अध्याय 1: अहसासों की अदालत और अधूरा सच
दृश्य 1
स्थान: फैमिली कोर्ट, मेरठ (आधुनिक कक्ष)
समय: दोपहर
पात्र: न्यायाधीश (जज), अवनि, माया, आर्यन, राज (7 साल), वकील और कोर्ट स्टाफ।
(दृश्य की शुरुआत: कोर्ट रूम में एयर कंडीशनर की हल्की सरसराहट के बीच एक भारी सन्नाटा है। न्यायाधीश महोदय अपने लैपटॉप पर कुछ फाइलें देख रहे हैं। राज अवनि की साड़ी का कोना पकड़कर उसके पीछे खड़ा है। उसका चेहरा साफ़ है पर उसकी आँखों में वही पुराना डर है जो 5 साल पहले था। माया अपनी महंगी साड़ी और गहनों के साथ मखमली सोफे पर बैठी है।)
न्यायाधीश: (फाइल से नज़रें हटाते हुए) श्रीमती अवनि, कानून भावनाओं पर नहीं, सबूतों पर चलता है। डीएनए (DNA) रिपोर्ट साफ़ तौर पर माया जी के पक्ष में है। विज्ञान के पास इस बात का प्रमाण है कि राज की जैविक माँ माया ही हैं। क्या आपके पास इस वैज्ञानिक सत्य के खिलाफ कहने के लिए कुछ शेष है?
अवनि: (कांपती हुई लेकिन मज़बूत आवाज़ में) जज साहब, विज्ञान शरीर की बनावट और खून के रिश्तों को तो पहचान सकता है, लेकिन उस रूह और ममता को कैसे नापेगा जिसने एक मुरझाए हुए फूल को फिर से सींचा है? आज आप जिसे 'जैविक माँ' कह रहे हैं, मैं उनसे बस एक सवाल पूछना चाहती हूँ...
(अवनि धीरे से मुड़कर माया की आँखों में देखती है। माया अपनी नज़रें चुराने की कोशिश करती है।)
अवनि: माया जी, आज आप इस सजे-धजाए कोर्ट में अपना हक मांगने आई हैं। लेकिन क्या आपको याद है कि 5 साल पहले, मेरठ की उस तपती दोपहर में आपका यह 'हक' कहाँ था? जज साहब, जब राज मुझे मिला था, तब वह महज़ 2 साल का एक छोटा सा बच्चा था।
(अवनि की आँखों में आंसू आ जाते हैं, वह फ्लैशबैक की यादों में खो जाती है)
अवनि: वह दृश्य मैं कभी नहीं भूल सकती। राज मेरठ की एक पुरानी गली के पास, कूड़े के ढेर के बगल में पड़ा था। उसका सांवला और मासूम चेहरा मिट्टी से पूरी तरह अटा पड़ा था। उसके कपड़े मैल से काले पड़ चुके थे और उनमें से बदबू आ रही थी। उसके बाल हफ्तों से अनछुए और उलझे हुए थे। वह इतना कमज़ोर था कि उसके रोने की आवाज़ भी मुश्किल से निकल रही थी। उस वक्त कहाँ थी इसकी 'जैविक माँ'? क्या माँ का दिल तब नहीं तड़पा जब उसका लाल मिट्टी में पड़ा अपनी मौत का इंतज़ार कर रहा था?
माया: (चिल्लाकर) यह सब सफ़ेद झूठ है! मेरा बच्चा मुझसे जबरदस्ती छीना गया था! अवनि ने इसे किडनैप किया है!
अवनि: (तेज़ आवाज़ में) छीना नहीं गया था माया जी, उसे मरने के लिए छोड़ दिया गया था! अगर उस दिन आर्यन इसे उठाकर घर न लाता, तो आज राज यहाँ इस कोर्ट में खड़ा न होता। मैंने इसकी एक-एक इंच मिट्टी साफ़ की है। इसे नहलाने से लेकर, इसे बोलना सिखाने और इसे 'राज' बनाने तक का सफर मैंने तय किया है। जब यह बीमार होता था और रात भर 'माँ-माँ' पुकारता था, तब माया जी आप अपने ऐशो-आराम की दुनिया में कहाँ थीं?
(कोर्ट रूम में बैठे लोग फुसफुसाने लगते हैं। जज साहब भी अवनि की बात को ध्यान से सुन रहे हैं। राज धीरे से अवनि का हाथ चूमता है।)
अवनि: (जज की तरफ मुड़कर) साहब, ममता की कोई स्याही नहीं होती जो कागजों पर उतर सके। राज का मुझसे रिश्ता खून का नहीं, बल्कि उन रातों का है जो मैंने इसके सिरहाने जागकर काटी हैं। और रही बात 'सच' की... (अवनि आर्यन की तरफ इशारा करती है जो कोने में अपनी गर्दन झुकाए खड़ा है)
अवनि: आर्यन... आज तुम खामोश क्यों हो? क्या तुम्हारी ये चुप्पी अवनि को हारते हुए देखना चाहती है? जज साहब, आर्यन वो शख्स है जो जानता है कि राज उस कूड़े के ढेर तक पहुँचा कैसे। वह 'अधूरा सच' जो इसके सीने में दफन है, वही इस केस की असली चाबी है। अगर माया माँ है, तो आर्यन बताए कि उस रात क्या हुआ था?
(आर्यन अपना आईफोन कसकर पकड़ता है और उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगती हैं। वह कुछ बोलना चाहता है पर शब्द उसके गले में फंस जाते हैं।)
न्यायाधीश: (हथौड़ा मारते हुए) ऑर्डर-ऑर्डर! मामला पेचीदा है। अवनि जी के तर्कों में दम है। सिर्फ डीएनए रिपोर्ट कस्टडी तय करने का आधार नहीं हो सकती। राज की सुरक्षा और उसका पिछला इतिहास जानना ज़रूरी है।
(न्यायाधीश राज की तरफ देखते हैं)
न्यायाधीश: राज, क्या तुम कुछ कहना चाहते हो बेटा?
राज: (अवनि की तरफ देखते हुए, धीमी आवाज़ में) मुझे... मुझे अपनी माँ के पास ही रहना है। वहाँ (माया की तरफ इशारा करते हुए) बहुत अंधेरा है।
(माया का चेहरा डर के मारे सफ़ेद पड़ जाता है। जज साहब गंभीरता से कुछ नोट करते हैं।)
न्यायाधीश: अदालत इस मामले की अगली सुनवाई तक राज की कस्टडी अवनि के पास ही सुरक्षित रखती है। आर्यन, अगली बार आपको शपथ लेकर वह 'अधूरा सच' बताना ही होगा। कोर्ट इज़ एडजर्न्ड!