मैंने दुःख जताते हुए कहा,
“हाँ छोटे भाई… अब लोगों के अंदर इंसानियत जैसे खत्म होती जा रही है…”
आर्यन ने हल्की सी मुस्कान लाने की कोशिश की,
लेकिन उसकी आँखों का दर्द साफ दिखाई दे रहा था…
वह बोला,
“छोड़िए… ये सब मेरी पुरानी बातें हैं…”
अंकिता तुरंत बोली,
“नहीं… ये सिर्फ तुम्हारी बातें नहीं हैं… ये दर्द अब हमारा भी है…”
मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा,
“तुम अब अकेले नहीं हो, आर्यन… हम सब तुम्हारे साथ हैं…”
आर्यन ने पहली बार थोड़ा सुकून महसूस किया…
उसने धीमे से सिर हिला दिया…
तभी अचानक कमरे के अंदर से हल्की सी आवाज़ आई…
“प… पानी…”
हम तीनों एकदम चौंक गए…
अंकिता घबराकर बोली,
“भैया… ये आवाज़… भाभी की है क्या…?”
मैं बिना एक पल गंवाए कमरे की तरफ दौड़ा…
दरवाज़ा थोड़ा सा खुला था…
मैंने अंदर झाँका—
प्रियांशी की उंगलियाँ हल्की-हल्की हिल रही थीं…
मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई…
“प्रियांशी…!” मैंने धीरे से आवाज़ दी…
उसने बहुत मुश्किल से अपनी आँखें खोलीं…
उसकी नज़र सीधे मुझ पर पड़ी…
कमज़ोर सी आवाज़ में वह बोली,
“तुम… ठीक हो न…?”
यह सुनकर मेरी आँखें भर आईं…
मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा,
“मुझे कुछ नहीं हुआ… तुम बस जल्दी ठीक हो जाओ…”
अंकिता भी दौड़कर अंदर आई,
“भाभी… आपको होश आ गया…!”
आर्यन दरवाज़े पर खड़ा सब देख रहा था…
उसके चेहरे पर पहली बार सच्ची मुस्कान आई…
लेकिन…
उसी पल… डॉक्टर तेजी से अंदर आए और बोले—
“रुकिए… अभी मरीज को ज्यादा बात नहीं करने देना है…”
उन्होंने हमें थोड़ा पीछे किया…
“इनकी हालत अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है…”
मैंने घबराकर पूछा,
“डॉक्टर… सब ठीक तो है न…?”
डॉक्टर ने गंभीर होकर कहा—
“अभी कुछ कहना जल्दी होगा…
अगले 24 घंटे बहुत महत्वपूर्ण हैं…”
मैंने धीरे से सिर हिलाया…
फिर प्रियांशी के पास गया…
मैंने उसके हाथों को अपने हाथों में लिया…
और हल्के से दबाकर उसे इशारे से शांत कराया…
अपने चेहरे पर एक जबरदस्ती की मुस्कान लाते हुए मैं बोला,
“अरे पगली… कुछ नहीं हुआ है… बस छोटा सा ज़ख्म है…”
“देखना… तुम जल्दी बिल्कुल ठीक हो जाओगी…”
प्रियांशी मुझे चुपचाप देख रही थी…
उसकी आँखों में अब डर कम… और भरोसा ज्यादा था…
मैंने थोड़ा मज़ाक करते हुए कहा,
“और हाँ… जब ठीक हो जाओगी न… तो फिर हम घूमने चलेंगे…
इस बार बिना किसी टेंशन के…”
यह सुनते ही उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई…
जैसे दर्द के बीच उसे एक सुकून मिल गया हो…
तभी आर्यन भी धीरे-धीरे पास आया…
और मुस्कुराते हुए बोला,
“अरे दीदी… जल्दी ठीक हो जाओ…”
“मुझे भी आप लोगों के साथ घूमने जाना है…”
“ये तो बस छोटा सा ज़ख्म है… आप तो बहुत स्ट्रॉन्ग हो…”
प्रियांशी ने हल्की सी नजर उठाकर आर्यन को देखा…
और बहुत धीमी आवाज़ में बोली,
“थैंक यू…”
कमरे का माहौल अब पहले से थोड़ा हल्का हो गया था…
लेकिन…
मेरे दिल के अंदर अभी भी एक अजीब सा डर बाकी था…
मैंने धीरे से कहा,
“प्रियांशी… तुम आराम करो… मैं बाहर जाकर कुछ खाने के लिए ले आता हूँ… शाम भी होने वाली है…
अंकिता तुम्हारे पास ही रहेगी…”
इतना कहते ही प्रियांशी ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया…
उसने हल्के से सिर हिलाया…
और धीमी आवाज़ में बोली,
“नहीं… आप अभी कहीं मत जाइए…”
उसकी आवाज़ में डर भी था… और एक अजीब सा लगाव भी…
मैं कुछ पल उसे देखता रहा…
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला,
“ठीक है… नहीं जाता… यहीं रुकता हूँ…”
यह सुनते ही उसने धीरे से अपनी पकड़ ढीली कर दी…
जैसे उसे सुकून मिल गया हो…
मैं उसके पास ही बैठ गया…
उसका हाथ अपने हाथों में लिए…
कमरे में हल्की सी खामोशी थी…
लेकिन उस खामोशी में भी एक अपनापन था…
तभी डॉक्टर अंदर आए…
उन्होंने एक नज़र प्रियांशी पर डाली…
और फिर नर्स को इशारा किया…
नर्स आगे बढ़ी…
और धीरे से प्रियांशी के हाथ में पानी की बोतल (ड्रिप) लगा दी…
प्रियांशी हल्का सा सिहर गई…
मैंने तुरंत उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया…
“डर मत… मैं यहीं हूँ…” मैंने धीरे से कहा…
उसने मेरी तरफ देखा…
और बिना कुछ कहे… बस आँखें बंद कर ली…
लेकिन…
उसके चेहरे पर अब डर नहीं…
बल्कि एक सुकून था…
ड्रिप लगने के कुछ ही देर बाद प्रियांशी की पलकों पर नींद उतरने लगी…
और धीरे-धीरे वह गहरी नींद में चली गई…
मैं कुछ देर उसे देखता रहा…
फिर चुपचाप उठकर हॉस्पिटल के बाहर चला गया…
बाहर से मैंने थोड़ा खाने-पीने का सामान लिया…
और वापस आ गया…
मैंने आर्यन की तरफ देखते हुए कहा,
“आओ… तुम भी कुछ खा लो…”
आर्यन हल्का सा मुस्कुराया और बोला,
“नहीं भैया… आप लोग खाओ… मैं अब घर जा रहा हूँ…”
“शाम भी हो गई है… और आपकी ट्रेन भी छूट गई होगी…”
मैंने हल्की सांस लेते हुए कहा,
“हाँ… आज तो हमारी ट्रेन भी छूट ही गई… 2 बजे की थी…”
आर्यन बोला,
“चलो भैया… मैं चलता हूँ…”
मैंने तुरंत कहा,
“अरे नहीं… अभी रुको… पहले हमारे साथ खाना खा लो… फिर जाना…”
वह फिर मना करने लगा,
“नहीं भैया… आप लोग खाओ… मैं घर जाकर खा लूंगा…”
तभी अंकिता थोड़ा सख़्ती से बोली,
“नहीं… इतना सब करने के बाद तुम बिना खाए कहीं नहीं जाओगे…”
उसने पानी की बोतल उसकी तरफ बढ़ाई,
“लो… पहले हाथ धो लो…”
आर्यन कुछ पल उसे देखता रहा…
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला,
“ठीक है दीदी…”
वह जाकर हाथ धोने लगा…
हम भी अपने हाथ धोकर वापस आए…
फिर हम तीनों वहीं बैठकर खाना खाने लगे…
कमरे में एक अजीब सा सुकून था…
कुछ देर पहले जहाँ डर और अफरा-तफरी थी…
वहीं अब अपनापन और शांति थी…
लेकिन…
मेरी नजर बार-बार प्रियांशी पर जा रही थी…
वह शांति से सो रही थी…
और मैं मन ही मन बस यही दुआ कर रहा था—
अब सब सच में ठीक ही रहे…
खाना खाने के बाद आर्यन धीरे से खड़ा हुआ…
“ठीक है भैया… अब मैं चलता हूँ…” उसने कहा।
फिर उसने जेब से एक कागज़ निकाला और मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोला,
“अगर ज़रूरत पड़े तो… ये मेरे पापा का नंबर है… कॉल कर लेना…”
मैं हल्का सा मुस्कुराया,
“अरे… मैं तो खुद तुमसे नंबर माँगने वाला था… और तुमने खुद ही दे दिया…”
अंकिता भी पास आ गई…
मैंने कहा,
“अंकिता… इसका नंबर नोट कर लो…”
अंकिता ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला,
“हाँ… बोलो आर्यन…”
आर्यन ने नंबर बताया…
और अंकिता ने उसे सेव कर लिया…
कुछ पल के लिए हम तीनों चुप खड़े रहे…
फिर मैं और आर्यन साथ में हॉस्पिटल के बाहर निकल आए…
बाहर हल्की ठंडी हवा चल रही थी…
शाम अब ढल चुकी थी…
हम दोनों धीरे-धीरे ऑटो स्टैंड की तरफ बढ़ने लगे…
चलते-चलते मैंने पूछा,
“आर्यन… तुम अकेले जाओगे, ठीक रहेगा न…?”
वह हल्का सा मुस्कुराया,
“भैया… अब डरना मैंने छोड़ दिया है…”
मैं उसकी बात सुनकर कुछ पल के लिए चुप हो गया…
उसकी उम्र छोटी थी…
लेकिन हालात ने उसे बहुत बड़ा बना दिया था…
हम ऑटो के पास पहुँच गए…
आर्यन मुड़ा…
और मेरी तरफ देखते हुए बोला—
“भैया… दीदी का ध्यान रखना…”
मैंने बिना एक पल गंवाए कहा,
“अपनी जान से भी ज्यादा…”
वह मुस्कुराया…
और धीरे-धीरे वहाँ से चला गया…
मैं वहीं खड़ा उसे जाता हुआ देखता रहा…