Beginning of My Love - 8 in Hindi Love Stories by My imaginary world books and stories PDF | Beginning of My Love - 8

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Beginning of My Love - 8


​शरद जी अपने कमरे में गए, अपना मोबाइल लिया और छत पर चले आए। उन्होंने अनु को कॉल किया, तो वह 'नॉट रिचेबल' बता रहा था। उन्होंने दोबारा कोशिश की, लेकिन फिर वही आवाज़ सुनाई दी।




​फिर उन्होंने घर के लैंडलाइन पर फोन लगाया। घंटी तो जा रही थी, लेकिन कोई फोन उठा नहीं रहा था। दरअसल, शैला किचन में थी और शारदा जी बेडरूम में। दोबारा घंटी बजी, तो शैला ने फोन उठाया।



​शैला: "हेलो... हेलो.."

​शरद: "हेलो, शारदा, मैं शरद बोल रहा हूँ।"

​शैला: "चाचा, मैं शैला बोल रही हूँ।"

​शरद: "शैला तुम हो? ज़रा अनु की माँ को फोन देना।"

​शैला: "चाचा, चाची की तबीयत ठीक नहीं है। वे बेडरूम में सो रही हैं। वे आपके ही फोन का इंतज़ार कर रही थीं।"

​शरद: "हाँ, इसीलिए मैंने उनकी तबीयत पूछने के लिए फोन किया। अच्छा, अनु पास में है क्या? उसे फोन दो।"


​शैला: "चाचा... अनु... अनु..."


​शरद: "अरे अनु-अनु क्या कर रही हो? उसे फोन दो, क्या वह किसी काम में व्यस्त है?"


​शैला सोच में पड़ गई कि कैसे बताए, पर बताना तो था ही। अनु की चिंता में शारदा जी की जान आधी हो गई थी।


​शैला: "चाचा, अनु घर पर नहीं है। वह सुबह कॉलेज गई थी, तब से वापस नहीं आई है। इसीलिए चाची बहुत तनाव में हैं। मैंने उसके दोस्तों को भी फोन किया, पर किसी को अनु के बारे में कुछ नहीं पता।"



​शैला एक ही सांस में सब कह गई। उसे लगा कि बेटी घर नहीं लौटी, तो बाप होने के नाते उन्हें चिंता होगी, पर शरद राव के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था।



​"क्या?" कहते हुए शरद जी अपना सिर पकड़कर वहीं बैठ गए। अब उनके दिमाग में अनगिनत विचारों का तांडव शुरू हो गया।



​'क्या उसे सब पता चल गया? क्या उसे अपना अतीत याद आ गया? क्या इसीलिए वह बिना बताए चली गई? पर वह ऐसी लड़की तो नहीं थी। अगर उसे सब पता भी चल जाए और अतीत याद भी आ जाए, तो भी वह शारदा को छोड़कर नहीं जा सकती। मैंने उसकी आँखों में अपनी माँ (शारदा) के लिए प्यार देखा है। क्या वह अपने अनाथालय गई होगी? या किसी ने उसे उसकी असली पहचान बता दी?'


​ऐसे कई सवाल उन्हें सता रहे थे।


​शैला: "चाचा... चाचा... क्या आप लाइन पर हैं?"
​शरद: "शैला, मेरे आने तक अनु की माँ को संभालना, उसे अकेला मत छोड़ना। अनु नहीं आई, इसका मतलब है कि वह किसी दोस्त के साथ गई होगी। तुम तो उसका स्वभाव जानती ही हो। मैं कल सुबह की बस से आता हूँ। तुम चिंता मत करो, वह कई बार सुबह तक आई है, इसलिए आ जाएगी।"



​शरद जी की यह बात सुनकर शैला को कुछ अजीब नहीं लगा। आखिर बच्चों की आदतों के बारे में माता-पिता से बेहतर कौन जानता होगा?


​शैला: "ठीक है चाचा, मैं रुक जाऊँगी। उन्हें खाना खिलाकर दवाइयां दे देती हूँ।"


​शरद: "प्लीज बेटा, आज के लिए रुक जाओ। मैं तुम्हारा यह अहसान कभी नहीं भूलूँगा।"


​शैला: "अहसान कैसा चाचा? यह तो पड़ोसी का धर्म है। आप आराम से आइये, मैं चाची के पास हूँ।" उसने फोन रख दिया।


​लेकिन यहाँ प्रोफेसर साहब का ध्यान ठिकाने नहीं था। उन्होंने हर संभावना पर विचार कर लिया था, पर किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पा रहे थे। उनके मन में डर ने घर कर लिया था। वे अपनी बेटी को पहले ही खो चुके थे, अब पत्नी को खोना उनके बस की बात नहीं थी। उन्हीं के लिए तो उन्होंने इतना बड़ा जोखिम उठाकर यह कदम उठाया था। उस वक्त उनकी प्रार्थना खाली नहीं गई थी और अनु के रूप में उन्हें वह (बेटी) मिल गई थी। शारदा बीपी की मरीज थीं, उन्हें एक छोटा-सा सदमा भी सीधा स्वर्ग पहुँचा सकता था, इसीलिए शरद जी ने यह सारा खेल रचा था।


​फ्लैशबैक (अतीत)

​उनकी बेटी अनाया अपने दोस्तों के साथ घूमने शिमला गई थी। वह हमेशा की तरह बिना किसी को बताए चली गई थी। उसके दोस्त बहुत अमीर घरों के थे, इसलिए उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं थी। अनाया बहुत होशियार थी, इसलिए उन सबको उससे टॉप लेवल के नोट्स और पेपर की फोटोकॉपी मिल जाती थी। जो पेपर होने वाले होते थे, वे उनके पास पहले ही पहुँच जाते थे, इसलिए उन्हें क्लास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। उनका असली ठिकाना कैंटीन था।



​उन्होंने अनु को अपने जाल में फँसा लिया था। उसे शराब, ड्रग्स और चरस की लत लगा दी थी, जिसकी प्रोफेसर को कानों-कान खबर नहीं थी। खबर होती भी कैसे? वह परीक्षा में हमेशा पहले नंबर पर आती थी। उन्हें यह भी नहीं पता था कि वह उनकी अलमारी (बुक शेल्फ) से पेपर की फोटोकॉपी निकालकर अपने ग्रुप में बाँटती थी। वह दिखने में किसी अप्सरा जैसी सुंदर और बेहद बुद्धिमान थी। उसकी माँ रोज़ रात को उसके सोने के बाद उसकी नज़र उतारती थी ताकि किसी की बुरी नज़र न लगे।



​पर उन्हें क्या पता था कि उसे पहले ही बुरी आदतों की नज़र लग चुकी है। और नज़र लगाने वाले बिगड़े हुए बाप की बिगड़ी हुई औलादें थीं। लड़कों के लिए तो वह एक नशा थी—"फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स"। वह कई बार अपने दोस्तों के साथ शारीरिक संबंध बना चुकी थी, जिसकी भनक उसके घर में किसी को नहीं थी।



​उसकी क्लास में जतिन नाम का एक लड़का था। वह एक साधारण परिवार से था और स्कॉलरशिप पर पढ़ने आया था। जतिन को देखते ही अनाया पसंद आ गई थी। वह उससे एकतरफा प्यार करता था, जो अनाया को नहीं पता था। जतिन प्रोफेसर साहब का सबसे चहेता छात्र था। प्रोफेसर भी कड़ी मेहनत करके ही ऊपर आए थे, इसलिए गुरु-शिष्य की यह जोड़ी बहुत अच्छी थी।



​जतिन प्रोफेसर का बहुत सम्मान करता था। एक बार जब जतिन और उसका दोस्त लाइब्रेरी जा रहे थे, तब अनाया सामने से आती दिखी। जतिन उसे एकटक देखता रह गया। उसके दोस्त ने उसे कोहनी मारी, तो जतिन झेंपकर मुस्कुराने लगा।



​दोस्त: "तुझे उसे सिर्फ देखकर ही पेट भरना पड़ेगा। वह हम जैसे साधारण लड़कों की पहुँच से बाहर है।"
​जतिन: "क्यों? ऐसा क्यों? साधारण हैं तो क्या हुआ, भावनाएं तो हमारे पास भी हैं।"




​दोस्त: "हाँ, पर ये भावनाएं पैसों के सामने हमेशा फीकी पड़ जाती हैं। वह नंबर एक की 'कैरेक्टरलेस' और बिगड़ी हुई लड़की है।"



​जतिन: "कैरेक्टरलेस? बिगड़ी हुई? तुम उस पर ऐसा आरोप कैसे लगा सकते हो?" जतिन को गुस्सा आ गया।


​दोस्त: "अरे, आरोप नहीं, सच है यह। कॉलेज में किसी से भी पूछ ले, सबको पता है। ड्रिंक, बार, पार्टियां, ड्रग्स... यहाँ तक कि मैंने यह भी सुना है कि वह अपने ग्रुप में 'फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स' है।"


​यह सुनकर जतिन के दिल को गहरा धक्का लगा। कॉलेज में आने के बाद वह पहली लड़की थी जिसे उसने पसंद किया था, और उसके बारे में यह सब सुनकर जतिन सन्न (Shocked) रह गया।


***
 कहानी का ये भाग कैसा लगा कमेंट कर के जरूर बतायेगा. और मुझे फॉलो करना ना भूले.