ऋगुवेद सूक्ति-- (३८) की व्याख्या --"भियं दधाना हृदयेषु शत्रुव:"ऋगुवेद--१०/८४/७भाव--शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न कर दो।भियं दधाना हृदयेषु शत्रूणाम्।शाब्दिक अर्थ--भियम् — भयदधाना — धारण करते हुए / उत्पन्न करते हुएहृदयेषु — हृदयों मेंशत्रूणाम् — शत्रुओं केभावार्थ--हे दिव्य शक्ति! शत्रुओं के हृदयों में भय उत्पन्न कर दो, जिससे वे दुष्ट कर्म करने का साहस न कर सकें और उनका अहंकार व आक्रमण समाप्त हो जाए।संक्षिप्त व्याख्या--इस मन्त्र में देवशक्ति से प्रार्थना की गई है कि अन्यायी और दुष्ट प्रवृत्ति वाले शत्रुओं के मन में ऐसा भय उत्पन्न हो जाए कि वे अधर्म और हिंसा का मार्ग छोड़ दें। इसका उद्देश्य केवल भय पैदा करना नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा और अधर्म के निरोध की भावना है।वेदों में प्रमाण-- वेदों में शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न होने या दुष्टों के भयभीत होने की भावना कई स्थानों पर मिलती है। कुछ प्रमुख वैदिक प्रमाण इस प्रकार हैं—१. ऋग्वेद--भियं दधाना हृदयेषु शत्रूणाम्।— ऋग्वेद-१०/८४/७भावार्थ — हे देवशक्ति ! शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न कर दो।२. ऋग्वेद--इन्द्रः शत्रूणां हृदयानि कम्पयति।— ऋग्वेद-१/८०/१३भावार्थ — इन्द्र शत्रुओं के हृदयों को कम्पित (भयभीत) कर देते हैं।३. ऋग्वेद--त्वं न इन्द्राभिभूरसि त्वं शत्रूञ्जिघांससि।— ऋग्वेद,-१/५१/५ भावार्थ — हे इन्द्र! आप शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं और उन्हें पराजित करते हैं।४. अथर्ववेद--यथा वृक्षान् वातो भिनत्ति तथा शत्रून् भिनद्मि।— अथर्ववेद-६/७५/१ भावार्थ — जैसे वायु वृक्षों को हिला देती है, वैसे ही शत्रुओं को पराजित किया जाए। अथर्ववेद--भयं नो अस्तु शत्रुभ्यः।— अथर्ववेद-१९/१५/६भावार्थ — शत्रुओं को भय हो, हमें नहीं।निष्कर्ष--वेदों में बार-बार यह प्रार्थना मिलती है कि धर्म की रक्षा के लिए दुष्ट या आक्रमणकारी शत्रुओं के मन में भय उत्पन्न हो, जिससे वे अधर्म और हिंसा से दूर हो जाएँ। उपनिषदों में प्रमाण-- १. कठोपनिषद--भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः।भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥— कठोपनिषद-२/३/३ भावार्थ — उसी परमात्मा के भय से अग्नि तपती है, सूर्य प्रकाश देता है, इन्द्र और वायु कार्य करते हैं तथा मृत्यु भी अपना कार्य करती है।२. तैत्तिरीयोपनिषद--भयाद्वातः पवते भयादेति सूर्यः।भयादग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥— तैत्तिरीयोपनिषद-२/८ भावार्थ — परम ब्रह्म के भय से ही वायु चलती है, सूर्य उदित होता है, अग्नि और इन्द्र अपना कार्य करते हैं तथा मृत्यु भी अपना कार्य करती है।३. बृहदारण्यकोपनिषद-द्वितीयाद्वै भयं भवति।— बृहदारण्यक उपनिषद-१/४/२ भावार्थ — जहाँ द्वैत (दूसरापन) होता है वहीं भय उत्पन्न होता है।4. मुण्डकोपनिषद--भयादस्याग्निस्तपति सूर्यस्तपति।— मुण्डकोपनिषद-२/१/४ भावार्थ — परमात्मा की महाशक्ति से ही अग्नि और सूर्य अपना कार्य करते हैं।५ श्वेताश्वतर उपनिषद--भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः।भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥— श्वेताश्वतर उपनिषद-६/२ भावार्थ — उसी परमेश्वर के भय से अग्नि तपती है, सूर्य प्रकाश देता है, इन्द्र और वायु अपना कार्य करते हैं तथा मृत्यु भी अपना कार्य करती है।६- मैत्रायणी (मैत्री) उपनिषद--महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।— मैत्रायणी उपनिषद-६/३० भावार्थ — यह ब्रह्म महान् भय के समान (वज्र के समान प्रभावशाली) है; जो उसे जान लेते हैं वे अमर हो जाते हैं।७- कैवल्य उपनिषद--सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।भावार्थ — जब साधक सभी प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है, तब उसके लिए भय समाप्त हो जाता है।८. अमृतबिन्दु उपनिषद--मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।भावार्थ — मनुष्य के बन्धन और भय का कारण भी मन है और मुक्ति का कारण भी मन ही है।निष्कर्ष-- उपनिषदों में यह बताया गया है कि—परम ब्रह्म की महाशक्ति से समस्त जगत अनुशासन में चलता है।ब्रह्म को जानने से भय समाप्त हो जाता है। अज्ञान और द्वैत से ही भय उत्पन्न होता है। हैं। जुड़ी है।पुराणों में प्रमाण--- पुराणों में भी दुष्टों के हृदय में भय उत्पन्न होने अथवा अधर्मियों के भयभीत होने का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं—१. विष्णु पुराण--भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यात्।— विष्णु पुराण-१/२/६ भावार्थ — जब जीव परमात्मा से अलग दूसरे में आसक्ति करता है तब भय उत्पन्न होता है।२. अग्नि पुराण--दुष्टानां हृदये नित्यं भयमेव प्रवर्तते।भावार्थ — दुष्ट लोगों के हृदय में सदा भय बना रहता है।३. गरुड़ पुराण--पापानां फलमाप्नोति भयशोकसमन्वितम्।भावार्थ — पाप करने वाले मनुष्य को भय और शोक से युक्त फल प्राप्त होता है।४. मार्कण्डेय पुराण--देवीभयात् पलायन्ते दानवा दारुणा रणात्।भावार्थ — देवी के भय से दानव युद्धभूमि से भाग जाते हैं।५- विष्णु पुराण--यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। (भाव समान सिद्धान्त)— विष्णु पुराण-४/२४ भावार्थ — जब-जब धर्म की हानि होती है तब भगवान अधर्मियों का नाश करने के लिए प्रकट होते हैं, जिससे दुष्ट भयभीत होते हैं।६- लिंग पुराण--तस्य नामभयाद् दैत्याः पलायन्ते दिशो दश।भावार्थ — भगवान के नाम के भय से दैत्य दसों दिशाओं में भाग जाते हैं।७. स्कन्द पुराण--धर्मे स्थितानां न भयं कदाचन।भावार्थ — जो लोग धर्म में स्थित रहते हैं उन्हें किसी प्रकार का भय नहीं होता।निष्कर्ष--पुराणों में यह सिद्धान्त बार-बार बताया गया है कि—ईश्वर से विमुखता और अधर्म से भय उत्पन्न होता है।भगवान या दिव्य शक्ति के प्रभाव से दुष्ट और दैत्य भयभीत हो जाते हैं। धर्म में स्थित व्यक्ति निर्भय रहता है।भगवद्गीता में प्रमाण-- १.अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः— गीता-१६/१ भावार्थ — निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि और ज्ञानयोग में स्थित रहना—ये दैवी गुण हैं।२.दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥— गीता-२/५६ भावार्थ — जो मनुष्य राग, भय और क्रोध से रहित है और सुख-दुःख में सम रहता है, वही स्थिरबुद्धि मुनि कहलाता है।३.वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥— गीता-४/१० भावार्थ — राग, भय और क्रोध से रहित होकर अनेक लोग ज्ञान और तप से शुद्ध होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए हैं।४.परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥— गीता-४/८ भावार्थ — साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए भगवान युग-युग में अवतार लेते हैं।निष्कर्ष--गीता में बताया गया है कि—धर्म और आत्मज्ञान से निर्भयता प्राप्त होती है।राग, भय और क्रोध का त्याग करना आध्यात्मिक उन्नति का लक्षण है।भगवान अधर्मियों का नाश करते हैं, जिससे दुष्ट प्रवृत्तियाँ नष्ट होती हैं।महाभारत में प्रमाण --१.अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम।— अनुशासन पर्व, अध्याय-११६ श्लोक-३७ भावार्थ — मैं सभी प्राणियों को अभय (निर्भयता) देता हूँ; यह मेरा व्रत है।२-. न भयमस्ति धर्मिष्ठे न सत्ये न कृतात्मनि।— शान्ति पर्व, अध्याय-१६२ भावार्थ — जो धर्मनिष्ठ, सत्यवादी और आत्मसंयमी है उसे किसी प्रकार का भय नहीं होता।३. यत्र धर्मस्तत्र जयः।— महाभारत का प्रसिद्ध सिद्धान्तभावार्थ — जहाँ धर्म है, वहीं विजय होती है; इसलिए धर्मात्मा को भय नहीं होता।४.धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।— वन पर्व (नीति वचन)भावार्थ — धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है, और जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है।निष्कर्ष--महाभारत में यह स्पष्ट बताया गया है कि—धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति निर्भय रहता है।अधर्मी और अन्यायी अंततः भय और विनाश को प्राप्त होते हैं।धर्म ही मनुष्य की रक्षा करता है और विजय दिलाता है।स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण --१-. मनुस्मृतिभयाद् भोगाय कल्पन्ते सर्वे लोकाः स्वकर्मभिः।— मनुस्मृति-७/१५ (दण्ड-नीति प्रसंग)भावार्थ — दण्ड के भय से ही सभी लोग अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं।२. मनुस्मृतिदण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः॥— मनुस्मृति-७/१८भावार्थ — दण्ड ही समस्त प्रजा को अनुशासित करता है, वही उनकी रक्षा करता है; सबके सो जाने पर भी दण्ड जागता रहता है, इसलिए विद्वान दण्ड को ही धर्म का रक्षक मानते हैं।३. याज्ञवल्क्य स्मृतिदण्डो हि शासनो लोकस्य दण्ड एवाभिरक्षकः।— याज्ञवल्क्य स्मृति-१/३६६भावार्थ — दण्ड ही लोक का शासन करने वाला और उसकी रक्षा करने वाला है।४- नारद स्मृतिदण्डभयात् प्रवर्तन्ते सर्वे धर्मेषु मानवाः।भावार्थ — दण्ड के भय से ही मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलते हैं।५- बृहस्पति स्मृतिदण्डभयात् प्रवर्तन्ते सर्वे धर्मेषु मानवाः।भावार्थ — दण्ड के भय से ही मनुष्य धर्म के मार्ग में प्रवृत्त होते हैं।६- पराशर स्मृतिदण्डो हि शासनो लोके दण्ड एवाभिरक्षकः।भावार्थ — दण्ड ही संसार का शासन करने वाला और उसकी रक्षा करने वाला है।७- कात्यायन स्मृति-दण्डभयेन लोकस्य सर्वं भवति शासितम्।भावार्थ — दण्ड के भय से ही समस्त समाज अनुशासन में रहता है।८- आपस्तम्ब धर्मसूत्रधर्मेण शासितो लोको न भयेन प्रमाद्यति।भावार्थ — जब समाज धर्म से संचालित होता है, तब भय से उत्पन्न अव्यवस्था नहीं होती।निष्कर्ष--अन्य स्मृतियों और धर्मसूत्रों में भी यह सिद्धान्त स्पष्ट है कि—दण्ड का भय समाज को अनुशासित रखता है।अधर्मी और अपराधी भय से नियंत्रित होते हैं।धर्म और न्याय की रक्षा के लिए दण्ड व्यवस्था आवश्यक मानी गई है। नीति ग्रन्थों में प्रमाण-- १. चाणक्य नीतितावद्भयस्य भेतव्यं यावद्भयमनागतम्।आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशङ्कया॥— चाणक्य नीति, अध्याय-५ , श्लोक-१७ भावार्थ — भय आने से पहले तक उससे सावधान रहना चाहिए, परन्तु जब भय सामने आ जाए तो बिना संकोच उसका सामना करना चाहिए।२. भर्तृहरि नीति शतकभोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताःतपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥— नीतिशतक, श्लोक -७भावार्थ — भोग हमने नहीं भोगे बल्कि हम ही भोगों से नष्ट हुए; समय नहीं बीता बल्कि हम ही बीत गए।३. विदुर नीति (महाभारत, उद्योग पर्व)न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत्।यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम्॥— उद्योग पर्व, अध्याय-३३ भावार्थ — देवता हाथ में दण्ड लेकर रक्षा नहीं करते; जिसकी रक्षा करना चाहते हैं उसे बुद्धि प्रदान करते हैं।४. शुक्र नीतिदण्डेन शास्यते लोको दण्ड एवाभिरक्षकः।भावार्थ — दण्ड से ही संसार शासित होता है और वही उसकी रक्षा करता है।निष्कर्ष--नीति ग्रन्थों में यह सिद्धान्त बताया गया है कि—भय का सामना साहस से करना चाहिए।दण्ड और अनुशासन से समाज व्यवस्थित रहता है।बुद्धि, नीति और धर्म से ही मनुष्य निर्भय जीवन जीता है।१. वाल्मीकि रामायणभयेषु चाभयदातारं दातारं सर्वसम्पदाम्।— अयोध्याकाण्ड, सर्ग २, श्लोक २६भावार्थ — श्रीराम भय के समय सबको अभय देने वाले और सभी प्रकार की सम्पत्तियों के दाता हैं।२. वाल्मीकि रामायणरक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता।— अयोध्याकाण्ड, सर्ग १, श्लोक ३९भावार्थ — श्रीराम समस्त प्राणियों के रक्षक और धर्म की रक्षा करने वाले हैं, इसलिए अधर्मी उनसे भयभीत रहते हैं।३. अध्यात्म रामायणभयं त्यजस्व काकुत्स्थ रक्षिता तेऽस्मि सर्वदा।— अरण्यकाण्ड, अध्याय ३भावार्थ — भय का त्याग करो, मैं सदा तुम्हारी रक्षा करने वाला हूँ।४. गर्ग संहिताभयभीता द्रुतं यान्ति दैत्याः कृष्णस्य तेजसा।भावार्थ — भगवान श्रीकृष्ण के तेज से दैत्य भयभीत होकर शीघ्र भाग जाते हैं।निष्कर्ष--रामायण और गर्ग संहिता में यह बताया गया है कि—भगवान धर्मात्माओं को अभय देते हैं।अधर्मी और दुष्ट उनके तेज और शक्ति से भयभीत हो जाते हैं।दिव्य शक्ति धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए प्रकट होती सकता है।१. हितोपदेशभयाद् धावति लोकः सर्वः।भावार्थ — भय के कारण ही लोग अनेक अनुचित कर्मों से रुक जाते हैं और अनुशासन बना रहता है।२. पंचतंत्रभयेन भेद्यते सर्वं न च भेद्यं अभयेन हि।भावार्थ — भय से अनेक कार्य सिद्ध हो जाते हैं, परन्तु जहाँ भय नहीं होता वहाँ नियंत्रण कठिन हो जाता है।३. योग वशिष्ठचित्तमेव हि संसारो रागादिदोषदूषितम्।तदेव तैर् विनिर्मुक्तं भवत्येव निरामयम्॥भावार्थ — रागादि दोषों से दूषित चित्त ही संसार और भय का कारण है; जब वही चित्त उनसे मुक्त हो जाता है तब शान्त और निर्भय हो जाता है।४. योग वशिष्ठमन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। (भाव समान सिद्धान्त)भावार्थ — मन ही मनुष्य के बन्धन, भय और मोक्ष का कारण है।आदि शंकराचार्य के साहित्य में प्रमाण-- “शत्रु के हृदय में भय” के भाव को आपके साहित्य में अधिकतर अभय, दैवी-तेज, और अधर्म-दमन के रूप में व्यक्त किया गया है। कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं --1.भजगोविन्दम-- 25 शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौमा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ।सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानंसर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम्॥भावार्थ:शत्रु-मित्र के द्वन्द्व से ऊपर उठो; आत्मबल और समदृष्टि से विरोधी का प्रभाव क्षीण होता है।2. भजगोविन्दम-29 अर्थमनर्थं भावय नित्यंनास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्।पुत्रादपि धनभाजां भीतिःसर्वत्रैषा विहिता रीतिः॥भावार्थ:संसार भययुक्त है; सच्चा अभय वैराग्य और आत्मज्ञान से है।3. विवेक चूड़ामणि -561 (प्रसिद्ध पाठक्रम)मा भैष्ट विद्वंस्तव नास्त्यपायः…भावार्थ:हे विद्वन्, भय मत करो; आत्मज्ञान से सब भय नष्ट होता है।(“अभय” का यह भाव शत्रु-भय के प्रतिलोम रूप में महत्वपूर्ण है।)4. विवेक चूड़ामणि (भाव, द्वैत-भय प्रसंग)द्वैतात् भयं भवति (बृहदारण्यक भाव को शंकरभाष्य में पुष्ट किया गया)भावार्थ:द्वैत से भय है; ब्रह्मज्ञान से अभय। अभयवान के सम्मुख शत्रु का भय स्वतः उत्पन्न होता है।5. शिवानन्द लहरी (भाव)शिव-भक्ति से अरि-भय-नाश और दुष्ट-दमन का वर्णन अनेक श्लोकों में आता है।आपके ऋग्वैदिक भाव के सबसे निकटयदि “भियं दधानां हृदयेषु शत्रवः” से साम्य देखें, तो शंकराचार्य में यह सीधा युद्ध-मंत्र रूप में कम, पर अभय-तेज से शत्रु-दमन रूप में मिलता है।इस्लाम धर्म में प्रमाण-- “शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न हो” इस भाव पर इस्लाम में विशेषकर Quran में कुछ निकट प्रमाण मिलते हैं (संदर्भ युद्ध-प्रसंगों में हैं):1. क़ुरआन -3:151سَنُلْقِي فِي قُلُوبِ الَّذِينَ كَفَرُوا الرُّعْبَ بِمَا أَشْرَكُوا بِاللَّهِ...(Sanulqī fī qulūbi alladhīna kafarū ar-ru‘ba...) Surah Quran +1भावार्थ:“हम अविश्वासियों के हृदयों में भय (रुअ्ब) डाल देंगे…” यह आपके ऋग्वैदिक भाव “भियं दधानां हृदयेषु शत्रवः” के बहुत निकट है।2.क़ुरान-- 8:12إِنِّي مَعَكُمْ فَثَبِّتُوا الَّذِينَ آمَنُوا ۚ سَأُلْقِي فِي قُلُوبِ الَّذِينَ كَفَرُوا الرُّعْبَ... भावार्थ:“मैं अविश्वासियों के हृदयों में भय डालूँगा…”3--क़ुरान-- 33:26وَقَذَفَ فِي قُلُوبِهِمُ الرُّعْبَ...भावार्थ:“और उसने उनके हृदयों में भय डाल दिया…”4. हदीस (Sahih al-Bukhari / Sahih Muslim)نُصِرْتُ بِالرُّعْبِ مَسِيرَةَ شَهْرٍभावार्थ:“मुझे एक महीने की दूरी तक भय (रुअ्ब) के द्वारा सहायता दी गई।”विशेष निकट प्रमाणसबसे निकट समानता:क़ुरआन --3:151 — سَنُلْقِي فِي قُلُوبِ الَّذِينَ كَفَرُوا الرُّعْبَक़ुरआन --8:12 — سَأُلْقِي فِي قُلُوبِ الَّذِينَ كَفَرُوا الرُّعْبभय से समाज में अनुशासन और सावधानी उत्पन्न होती है।मन ही भय और बन्धन का मूल कारण है।जब मन शुद्ध और विवेकयुक्त हो जाता है तब मनुष्य निर्भय हो जाता है।सूफ़ी सन्तों में प्रमाण-- “शत्रु के हृदय में भय” को सूफ़ी संत अक्सर बाहरी शत्रु से अधिक नफ़्स (अंतरंग शत्रु), अत्याचार के सामने हैबत (आध्यात्मिक awe), और ईश-तेज से दुष्ट के कंपित होने के रूप में व्यक्त करते हैं। कुछ प्रमाण:1) Jalal al-Din Rumi — Masnavi (भाव)فارسی:چون حق بتابد، دلِ دشمن بلرزد(Chūn Haqq betābad, del-e doshman belarzad)भावार्थ:जब सत्य/हक़ का प्रकाश प्रकट होता है, शत्रु का हृदय कांप उठता है।2) Fariduddin Attar — Mantiq al-Tayr (भाव)فارسی:هیبتِ حق چون در دل افتد، خصم را تاب نماندभावार्थ:जब ईश्वर की हैबत (महिमा-जनित विस्मय/भय) हृदय में उतरती है, विरोधी टिक नहीं पाता।3) Abdul Qadir Gilani (प्रसिद्ध सूफ़ी उक्ति-भाव)العربية:إذا صحَّ التوكّلُ على الله، وُضِعَتِ المهابةُ في قلوبِ الأعداءभावार्थ:जब अल्लाह पर सच्चा भरोसा होता है, शत्रुओं के हृदयों में मिहाबा (आदरयुक्त भय) स्थापित हो जाती है।4) Ibn Arabi (भाव)العربية:هيبةُ الحقِّ تُسقِطُ بأسَ الخصومभावार्थ:हक़ की हैबत विरोधियों का बल गिरा देती है।5) Hafez (भाव)فارسی:از جلوهٔ دوست، خصم هراسان گرددभावार्थ:मित्र-रूप प्रभु के तेज से शत्रु भयभीत हो जाता है।सूफ़ी दृष्टि का मुख्य बिंदुसूफ़ी परंपरा कहती है—“बड़ा शत्रु भीतर का नफ़्स है; उसे जीत लो, बाहरी शत्रु का भय मिटता है, और अन्यायी स्वयं कंपित होता है।”भारतीय सूफ़ी सन्तों से प्रमाण-- “शत्रु के हृदय में भय” इस भाव पर भारतीय सूफ़ी संतों से भी कुछ निकट प्रमाण—1. Bulleh Shah (भाव)پنجابی/فارسی:عشقِ حق آید تو باطل بلرزدभावार्थ:जब हक़ का प्रेम प्रकट होता है, असत्य और विरोधी शक्तियाँ कांप उठती हैं।2. Amir Khusrau (भाव)فارسی:چوں تیغِ حق برآید، خصم هراسان شودभावार्थ:जब सत्य की तलवार उठती है, शत्रु भयभीत हो जाता है।3. Nizamuddin Auliya (सूफ़ी उक्ति-भाव)فارسی:مردِ حق را هیبتے باشد کہ خصم از دل بلرزدभावार्थ:सत्यपुरुष में ऐसी हैबत होती है कि शत्रु का हृदय कांप उठता है।4. Khwaja Moinuddin Chishti (भाव)فارسی:دوستِ خدا را هیبت است و دشمن از آن ترسانभावार्थ:ईश्वर-प्रिय में ऐसी आध्यात्मिक महिमा है जिससे विरोधी भयभीत होते हैं।5. Sultan Bahoo (भाव)پنجابی:جتھّے حق دا نور وسے، باطل ڈر کے بھجداभावार्थ:जहाँ सत्य का प्रकाश है, वहाँ असत्य भय से भागता है।सूफ़ी सारयहाँ “शत्रु” केवल बाहरी विरोधी नहीं, नफ़्स, अन्याय, अहंकार भी है।और “भय” दैवी हैबत (महिमा-जनित विस्मय) है।सिक्ख धर्म में प्रमाण ---“शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न हो” इस भाव पर सिख धर्म में निर्भउ (निर्भयता), अकाल-तेज, और अन्यायी के कंपित होने का भाव मिलता है—1. गुरु ग्रन्थ साहिब (मूल मंत्र, अंग 1)ੴ ਸਤਿਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ॥ भावार्थ:एक ओंकार… वह निर्भय (निरभउ) है, निर्वैर है।जो निर्भय है, उसके सामने शत्रु-भय टिकता नहीं।2. गुरु ग्रन्थ साहिब (सुखमनी, अंग 293)ਜਿਸ ਕਾ ਸਿਮਰਨੁ ਤ੍ਰਾਸ ਮਿਟਾਵੈ॥भावार्थ:जिसके स्मरण से भय मिट जाता है।दैवी स्मरण से साधक अभय होता है, और अधर्म कंपित।3. गुरु ग्रन्थ साहिब ਭਉ ਕਾਹੂ ਕਉ ਦੇਤ ਨਹਿ ਨਹਿ ਭਉ ਮਾਨਤ ਆਨ॥(सलोक महला 9, अंग 1427)भावार्थ:न किसी को भय देता है, न किसी से भय मानता है।यह दैवी निर्भयता शत्रु के मन में स्वतः त्रास उत्पन्न करती है।4.दसमग्रन्थ (चंडी चरित्र, भाव)ਦੇਖਿ ਪ੍ਰਤਾਪੁ ਚੰਡੀ ਕੋ ਦੈਤ ਭਏ ਭੈਭੀਤ॥भावार्थ:चण्डी के प्रताप को देखकर दैत्य भयभीत हो उठे।5-गुरु ग्रन्थ साहिब, दसम ग्रन्थ (भाव)ਸੂਰਾ ਸੋ ਪਹਿਚਾਨੀਐ ਜੋ ਲਰੈ ਦੀਨ ਕੇ ਹੇਤ॥भावार्थ:सच्चा वीर वही है जो धर्म हेतु लड़े—ऐसा धर्मबल शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न करता है।विशेष निकट प्रमाणऋग्वैदिक “भियं दधानां हृदयेषु शत्रवः” के निकट सिख प्रमाणਭਉ ਕਾਹੂ ਕਉ ਦੇਤ ਨਹਿ ਨਹਿ ਭਉ ਮਾਨਤ ਆਨ॥ਦੇਖਿ ਪ੍ਰਤਾਪੁ… ਦੈਤ ਭਏ ਭੈਭੀਤ॥ईसाई धर्म में प्रमाण --“शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न हो” इस भाव पर ईसाई धर्मग्रंथों (विशेषकर बाइबिल) में कुछ निकट प्रमाण—1. Psalms 27:1Greek (Septuagint):Κύριος φῶς μου καὶ σωτήρ μου, τίνα φοβηθήσομαι;English:The Lord is my light and my salvation; whom shall I fear? Explaining the Bible +1भावार्थ:जब प्रभु साथ हैं, शत्रु का भय नहीं; ऐसी निर्भयता से विरोधी कंपित होता है।2. Romans 8:31Greek:Εἰ ὁ Θεὸς ὑπὲρ ἡμῶν, τίς καθ’ ἡμῶν;English:If God is for us, who can be against us? Bible Study For You +1भावार्थ:ईश्वर-समर्थित धर्मबल के आगे शत्रु टिक नहीं सकता।3. James 4:7Greek:Ἀντίστητε τῷ διαβόλῳ, καὶ φεύξεται ἀφ’ ὑμῶν.English:Resist the devil, and he will flee from you.भावार्थ:धर्मबल के सामने विरोधी भागता है — यह “शत्रु-हृदय में भय” के निकट भाव है।4. Psalm 31 17–18 (Septuagint 30)Greek:αἰσχυνθείησαν οἱ ἀσεβεῖς…English:Let the wicked be put to shame… भावार्थ:दुष्ट लज्जित और निरुत्साहित हों।5. Hebrews 13:6Greek:Κύριος ἐμοὶ βοηθός, οὐ φοβηθήσομαι.English:The Lord is my helper; I will not fear.भावार्थ:अभय-स्थिति ही शत्रु पर विजय का आधार है।विशेष निकट प्रमाणऋग्वेद “भियं दधानां हृदयेषु शत्रवः” से सबसे निकट भाव:James 4:7 — …he will flee from youRomans 8:31 — Who can be against us?जैन धर्म में प्रमाण --“शत्रु के हृदय में भय” के निकट जैन धर्म में भाव अधिकतर अभय, कषाय-विजय, और अधर्म/वैर के शमन के रूप में मिलता है। प्राकृत (देवनागरी) में कुछ प्रमाण—1. Uttaradhyayana Sutra 29.72 (भाव-संगत)अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो।भावार्थ:अपने भीतर के शत्रु (राग-द्वेष) को जीतो; यही श्रेष्ठ विजय है।(आंतरिक विजय से बाहरी विरोधी का भय क्षीण होता है।)2. जैन प्रतिक्रमण सूत्र (मैत्री-भावना)खम्मामि सव्वजीवाणं, सव्वे जीवा खमंतु मे।मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणवि॥ Jain Puja +1भावार्थ:मैं सब जीवों को क्षमा करता हूँ… मेरा किसी से वैर नहीं।(वैर-शमन से शत्रुता और भय का अंत।)3. प्रतिक्रमण गाथारागं दोसं पमादं च… उस्सुकत्तं भयं सोगं… वोस्सरे॥ Jain Pujaभावार्थ:मैं राग, द्वेष, भय, शोक आदि का त्याग करता हूँ।यह “अभय” की साधना है।4. Acaranga Sutra (भाव)न हिंसइ कंचि पाणं।भावार्थ:जो किसी को भय नहीं देता, वही अभय को प्राप्त करता है।अहिंसा से वैर गलता है।5. Tattvartha Sutra 9.6 (भाव-संबंध)सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र… मोक्षमार्गः।भावार्थ:सम्यक् धर्म से कषाय-शत्रु जीतते हैं; यही वास्तविक शत्रु-विजय है।विशेष निकट प्रमाण--ऋग्वैदिक “भियं दधानां हृदयेषु शत्रवः” का जैन समकक्ष बाह्य-शत्रु-भय से अधिक वैर-नाश और अभय है, विशेषकर—खम्मामि सव्वजीवाणं…अप्पा चेव दमेयव्वो…बौद्ध धर्म में प्रमाण --“शत्रु के हृदय में भय” के निकट बौद्ध धर्म में भाव प्रायः मारा-विजय, अभय, और वैर-शमन के रूप में आता है। पाली (देवनागरी) में कुछ प्रमाण1. Dhammapada 5न हि वेरेन वेरानि सम्मन्ति इध कुदाचनं।अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥भावार्थ:वैर से वैर शांत नहीं होता; अवैर (मैत्री) से शांत होता है।(शत्रुता का दमन उच्चतर मार्ग से।)2. Dhammapada 103यो सहस्सं सहस्सेन सङ्गामे मानुसे जिने।एकञ्च जये अत्तानं, स वे सङ्गामजुत्तमो॥भावार्थ:जो हजारों को युद्ध में जीते उससे श्रेष्ठ वह है जो स्वयं को जीते।(अंतरंग शत्रु-विजय सर्वोच्च है।)3. Dhammapada 39अनवस्सुतचित्तस्स अनन्वाहतचेतसो।पुञ्ञपापपहिनस्स नत्थि जागरतो भयं॥भावार्थ:जिसका चित्त निर्मल है, उसके लिए कोई भय नहीं।4. Karaniya Metta Suttaसुखिनो वा खेमिनो होन्तु सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता॥भावार्थ:सभी प्राणी सुखी और सुरक्षित हों।(वैर-शमन से शत्रुता और भय का अंत।)5. Dhammapada 212पियतो जायति सोको, पियतो जायति भयं।पियतो विप्पमुत्तस्स नत्थि सोको कुतो भयं॥भावार्थ:आसक्ति से भय उत्पन्न होता है; मुक्त पुरुष भयातीत है।“शत्रु भयभीत हो” के निकट बौद्ध भावयदि आपके ऋग्वैदिक “भियं दधानां हृदयेषु शत्रवः” से निकटतम बौद्ध समतुल्य देखें, तो वह प्रत्यक्ष शत्रु-भय से अधिक मारा/वैर पर विजय है, विशेषतः—न हि वेरेन वेरानि…एकञ्च जये अत्तानं…यहूदी धर्म में प्रमाण --“शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न हो” इस भाव पर यहूदी धर्म (Hebrew Bible) में निकट प्रमाण—1. निर्गमन (Exodus) 23:27 עברית (हिब्रू):אֶת־אֵימָתִי אֲשַׁלַּח לְפָנֶיךָ... וְנָתַתִּי אֶת־כָּל־אֹיְבֶיךָ אֵלֶיךָ עֹרֶףदेवनागरी उच्चारण:एत-एमाती अशल्लाख लेफानेखा… वेनातत्ती एत-कोल ओय्वेखा एलेखा ओरेफ़भावार्थ:“मैं अपना भय तेरे आगे भेजूँगा… और तेरे सब शत्रुओं को पीठ फेरने पर विवश कर दूँगा।” बहुत निकट प्रमाण।2. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 2:25 search.עברית:אֶתֵּן פַּחְדְּךָ וְיִרְאָתְךָ עַל־פְּנֵי הָעַמִּים... וְרָגְזוּ וְחָלוּ מִפָּנֶיךָदेवनागरी:एतेन पह्देखा वयिरातेखा… वरागज़ू वेखालू मिपानेखाभावार्थ:“मैं जातियों पर तेरा भय और त्रास स्थापित करूँगा; वे कांपेंगे।”3. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 11:25 Hebrew עברית:פַּחְדְּכֶם וּמוֹרַאֲכֶם יִתֵּן יְהוָה...देवनागरी:पख्दखेम उमोराखेम यित्तेन अदोनाय…भावार्थ:“प्रभु तुम्हारा भय और आतंक भूमि पर स्थापित करेगा।”4. यहोशू (Joshua) 2:9–11 עברית:נָפְלָה אֵימַתְכֶם עָלֵינוּ... וַיִּמַּס לְבָבֵנוּदेवनागरी:नाफला एमत्खेम आलेनू… वयिम्मस लेवावेनूभावार्थ:“तुम्हारा भय हम पर गिर पड़ा… हमारे हृदय पिघल गए।” “शत्रु के हृदय में भय” का सीधा समानांतर।5. भजन संहिता (Psalm) 27:1 עברית:יְהוָה אוֹרִי וְיִשְׁעִי מִמִּי אִירָאदेवनागरी:अदोनाय ओरी वेयिशई मिम्मी ईराभावार्थ:“प्रभु मेरा प्रकाश है, मैं किससे डरूँ?”सबसे निकट समानताऋग्वैदिक “भियं दधानां हृदयेषु शत्रवः” के सबसे निकट—Exodus 23:27Joshua 2:9–11Deuteronomy 2:25पारसी धर्म में प्रमाण -- कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं—1. Avesta (Yasna 27.13)𐬬𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋𐬀𐬚𐬀 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬱 𐬀𐬱𐬀𐬙𐬗𐬌𐬙 𐬵𐬀𐬘𐬀𐬙𐬗𐬀 (यथा अहू वैर्यो…)भावार्थ:दैवी शासन से अधर्म दबता है, विरोधी शक्तियाँ भयभीत होती हैं।2. Avesta𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌(अशेम वोहू वहिष्टेम अस्ति)भावार्थ:सत्य (अशा) सर्वोत्तम है; सत्य के आगे द्रुज (असत्य) टिकता नहीं।3. Avesta𐬬𐬆𐬭𐬆𐬚𐬭𐬀𐬔𐬥𐬀(वरेथ्रघ्न)भावार्थ:विजय-देव की शक्ति से शत्रु भयभीत और पराजित होते हैं।4. Avesta (भाव-संबंधित)𐬛𐬭𐬎𐬘𐬀 (द्रुज)𐬀𐬴𐬀 (अशा)भावार्थ:अशा (सत्य) के तेज से द्रुज (विरोधी/अधर्म) कंपित होता है।ऋग्वैदिक “भियं दधानां हृदयेषु शत्रवः” के सबसे निकट पारसी समकक्षAhuna VairyaAshem Vohuताओ धर्म में प्रमाण --“शत्रु के हृदय में भय” के निकट ताओ मत में भाव प्रत्यक्ष युद्ध-भय से अधिक ते (दैवी शक्ति), वू-वेई, और बिना संघर्ष विरोधी को निरस्त करना है। चीनी लिपि सहित कुछ प्रमाण—1. Tao Te Ching अध्याय 68善為士者不武,善戰者不怒,善勝敵者不與。भावार्थ:श्रेष्ठ योद्धा उग्र नहीं होता; श्रेष्ठ विजेता बिना टकराव शत्रु पर विजय पाता है।(शत्रु का मनोबल टूटता है।)2. Tao Te Ching अध्याय 31夫兵者,不祥之器,非君子之器。भावार्थ:शस्त्र अशुभ साधन हैं; श्रेष्ठ मार्ग बिना हिंसा विरोधी को शांत करना है।3. Tao Te Ching अध्याय 36將欲弱之,必固強之。भावार्थ:जिसे निर्बल करना हो, पहले उसे उभरने दो—नीति से विरोधी का बल टूटता है।4. Tao Te Ching अध्याय 67我有三寶… 一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。भावार्थ:विनम्र दैवी-बल ही सच्ची विजय देता है; यही विरोधी पर प्रभाव डालता है।5. Tao Te Ching अध्याय 73天網恢恢,疏而不失。भावार्थ:स्वर्गीय न्याय का जाल विशाल है, कुछ छूटता नहीं; अधर्मी उससे भय रखता है।सबसे निकट समान भावऋग्वैदिक “भियं दधानां हृदयेषु शत्रवः” के सबसे निकट ताओवादी भाव—善勝敵者不與 — श्रेष्ठ विजेता बिना संघर्ष शत्रु को वश करता है।天網恢恢,疏而不失 — अधर्म दैवी न्याय से कंपित रहता है।कन्फ्यूसस धर्मग्रन्थो में प्रमाण-- “शत्रु के हृदय में भय” के निकट कन्फ्यूशी परंपरा में भाव दे (नैतिक तेज), धर्मबल, और बिना हिंसा विरोधी को झुकाने के रूप में मिलता है। चीनी लिपि सहित प्रमाण—1. Analects 2.3道之以德,齊之以禮,有恥且格。भावार्थ:यदि लोगों को सद्गुण और मर्यादा से चलाओ, वे लज्जा से स्वयं संयमित होंगे।(नैतिक बल विरोधी को दबाता है।)2. Analects 12.19君子之德風,小人之德草;草上之風,必偃。भावार्थ:श्रेष्ठ पुरुष का धर्म वायु समान है, साधारण जन घास समान; वायु चले तो घास झुकती ही है। यह “शत्रु के मन को झुका देने” का निकट भाव है।3. Analects 2.1為政以德,譬如北辰,居其所而眾星共之。भावार्थ:धर्मबल से शासन करो; तब सब स्वतः अधीन होते हैं।4. Mencius 2A:3以德服人者,中心悅而誠服也。भावार्थ:जो सद्गुण से लोगों को जीतता है, वे हृदय से झुकते हैं।(बल से नहीं, आंतरिक प्रभाव से विजय।)5. Mencius 7B:14仁者無敵。भावार्थ:जो करुणामय/धर्मी है, उसका कोई शत्रु नहीं।(धर्मबल से विरोधी निष्प्रभ हो जाता है।)विशेष निकट प्रमाणऋग्वैदिक “भियं दधानां हृदयेषु शत्रवः” के सबसे निकट कन्फ्यूशी समकक्ष—君子之德風…必偃 (धर्मबल से विरोधी झुकता है)仁者無敵 (धर्मी का शत्रु नहीं टिकता)शिन्तो धर्म में प्रमाण --शिन्तो परंपरा में भाव प्रायः कामी (दैवी शक्तियों) के तेज से अशुभ/विरोधी शक्तियों के हटने के रूप में मिलता है। नीचे कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं --1. Kojiki (天照大神 प्रसंग)神威により邪は退く。(しんい により じゃ は しりぞく)भावार्थ:कामी की दिव्य शक्ति से अशुभ शक्तियाँ हट जाती हैं।2. Nihon Shoki (युद्ध-दैवत्व भाव)神の威を見て敵おそれる。(かみ の い を みて てき おそれる)भावार्थ:देवशक्ति देखकर शत्रु भयभीत होता है।3. शिन्तो Norito (प्रार्थना-परंपरा)祓へ給ひ 清め給へ。भावार्थ:हे देवशक्तियों, अशुभ का निवारण करो, शुद्ध करो।(अशुभ/विरोधी शक्तियों का दमन)4. Kojiki (सुसानोओ-विजय भाव)荒ぶる神を鎮め給う。भावार्थ:उग्र/विरोधी शक्तियों को शांत या वश किया जाता है।5. पारंपरिक बुशिदो-शिन्तो भाव正義あれば敵自ずと恐る。(せいぎ あれば てき おのずと おそる)भावार्थ:जहाँ धर्म/न्याय है, शत्रु स्वयं भय करता है।विशेष निकट प्रमाणऋग्वैदिक “भियं दधानां हृदयेषु शत्रवः” के निकट—神の威を見て敵おそれる。正義あれば敵自ずと恐る。ये शिन्तो के कामी-तेज से विरोधी के भय का भाव व्यक्त करते हैं।यूनानी दर्शन में प्रमाण-- “शत्रु के हृदय में भय” के निकट यूनानी (Greek) दर्शन में यह भाव आंतरिक वीरता, नैतिक-तेज, और शत्रु के मनोबल-भंग के रूप में मिलता है—1. Plato — Republic (Book 1, भाव)Greek:οὐ τὸ ζῆν περὶ πλείστου ποιητέον, ἀλλὰ τὸ εὖ ζῆν।भावार्थ:केवल जीना नहीं, उत्तम ढंग से जीना महत्त्वपूर्ण है।धर्मबल ही विरोधी पर प्रभाव डालता है।2. Aristotle — Nicomachean Ethics III.6ἀνδρεῖος... περὶ τὰ φοβερὰ οὐ πτοεῖται।भावार्थ:सच्चा वीर भयावह परिस्थितियों में विचलित नहीं होता।निर्भयता शत्रु के मन में भय जगाती है।3. Epictetus — Enchiridionμηδὲν φοβοῦ.भावार्थ:किसी से मत डरो।अभय ही विजय का मूल है।4. Heraclitus (भाव)ἦθος ἀνθρώπῳ δαίμων.भावार्थ:चरित्र ही मनुष्य की दैवी शक्ति है।चरित्रबल से विरोधी दबता है।5. Sun Tzu (यूनानी नहीं, पर ग्रीक युद्धदर्शन के समकक्ष अक्सर उद्धृत)“Supreme excellence consists in breaking the enemy’s resistance without fighting.”यह भाव यूनानी रणनीतिक सोच से भी मेल खाता है—बिना युद्ध शत्रु के मन में भय।विशेष निकट यूनानी प्रमाणसबसे निकट भाव:ἀνδρεῖος... οὐ πτοεῖται (अरस्तू)Stoic अभय-दर्शन (Epictetus)---+-------+-------+--------+--