कमल चोपड़ा
घर तक आते-आते रास्ते में राशनवाले, किरोसिनवाले और दवाईवाले का उधार चुकता करते-करते उसकी तनखा निपट गयी थी। तनखाह के हाथ में आने की गर्मी, उत्साह और खुशी कुछ ही क्षणों में अगले महीने की दस तारीख तक की इन्तजार, बेसब्री और बेचैनी में बदल गयी थी।
जिस तेजी से सिरपत अपनी किराये की अधकच्ची-सी कोठरी में घुसा था, उसी तेजी से उबलती हुई दाल की गन्ध उसकी नाक में घुस गयी थी। उसकी बीवी सुरसती जमीन पर बैठकर चारपाई पर सिर टिकाये-टिकाये सोई पड़ी थी। पास ही रोज की तरह जलते हुए स्टोव पर रखी दाल उबल-उबलकर बाहर गिर रही थी। “ये क्या...?”
हड़वड़ा उठी सुरसती। क्षणभर में उसने स्थिति को समझा और स्टोव की हवा निकाल दी, “बहुत थक गयी थी आज, सो जरा आँख लग गयी थी।”
“तू किसी दिन जरूर कोई झंझट खड़ा करेगी मेरी जान को... अच्छा पहले ये बता गिन्नू कहाँ है?”
“ग्यारह से ऊपर का वक्त हो गया और अभी तक नहीं लौटा? आने दे आज साले को...?”
“खैर तो है? क्या बात है?”
“पर अभी तक वो लौटा क्यों नहीं?”
“अब क्या पता? रोज तो दस बजे तक आ जाता था पर आज...”
“जायेगा कहाँ? आने दे साले को... सुन ले तू भी आज, वो मेरे हाथ से बचेगा नहीं।” “क्या हुआ है? ऐसा क्या किया है उसने?”
“आज उसका महीना पूरा होनेवाला था ना... मैं चन्दू के ढाबे पर गया था उसकी तनखाह लेने। पता चला गिन्नू अपनी तनखाह पहले ही ले जा चुका है। मैंने उसके मालिक को कहा तूने उसे उसकी तनखाह दी क्यों? है तो बच्चा ही। जब मैंने उसे रखवाया था तब ही कह दिया था कि उसकी तनखाह मैं महीने के महीने खुद ले जाया करूँगा। उसका मालिक बोला—‘वो मुझे कई दिनों से कह रहा था कि मेरी तनखाह मुझे ही देना मेरे बापू को मत देना वर्ना मैं काम छोड़ दूँगा। अगर मेरी तनखाह मेरे बापू को दी तो फिर काम भी मेरे बापू से ही करवा लेना...। हमें तो तनखाह देनी ही थी। उसकी मेहनत का पैसा उसे दे दिया।’ और वो साला गिन्नू अपनी तनखाह लेकर चला गया है ना...जिसने पाला-पोसा उसका कुछ नहीं? आने दे साले को बनाता हूँ उसे बड़ा...साला अभी बारह-साढ़े बारह साल का हुआ नहीं और...।”
“अब जरा शान्ति से काम लो...आये तो जरा उसे प्यार से पूछना...जरा ठण्डे दिमाग से काम लो।”
“कहीं तू भी उसके साथ मिली हुई तो नहीं है? उसने वो तनखाह लाकर तुझे दी हो और तूने ही उसे कहीं छुपा...।”
खीझ उठी वह, “मैं तो उसकी चिन्ता में घुली जा रही हूँ वो गया कहाँ? कहाँ गया होगा कहाँ नहीं? और तुम मुझ पर ही...मैं कहती हूँ देख लेना एक दिन तुम अपने इस लड़के से हाथ धो बैठोगे। एक दिन घर छोड़कर कहीं भाग ही जायेगा वह, तो क्या कर लोगे?”
एकाएक ठण्डा पड़ गया सिरपत और सोचने लगा—सचमुच अगर गिन्नू घर छोड़कर भाग गया तो...।
सिरपत को चारपाई पर गुस्से से भरा हुआ बैठा देखकर सुरसती समझ गयी थी, अभी वो और भी क्लेश मचायेगा। रोज की ही बात है।
धीरे-से कहा सुरसती ने, “कमरे का किराया तो मैंने अपनी तनखाह से मकान-मालिक को दे दिया है। पर बिजली के सवा सौ बाकी हैं। पिछले दिनों चारपाई ठीक करवाई थी, उसके नब्बे रुपये देने हैं।”
“तेरा तो रोज का रोना है। मुझे तो लाला राधेश्याम के कर्जे की किश्त की चिन्ता है। इसी नामुराद गिन्नू के इलाज के लिए कर्जा लिया था। पैदा होते ही पीलिया, उल्टियाँ और बुखार हो गया था। बारह साल हो गये। उस वक्त लाला राधेश्याम ने कर्जा देके मेहरबानी न की होती तो गिन्नू आज जीवित न होता। यही अहसान क्या कम है कि पाँच परसेंट के हिसाब से बीस हजार का हजार रुपया तो महीना ब्याज ही बनता है, हम पाँच सौ रुपया महीना दे पा रहे हैं। अगला फिर भी कोई ज्यादती नहीं कर रहा। आज दस तारीख है पाँच सौ भी नहीं पहुँचे तो...तीन साल से तो गिन्नू की तनखाह चन्दू से लाके सीधी राधेश्याम को दे आता था। पर आज अब ये साला गिन्नू बड़ा हो गया...।” सिरपत बार-बार चीख रहा था, “आज साले को जिन्दा नहीं छोड़ूँगा! वो मेरा बाप है या मैं उसका बाप...?”
अन्दर जमा हुआ दर्द सुरसती की आँखों से पानी बनकर बहने लगा था। मन में बार-बार हौल उठ रहे थे, “खुद कमाता है वह...वो क्यों सहेगा यह सब? हो न हो वह कहीं दूर भाग गया है...!”
घबराकर उसने अपने पति से कहा, “जाओ कहीं जाकर उसका पता लगाओ। जरूर कुछ ऊँच-नीच...मेरे बेटे को कुछ हो गया तो मैं भी जान दे दूँगी...!”
“अब मैं कहाँ जाऊँ उसे ढूँढ़ने? ...सिर चढ़ा रखा है तूने उस साले को...!”
कैसे बुरे-बुरे ख्याल आने लगे थे सुरसती के दिमाग में। रोने-कलपने के सिवाय वह कुछ नहीं कर पा रही थी।
काफी प्रतीक्षा के बाद भी गिन्नू नहीं आया तो एकाएक बिफर उठी वह, “कहती हूँ कहीं ढूँढ़ो उसे...तुम नहीं जाते तो मैं जाती हूँ।”
“रुक जा...मैं ही जाता हूँ। पर कहाँ जाकर ढूँढ़?”
ज्योंही सिरपत बाहर निकला उसने देखा सामने से गिन्नू चला आ रहा है। वह वापिस आ बैठा। डरा-सहमा-सा गिन्नू अन्दर घुसा तो सिरपत ने कड़ककर पूछा, “अपने मालिक से तनखाह ले आया ना?”
चुपचाप खड़ा रहा गिन्नू।
“सुनता नहीं तुझे? वो पाँच सौ रुपये कहाँ हैं? ला मुझे दे दे।”
जवाब में कुछ नहीं बोला गिन्नू। सिर झुकाये जमीन की ओर देखता रहा। सिरपत का पारा और भी चढ़ने लगा, “गूँगा-बहरा हो गया है क्या? अबे बोल साले—नहीं तो जान से मार दूँगा आज तो...!”
“जरा प्यार से पूछो...बता देगा...बच्चा ही तो है।”
सुरसती ने कहा तो बापू ने उसे परे धकेल दिया और काँपते-थरथराते हुए गिन्नू पर जैसे झपट ही पड़ा। गिन्नू की जेबें देखीं। कुछ भी नहीं था जेबों में, फिर पैसे कहाँ गये, “बता...सीधी तरह पैसे मुझे दे दे वर्ना मर जायेगा तू मेरे हाथ से...!”
गिन्नू अब भी कुछ नहीं बोला तो बापू उस पर टूट पड़ा। थप्पड़-लात-घूँसे जो बन पड़ रहा था, चलाने लगा। मार-मारकर उसकी हालत खराब कर दी।
साँस फूल आया बापू का उसे पीटते-पीटते। बुरी तरह बिलबिला रहा था गिन्नू। माँ रोती-झींकती बीच-बचाव करने की कोशिश कर रही थी।
“अब भी बता दे वर्ना जान से मार डालूँगा। बोल, साले बोल!”
पीटते-पीटते हाथ दुखने लगे बापू के तो वह इधर-उधर कोई चीज ढूँढ़ने लगा। माँ गिन्नू को पुचकारते हुए समझाने लगी, “इतना पिट रहा है तू..इससे अच्छा बता ही दे वो पैसे हैं कहाँ?”
“ये ऐसे नहीं बताएगा।”
गुस्से में पागल हुआ-सा बापू बिना आगा-पीछा देखते हुए गिन्नू पर तड़ातड़ डण्डे बरसाने लगा। उसके हाथ-मुँह-कोहनियों से खून निकलने लगा। तड़फकर गिर पड़ा वह। उसे गिरता हुआ देखकर बिफरी हुई गाय की तरह फुफकार उठी सुरसती। अपने पति को जोर से धक्का दिया उसने और वह चारपाई के पास जा गिरा। उसका माथा चारपाई के पाये पर जा लगा। माथे से खून बह निकला। उधर गिन्नू को बेहोश पड़ा देखकर वह तड़फड़ाकर रह गयी।
“बापू हो या कसाई? देख तो मार-मार के क्या हालत कर दी बेचारे की...हाय!”
गिन्नू का सिर सहलाते हुए वह कड़कड़ाने लगी, “अपनी मेहनत के पैसे खुद ले आया तो क्या गुनाह कर दिया...इस तरह कसाइयों की तरह पीटने का मतलब...?”
थोड़ी देर बाद गिन्नू को होश आया तो सुरसती उसे पानी पिलाने लगी। उधर सिरपत अपने माथे के जख्म को मैले-कुचैले कपड़े से दाबे बैठा था। जख्मों के दर्द से बिलबिला रहा था गिन्नू। सुरसती उसके जख्मों पर हल्दी लगाने लगी थी।
“इससे अच्छा तू बता ही देता पैसे गये कहाँ? किसे दे आया? किसी बुरी संगत में तो नहीं पड़ गया तू? कोई लाटरी जुए में तो नहीं गँवा आया जो बता नहीं रहा।”
“मैंने कब खेली है लाटरी...।”
“तो फिर गये कहाँ पैसे...?”
एकदम खीझकर बोला गिन्नू, “मैं अपने मालिक से पैसे लेकर चला तो ढाबे पर से ही एक स्मैकिया मेरे पीछे हो लिया...नाले की पुलिया से थोड़ा उधर ही उसने मुझे रोका और कहा—पैसे निकाल...! मैंने नहीं निकाले तो वह जबरदस्ती मुझसे छीनने लगा। मुझसे काफी बड़ा था वो, फिर भी मैंने उसे धक्का दिया और अपने पैसे बचाकर भाग लिया। पुल पर पहुँचते ही वहाँ तैनात मुच्छड़ पुलिसिये ने मुझे रोक लिया—कहाँ भागा जा रहा है इस तरह...किसी का कुछ उठाकर भागा है क्या? इतनी देर में वो स्मैकिया भी वहाँ आ गया और पुलिसिये से बोला—हाँ, साहब, ये मेरे पैसे छीनकर भाग रहा था। मैंने बहुत कहा, उल्टा ये मेरे पैसे छीनने की कोशिश कर रहा था। पुलिसिये ने मेरी तलाशी ली और पैसे अपने कब्जे में कर लिए। मैंने बहुत कहा—ये मेरी महीनेभर की मेहनत की कमाई है। चल के मेरे मालिक से पूछ लो। अभी-अभी लेकर आया हूँ उससे। लेकिन उसने मेरी एक नहीं सुनी। मुझे दो डण्डे मार के भगा दिया। देखो पीठ पर निशान भी होंगे। मैंने आगे जाके मुड़के देखा तो पुलिसिया और स्मैकिया आपस में पैसे बाँट रहे थे...
मैंने एक पत्थर उठाया और जोर से मुच्छड़ पुलिसवाले के दे मारा। निशाना सही लगा। सिर फट गया उसका। खून निकलने लगा। सिर पकड़कर वहीं बैठ गया वह। मैं तो भाग लिया वहाँ से...!”
माँ का साँस जहाँ-का-तहाँ रुक गया, “हूँ...क्या जरूरत थी मुसीबत मोल लेने की? बापू भी घबरा गया। उसने उठकर झुग्गी का दरवाजा ठीक से बन्द किया—पुलिस से पंगा? मामूली बात नहीं है। अभी आती होगी पुलिस। वो पैसे तो गये ही गये अब देखना...खुद तो मरेगा ही, साथ में हमें भी मरवायेगा। इसीलिए मैं इसकी तनखाह लेकर आता था। अब बन ले बड़ा।”
“गुण्डे-वुण्डे बड़ों से भी तो पैसे छीन लेते हैं। मेरी जगह आप होते तो क्या कर लेते?” जवाब नहीं सूझा बापू को। भर्राई-सी आवाज में पूछा माँ ने, “लेकिन तुझे पैसे की क्या जरूरत आन पड़ी थी?”
जवाब में उसने अपना पीले प्लास्टिक का जूता उठाकर दिखाया जिसके तल्ले में बड़ा-सा मोरा था। फिर अपना पैर उठाकर दिखाया जिस पर बने जख्म से ताजा-ताजा खून रिस रहा था, “तीन महीने हो गये पैर में काँच घुसे। इलाज तो हुआ नहीं, ऊपर से रोज फिर-फिर चोट लग जाती है। खून निकल आता है।”
माँ गिन्नू के जख्मों पर हल्दी लगाने लगी तो वह चीख उठा, “तीन महीनों में कितने की तो हल्दी लगा दी। जख्म फिर भी ठीक नहीं हुआ! होगा भी कैसे? पैरों का बचाव तो जूते से होगा ना...
कितने दिनों से दो सौ रुपयोंवाला ब्राउन जूता ले के देने को कह रहा हूँ पर...! सोचा था दो सौ रुपयों का ब्राउनवाला जूता लूँगा और बाकी के पैसे से जख्म का इलाज करवाऊँगा। सारा दिन इधर-उधऱ भागना पड़ता है। पैर में दर्द हो या कुछ, मालिक को क्या?”
कहते-कहते उसकी आवाज भीग गयी थी। उसे अनसुना करके बापू ने फिर चिन्ता जताई, “ऐसे छोड़ेगी तो नहीं इसे पुलिस। आती ही होगी...!”
लापरवाही से कहा गिन्नू ने, “बहुत आगे जाके मैंने मुड़कर देखा। मेरा पीछा कोई नहीं कर रहा था। मेरे पैसे छिन चुके थे। फिर भी मैं बाजार की तरफ चला गया। काफी देर तक मैं फैन्सी शूजवाले की दुकान के बाहर खड़ा रहा। बाजार बन्द होने लगा तो शूजवाला भी दुकान बन्द करके चला गया। मैं दुकान के बाहर फट्टे पर बैठकर रोता रहा। फिर उठकर घर चला आया। बहुत देर हो गयी पुलिसिये ने आना होता तो अब तक आ न जाता।”
माँ ने उसकी बात काटी, “ठीक है तू भाग आया पर तेरी शक्ल तो देख ली होगी उस पुलिसवाले ने! फिर कभी उसकी नजर तुझ पर पड़ गयी तो...!”
फुफकराते हुए साँप ने जैसे उनके दरवाजे पर फण पटका था—खट खट खट! उन्हें काटो तो खून नहीं। पुलिस होगी। इसी बात का तो डर था। सूखे पत्ते की तरह काँपते फड़फड़ाते रह गये। दरवाजा खोला तो सामने नशे में धुत गालियाँ बकते हुए राधेश्याम लाला के आदमी खड़े थे, “किश्त नहीं पहुँची अभी तक तेरी? कर्जा लेने के वक्त तो तलवे चाट रहा था। किश्त लेने के लिए तेरे चक्कर हम काटें।”
गिड़गिड़ाते हुए उन्होंने अपनी मजबूरियाँ बताईं तो वे भड़क उठे, “रहने दे ये बहानेबाजियाँ! कल शाम तक लालाजी के पास किश्त पहुँच जानी चाहिए। हमें दुबारा न आना पड़े वर्ना...?”
उसके जाने के बाद माँ का रुका हुआ साँस लौटा—गनीमत है पुलिस नहीं थी। दरवाजा बन्द करके बापू एक तरफ बैठकर कलपने लगा था, “ठीक दस तारीख को चले आते हैं लूटने! इन्हींका हक है हमारी तनखा पर। कहीं अपनी मेहनत की कमाई हम खुद न खर्च कर लें?”
फटे-पुराने जूते जैसा बापू का मुँह झुर्रियल होकर लटका हुआ था। गड्ढों में धँसी आँखों से रिसे पानी को देखकर गिन्नू तड़पकर रह गया, “ठीक कहता है बापू! उन्हीं को लूटा जाता है जिनके पास कुछ नहीं। हम अपने लिए नहीं उनके लिए कमाते हैं। पहले वह सोचता था जिनके पास कुछ है ही नहीं उनसे क्या लूटेगा कोई? लेकिन अब उसे समझ आ गया था कि वे पहले उसे कुछ कर्जा देंगे और फिर कमायेगा वह, और लूटेंगे वे? इस जायज लूट को ब्याज का नाम देते हैं वे।”
तीन साल हो गये उसे चन्दू के ढाबे पर काम करते हुए। पाँच सौ रुपये और दो वक्त की रोटी पर लगा था। आज भी वही मिल रहा है। तीन सालों में उसकी तनखाह एक पैसा भी नहीं बढ़ी थी। बढ़ाने के लिए कहने पर चन्दू खीझ उठता, “पहले पुलिसवाले और लेबर इंस्पेक्टर चार-चार सौ रुपया महीना लेते थे अब बारह-बारह सो देना पड़ रहा है। मैं उनकी बढ़ाऊँ कि तेरी? नहीं देने पर कानून का डण्डा है, तो किसी के पास पैसों का और एक हम हैं कि...?”
बहुत डर लगता था उसे आग से। जब भी वह परेशान होता उससे कोई गलती हो जाती तो चन्दू बिफर उठता, “साले भट्ठी में झोंक दूँगा तुझे!” क्षणभर के लिए वह सिहरकर रह जाता। डरकर वह तन्दूर से निकलतीं लाल-पीली लपटों की ओर देखता। कुछ क्षणों बाद वह लाल-पीली लपटों के अक्स उसकी आँखों में भी उतर आते। उसका मन होता कि कहे—मन तो मेरा हो रहा है कि तुझे धक्का मारकर तन्दूर में गिरा दूँ पर चुप्पी लगा जाता वह।
सुबह गिन्नू के बुरी तरह कराहने की आवाजें सुनकर आँख खुली थी माँ की। गिन्नू के पैर में तेज दर्द था और वह तेज बुखार से तप रहा था। माँ घबरा उठी थी। बापू बस्ती के किसी झोलाछाप डॉक्टर से दस रुपये की दो खुराक दवाई ले आया था। एक खुराक खिलाकर बापू ने गिन्नू से बोला, “आज तू काम पर नहीं जाइयो। अपनी जान पहले काम बाद में...।” माँ को भी बापू ने काम पर जाने से मना कर दिया, “मालकिन बुरा माने तो माने। बच्चा घर में बुखार से तप रहा है? पर उन्हें क्या? तो हमें भी क्या? जबतक इसका बुखार न उतरे तू कहीं मत जाना।”
हमेशा चिड़चिड़ाने और गुस्से में उबलने-उफननेवाले बापू को आज एकाएक इतना नम और नरम देखकर वह हैरान रह गया था!
दवा ने असर दिखाया था। कुछ देर बाद बुखार ढीला पड़ गया था। माँ काम पर चली गयी थी। दोपहर बाद लौटी तो सहज और खुश थी जैसे बहुत बड़ी समस्या निपटकर लौटी हो। वह अपनी मालकिन से पाँच सौ रुपया एडवांस लेकर आयी थी ताकि शाम को लाला राधेश्याम के आदमी आकर उन्हें जलील न कर सकें। पाँच सौ रुपये गिन्नू को पकड़ाकर माँ ने उसे लाला को उसके बँगले पर दे आने को कहा। गिन्नू ने लाला का बँगला देखा हुआ था। एकबार वह बापू के साथ वहाँ से गुजरा था तो बापू ने बाहर से दिखाया था, “ये लाला राधेश्याम का बँगला है।” हैरान रह गया था वह...कितना बड़ा लाल पत्थरों से बना कितना मजबूत घर है!
बँगले के बाहर अहाते में एक ऑफिसनुमा कमरे में उसने अपने बापू का नाम बताकर किश्त जमा करवाई और बँगले से बाहर निकल आया। उसके साथ-साथ लगभग उसीकी उम्र का एक मोटा-ताजा लड़का भी बँगले से निकल रहा था। उसके हाथ में क्रिकेट का बैट था और बँगले के सामनेवाले पार्क में खेलने जा रहा था। उसने ब्राउन रंग के जूते पहने हुए थे। गिन्नू की नजर उन पर पड़ी तो देखता ही रह गया। वह उसके पीछे हो लिया। मोटू पार्क में जाकर खेलने लगा। वह पार्क के गेट पर पहुँचकर ठिठक गया। डरते-सहमते वह पार्क में घुसा। इससे पहले वह कभी किसी पार्क में नहीं घुसा था बल्कि आज पहली बार उसे काम से छुट्टी मिली थी। रोजाना सुबह-शाम बस काम। छुट्टी क्या होती है उसे कुछ पता नहीं था। पार्क की घास-पत्तियाँ, फूल, पौधे, क्यारियाँ देखकर उसे लगा स्वर्ग ऐसा ही होता होगा। उसे अपने इंसान होने का अहसास हो रहा था लेकिन उसे वहाँ अपनी मौजूदगी गुनाह की तरह लग रही थी। उसे लग रहा था वह कोई जुर्म तो नहीं कर रहा? वह पार्क की बेंच पर बैठ गया। मोटू जूते पहने हुए ही खेल रहा था। उसे शायद असुविधा हो रही थी। उसने पार्क की बेंच के पास आकर जूते उतारे और फिर से खेलने में व्यस्त हो गया। हसरतभरी निगाहों से गिन्नू कभी पार्क में खेलते हुए बच्चों को तो कभी बेंच के नीचे एक साइड में पड़े जूतों को देख रहा था। उसका मन हो रहा था कि वह उन जूतों को उठाकर भाग जाये। वैसे भी ये जूते हमारे ही पैसों के हैं। अभी तो इसके बापू को पाँच सौ देकर आ रहा हूँ। कमाएँ हम और मजा लें ये मोटे। गिन्नू ने अपने फटे जूते तुरन्त उतारे और...
पार्क के गेट पर पहुँचकर वह ठिठक गया। उसकी आँखों के सामने माँ और बापू का तमतमाया हुआ चेहरा आ गया—यह चोरी है। लाला चोर है तो मैं भी चोर बन जाऊँ? उसका मन नहीं माना। वापिस लौटकर वह बेंच के पास आकर जूते उतारने लगा। जूतों को अपने पैरों से अलग करते वक्त उसका मन तड़फड़ा रहा था। शायद किसी की नजर उस पर पड़ गयी—ओये क्या कर रहा है? क्षण में उसने अपने-आपको जूतों से अलग किया—कुछ नहीं? खेलना छोड़कर लड़कों ने आकर उसे घेर लिया—तो क्या कर रहा था? थरथर काँपने लगा वह, “मैं तो योंही जूते पहनकर देख रहा था। मुझे भी ऐसे जूते लेने हैं।”
“देख रहा था या चुराकर भाग रहा था साला! मारो साले को...!”
थप्पड़-लात-घूँसों से पीटने लगा वह। वह झुँझलाया, “चोर होता तो भाग न जाता, मुझे भी ऐसे जूते लेने हैं।”
मोटू हँसा, “ऐसे जूते लेने की औकात है? पता है ढाई हजार रुपये के जूते हैं? साला भिखारी की औलाद चोर...!” खींचकर बैट दे मारा मोटू ने उसके।
वह किसी तरह जान बचाकर भाग खड़ा हुआ। वह पूरा दम लगाकर दौड़ रहा था। कुछ देर तक लड़कों ने उसका पीछा किया, फिर रुक गये।
घर लौटकर उसने माँ को कुछ नहीं बताया। उसके माथे पर लगी चोट के बारे में पूछने पर जवाब दिया कि वो भागते-भागते एक साइकिलवाले से टकरा जाने से लगी है। सवालिया निगाहों से देखा था माँ ने उसे। स्पष्ट था कि उसके जवाब से माँ सन्तुष्ट नहीं थी, पर माँ ने बात आगे नहीं बढ़ाई थी।
रात हो गयी थी। बापू देर से लौटा था। अपने मालिक से वह तीन सौ रुपये एडवांस ले आया था। दो सौ रुपयों की उसे अब भी चिन्ता थी। लाला की किश्त दी जा चुकी है, पता चलने पर बापू की एकाएक बाँछें खिल गयीं, "फिर तो इन रुपयों से गिन्नू के लिए जूते ले लेते हैं।"
सूखे की मार झेल रही पपड़ाई दरकी जमीन पर एकाएक बौछार पड़ गयी। घर का माहौल एकाएक खुशनुमा हो गया! गिन्नू की आँखों में नये ब्राउन जूते चमचमाने लगे!
दरवाजे पर धड़धड़ हुई थी, जैसे किसी सांड ने दरवाजे पर टक्कर मारी हो। गिन्नू ने उठकर दरवाजा खोला। सामने लाल जलती हुई आँखों से घूरता नशे में धुत मुच्छड़ पुलिसिया खड़ा था। उसके माथे पर पट्टी बँधी हुई थी और हाथ में डण्डा था।
अन्दर घुसते हुए बोला, "तू ही पत्थर मारकर भागा था न? क्या सोचा था तुझे पकड़ नहीं पाऊँगा? कल तो मैं पट्टी करवाने के चक्कर में रह गया। स्मैकिये ने बताया कि उसने तेरा पीछा चन्दू के ढाबे से किया था। आज मैंने चन्दू से जाके पूछा तो उसने तेरा पता बताया।"
गिन्नू को काटो तो खून नहीं। थरथर काँप रहे थे माँ और बापू! सफाई दी गिन्नू ने, "उल्टा स्मैकिये ने छीने थे मेरे पैसे। मेरे पाँव में तो चोट लगी हुई है। मुझे तो जूते लेने थे।" अपने जख्म दिखाने के लिए उसने अपने पाँव आगे बढ़ाये। पुलिसिये ने उसके पैर पर खींचकर डण्डा मारा। बिलबिलाकर रह गया वह। खड़ा नहीं रह पाया। नीचे बैठे दर्द से छटपटाने लगा। रोना गले में ही जैसे अटक गया। पुलिसिये का डण्डा थमा नहीं था, "तूने मेरा खून निकाला मैं तेरा खून बहा दूँगा।"
पुलिसिये के पाँव पकड़ रहा था बापू। माँ गिड़गिड़ा रही थी, "बच्चा है गलती कर बैठा है। गरीब है...माफ कर दो, आपके पाँव पड़ते हैं।" बिफरे हुए सांड की तरह उसने माँ और बापू पर भी लात और डण्डे बरसाने शुरू कर दिये। बापू ने तीन सौ रुपये उसकी ओर बढ़ाये तो पुलिसिये ने अपनी जेब में रखते हुए कहा, "इनसे क्या होगा? मेरे खून निकला। मुझे पट्टी करवानी पड़ी। कम-से-कम दस हजार निकालो वर्ना...सरकारी बन्दे पर हमला करने के जुर्म में जिन्दगी भर के लिए अन्दर करवा दूँगा।"
गिन्नू से उठा नहीं जा रहा था। शायद उसकी टाँग की हड्डी टूट गयी थी। वो रोते-रोते बोला—आप चन्दू के पास गये थे। उसने बताया तो होगा उसीने मुझे तनखाह के पैसे दिये थे, मैंने किसी से पैसे नहीं छीने...और भी भड़क उठा पुलिसिया, "तेरा मतलब—मैंने छीने...तेरी...!"
गालियाँ बकते हुए पुलिसिये ने पास ही जल रहे स्टोव पर लात दे मारी। स्टोव उलटकर गिन्नू पर आ गिरा। उसके कपड़ों ने आग पकड़ ली। स्टोव पर उबल रही दाल की पतीली गिन्नू के पेट पर आ गिरी। बुरी तरह जल गया वह। बुरी तरह चीखने लगी माँ।
कोठरी में हाय-तौबा, चीख-पुकार मच गयी थी। आग बुझाने की कोशिश करता बापू गिन्नू के तन से कपड़े अलग करने की कोशिश कर रहा था। गिन्नू बेसुध-सा होता जा रहा था। कोठरी के दरवाजे पर ठिठके पुलिसिये को माँ ने जोर से धक्का दिया। वह बाहर जा गिरा। बाहर आसपास के लोगों को जमा देखकर पुलिसिया चुपचाप वहाँ से खिसक लिया। उसके जाने के बाद आसपास के मुर्दा लोगों की साँसें लौटीं। उन्होंने गिन्नू को अस्पताल पहुँचाया था।
गिन्नू आधे से कुछ ज्यादा जल गया था। माँ बाहर खड़ी रो रही थी। बापू उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था। तभी सादी वर्दी में एक काले मोटे आदमी ने बापू को परे ले जाकर कहा, "तुम्हारे ऊपर केस बन रहा है। तुम्हारे लड़के को पुलिसवाले ने स्मैक बेचते हुए देखा। वह तुम्हारे घर की तलाशी लेने गया। स्मैक की पुड़िया बरामद हुई। उल्टा तुमने पुलिसवाले पर हमला कर दिया। हमारे पास गवाह और सब सबूत मौजूद हैं। अब बोलो क्या करना चाहते हो? पुलिस के खिलाफ बयान तो देना मत वर्ना जिन्दगीभर जेल में सड़ोगे। दस-पन्द्रह हजार का इन्तजाम कर लो और मामला रफा-दफा करवा लो। तुम्हारे पास नहीं है तो किसी से उधार ले लो...।"
बापू चीखा, "किसी से उधार-वुधार नहीं लूँगा। बेशक डाल दो जेल में...! जो सच है वही बोलूँगा!"
अस्पताल के बेड पर लेटा गिन्नू आँखें खोलता तो उसे ग्लूकोज की थैली पिचके हुए जूते जैसी नजर आती...! आँखें बन्द करता तो उसे लगता राक्षसी चेहरोंवाले लाला के बन्दे चन्दू और पुलिसिये ने मिलकर उसे जलती हुई भट्ठी में लटका रखा है। फिर आँखें खोलता, तो उसकी आँखों से आग निकलने लगती!