाले कमरे से निकलकर बापू बाहर आया तो मुख्तारी ने हड़बड़ाकर अपने सिर और माथे को दुपट्टे से ढक लिया, “पाँ लागू बापू!”
“जीवती रहे बेट्टी...”
मुख्तारी ने देखा बापू कुछ और बूढ़ा हो गया है और लाठी पकड़कर चलने लगा है।
“तुम ठीक सो बापू?”
“ठीक ई सूँ बेट्टी?”
“अर...आशा कैसी सै?”
“वा भी आपणे घर ठीकै सै...
“हाँ...बेट्टी आपणे घर राजी रए...माँ-बाप ने और के चइये?”
अपने घर फिर से पहुँच पाने की खुशी मुख्तारी से सम्भाली नहीं जा रही थी, “पहल्या मैं आपणा घर पूरी तरह देख के आऊँ।”
घर में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। घर साफ-सुथरा था। चूल्हा-चौका एकदम साफ और ताजा लीपा-पोता गया था। सामने तार पर किसी औरत के कपड़े सूख रहे थे। मुख्तारी का दिल धड़कने लगा।
टीन की चद्दरोंवाले कमरे में वह घुसी तो उसकी आँखें फटी-की-फटी रह गयीं। लकड़ी के भारी मोटे पावोंवाले जिस पलँग पर पहले वह सोती थी, उसपर एक अन्य औरत लेटी हुई थी। उसके साथ एक चार साल का और एक आठ महीने का बच्चा लेटे हुए थे। मुख्तारी को काटो तो खून नहीं।
ज्योंही वह घूमी, पीछे रिसाल खड़ा था। उसने पूछा, “यो औरत कौन सै?”
रिसाल के माथे पर पसीना छलक आया था। मुख्तारी ने अपना प्रश्न दोहराया। रिसाल का गला सूख आया था। उसके मुँह से शब्द नहीं फूट पा रहे थे। पलँग पर लेटी औरत उठकर बाहर चूल्हा जलाने लगी थी।
“बोल्या नई... कौण सै यो?”
“यो सन्तोष सै... दूजा ब्याह करणा पड्या मन्नै इस तै...”
उसके दिलो-दिमाग पर सैकड़ों साँप फुफकारने लगे थे। बाहर आकर वह बापू के सामनेवाली चारपाई पर बैठ गयी थी, ‘तभी यो दोनों बापू-बेट्टा मेरे घर वापस आन पर खुश नहीं लग रहे थे...’
बुरी तरह कुरलाने लगी वह, “हाय... यो तुमनै मेरे तै किस जनम की दुश्मनी काढ़ी? मेरी जिन्दगी गाल दी रै। मेरी त माटी खराब हो गयी... ईब मैं कड़ै जाऊँ? हाय... थारी इज्जत की खातर मन्नै अपणी इज्जत दे दी अर तुम मेरी गैल... मैं बेदोसी दुनिया में कहीं मुँह दिखाण लैक नई रई... क्यूँकर रंग बदल गये तुम? बापू ईब तू बता मैं किस कुएँ में जा पडूँ... ”
सिर झुकाये बैठा था बापू, “थोड़ा हौंसला रख बेट्टी...”
“बेट्टी...? मैं थारी बेट्टी होती तो तुम मेरे साथ न्यूँ करते?”
बुरा-भला सुनकर बापू तो मुँह लटकाकर अन्दर चला गया। रिसाल थोड़ा खीझ उठा, “बस-बस... जरा चुप हो ले। आसपास के लोग सुनैंगे त के कहेंगे? म्हारी भी कोई इज्जत सै... ”
हँसी आ गयी मुख्तारी को, “इज्जत? वा रे इज्जतवाले? आज थारी इज्जत सै त कैसे? रे बैरी, थारे घर की इज्जत त मैं...”
आगे नहीं बोल पाई मुख्तारी। फिर से रोने लगी वह। रिसाल उसे चुप कराने की प्रयास करने लगा, “के करते? हम भी मजबूर हो गये थे। तेरे पीछे हम घर में दो मर्द-माणस रै गये थे। रोटी पौणवाला भी कोई था नई। गाँव बिरादरीवाले पीछे पड़ गये। रिसाल का दूसरा ब्याह कर दो। काले मूँ आली खूनी औरत ते त थारा पीछा छुट्या। बेरा ना कद वो वापस आवेगी कद नई? ना भी आवै। आ भी जावैगी तो इसी औरत ने घराँ क्यूँकर राखोगे? रोज का रोना हो गया था। जित जाओ जित बैठो वाये बात। कइयों नै त यो भी कया, जब काले मूँ आली खूनी औरत जेल तै वापस आवैगी अर तुम उसनै अपणे घराँ राखोगे त राजबीर के घराले फिर से थारे दुश्मन हो जावैंगे। मैं के करता, सोच-सोच दिमाग खराब हो गया मेरा... मन्नै दूसरा ब्याह करना पड्या...।”
रिसाल की बात सुनकर मुख्तारी एकदम चुप लगा गयी थी। उसका चेहरा एकदम लाल सुर्ख हो गया था। उसकी आँखों से जैसे खून-ही-खून उतरने लगा था।
रिसाल तेजी से उठा और अन्दर जाकर बापू से उलझने लगा, “बता बापू के करें इसका? ना तुम इसने और आशा नै सब्जी लेण भेजते अर ना... ईब मैं त कहूँ, भगा देता हूँ साली को... जहाँ चाहे जाये। हम के करें... के बिगाड़ लेगी म्हारा?”
“या ये बात की चिन्ता सै... और तै के बिगाड़ेगी, आशा का नाम ले के बदनामी करेगी। शाबाश है इसने ईब ताईं कितै भी आशा का नाम ना आण दिया, पर ईब ज इसने आशा का नाम ले दिया तै...? बदनामी हो जागी। बदनामी आशा की ससुरालवालों तक पहुँचेगी तो बेचारी का बसा-बसाया घर खराब हो सकै सै...।”
“के करें फेर? एक औरत त डर के बैठ जावें, देख लेंगे साली नै। कुछ ना कर सकै यो म्हारा, न्यूँ बी ईब इसकी बात का विश्वास करेगा कौण? न्यूँ बी इसने तो राजबीर के घरवाले ही जिन्दा नहीं छोड़ेंगे। इससे त म्हारा पिण्ड अपणे आप ई छूट जागा।”
बाहर बैठी सुलगती हुई मुख्तारी सुन रही थी। एक-एक शब्द उसे नुकीले भाले की तरह भेद रहा था।
“ईब तू ई बता या बेचारी कड़ै जावे? मायके में इसके कोई सै नई। एक भाई सै, दिल्ली में किसी फैक्ट्री में काम करके गुजारा कर रैया सै। माँ सै नई। बाप पैल्याँ ई चारपाई तै लग्या पड़ा सै। उसने देखणिया संभालणिया कोई सै ना। इसने कौण राखैगा?”
“त मैं के करूँ?”
अन्दर तक आहत हो आयी वह। अपने मायके की खबर मुझे अब इस रूप में मिल रही है। उसने भी आते ही उनसे अपने मायके के बारे में क्यों नहीं पूछा? हैरान थी वह अपने-आप पर। मायकेवालों ने भी एक अर्से से उसकी सुध नहीं ली थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह भी उन्हें कैसे भूल गयी थी, “मन्नै अपणै-आपका बेरा नई मैं कित सूँ... मैं किसै और का के करूँ?”
कमरे में जल रहे पीले बल्ब की मद्धिम-सी रोशनी बाहर आ रही थी। इसके बावजूद चौक में अँधेरा था। सन्तोष शाम का खाना बनाने में जुट गयी थी। मुख्तारी जमीन पर बैठी थी। अपना सर चारपाई की पाटी पर रखकर सोच रही थी कि ये लोग सोच रहे हैं कि कहीं मैं आशा को बदनाम ना करूँ? सिर्फ इसी डर से ये मुझे अपने घर से भगा नहीं रहे हैं वर्ना पता नहीं ये क्या करते? पर मैं ऐसी नहीं हूँ। मेरे साथ तो जो होया था हो गया। ठीक है खून आशा से हुआ, लेकिन अब उसकी जिन्दगी में नया बखेड़ा क्यों खड़ा करूँ। किसी भी हालत में उस बेचारी औरत जात का नाम कहीं नहीं आने दूँगी।
अन्दर रिसाल और बापू की जिरह जारी थी। सन्तोष बापू के हुक्के की चिलम भरने से लेकर बच्चों को सम्भालने तक के अपने काम में किसी बेआवाज यन्त्र की तरह लगी हुई थी।
जाने कब सन्तोष उसके आगे एक थाली में रोटी और मूली की सब्जी रख गयी थी।
धीरे-धीरे लाठी टेकता हुआ बापू उसके पास आकर खड़ा हो गया था। कुछ देर चुप रहने के बाद बहुत ठण्डे लहजे में बोला, "बेट्टी, बखत के मारे सै हम। कसूर तै किसी का भी कोना। जा बखत लिकड़ गया वा तै वापस आंदा को नी...ईब या घर बी तेराए सै...! सन्तोष अर तू दोनों भाण-भाण बन के रै लो। कितनेई माणसाँ की दो-दो बीवी हो सैं। कोई अनोखी बात सै नई। तू बड़ी है तेरा हक पैला सै...
सन्तोष तेरी गैल सौतगीरी नई करेगी। दोनुआँ रये जाओ। सन्तोष रोटी पो लेवैगी अर तू भैंसा नै सम्भालिए...अपना अन्दर कमाती-खाती पड़ी रहिये... और तै के हो सकै है?"
बेजान पत्थर के बुत की तरह बैठी वह बापू की बात सुनती रही। अपनी बात का कुछ भी जवाब ना पाकर बापू झेंप-सा गया। थोड़ा रुककर बोला, "अच्छा बेट्टी, यो खाना धर्या सै, खा लिए। आज ते यो बैठक आला कमरा तेरा। रात ने बैठक में सो जाइयो। मेरा के सै? मैं अपनी खाट तूड़ेवाले कमरे में गेर ल्यूँगा। बाद की बाद में देखी जागी...अच्छा बेट्टी।"
बापू के जाने के बाद उसने खाने की थाली पर नजर डाली। उसका खाने का मन नहीं हुआ। रात काफी हो गयी थी। रिसाल खाना-वाना खाकर सो गया था। सन्तोष सुबह की भैंसों की सानी के लिए खल-छिलका भिगोने लगी थी।
चारों तरफ सन्नाटा छा गया था। सारा गाँव जैसे मरघट में बदल गया हो! भैंसों को पानी पिलाने के बाद सन्तोष भी कमरे का दरवाजा बन्द करके सो गयी थी। मुखतारी अब भी वैसे ही पत्थर की तरह सुन्न-सी बैठी थी। उसने भैंसों की तरफ देखा तो उसे लगा अब उसकी हैसियत एक भैंस से अधिक नहीं रह गयी है। इन लोगों ने जिन्दगीभर भैंस ही तो पाली हैं। चारा खिलाकर दूध जैसा अमृत दूहा है और अब काम की न रहे तो उठाकर हजार-पाँच सौ रुपयों में कसाई के हाथों सौंप दी। इनके लिए औरत और भैंस में अन्तर ही क्या है। अगर भैंस बनके रहना मंजूर है तो रहे वर्ना...सन्तोष सोच ही रही होगी, मैं उसका हक मारने आ पहुँची हूँ और मुझे लग रहा है वह मेरा हक मारे बैठी है। दूसरी बीवी बन के रहा जा सकता है। जिन्दगी कट तो सकती है पर...?
कुछ निर्णय नहीं कर पा रही थी वह। इतना बड़ा संकट झेल गयी वह तो अब इतनी आसानी से क्या हार मानना। उसने थाली को अपनी तरफ खींचा। रोटी खाते-खाते सोचने लगी—मैंने इस घर के लिए जो भी कर सकती थी, किया। उल्टा अब इस घर में मेरा हक आधा रह गया है। लेकिन अब वह जाये तो कहाँ जाये?
अभी मुर्गे ने बाँग भी नहीं दी थी कि मुखतारी ने उठकर भैंसों को सानी-पानी करना शुरू कर दिया था। सन्तोष ने मुखतारी को काम में जुटा हुआ देखा तो उल्टा-सीधा बकने लगी। रिसाल ने उसे हौसला रखने के लिए कहा और खुद भैंसों का दूध दूहने लगा। सन्तोष अन्दर जाकर पलँग पर औंधी लेटकर रोने लगी। शायद उसे अपना घर छिनता हुआ लग रहा था। रिसाल दूध ड्रमों में भरकर शहर के लिए रवाना हो गया था।
मुखतारी काम में इस तरह जुटी हुई थी जैसे वह कभी कहीं गयी ही नहीं थी। ये सब काम पिछले कई वर्षों से जैसे उसकी दिनचर्या में शामिल रहे हों! सन्तोष अपने कमरे से बाहर नहीं निकली थी। रोती-झींकती रही थी।
बापू ने मुखतारी को घर से बाहर जाने से मना कर दिया था, "गाँववाले ताने-फिकरे कसेंगे क्या फायदा?"
अन्दर ही रहकर अपना बनाती-खाती रहे वह। बाहर का कोई काम हुआ तो रिसाल या सन्तोष कर लेंगे।
सन्तोष का विरोध जारी था। आधी घरवाली बनकर बेजुबान की तरह अन्दर पड़े रहने का मन तो मुखतारी का भी नहीं था पर वह मन मारे बैठी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था, वह करे तो क्या करे, जाये तो कहाँ जाये?
दो-तीन दिन योंही निकल गये थे। घर में बहुत-सा गोबर इकट्ठा हो गया था। मुखतारी ने सोचा क्यों ना वह इसे बाहर कहीं खुले में जाकर पाथ आये। उसका गाँव निकलना था कि गाँवभर में उसके आने की खबर आग की तरह फैल गयी थी।
बहुत-सी औरतों ने उसे पहचानकर भी अनजान बनकर कन्नी काट ली थी। किसी ने उसके साथ बात करने की कोशिश नहीं की थी, जैसे वह जेल से लौटने के बाद सामान्य-सी औरत ना रहकर कोई मनहूस डायन बन गयी हो! उसे भी हिकारत हो आयी ऐसी औरतों पर...
ताने और फिकरे सुनने पड़ेंगे, इतना तो उसे भी पता था लेकिन ऐसे और इतने अधिक सुनने पड़ेंगे, इतनी तो उसे भी उम्मीद नहीं थी :
—"लुट गयी थी या बच गयी थी?"
—"इतनी-सी बात थी, यो मान जाती तो इसे के फर्क पड़ जाता?"
—"राजबीर मर गया मरनेवाली चीज पर..."
—"क्या कातिल है?"
—"वो पहले ही मर गया या...कुछ करके?"
जितने मुँह, उतनी बातें...।
उसे लगा, तब नहीं, उसकी इज्जत तो अब लूटी जा रही है। उसने या आशा ने उस राक्षस को मारा, उसने जेल भोगी, किसलिए, इज्जत बचाने के लिए। लेकिन...किसी तरह बर्दाश्त करके रह गयी वह।
अगले दिन फिर कुछ लड़कों ने उसे देखकर अश्लील फब्तियाँ कसते हुए पत्थर फेंके। वह बर्दाश्त नहीं कर सकती। गुस्से में एक पत्थर उठाकर उसने भी दे मारा। पत्थर लड़के के सर में लगा। उसके सर से खून बह निकला। बाकी लड़के भागने लगे तो वह गरजी, "ईब क्यों भाजो सो कमीणो? इज्जत की खातिर ई मन्नै यो सब झेला, फेर भी मेरी इज्जत तारो सो? मेरी तो उल्टा ज्यादा इज्जत होनी चाहिए। मन्नै तो उल्टा इनाम मिलणा चइये। मन्नै इज्जत नई दी एक राक्षस ते लड़ी उसने मार गेर्या पर...यो समाज अर कानून अजीब किसम के अन्धे सैं...एक जुर्म की कै बार सजा मिलेगी मुझे?"
सभी लड़के वहाँ से भाग चुके थे। जिसके चोट लगी थी वह भी। मुखतारी भी कलपती हुई घर लौट आयी थी।
देर रात रिसाल बाहर से लौटा तो वह डरा हुआ होने के बावजूद बहुत गुस्से में था। उसने बापू को अन्दर बुलाकर कहा, "आज राजबीर के बाप और भाइयों ने मन्नै बीच बाजार रोक कै खूब खरी-खोटी सुनाई। कहने लगे, कानून ने मुखतारी को बहुत कम सजा दी है। ईब उस खूनी औरत नै तू आपणे घर राखेगा? हम क्यूँकर बरदास करेंगे? म्हारी-थारी दुश्मनी शुरू हो जागी। या ते उस औरत ने घर तै भगा देना, ना तै हम तन्नै भी गाँव में चैण तै ना रैन देंगे। ईब तू बता बापू मैं के करूँ?"
"यो तै भूंडा फँसे भाई। कहीं और जा बसें पर...यो मकान बिके तब ना। वो लाला पेल्याँ ई नजर गाड़े बैठा सै। मन्नै तो लगै, इ लाला ने ई राजबीर के घरवाल्याँ ने भड़काया सै ताकि तंग आके हम सस्ते में यो मकान उसे बेच-बाचके गाँव छोड़ के चले जावैं..."
"हो सकै सै। पर बापू...यो औरत भी सूधी कोनी। तन्नै बेरा सै, आज इसने एक छोरे का सिर फाड़ दिया। बाहर जाण नै इस ताईं मना कर रखा था। फिर भी यो बाहर गयी? मैं बूझूँ यो बाहर गई क्यूँ?"
मुखतारी सुन रही थी उनकी बात। चुप नहीं रह सकी वह, "अर वो छोरा मन्नै के कै रैया था?"
"के कै रैया था? कोई तन्नै गाली देगा तू औरत जात हो के उसका सिर फोड़ देगी? किस-किस का सिर फोड़ेगी? उसके जरा-सी ज्यादा लग जाती अर वा भी मर जाता फेर...?"
"पर मन्नै..."
"तू औरत सै या...?" रिसाल चिल्लाया तो बापू ने उसे चुप कराया फिर मुखतारी से बोले, "फेर भी बेट्टी...तू औरत सै। तन्नै अपणे ऊपर काबू रखना चइये। तन्नै आपणी हद में रैणा चइये। आच्छा जा...के आपणा काम निबटा..."
रात काफी हो गयी थी। एकाएक उसे याद आया, ढेर-सा काम बाकी है और वह जल्दी-जल्दी अपना काम निबटाने लगी।
उधर बापू कह रहा था, "आगे देखो के होवै है? हो सके सै धीरे-धीरे सब ठीक हो ज्या..."
"हो सके गाम वाल्याँ के ताने-फिकरे सुण-सुण के यो साली खुद ही कुएँ में जा गिरे।"
"घर से बाहर ना निकली होती तो...ईब भी किसी दिन मैं ई मार के इसने कुएँ में गेर आऊँगा। इसने अन्दर-ही-अन्दर चुपचाप मारना आसान था पर..."
रिसाल के ये शब्द मुखतारी के कानों में जलते फुफकारते हुए साँपों की तरह घुस गये थे। कुछ ही क्षणों में साँपों ने उसके अन्दर जाने क्या कुछ जला डाला था। उसके सारे शरीर में जहर-ही-जहर फैल गया था।
उसकी आँखों में खून उतर आया, "तू मन्नै कुएँ में गेरेगा? हराम के कमीण...तेरी खातर मैं जेल गयी अर तू? तन्नै बेरा नई, खून का इल्जाम त मैं पैल्याँए भुगत चुकी जनानी हूँ..."
उसकी आँखों के सामने उसके साथ जेल में बन्द उन तमाम महिला अपराधियों के चेहरे घूमने लगे थे। उसने फैसला किया, पहले तो उसने खून किया नहीं था, पर अब एक खून जरूर करेगी। रिसाल का खून। इस बार उसे ज्यादा सजा होगी। फाँसी हुई तो इस जिल्लत से छुटकारा मिल जायेगा। उम्र कैद हुई तो भी ठीक। इस चारदीवारी से जेल की चारदीवारी भली। बिना जुर्म के सजा काटने का पहले जैसा मलाल तो ना होगा। नहीं रहना उसे रिसाल जैसे धोखेबाज की दूसरी बीबी बनकर। सचमुच की अपराधिन् बनेगी। वह रिसाल जैसे धोखेबाज को सजा देगी...
सब सो चुके थे। झींगुरों की आवाज के अतिरिक्त कहीं से कोई आवाज नहीं आ रही थी। सामने का कमरा बन्द था। बैठक का दरवाजा खुला था।
बैठक में बिछे लकड़ी के पट्टे पर बैठी थी वह।
सामने का दरवाजा खुला। उसने देखा रिसाल कमरे से बाहर आया। वह सतर्क होकर बैठ गयी। उसने सोचा—शायद वह उसीके पास आये। कुछ सुख-दुख की बात करने, शायद उसके मन में उसके लिए कुछ हमदर्दी जागी हो! शायद अब भी उसके मन में उसके लिए कुछ जगह हो। अपनी दूसरी बीबी के सामने जानबूझकर ऐसा बन रहा हो।
रिसाल ने उसकी तरफ देखा और नजर फेर ली और ईंटों का पर्दा करके बनाई गयी लैट्रिन की तरफ चल दिया। शायद पेशाब करने उठा था वह। उसकी बेरुखी और हिकारत ने मुखतारी का खून और भी खौलाकर रख दिया।
लैट्रिन की पिछली दीवार की ईंटें कुछ उखड़ी हुई थीं जिस पर बोरी का टुकड़ा टाँगकर पर्दा कर दिया था। मुखतारी ने सोचा यही मौका है उस पर वार करने का, पर तभी रिसाल के बच्चे के रोने और उसकी बीबी के उसे चुप कराने की आवाजें उसके कानों में पड़ीं। क्षणभर में जाने क्या कुछ बीत गया उस पर। ठण्डी और तेज हवा होने के बावजूद वह पसीना-पसीना हो आयी थी।
उसकी आँखों से खून पानी बनकर बह निकला था, 'इस कमीण को दण्ड देने का मतलब सै सन्तोष नै और दो बेदोष मासूम बच्चैयाँ नै दण्ड देना। ना इस औरत और उन बच्चैयाँ नै क्यूँकर दण्ड दे सकूँ सै। यो मरद कितनी बार औरत नै ढाल बनाकर बचते रैंगे?'
कब उसकी आँख लग गयी उसे पता ही नहीं चला। आँख खुली तो दिन काफी चढ़ आया था। रिसाल दूध लेकर जा चुका था। सानी-पानी का काम सन्तोष ने निपटवा दिया होगा। वह मन मारकर उठी और काम में जुट गयी। उसने अपने-आपको समझाया कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा।
रिसाल दूध पहुँचाकर लौट आया था। साइकिल एक तरफ को खड़ी करके वह चारपाई पर आ बैठा; मुखतारी चूल्हे पर चाय चढ़ाये बैठी थी।
मुखतारी से चाय का गिलास लेकर रिसाल ने अभी मुँह को लगाया ही था कि बाहर से आवाज आयी—
"रै रिसाल...निकाल बाहर...उस खूनी लुगाई नै, भीतर कहाँ छुपाये बैठा है..."
घर के बाहर गाँव के कुछ लोग आ जुड़े थे। उनमें उस लड़के का बाप भी था जिसे कल मुखतारी ने पत्थर मारा था।
"साली की हिम्मत तो देखो...औरत हो के..."
"कल म्हारे छोरे का सिर फोड़ दिया...कल म्हारा कतल करेगी..."
रिसाल चुपचाप खड़ा सुन रहा था। कुछ लोग गालियों पर उतर आये थे, "निकाल बाहर कर साली को...साली कंजर की..."
मुखतारी से रहा नहीं गया। गुस्से में भरकर बाहर निकली और कहने लगी, "खबरदार किसे नै गाली बकी तै...थारे छोरे का कोई कसूर ना सै? मैं औरत हूँ...सिर्फ इसलिए सबकी ज्यादती बरदास करती रहूँ? मन्नै गुस्सा नई आ सकदा? मन्नै किया ई के सै? मेरा यो कसूर सै कि मैं औरत हूँ? मन्नै एक जुर्म की कितनी बार सजा मिलेगी?"
हाथ की लाठी को जमीन पर पटकते हुए एक गाँववाले ने रिसाल को घुड़का, "रिसाल...हम तेरा लिहाज कर रहे सै...अपनी बोहड़िया नै सम्भाल ले ना तै...?"
रिसाल का मर्द जैसे सोते से जाग उठा। वह मुखतारी को मारते-पीटते हुए अन्दर की ओर धकेलने लगा, "चल साली अन्दर...मर्दों से जुबान लड़ा रही सै। किसै की शर्म ना सै तन्नै..."
मुखतारी को थोड़ा अन्दर धकेलकर वह गाँववालों से बोला, "भाइयो! जरा शांति रखो। मैं तो खुद इस चुड़ैल तै पीछा छुड़ान के चक्कर में हूँ...?"
मुखतारी फिर से बाहर आकर चीखने लगी, "रै तू कै मन्नै छोड़ेगा, मैं ई तन्नै छोड़री हूँ...शादी के टैम में जो गहने-लत्ते लेके इस घर आयी थी वो सब लिकाड़ के मन्नै दे दे...लानत सै इ घर-गाँव-बिरादरी सब पे...जो औरत की इज्जत ना कर सके।"
रिसाल को अपनी ओर हैरानी से देखता हुआ पाकर वह कड़की, "आँखें फाड़-फाड़के के देखै है? ज्यादा होश्यार बनने की कोशिश मत करियै...तन्नै तै बेरा ई सै—मन्नै थाना-कचहरी-जेल सब देख रक्खे सैं...मन्नै ना रहना तेरी भैंस बनके। मैं भी दूसरी शादी कर सकूँ हूँ। ना तै जा के अपने बाप की देखभाल करूँगी...।"
बेहद हैरान परेशान होकर गाँववाले एक-दूसरे का मुँह देखने लगे थे। बापू भी मुखतारी की ऊँची आवाज सुनकर बाहर आ गया था। मुखतारी अब भी कड़क रही थी, "मैं आड़ै इस कमीण दुहेजू की आधी बीवी बनके क्यूँ रहूँ? दो रोटी खातर? वा ते मैं किते भी हाथ-पाँव हिलाकर कमा ल्यूँगी। मैं भी दूसरी शादी कर सकूँ सूँ। इस दुहेजू की बजाय किसे और रंडुवे से शादी ना कर ल्यूँगी? कम ज कम उसकी पूरी घरवाली तै हूँगी। आड़े अधूरी बनके रहने में के पैदा?"
कहते-कहते मुखतारी की आवाज गुस्से के बावजूद भर्रा गयी थी... उसकी आवाज ने गाँवभर को जैसे हिलाकर रख दिया था। उधर बापू थरथरा रहा था कि कहीं वह सब के सामने आशा का नाम ना ले दे। पर वह तो जैसे आशा का नाम ही भूल चुकी थी।
बापू ने उसे चुप कराने की कोशिश की, "बेट्टी, म्हारी इज्जत..." तो वह और भड़क उठी, "इज्जत? क्याँ की इज्जत? किसकी इज्जत? थारी इज्जत? अर मेरी? मेरी कोई इज्जत नई? जित रहूँगी इज्जत के साथ रहूँगी, ना तै...?"