for the welfare of all beings in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | सर्वभूतहितेरत

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सर्वभूतहितेरत

ऋगुवेद सूक्ति--(३६) की व्याख्या "मा नः प्रजा रीरिषः” ऋगुवेद--१०/१८/१अर्थ-- हे प्रभु ! तू हमारी सन्तानों को नष्ट न कर।शब्दार्थ--मा = मत / नहींनः = हमारीप्रजा = सन्तान, लोग, जनतारीरिषः = हानि करना, नष्ट करना, पीड़ा देनाभावार्थ--“हमारी प्रजा को हानि मत पहुँचाओ।”या“हमारी सन्तान/जनता का नाश न हो।”विस्तृत अर्थ--ऋग्वेद में यह प्रार्थना देवता से की जाती है कि हमारी प्रजा, परिवार और समाज सुरक्षित रहें, उन्हें किसी प्रकार की हानि, विनाश या दुःख न हो।अर्थात यह मंत्र लोककल्याण, सुरक्षा और प्रजा की रक्षा की भावना को व्यक्त करता है। “मा नः प्रजा रीरिषः” का भाव हमारी प्रजा को हानि न हो — यह विचार वेदों में अनेक स्थानों पर मिलता है। वेदों में प्रजा की रक्षा, कल्याण और वृद्धि की प्रार्थना बार-बार की गयी है।१.ऋगुवेद--मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकंमा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्।मा नो वधीः पितरं मोत मातरंमा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः॥ (ऋग्वेद 1.114.8)भावार्थ — हे रुद्र! हमारे बड़े-छोटे, बालक-युवक, माता-पिता और प्रिय जनों को हानि मत पहुँचाओ।२- यजुर्वेद --मा हिंसीः पुरुषं जगत्।भावार्थ — मनुष्य और संसार के प्राणियों को हिंसा न करो।३ अथर्ववेद --भद्रं नो अपि वातय मनः।भावार्थ — हमारा मन और जीवन कल्याणकारी बने।४. ऋग्वेद-- शं नो मित्रः शं वरुणःशं नो भवत्वर्यमा।भावार्थ — मित्र, वरुण आदि देवता हमारे लिए कल्याणकारी हों और हमें सुख-शांति दें।सार--वेदों में अनेक मंत्रों के माध्यम से यह सिद्ध होता है कि प्रजा की रक्षा,अहिंसा,लोककल्याणसभी के सुख की कामनावेदों की मूल भावना है।“मा नः प्रजा रीरिषः” भी इसी वेदिक भावना को प्रकट करता है कि हमारी प्रजा, सन्तान और समाज को कोई हानि न पहुँचे। है। वेदों की तरह उपनिषदों में भी प्रजा-रक्षा, अहिंसा, और सबके कल्याण की भावना के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।उपनिषद् में प्रमाण-- १. ईश उपनिषद--“यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यतिसर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥”भावार्थ — जो मनुष्य सभी प्राणियों को अपने ही आत्मा में और अपने आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, वह किसी से घृणा या हानि नहीं करता।२- छान्दोग्य उपनिषद--“सर्वं खल्विदं ब्रह्म।”भावार्थ — यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है। इसलिए किसी प्राणी को कष्ट पहुँचाना उचित नहीं।३. तैत्तिरीय उपनिषद --“मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।”भावार्थ — माता, पिता, गुरु और अतिथि का सम्मान और संरक्षण करो।४. बृहदारण्यक उपनिषद --“असतो मा सद्गमयतमसो मा ज्योतिर्गमयमृत्योर्मा अमृतं गमय।”भावार्थ — हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।५ कठ उपनिषद--“एको वशी सर्वभूतान्तरात्माएकं रूपं बहुधा यः करोति।”भावार्थ — एक ही परमात्मा सब प्राणियों के भीतर स्थित है और वही अनेक रूपों में प्रकट होता है। इसलिए किसी प्राणी को हानि पहुँचाना उचित नहीं।६-मुण्डक‌ उपनिषद--“यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।”भावार्थ — ज्ञानी पुरुष के लिए सभी प्राणी अपने ही समान हो जाते हैं; इसलिए वह किसी को कष्ट नहीं देता।७. श्वेताश्वतर उपनिषद--“एको देवः सर्वभूतेषु गूढःसर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।”भावार्थ — एक ही परमात्मा सभी प्राणियों में भीतर स्थित है और सबमें व्याप्त है।८. मैत्री उपनिषद--“आत्मवत् सर्वभूतेषु।”भावार्थ — सभी प्राणियों को अपने समान समझो।सार--इन उपनिषदों से यह सिद्ध होता है कि सभी प्राणियों में एक ही आत्मा और परमात्मा का वास है।इसलिए किसी प्राणी को हानि पहुँचाना धर्म के विरुद्ध है।सभी के कल्याण और संरक्षण की भावना ही श्रेष्ठ आचरण है।इसी कारण वेद का वाक्य “मा नः प्रजा रीरिषः” (हमारी प्रजा को हानि न हो) उपनिषदों की शिक्षाओं के साथ पूर्णतः संगत है। खाता है।पुराणों में प्रमाण-- १. भागवत पुराण-- “सर्वभूतहिते रतः।”भावार्थ — श्रेष्ठ मनुष्य वह है जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।२. विष्णु पुराण-- “परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।”भावार्थ — दूसरों का उपकार करना पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप है।३. पद्म पुराण --“अहिंसा परमो धर्मः।”भावार्थ — अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है।४. गरुड़ पूराण- “न हिंस्यात् सर्वभूतानि।”भावार्थ — किसी भी प्राणी को कष्ट या हानि नहीं पहुँचानी चाहिए।५- स्कंद पुराण --“न हिंस्यात् सर्वभूतानि सर्वभूतहिते रतः।”भावार्थ — किसी भी प्राणी को कष्ट न दे और सभी प्राणियों के हित में लगा रहे।६. अग्नि पुराण--“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।”भावार्थ — अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियों का संयम — ये धर्म के मुख्य लक्षण हैं।७. ब्रह्म पुराण--“सर्वभूतदयायुक्तः स धर्मं वेत्ति पण्डितः।”भावार्थ — जो सभी प्राणियों पर दया करता है वही सच्चे धर्म को जानने वाला पण्डित है।८. नारद‌ पुराण--“दया सर्वभूतेषु धर्मस्य परमं फलम्।”भावार्थ — सभी प्राणियों पर दया करना धर्म का सर्वोच्च फल है।सार--इन पुराणों से यह सिद्ध होता है कि सभी प्राणियों पर दया करना धर्म है।किसी को कष्ट देना अधर्म है।लोक-कल्याण और प्रजा-रक्षा ही श्रेष्ठ आचरण है।भगवद्गीता में प्रमाण-- १- अध्याय १२, श्लोक १३“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।”भावार्थ — जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता और सबके प्रति मित्रभाव तथा करुणा रखता है, वही श्रेष्ठ भक्त है।२. अध्याय ५ श्लोक २५“लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणम् ऋषयः क्षीणकल्मषाःछिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥”भावार्थ — जिनका मन शुद्ध है और जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होते हैं।३-अध्याय ६ श्लोक ३२“आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुनसुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥”भावार्थ — जो दूसरों के सुख-दुःख को अपने समान समझता है, वही श्रेष्ठ योगी है।४- अध्याय १६, श्लोक २“अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।”भावार्थ — अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग और शान्ति — ये दैवी गुण हैं।सार--गीता में स्पष्ट बताया गया है कि—सभी प्राणियों से द्वेष न करनासर्वभूत हित में लगे रहनाअहिंसा और करुणा रखनाये श्रेष्ठ धर्म और योग के लक्षण हैं।महाभारत में प्रमाण-- १-अनुशासन पर्व-“अहिंसा परमो धर्मः।”भावार्थ — अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है।२-शान्ति पर्व“न हिंस्यात् सर्वभूतानि।”भावार्थ — किसी भी प्राणी को कष्ट या हानि नहीं पहुँचानी चाहिए।३-अनुशासन पर्व-“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।”भावार्थ — जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल हो, वह दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।४-शान्ति पर्व--“सर्वभूतहिते युक्तः स धर्मं वेत्ति पाण्डव।”भावार्थ — भीष्म पितामह युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए कहते हैं कि‌ से पाण्डव ! जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है वही सच्चे धर्म को जानता है।सार--महाभारत में स्पष्ट बताया गया है कि—अहिंसा सर्वोच्च धर्म है।किसी भी प्राणी को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए।दूसरों के हित और प्रजा की रक्षा करना ही धर्म है।इस प्रकार वेद का सिद्धान्त “मा नः प्रजा रीरिषः” (हमारी प्रजा को हानि न हो) की भावना महाभारत में भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।स्मृति ग्रन्थों  प्रमाण --१.मनु स्मृति --“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥” (मनुस्मृति १०-६३)भावार्थ — अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियों का संयम — यह सबके लिए समान धर्म है।२. याज्ञवल्क्य स्मृति-- “अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।”भावार्थ — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शुद्धता और इन्द्रिय-निग्रह धर्म के मुख्य लक्षण हैं।३- पराशर स्मृति-- “न हिंस्यात् सर्वभूतानि।”भावार्थ — किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं देना चाहिए।४--नारद स्मृति --“दया सर्वभूतेषु धर्मस्य परमं लक्षणम्।”भावार्थ — सभी प्राणियों पर दया करना धर्म का सर्वोच्च लक्षण है।सार--स्मृति ग्रन्थों की शिक्षा यह बताती है कि—अहिंसा धर्म का मुख्य सिद्धान्त है।सभी प्राणियों पर दया करना चाहिए। किसी को हानि पहुँचाना अधर्म है।इस प्रकार वेद का सिद्धान्त “मा नः प्रजा रीरिषः” (हमारी प्रजा को हानि न हो) की भावना स्मृति ग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से समर्थित मिलती है।नीति-शास्त्रों में भी सर्वभूत-हित, दया और किसी को कष्ट न देने का सिद्धान्त स्पष्ट रूप से बताया गया है।१- चाणक्य नीति --“मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥”भावार्थ — जो दूसरों की स्त्री को माता के समान, दूसरे के धन को मिट्टी के समान और सभी प्राणियों को अपने समान समझता है, वही सच्चा पण्डित है।२. विदुर नीति-- (महाभारत)“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।”भावार्थ — जो व्यवहार अपने लिए अच्छा न लगे, वह दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।३- शुक्र नीति --“दया सर्वभूतेषु कर्तव्या।”भावार्थ — सभी प्राणियों पर दया करना मनुष्य का कर्तव्य है।४- भरथरी नीति शतक-- “परोपकाराय सतां विभूतयः।”भावार्थ — सज्जनों की सम्पत्ति और शक्ति दूसरों के उपकार के लिए होती है।सार--नीति-शास्त्रों में स्पष्ट बताया गया है कि—सभी प्राणियों को अपने समान समझना चाहिए।दूसरों को कष्ट देना अधर्म है।परोपकार और सर्वभूत-हित ही श्रेष्ठ नीति है।इस प्रकार वेद का सिद्धान्त “मा नः प्रजा रीरिषः” (हमारी प्रजा को हानि न हो) की भावना नीति-शास्त्रों में भी पूर्ण रूप से समर्थित मिलती है।१-वाल्मीकि रामायण में प्रमाण-“सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥”(युद्धकाण्ड 18.33)भावार्थ — जो एक बार भी शरण में आकर कहे कि “मैं आपका हूँ”, उसे मैं सभी प्राणियों से अभय देता हूँ। यह मेरा व्रत है।यहाँ भगवान राम सभी प्राणियों की रक्षा और अहिंसा की भावना व्यक्त करते हैं।२-अध्यात्म रामायण में प्रमाण-“सर्वभूतहिते रतः।”भावार्थ — श्रेष्ठ पुरुष वही है जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।3. गर्ग संहिता में प्रमाण -“दयालुः सर्वभूतेषु।”भावार्थ — महापुरुष वह है जो सभी प्राणियों पर दया करने वाला हो।सार--इन ग्रन्थों में स्पष्ट बताया गया है कि—सभी प्राणियों को अभय देनासर्वभूत-हित में लगे रहनासब पर दया करनाधर्म का मुख्य सिद्धान्त है।इस प्रकार वेद का वाक्य “मा नः प्रजा रीरिषः” (हमारी प्रजा को हानि न हो) की भावना रामायण, अध्यात्म रामायण और गर्ग संहिता में भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित होती है।योग वशिष्ठ में प्रमाण- १. सर्वभूत-हित का सिद्धान्त“सर्वभूतहिते रतः साधवो हि महात्मानः।”— योग वशिष्ठअर्थ:महात्मा और सज्जन लोग सदा सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं।२. समदृष्टि और अहिंसा“यथा स्वे तथा सर्वेषु भूतेषु दयया स्थितिः।”— योग वशिष्ठअर्थ:जैसा अपने प्रति भाव हो, वैसा ही सभी प्राणियों के प्रति दया और समान दृष्टि रखनी चाहिए।३. करुणा और धर्म“परोपकाराय सतां विभूतयः।”— योग वशिष्ठ (प्रचलित उक्ति)अर्थ:सज्जनों की सम्पत्ति और सामर्थ्य परोपकार के लिए ही होती है।इन कथनों का मुख्य संदेश यह है कि सच्चा ज्ञानी वही है जो आत्मज्ञान के साथ-साथ सभी प्राणियों के हित, दया और समता का पालन करे।इसीलिए योग वशिष्ठ में बार-बार बताया गया है कि आत्मज्ञान का फल करुणा, अहिंसा और सर्वभूत-हित है।इस्लाम धर्म में प्रमाण --“मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — हमारी सन्तानों को नष्ट न करो — इस भाव से मिलता-जुलता संरक्षण-प्रार्थना का भाव Quran में भी मिलता है:1. Quran 25:74رَبَّنَا هَبْ لَنَا مِنْ أَزْوَاجِنَا وَذُرِّيَّاتِنَا قُرَّةَ أَعْيُنٍअर्थ:हे हमारे पालनहार! हमें हमारी पत्नियों और सन्तानों से आँखों की ठंडक (सुख) प्रदान कर।— यहाँ सन्तान-कल्याण की प्रार्थना है।2. Quran 14:40رَبِّ اجْعَلْنِي مُقِيمَ الصَّلَاةِ وَمِنْ ذُرِّيَّتِيअर्थ:हे मेरे प्रभु! मुझे और मेरी सन्तान को धर्ममार्ग पर स्थिर रख।— यहाँ सन्तान की रक्षा और उन्नति का भाव है।3. Quran 2:201رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الآخِرَةِ حَسَنَةًअर्थ:हे प्रभु! हमें इस लोक और परलोक दोनों में कल्याण दे।— इसमें परिवार और वंश के कल्याण का व्यापक भाव है।4. संतान की रक्षा संबंधी भावQuran 17:31وَلَا تَقْتُلُوا أَوْلَادَكُمْ خَشْيَةَ إِمْلَاقٍअर्थ:अपनी सन्तानों को निर्धनता के भय से मत मारो।— यह सन्तान-सुरक्षा का स्पष्ट सिद्धान्त है।ये प्रमाण आपके वैदिक भाव “हमारी सन्तानों को नष्ट न कर” से साम्य रखते हैं।सूफ़ी सन्तों में प्रमाण --“मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — सन्तान की रक्षा और कृपा की प्रार्थना — इस भाव से मिलते-जुलते सूफ़ी वचनों में दया, वंश-कल्याण और औलाद के लिए दुआ मिलती है:1. Jalal al-Din Rumi (फ़ारसी)هر کودکی امانتی‌ست از جانب حقدر حفظِ امانت، لطفِ خدا طلب کن(भावानुवाद)हर संतान ईश्वर की अमानत है; उसकी रक्षा के लिए ईश-कृपा माँगो।2. Saadi Shirazi (फ़ारसी)فرزند، چراغِ خانه و رحمتِ خداست(भावानुवाद)संतान घर का दीपक और ईश्वर की दया है।3. Abdul Qadir Gilani (अरबी प्रार्थना-भाव)اللَّهُمَّ احْفَظْ أَوْلَادَنَا بِحِفْظِكَअर्थ:हे अल्लाह! हमारी संतानों की अपनी रक्षा से रक्षा कर।4. Khwaja Moinuddin Chishti से सम्बद्ध दुआ-भाव (फ़ारसी परम्परा)یا رب، اولادِ مؤمنان را در پناهِ خود نگه دارअर्थ:हे प्रभु! विश्वासियों की संतानों को अपनी शरण में सुरक्षित रख।इनमें वही भाव है जो वैदिक प्रार्थना में है— सन्तान-विनाश न हो, उनकी रक्षा हो।कई अन्य सूफ़ी संतों में भी संतान-रक्षा, करुणा और ईश-शरण का भाव मिलता है—1. Nizamuddin Auliyaفارسی:خلقِ خدا را راحت رسان، این عبادت است(ख़ल्क़-ए-ख़ुदा को राहत पहुँचाना ही इबादत है।)भाव: सन्तान और समस्त जीवों की रक्षा दैवी करुणा का मार्ग है।2. Bulleh Shahپुत्र भी रब की अमानत हैं — यह भाव उनकी सूफ़ी वाणी में बार-बार आता है।पंजाबी/फ़ारसी परम्परा से भाव:اولاد حق دی امانت اےऔलाद ईश्वर की अमानत है।3. Shah Abdul Latif Bhittaiفارسی/सिंधी सूफ़ी भाव:رحمتِ حق بر اهل و فرزند بادईश्वर की दया परिवार और संतानों पर बनी रहे।4. Bahauddin Naqshbandعافیت در ذکر و حفظِ حق استसुरक्षा ईश्वर-स्मरण और उसकी रक्षा में है।5. Sultan Bahooهوُو رکھوالا سب دا(हू — परमात्मा — सबका रक्षक है।)भाव: प्रभु संतानों और वंश की रक्षा करता है।6. Fariduddin Attarفرزند نعمتِ حق است، حفظش دعا خواهدसंतान ईश्वर का वरदान है, उसकी रक्षा हेतु दुआ करो।इन सबमें “मा नः प्रजां रीरिषः”— हमारी सन्तानों को नष्ट न कर — जैसा ही संरक्षण-भाव है।सिक्ख धर्म में प्रमाण --“मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — हमारी सन्तान और वीरों की रक्षा हो — इस भाव पर Guru Granth Sahib में सुंदर प्रमाण मिलते हैं:1. Guru Arjan (गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 819)ਤੂ ਠਾਕੁਰੁ ਤੁਮ ਪਹਿ ਅਰਦਾਸਿ ॥ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤੇਰੀ ਰਾਸਿ ॥अर्थ:हे प्रभु! तुझसे अरदास है; जीवन और सब कुछ तेरी धरोहर है — रक्षा कर।यह संतति-रक्षा की प्रार्थना के भाव से जुड़ता है।2. Guru Nanak (जपुजी)ਪਵਣੁ ਗੁਰੂ ਪਾਣੀ ਪਿਤਾ ਮਾਤਾ ਧਰਤਿ ਮਹਤ ॥अर्थ:सृष्टि मातृ-पितृवत पालन करती है — सभी जीव संतानवत संरक्षित हैं।3. Guru Ram Dasਤੁਮ ਕਰਹੁ ਦਇਆ ਮੇਰੇ ਸਾਈਂਐਸਾ ਵਰੁ ਦੇਹੁ ਮੈ ਮੰਗਾ ॥अर्थ:हे स्वामी! कृपा करो, ऐसा वर दो जिसकी मैं याचना करता हूँ।— यह रक्षा और कृपा-प्रार्थना है।4. Guru Granth Sahib (अंग 1136)ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ ॥अर्थ:सब प्राणियों का एक ही पालनहार है; वही रक्षक है।5. सन्तान-कल्याण का गृहस्थ आदर्शGuru Amar Das की परम्परा में गृहस्थ-धर्म को संतति-पोषण और धर्मरक्षा का मार्ग माना गया है। SikhiWikiइन सबमें वही भाव है— “हे प्रभु, हमारी प्रजा/सन्तान की रक्षा करो।”इसाई धर्म में प्रमाण ---“मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — हमारी संतानों को नष्ट न कर — इस भाव पर Bible से अंग्रेज़ी (English) में प्रमाण:1. Book of Psalms 127:3“Children are a heritage from the Lord,offspring a reward from Him.”अर्थ:संतान प्रभु की धरोहर है।2. Gospel of Matthew 19:14“Let the little children come to me,and do not hinder them.”अर्थ:बालकों को मेरे पास आने दो, उन्हें मत रोको।3. Gospel of John 17:15“Keep them from the evil one.”अर्थ:उन्हें बुराई से सुरक्षित रख।— यह रक्षा-प्रार्थना है।4. Book of Isaiah 49:25“I will save your children.”अर्थ:मैं तेरी संतानों को बचाऊँगा।5. Book of Proverbs 22:6“Train up a child in the way he should go…”अर्थ:बालक को उचित मार्ग में चलाना सिखाओ।6. Third Epistle of John 1:4“I have no greater joy than to hearthat my children walk in truth.”अर्थ:इससे बड़ा आनंद नहीं कि मेरी संतान सत्य में चले।इन सबमें वही भाव है— सन्तान प्रभु की धरोहर है, उनकी रक्षा हो, वे सुरक्षित रहें — जो वैदिक मंत्र में है।यदि चाहें तो ईसाई संतों (St. Augustine, St. Francis) से भी प्रमाण दे सकता हूँ।“मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — हमारी संतानों को नष्ट न करो — इस भाव से जैन धर्म में अहिंसा, जीव-रक्षा और प्राण-संरक्षण के अनेक प्रमाण मिलते हैं:1. Acharanga Sutraसव्वे पाणा ण हंतव्वा।(प्राकृत)अर्थ:सभी प्राणियों का वध नहीं करना चाहिए।— इसमें संतति सहित सभी जीवों की रक्षा का सिद्धांत है।2. Uttaradhyayana Sutraजं इच्छसि अप्पणतो, तं इच्छ परस्सवि।अर्थ:जो अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो।— अपनी संतानों की रक्षा जैसे दूसरों की संतानों की भी रक्षा।3. Tattvartha Sutra 5.21परस्परोपग्रहो जीवानाम्।अर्थ:जीव एक-दूसरे के उपकारी हैं।— जीवन-संरक्षण और पोषण का सिद्धांत।4. Dasavaikalika Sutraसव्वे जीवा जीविउं इच्छन्ति।अर्थ:सभी जीव जीना चाहते हैं।— किसी प्रजा या सन्तान के विनाश का निषेध।5. Mahavira वचनअहिंसा परमो धर्मः।अर्थ:अहिंसा सर्वोच्च धर्म है।— सन्तान-रक्षा का मूलाधार।इनमें वैदिक “मा नः प्रजां रीरिषः” जैसा ही जीवन-सुरक्षा और संतति-रक्षा का भाव है।बौद्ध धर्म में प्रमाण --“मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — हमारी सन्तानों/प्राणियों को हानि न हो — इस भाव पर Pali Canon में करुणा और प्राणी-रक्षा के अनेक प्रमाण हैं:1. Karaniya Metta Suttaसब्बे सत्ता भवंतु सुखितत्ता।(Pāli: Sabbe sattā bhavantu sukhitattā)अर्थ:सब प्राणी सुखी हों।— संतति सहित सबकी रक्षा और मंगल।2. Dhammapada 129सब्बे तस्सन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।(Sabbe tasanti daṇḍassa, sabbesaṃ jīvitaṃ piyaṃ.)अर्थ:सब दण्ड से डरते हैं, सबको जीवन प्रिय है।— किसी प्राणी या सन्तान को हानि न पहुँचाने का सिद्धांत।3. Dhammapada 130अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये।(Attānaṃ upamaṃ katvā na haneyya na ghātaye.)अर्थ:अपने समान समझकर न किसी को मारो, न मरवाओ।4. Mangala Suttaपुत्तदारस्स सङ्गहो(Puttadārassa saṅgaho)अर्थ:पुत्र-पत्नी (परिवार) का पालन-पोषण मंगल है।— सन्तान-कल्याण का स्पष्ट भाव।5. Karaniya Metta Suttaमाता यथा नियं पुत्तं आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे…(Mātā yathā niyaṃ puttaṃ āyusā ekaputtamanurakkhe…)अर्थ:जैसे माता अपने इकलौते पुत्र की प्राण देकर रक्षा करती है…— यह तो सीधे सन्तान-रक्षा का महान उदाहरण है।ये सभी “मा नः प्रजां रीरिषः” के भाव— संतानों को क्षति न हो — से अत्यंत साम्य रखते हैं।यदि चाहें तो महायान सूत्रों या बौद्ध संस्कृत ग्रंथों से भी प्रमाण दे सकता हूँ।यहूदी धर्म में प्रमाण --“मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — हमारी संतानों को नष्ट न कर — इस भाव से मिलते-जुलते प्रमाण Hebrew Bible (यहूदी धर्म) में भी मिलते हैं:1. Book of Psalms 127:3הִנֵּה נַחֲלַת יְהוָה בָּנִים(Hinneh naḥalat Adonai banim)अर्थ:देखो, संतान प्रभु की धरोहर है।— सन्तान दैवी वरदान है, नष्ट करने योग्य नहीं।2. Book of Psalms 128:6וּרְאֵה־בָנִים לְבָנֶיךָ שָׁלוֹם עַל־יִשְׂרָאֵלअर्थ:तू अपने पुत्रों के पुत्र देखे; इस्राएल पर शांति हो।— संतति की रक्षा और दीर्घ वंश-कल्याण।3. Book of Deuteronomy 6:6–7וְשִׁנַּנְתָּם לְבָנֶיךָअर्थ:इन उपदेशों को अपने बच्चों को सिखाओ।— सन्तानों के पालन और संरक्षण का धर्म।4. Book of Isaiah 49:25וְאֶת־בָּנַיִךְ אָנֹכִי אוֹשִׁיעַअर्थ:“मैं तेरे पुत्रों को बचाऊँगा।”— सीधा रक्षा-भाव।5. Book of Proverbs 22:6חֲנֹךְ לַנַּעַר עַל־פִּי דַרְכּוֹअर्थ:बालक को उचित मार्ग पर चलना सिखाओ।— संतति के संरक्षण और उन्नति का भाव।इन सबमें वही प्रार्थना-भाव है— “हे प्रभु, हमारी संतानों की रक्षा कर।”पारसी धर्म में प्रमाण “मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — हमारी संतानों को नष्ट न कर। — इस भाव के अनुरूप Avesta (पारसी धर्म) में भी सन्तान, जीवन और संरक्षण के भाव मिलते हैं:1. Avesta — अशेम वोहू (Avestan)𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌Ashem vohū vahištəm astiअर्थ:धर्म (अशा) सर्वोत्तम है; वही कल्याणकारी है।— धर्म और कल्याण द्वारा प्रजा की रक्षा।2. Yasna 68.1𐬀𐬙 𐬥𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁...(प्रार्थना में जीवन और सृष्टि-रक्षा का भाव)भावार्थ:हे अहुरा मज़्दा, हमें और हमारी सृष्टि को सुरक्षित रख।3. Yasna 34.15...फ्रशा वरेनम...(धर्ममय उन्नति और वंश-कल्याण की कामना)भावार्थ:धर्म से जीवन और वंश समृद्ध हों।4. Khordeh AvestaHumata, Hukhta, Huvarshta(सद्विचार, सद्वचन, सद्कर्म)अर्थ:सदाचार से समाज और संतति की रक्षा होती है।5. अहुरा मज़्दा से रक्षा-प्रार्थनाAvesta में बार-बारअहुरा मज़्दा से सन्तान, गृह और समुदाय की रक्षा की प्रार्थना आती है।भाव-साम्य:जैसे वैदिक मंत्र कहता है— हमारी प्रजा को नष्ट न कर,वैसे पारसी धर्म में— अहुरा मज़्दा हमारी सृष्टि, वंश और जीवन की रक्षा करे।ताओ धर्म में प्रमाण --“मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — हमारी सन्तानों को नष्ट न कर — इस भाव से मिलता-जुलता करुणा, संरक्षण और जीवन-पोषण का भाव Tao Te Ching में मिलता है:1. Tao Te Ching अध्याय 67我有三寶,持而保之:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。अर्थ:मेरे तीन रत्न हैं— करुणा, संयम, और नम्रता।— 慈 (करुणा) संतानों सहित सबकी रक्षा का मूल है।2. Tao Te Ching अध्याय 49聖人常無心,以百姓心為心。अर्थ:संत सब लोगों को अपने हृदय में रखता है।— प्रजा और संतानों के संरक्षण का भाव।3. Tao Te Ching अध्याय 51道生之,德畜之,長之育之。अर्थ:दाओ उत्पन्न करता है, पोषण करता है, बढ़ाता है।— सृष्टि और संतति-पोषण का सुंदर भाव।4. Tao Te Ching अध्याय 52見小曰明,守柔曰強。अर्थ:कोमल (बालकवत) की रक्षा ही शक्ति है।5. Zhuangzi天地有大美而不言。(स्वर्ग-पृथ्वी सबका पोषण करते हैं।)भाव: प्रकृति सब जीवों और संतानों का पालन करती है।इनमें वही भाव है— जीवन की रक्षा, संतति का पोषण, अहिंसा और करुणा — जो “मा नः प्रजां रीरिषः” में है।कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --“मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — हमारी सन्तानों को नष्ट न कर — इस भाव से मिलता-जुलता परिवार-सुरक्षा, संतति-पोषण और मानवीय करुणा का भाव Analects आदि कन्फ्यूशियस ग्रंथों में मिलता है:1. Analects (論語) 12.22樊遲問仁。子曰:愛人。अर्थ:फान ची ने ‘रेन’ (मानवता) पूछा। गुरु ने कहा— “लोगों से प्रेम करो।”— संतानों सहित सबकी रक्षा का आधार करुणा।2. Analects 1.2孝弟也者,其為仁之本與。अर्थ:माता-पिता और परिवार के प्रति भक्ति ही मानवता का मूल है।— परिवार और संतति-रक्षा का सिद्धान्त।3. Mencius老吾老,以及人之老;幼吾幼,以及人之幼。अर्थ:अपने बच्चों से प्रेम करो और दूसरों के बच्चों से भी।— यह सीधे संतानों की रक्षा और करुणा का भाव है।4. Book of Rites大道之行也,天下為公。अर्थ:जब महान मार्ग चलता है, संसार सबका परिवार बनता है।— सबकी संतानों की सामूहिक सुरक्षा।5. Classic of Filial Piety身體髮膚,受之父母,不敢毀傷。अर्थ:शरीर माता-पिता से मिला है, उसे क्षति न पहुँचाना चाहिए।— जीवन-सुरक्षा और वंश-सम्मान।इनमें वही भाव है— प्रजा/सन्तान की रक्षा, पोषण और अहिंसक करुणा — जो वैदिक मंत्र में है।शिन्तो धर्म में प्रमाण --“मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — हमारी सन्तानों को नष्ट न कर — इस भाव से मिलता-जुलता जीवन-संरक्षण, परिवार-कल्याण और संतति-रक्षा का भाव Kojiki और Nihon Shoki सहित शिन्तो परंपरा में मिलता है:1. Norito (शिन्तो प्रार्थना)家門繁栄・子孫長久(Kamon han'ei, shison chōkyū)अर्थ:परिवार समृद्ध हो, संतति दीर्घायु हो।— सीधा संतति-रक्षा का भाव।2. Norito大神の御守護を願い奉る(Ōkami no goshugo o negai tatematsuru)अर्थ:महादेवताओं की रक्षा की प्रार्थना करते हैं।— परिवार और संतान की दैवी सुरक्षा।3. Kojiki生命は神より授かる(Seimei wa kami yori sazukaru)अर्थ:जीवन कामि (देव) से प्राप्त वरदान है।— संतान दैवी अमानत है।4. Nihon Shoki子孫を守るは神の恵み(Shison o mamoru wa kami no megumi)अर्थ:संतानों की रक्षा देवकृपा है।5. शिन्तो कामि-प्रार्थनाNorito में प्रार्थना-भाव:家内安全・子孫繁栄(Kanai anzen, shison han'ei)अर्थ:गृह-सुरक्षा और संतति-वृद्धि।इनमें वही भाव है— संतानों की रक्षा, वंश-कल्याण, दैवी संरक्षण — जो “मा नः प्रजां रीरिषः” में है।यूनानी दर्शन में ‌प्रमाण-- “मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” — हमारी सन्तानों को नष्ट न कर — इस भाव के समान सन्तान-पालन, जीवन-सुरक्षा और भावी पीढ़ियों के कल्याण का विचार Ancient Greek Philosophy में भी मिलता है:1. Plato — LawsGreek:τρέφειν καὶ παιδεύειν τοὺς παῖδας καλῶς χρὴ.Roman:Trephein kai paideuein tous paidas kalōs chrē.अर्थ:बालकों का उत्तम पालन और शिक्षा आवश्यक है।— सन्तान-सुरक्षा और पोषण।2. Aristotle — PoliticsGreek:ἡ πόλις τῶν παίδων ἕνεκεν καὶ τοῦ μέλλοντος.Roman:Hē polis tōn paidōn heneken kai tou mellontos.अर्थ:राज्य बच्चों और भविष्य के लिए है।— भावी पीढ़ी की रक्षा।3. EpictetusGreek:μηδὲν βλάπτειν.(Mēden blaptein)अर्थ:किसी को हानि मत पहुँचाओ।— “रीरिषः” (हानि न करना) के निकट भाव।4. PythagorasGreek tradition:τρέφε παιδία ἐν ἀρετῇ.Roman:Trephe paidia en aretē.अर्थ:संतानों को सद्गुण में पोषित करो।5. PlutarchGreek:οἱ παῖδες ἱερὰ παρακαταθήκη.Roman:Hoi paides hiera parakatathēkē.अर्थ:संतान पवित्र धरोहर हैं।इन सबमें वही भाव है— संतान की रक्षा, उनका पोषण, उन्हें हानि न पहुँचाना — जो वैदिक मंत्र “मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्” ------+-------+-------+---------