🌿 भूतों की बारात में झूमर“जब तान, थाप और नृत्य ने अदृश्य जगत को भी बाँध लिया…”
डोमन के सिर से माँ-बाप का साया बचपन में ही उठ गया था।
गाँव में भयंकर हैजे का प्रकोप हुआ था। उन दिनों न दवा थी, न सुविधा—एक साधारण सी बीमारी ने अनेकों की जीवन लीला समाप्त कर दी। उन्हीं में डोमन के माता-पिता भी थे।
देश अभी-अभी आज़ाद हुआ था।
हवा में बदलाव था, पर लोगों के मन अभी भी डरे हुए थे।
किसी के मन में भय था,
किसी के भीतर भूख और अकाल की स्मृतियाँ,
तो किसी के भीतर एक नई उम्मीद—
“अब पेट भर खाना मिलेगा…”
“अब देश आगे बढ़ेगा…”
धीरे-धीरे समय बदलने लगा।
गरीबों के विवाह में झूमर और नोटुवा नृत्य होने लगे,
और रसूखदारों के यहाँ बाई-नाच का चलन बढ़ गया।
डोमन के नाना—झगड़ू—कहार का काम करते थे,
पर उनका मन बसता था झूमर में।
जब वे नाचते, तो लगता—
जैसे उम्र ने उनके आगे हार मान ली हो।
डोमन बचपन से यही देखता-सुनता बड़ा हुआ।
नाना ने अपने इकलौते नाती के लिए एक ढोल का जुगाड़ कर दिया।
बस फिर क्या था—
डोमन की उँगलियाँ ढोल पर थिरकने लगीं।
जब भी मौका मिलता,
नाना-नाती की महफ़िल जमती—
और छोटा सा आँगन झूमर का अखड़ा बन जाता।
पर एक कमी थी—
झगड़ू ऊँचे सुर में गा नहीं पाते थे।
एक दिन डोमन बोला—
“नाना, मैं एक ऐसे आदमी को जानता हूँ जो ऊँची तान में झूमर गा सकता है…”
झगड़ू की आँखें चमक उठीं—
“तो फिर देर किस बात की!”
वह था—नाटा महतो।
नाम भले नाटा, पर गाने में उस्ताद।
अब तीनों की जोड़ी जम गई—
नाटा की ऊँची तान,
डोमन की ढोल की थाप,
और झगड़ू का बेमिसाल नृत्य।
लोग कहते थे—
नाटा ने श्मशान काली की साधना से सुर पाया है।
जहाँ भी जाते—धमाल मचा देते।
🌑 वह रहस्यमयी रात
एक रात, परसुडीह गाँव से लौटते हुए देर हो गई।
रात गहरी हो चुकी थी।
चाँद बादलों के पीछे छिप-छिपकर जैसे कोई खेल खेल रहा था।
थके हुए तीनों ने एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम करने का निश्चय किया।
धरती ठंडी थी, हवा में अजीब-सी सरसराहट थी।
कुछ ही देर में तीनों गहरी नींद में डूब गए।
अचानक—
डोमन की आँख खुली।
ढोल गायब थी।
और पास ही कहीं झूमर की मधुर धुन गूँज रही थी…
“नाना… देखो…”
झगड़ू ने आँखें मलीं—
और जैसे ही नज़र उठाई, उनका शरीर सिहर उठा।
यह कोई साधारण टोली नहीं थी—
यह तो भूतों की बारात थी।
धुँधले, विचित्र, पर अजीब तरह से उत्साहित चेहरे…
हवा में तैरते हुए शरीर…
और उसी में—उनकी ढोल!
तीनों के प्राण सूख गए।
पर तभी—
नाटा ने आँखें बंद कीं, माँ काली का स्मरण किया…
और एक गहरी, ऊँची तान छेड़ी—
ऐसी तान, जो भय को चीरती हुई निकल जाए।
क्षण भर में—
भूतों की टोली ठिठक गई।
एक भूत बोला—
“अरे! इतना मधुर गान… और सुनाओ!”
डर अब धीरे-धीरे पिघल रहा था।
नाटा की तान आसमान छूने लगी,
डोमन की ढोल जैसे स्वयं बोलने लगी,
और झगड़ू—उम्र भूलकर—नृत्य में डूब गए।
अब यह मनुष्यों और भूतों का भेद नहीं रहा—
यह केवल कला की महफ़िल थी।
रात भर—
तान, थाप और नृत्य का जादू चलता रहा।
🌅 भोर और वरदान
भोर की पहली किरण फूटी।
भूतों के सरदार ने कहा—
“मानव! तुमने हमें प्रसन्न कर दिया। जो चाहो माँगो…”
डोमन ने नाना की ओर देखा—
और मासूमियत से बोला—
“हमें एक-एक घोड़ा दे दीजिए…”
क्षण भर में—
तीन सुंदर घोड़े उनके सामने खड़े थे।
और फिर—
भूतों की पूरी टोली धुएँ की तरह विलीन हो गई।
डोमन खुशी से झूम उठा—
“वाह! कितना सुंदर घोड़ा!”
नाटा ने सावधान किया—
“ध्यान रखना… ये लात मारते हैं…”
डोमन हँस पड़ा—
“ऐसे मारते हैं?”
और उसने पैर घुमाया—
💥 धड़ाम!
डोमन की आँख खुल गई।
सामने—
टूटी हुई हांडी…
बिखरा हुआ चावल…
और नानी हाथ में छड़ी लिए खड़ी थी।
“निकम्मा! दिन भर सपने देखता है!”
“काम का न काज का—रोटी तोड़े नानी का!”
डोमन चुप रहा।
आज पहली बार—वह भीतर तक शांत था।
उसके भीतर कुछ बदल रहा था।
उसे समझ में आ गया—
बचपन से जो भूत-प्रेत की कहानियाँ उसने सुनीं,
उसी ने उसके मन में यह संसार रच दिया।
उसने सोचा—
“अगर माँ होती… तो शायद ये कर्कश शब्द न सुनने पड़ते…”
पर अब वह रोया नहीं।
🌿 मन का जागरण
उस दिन के बाद—डोमन बदलने लगा।
अब जब वह ढोल उठाता—
तो केवल थाप नहीं देता,
सोचता भी था।
अब वह डर की नहीं—
जीवन की धुन बजाना चाहता था।
उसे समझ आ गया—
👉 मन एक बीज है
👉 चित्त एक खेत है
जैसा बोओगे—वैसी ही फसल उगेगी।
मानव मन वही बनता है—
जिससे उसे भरा जाता है।
संसार में चिंतन के अनगिनत विषय हैं,
पर मनुष्य स्वयं को
खाने, सोने और भोग तक सीमित कर लेता है।
🌼 अंतिम संदेश
“विस्तार ही जीवन है,
और संकीर्णता ही पाप है।”
“विस्तार में अपना अस्तित्व खो दो…”
— श्रीश्रीठाकुर 🌿
जयगुरु 🙏🙏🙏
वंदे पुरुषोत्तमम् 🌿