__मौन के पार से आई खबर___
बच्चों के मन में उत्पन्न सवालों को नारायणी अक्सर इधर उधर की बातें कर टालने का प्रयास करती।
नारायण के बिन पहले कुछ दिन बीते, फिर सप्ताह और महीने...धीरे-धीरे चार वर्ष बीत चुके थे पर उसकी कोई खबर नहीं मिली।
इसी शर्म और गांव वालों की आलोचनाओं के कारण नारायणी न तो ससुराल जाती और न ही अपने मायके...।
बस फोन पर ही दोनों परिवारों का हाल चाल जान लिया करती ।
गर्मी की छुट्टियों में सभी बच्चे अपने अपने दादी - नानी गांव, कोई मौसी के यहां तो कोई बुआ या अन्य रिश्तेदारों के घर घूमने जाया करते और छुट्टियां समाप्त होने पर स्कूल में आकर बड़े चाव से सब बताते।
हमने ये खाया,वो पिया, झूला झूले, बाग-बगीचा,खेत- दुआर इत्यादि के सौंदर्य का वर्णन ऐसे करते जैसे जीवन में पहली बार देखा हो। एक बच्चे ने तो घोड़े- बैल हाथी का जिक्र कर दिया तब से ही रौनक गांव जाने की जिद करने लगा।वैसे भी बच्चे जब बड़े हो जाए तो अक्सर बिना कारण ही जिद करने लग जाते हैं ।
पर नारायणी मां थी, वह जानती थी बच्चों के इस जिद के पीछे का कारण।
लेकिन वह मजबूर थी।
कैसे सामना करती इस परिस्थिति का?
कैसे मिलाती बच्चों से नज़रें…?
और सबसे बड़ा सवाल – क्या जवाब देती? आखिर क्यों नारायण उसे और उसके बच्चे को इस हाल में छोड़ कर चला गया और कहां गया होगा..कोई अनबन भी तो नहीं हुई थी।
कौन यकीन करेगा… कि सिर्फ एक मौन ने मेरी पूरी दुनिया उजाड़ दी।
इसी कारण वह रौनक की बातों उसके गांव जाने की जिज्ञासा को अनदेखा कर पत्थर बन जाया करती ।
झूनिया और रुणिया अब 12 वर्ष की हो चुकी थी पर थी तो भावी स्त्री ही।
मां की ममता,उदास चेहरा,उनकी कोमलता और उनकी कठोरता को धीरे धीरे दोनों बच्चियां समझने योग्य होने लगी थी ।
वह मां से एकांत में अक्सर कहा करती,
"पापा छोड़ गए हमे इसी लिए उदास हो न?" पर नारायणी बात को टाल देती तो कभी उन्हें झुठला देती।
"न गे वो छोड़ के कहां गए है वह तो गांव में है ,वहां रह के गाय गेरू खेत पैदावार सब व्ही न देख रहे हैं..।"
नारायणी की आंखे चमक उठी शायद अश्रु के कुछ बूंद उसकी आंखों में सैलाब लाने वाले थे।
तब तक फोन की घंटी बजी मोबाइल के स्क्रीन पर लिखा था शकुंतला मौसी..।
"हेलो नारायणी..?!"
हां मौसी प्रणाम की हाल..?(नारायणी ने कहा)
"प्रणाम पाती छोड़..हम पाहुन के देखलउ हैं.."
का..?!(नारायणी हड़बड़ा गई उसके सीने में जैसे कोई करेंट दौड़ गया..., धड़कने बढ़ गई...,हाथ कंपकंपाने लगे और जुबान लड़खड़ाने..)
उधर से आवाज आई
हड़बड़ाओ नहीं दीदी..(शायद मौसी का बड़का बेटा फोन ले लिया)
पाहुन एहिजे छथिन पुरनका मठ मे...,उन्होंने मुझे नहीं देखा लेकिन वो फुआ का बेटा जो मेरे साथ तुम्हारे तिलक में गया था वो भतीजे के मुंडन में देवता पूजने गया हुआ था वहां।
वहीं लंबे दाढ़ी मूंछ और भगवा वस्त्र के साथ पाहुन बैठे थे।
इतना सुनते ही नारायणी के हाथों से फोन छूट कर कुछ क्षण तक फर्श पे नाचता रहा जिसमें से लगातार आ रहीं आवाजें दूर होती जा रही थी।
"हेलो,हेलो दीदी सुन रही ही न"
जैसे उसके हाथों से सिर्फ फोन नहीं, चार साल की थमी हुई उम्मीद भी छूट कर गिर पड़ी हो…