हम सपरिवार खेत पर काम कर रहे थे। मन के भीतर एक दबी हुई खुशी थी कि मैंने 'नवीं' कक्षा उत्तीर्ण कर ली है। तभी कुछ दूरी से एक आवाज आई— "भैया, यहाँ आ!"
पीछे मुड़कर देखा तो चाचा बुला रहे थे। पास पहुँचते ही उन्होंने पूछा,
"नंबर कैसे आए हैं?"
"ठीक-ठाक," मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया।
चाचा बोले, "ठीक-ठाक मतलब?"
मैंने सुधारते हुए कहा, "जी, अच्छे आए हैं।"
चाचा ने पता नहीं उस पल मुझमें क्या देखा और अचानक बोले, "आई.ए.एस. की तैयारी करोगे?"
मुझे इस पद या परीक्षा के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था, बस अनभिज्ञता में कह दिया— "ठीक है।"
यही वह दिन था जब समाज ने अपनी अधूरी कामनाएँ मुझ पर लाद दीं। मुझे उड़ने नहीं दिया गया; मुझे यह देखने का अवसर ही नहीं मिला कि समाज क्या है? भविष्य क्या है? सफलता क्या है? और जीवन क्या है? बस मुझे यह बताया गया कि तुम्हें वह करना है, जो अभी तक आसपास किसी ने नहीं किया। इस अपेक्षा के भाव का वजन इतना अधिक होता है कि इसे संभालना मुश्किल हो जाता है, और मैं उसे आज तक ढो रहा हूँ।
समय इतनी तेज़ी से आगे बढ़ा कि 'आई.ए.एस.' बनने का जो कीड़ा नवीं कक्षा में मेरे भीतर डाला गया था, उसे बड़ा करने का वक्त नज़दीक आ गया। आज मैंने अपनी 'बारहवीं' पास कर ली है। उत्तर भारत में जब दसवीं और बारहवीं का परिणाम घोषित होता है, तो यह विशेष ध्यान रखा जाता है कि पूरे गाँव में कोई ऐसा व्यक्ति न बचे जिसे यह पता न हो कि किसके कितने अंक आए हैं या किसका प्रतिशत क्या रहा है।
पूरे गाँव में परिणाम का एक अजीब सा माहौल रहता है। चाचा, ताऊ और दोस्तों के पिता, सब एक-दूसरे से जानकारी लेते-देते पूरे मोहल्ले में 'परिणाम का दशहरा' मनाते घूमते हैं। बारहवीं का परिणाम घोषित होने की रात को ही रिश्तेदारों के साथ मिल-बैठकर बच्चे का भविष्य तय कर दिया जाता है—कि उसे आगे पढ़ने कहाँ भेजना है और कौन सी डिग्री करानी है जिससे जल्दी नौकरी लग सके। इसके पीछे उनके अपने सामाजिक और आर्थिक हित होते हैं।
भारत में वे बच्चे बड़े खुशनसीब होते हैं जिन्हें बारहवीं तक ऐसी शिक्षा मिली होती है कि वे खुद यह कह सकें कि उन्हें जीवन में क्या करना है, और समाज अपनी इच्छा थोपे बिना उन्हें मंजूरी दे दे। मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। मुझे ऐसी शिक्षा नहीं मिली जिससे बारहवीं तक पहुँचते हुए यह पता चल पाता कि मेरी अपनी रुचि क्या है। इसीलिए घर वालों को मुझे यह समझाना आसान लगा कि इसे 'आई.ए.एस.' ही बनाना है।
अंततः, समाज की वह इच्छा धीरे-धीरे मेरी अपनी इच्छा बना दी गई, और अब मैं भी बड़े गर्व से कहता हूँ— "मैं आई.ए.एस. बनूँगा।"
चाचा हमेशा कहते थे कि आई.ए.एस. बनने में लगभग "दस साल" तो लगते ही हैं। मुझे भी लगता था कि अभी समय बहुत है; कहीं न कहीं, कुछ न कुछ तो बन ही जाएँगे। आई.ए.एस. नहीं, तो कम से कम आई.पी.एस. या पी.सी.एस. ही सही।
जब आप एक औसत स्कूल से औसत अंकों के साथ बारहवीं पास करते हैं, और आपके सामने एक लुभावना लक्ष्य तथा उसे पाने के लिए लंबा समय होता है, तो लगता है कि एक सुहावना भविष्य बस आपका ही इंतज़ार कर रहा है। मैं वही 'उधार का लक्ष्य' लेकर उसे पूरा करने के लिए प्रयागराज आ पहुँचा। मैंने अपनी तैयारी में एक लंबा समय लगाया और शहर की एक जानी-मानी कोचिंग में दाखिला ले लिया। वे जैसा और जो कुछ भी पढ़ाते, मैं उसे पढ़ता रहा। धीरे-धीरे समय बीतता गया और वक्त के साथ यह चर्चा भी फैल गई कि मैं आई.ए.एस. की तैयारी कर रहा हूँ। मैंने भी इन चर्चाओं का भरपूर लाभ उठाया, जैसे अब तो मेरा अधिकारी बनना लगभग तय ही है।
लेकिन आप अपनी असलियत खुद से कब तक छिपा सकते हैं? यह तो आपकी अपनी ईमानदारी पर निर्भर करता है।
तैयारी के दौरान मुझे पढ़ने का शौक होने लगा—पढ़ने के साथ-साथ लिखने का भी। बस पेच यहाँ फँसा कि मैं अपने बंधे-बधाए पाठ्यक्रम से भटकने लगा। पढ़ते-पढ़ते मैं कब और किन उत्कृष्ट लेखकों की पुस्तकों में खो जाता, मुझे खुद पता नहीं चलता। बाद में एहसास होता कि यह तो मेरे पाठ्यक्रम का हिस्सा ही नहीं है। जब-जब मैं अपने पाठ्यक्रम के दायरे से बाहर निकला, दर्शन (Philosophy) ने मुझे अपनी ओर खींच लिया। उन पुस्तकों में जो रस था, वह मुझे 'असीमित' की ओर ले जाता।
घर के लोग जब भी मुझसे पूछते कि मैं ये सब किताबें क्यों पढ़ रहा हूँ, तो मैं उनसे झूठ बोल देता कि यह सब आई.ए.एस. के पाठ्यक्रम में ही है। यह सुनते ही वे चुप हो जाते।
अंततः, मैंने अपना पहला और अंतिम प्रयास वर्ष 2023 में दिया, लेकिन मेरा परिणाम संतोषजनक नहीं रहा। उस परीक्षा के बाद मुझे गहराई से महसूस हुआ कि यह मेरे लिए सही रास्ता नहीं है। अब सिविल सर्विस या कोई अन्य सरकारी नौकरी मुझे अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाएगी।
मेरा झुकाव अब पढ़ने, लिखने, जानने और खोजने की ओर अधिक हो गया है। मुझे समाज, पद, प्रतिष्ठा और कोचिंग माफिया का जाल अब स्पष्ट समझ आने लगा है।
अब मैं पढ़ना चाहता हूँ, खेलना चाहता हूँ, लिखना चाहता हूँ; मैं दुनिया और खुद को समझना चाहता हूँ। मैं घूमना चाहता हूँ और वह सब कुछ करना चाहता हूँ जो मेरी आंतरिक ऊँचाई को बढ़ा सके।
लेकिन जब भी घर से फोन आता है और वे पूछते हैं— "तैयारी कैसी चल रही है?", तो मैं बस इतना कह देता हूँ— "ठीक चल रही है।" आपको उस पद में सम्मान और रुतबा दिखता है, जबकि मुझे—यदि सब कुछ ठीक रहा तो—एक 'सेवक' के सिवा और कुछ नज़र नहीं आता।
मेरे चाचा मुझसे बार-बार यही कहते हैं कि जब तुम 31 साल की उम्र तक परीक्षा में बैठ सकते हो, तो बैठो न? मैं सोचता हूँ कि अगर मैं 31 साल तक परीक्षा देता रहा और मेरा चयन नहीं हुआ, तो मेरी इस बीती हुई उम्र की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
अगर 31 साल की उम्र में जाकर यह पता चले कि यह रास्ता मेरे लिए था ही नहीं, उससे कहीं बेहतर यह है कि मुझे 23 साल की उम्र में ही यह समझ आ गया। इसमें क्या बुराई है? मैं कई अन्य चीजों में बेहतर कर सकता हूँ, और मैं कर भी रहा हूँ।
मुझे याद है कि समाज और परिवार ने मुझ पर काफी आर्थिक निवेश किया है। मैं उसे चुकाना चाहता हूँ, इसीलिए मैंने काफी समय पहले ही घर से पैसे लेना बंद कर दिया था; बल्कि अब मैं अपनी ओर से थोड़ी बहुत आर्थिक मदद भी कर देता हूँ। इसके बावजूद, घर से आने वाले उस फोन से मुझे अब भी डर लगता है!
~ यथार्थ