Book Review-Allahabad Passanger in Hindi Book Reviews by Prafulla Kumar Tripathi books and stories PDF | पुस्तक समीक्षा - इलाहाबाद पैसेंजर

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पुस्तक समीक्षा - इलाहाबाद पैसेंजर

युवाओं के सपनों के शहर का आईना है - “इलाहाबाद पैसेंजर “

​​ लगभग उन्हीं दिनों (वर्ष 2026) में यह पुस्तक छप कर सामने आई है जिन दिनों में वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया का उपन्यास “जीते जी इलाहाबाद” को साहित्य अकादमी अवार्ड मिला है और उसको लेकर साहित्य जगत में भिन्न - भिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं | इलाहाबाद की साहित्यिक - सामाजिक चर्चा हो और उस पर भिन्न भिन्न प्रतिक्रियाएं सामने ना आएं यह हो ही नहीं सकता है | इलाहाबाद वैचारिक समर भूमि रहा है और इसीलिए उसकी अलग पहचान बनी हुई है |

                  लेखक श्री संजीव रॉय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं|छात्र जीवन को उन्होंने जिया है और शब्दों के माध्यम से उस दौर का जीवंत चित्रण इस पुस्तक में किया है |आमुख में ही उन्होंने पुस्तक समर्पण के साथ पुस्तक के सार का परिचय इन शब्दों में दे दिया है –“ इलाहाबाद विश्व- विद्यालय के दोस्तों,गुरुजनों और शहर को जो संघर्ष ,हंसी,उदासी,बहस जज्बे और जिजीविषा के गवाह रहे हैं और जिनसे हमारे सपने और मूल्य बुने गए |उस परंपरा को जहना जूनियर सीनियर और दोस्ती का रिश्ता समय के ताप से पिघला नहीं है और अभी भी अपनी बुनियाद पर कायम है |”शिक्षाविद और साहित्यकार सर्वेद् विक्रम ने उपन्यास की संस्तुति करते हुए एकदम सही लिखा है कि ‘ इस कथा यात्रा में युवा हरी प्रसाद के एच. पी.  बनने के संघर्ष, बदलाव और अंदर का खालीपन आपको देर तक पकड़े रहती है |” पुस्तक पढ़ने के बाद मैंने भी स्वयं को एच. पी. नामक मुख्य चरित्र से अपने आपको महीनों जुड़े पाया और आज पुस्तक की समीक्षा लिखते हुए भी वही एच. पी. ज़ेहन में छाए हुए हैं | इसकी एक वजह यह भी है कि सत्तर से नब्बे के दशक में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से निकले मेरे कुछ युवा परिचितों-रिश्तेदारों के व्यक्तित्व में एच.पी. सरीखे गुण विकसित हुए थे और वे भी आज देश की सरहद की सीमा लांघ कर अमेरिका जैसे विकसित देशों में अपनी प्रतिभा का योगदान दे रहे हैं | गाँव करम्मर जिला बलिया के ही गदाधर प्रसाद शुक्ला उर्फ़ जी. पी. उनमें से एक हैं जिनकी छात्र जीवन के दौरान पहचान शिखा सूत्र वाले युवा बाभन की  बनी रही |वहीं पढे और वहीं पढ़ाए और वहीं रहते हुए आई. ए. एस. हुए और चीफ सेक्रेटरी पद पर रहते हुए स्वयं सेवानिवृत्ति ले लिए और अमेरिका जाकर बस गए |

           27 मार्च को रामनवमी के दिन मुझे यह पुस्तक मिली  और इसे पढ़ने में मैं डूब गया |पूरब का आक्सफोर्ड कहे जाने वाले इस संस्थान से मैं तो नहीं जुड़ा रहा किन्तु जितनी देर तक मैं इस पुस्तक को पढ़ता रहा ऐसा लगा कि इस पैसेंजर ट्रेन में चढ़े यात्रियों का मैं भी एक  हिस्सा हूँ |अपने जीविका निर्वहन के अल्पकालिक प्रवास में मैंने भी इलाहाबाद को जिया है उसकी धड़कनों  को महसूस किया है |किस्सागोई शैली में लिखे गए इस उपन्यास में लेखक ने अपने जूनियर और सीनियर लोगों को भरपूर सम्मान देते हुए उनकी चर्चा की है |पढ़ने के तारतम्य में ऐसा लागता रहा कि ये चरित्र आस पास ही हों |

        वर्ष 1988 में कथा नायक हरि प्रताप का ऐडमीशन होता है और वह अपने मित्रों में एच. पी . के नाम से जाना जाने लगता है |हास्टल का चक्रव्यूह भेद पाने में असफल होकर कभी इस कमरे में तो  कभी उस कमरे में डेरा  डालते हैं|इलाहाबाद में बने रह कर कुछ बनने का सपना पालते हैं लेकिन वहीं वह यह भी देख रहे हैं कि कितने संगी साथियों का आई. ए. एस. या पी . सी. एस.. बनने का सपना चकनाचूर होता  जा रहा है और वे या तो कोचिंग का हिस्सा बन जाते हैं या फिर राजनीति या वकालत करने लगते हैं |सभी की चिंता, सभी का संघर्ष, सभी की चुनौतियाँ सामूहिक हैं और सभी उससे निपटने में पिले  पड़े हैं |इलाहाबादी  बोली और भोजपुरिया लहजे का जगह जगह प्रयोग स्वाभाविकता उत्पन्न करता है |

             उपन्यास की किस्सा गो शैली लुभावनी है|जैसे-“दो तीन महीने के बाद डेलीगेसी के छात्र समझ जाते कि अब खाना नहीं बनाया तो हाथ अगरबत्ती और पैर मोमबत्ती हो जाएगा |” और यह भी कि “एच पी और निरंजन दोनों शाम को साथ साथ पास के लेबर चौराहा जाते ,सब्जी यंदा,दूध,पावरोटी(ब्रेड)वगैरा लाते|दिन में बी-डी-सी अर्थात भात दाल चोखा बनता  तो शाम को . . .।“निजी और छात्र जीवन के संघर्षों से जूझते एच. पी. के लिए टूरिस्ट गाइड के रुप में कुम्भ मेला में अपनी सेवा देना सिर्फ़ कमाने खाने और इलाहाबाद में बने रहने का एक कारण ही नहीं बन जाता है बल्कि उसके नैराश्य जीवन में आशा की एक किरण भी बनकर आता है | लंदन से आई एक पर्यटक एमी पटेल से उसकी निकटता उसके जीवन के सादे कैनवास में रंग भर देती है और नि:संदेह यहीं से उपन्यास “इलाहाबाद पैसेंजर” एक रोमांचक मोड़ पर पहुँच जाता है जिसकी चर्चा मैं जानबूझ कर इसलिए नहीं कर रहा हूँ कि जिससे पाठकों का क्रेज बना रहे |

​​​कुल 170 पृष्ठ के इस उपन्यास में देश, काल, पात्र बहुत खूबसूरती से उभर कर आए हैं|इलाहाबाद यूनिवर्सिटी ,छात्र  समाज और उसके मुहल्ले जीवंत हो उठे हैं|शायद इसीलिए लेखक का यह कहना शत प्रतिशत सही है कि ‘जानते हो बे ,जीवन में कितना भी बड़ा पद, प्रतिष्ठा या पैसा मिल जाए कुछ चीजों के छूट जाने का दुख हमेशा बना रहता है |”

पुस्तक-इलाहाबाद पैसेंजर /

मूल्य-रु.299/-/

प्रकाशक-मंजुल कथाकार