Jism nahi... Izazat chahiye - 1 in Hindi Love Stories by Anshu Gupta books and stories PDF | जिस्म नहीं… इजाज़त चाहिए - 1

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जिस्म नहीं… इजाज़त चाहिए - 1


 Episode 1: पहली रात… लेकिन वैसी नहीं
कमरे में हल्की पीली रोशनी फैली हुई थी…
फूलों की खुशबू जैसे हर सांस के साथ दिल तक उतर रही थी…
और मैं… लाल जोड़े में सजी मैं थी…मैं धीरे से आईने के सामने खड़ी हो गई…
लाल जोड़े में सजी हुई… खुद को पहचान नहीं पा रही थी…
ये वही लड़की थी… जो कुछ दिन पहले तक हंसती थी, खुलकर जीती थी…
मैंने अपनी आंखों में देखा…
वहां खुशी कम… और सवाल ज्यादा थे…
 “क्या मैं सच में इस रिश्ते के लिए तैयार हूँ…?”
लेकिन जवाब…
आज भी मेरे पास नहीं था…
गहनों का बोझ शरीर पर था…
और सवालों का बोझ दिल पर…
हाथों की मेंहदी अभी भी गहरी थी…
चूड़ियों की हल्की खनक कमरे की खामोशी को तोड़ रही थी…
लेकिन मेरे अंदर…
 शोर बहुत था…
डर भी…
झिझक भी…
और कुछ अनकही उम्मीदें भी…
आज मेरी शादी की पहली रात थी…
वो रात, जिसके बारे में मैंने सिर्फ कहानियों में सुना था…
जहाँ सब कुछ तय होता है…
जहाँ एक रिश्ता “पूरा” माना जाता है…
लेकिन मुझे नहीं पता था…
 मेरी कहानी उन कहानियों जैसी नहीं होने वाली थी…
दरवाज़े के बाहर कदमों की आहट सुनाई दी…जब वो कमरे में आता है
दरवाज़ा बंद होने की हल्की सी आवाज़ आई…
और जैसे ही कुंडी लगी…
मेरे दिल की धड़कन और तेज़ हो गई…
वो कुछ पल वहीं खड़ा रहा…
जैसे मुझे देख रहा हो…
और मैं…
 अपनी ही सांसों की आवाज़ से डर रही थी…
मेरी उंगलियां आपस में उलझ गईं…
दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो गई कि लगा—अभी सुनाई दे जाएगी…
मेरी नजरें अपने आप झुक गईं…
मैंने उसे ठीक से देखा भी नहीं…
बस इतना महसूस किया—
 अब मेरी ज़िंदगी बदलने वाली है…
वो मेरे पास आकर बैठ गया…
हम दोनों के बीच कुछ इंच की दूरी थी…
लेकिन उस दूरी में…
 हजारों अनकहे सवाल थे…
कुछ पल…
बस खामोशी…
फिर उसने धीरे से मेरा हाथ थामा…, मैं थोड़ा सहम गई
उसका स्पर्श अलग था…
ना जल्दबाज़ी…
ना कोई हक जताने की कोशिश…
बस… जैसे वो मुझे समझना चाहता हो…
मैंने सोचा—
अब सब वैसा ही होगा…
जैसा हर लड़की सुनती आई है…
लेकिन…
 अगले ही पल उसने जो कहा…
उसने मेरे सारे खयाल बदल दिए—
“डरो मत…”
उसकी आवाज़ बहुत शांत थी…
मैंने धीरे से उसकी तरफ देखा…
“मैं… तुम्हें तब तक नहीं छुऊँगा…
जब तक तुम खुद मुझे इजाज़त नहीं दोगी…”
एक पल के लिए…
सब कुछ जैसे रुक गया…
“क्या…?”
मेरी आवाज़ खुद मुझे अजनबी लगी…
वो मेरी आंखों में देख रहा था…
बिना किसी झिझक के…
बिना मुस्कुराए…
“रिश्ता सिर्फ जिस्म से नहीं बनता…”
उसने धीरे से कहा…
“मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे जानो… समझो…
और जब तुम्हें सही लगे… तभी…”
मेरे अंदर कुछ टूट भी रहा था…
और कुछ नया बन भी रहा था…
 ये सुकून था…
या डर…
मैं तय नहीं कर पा रही थी…
क्योंकि…
आज तक मैंने जो भी सुना था…
उसमें “इजाज़त” जैसी कोई बात नहीं थी…
शादी… मतलब हक…
बस यही सीखा था…
लेकिन यहाँ…
 कोई मुझसे मेरी मर्ज़ी पूछ रहा था…
मैंने धीरे से अपना हाथ उससे अलग किया…
दिल में एक ही सवाल बार-बार गूंज रहा था—
 “आखिर वो ऐसा क्यों कर रहा है…?”
क्या वो सच में इतना अच्छा है…
या…
 इसके पीछे कोई ऐसा सच छुपा है…
जिसे जानकर मैं खुद को संभाल नहीं पाऊँगी…?
उस रात हम दोनों के बीच दूरी बनी रही…
लेकिन वो दूरी…
 सिर्फ हमारे बीच नहीं थी…
वो दूरी थी—
मेरी सोच और उसकी सोच के बीच…
और मुझे नहीं पता था—
 यही दूरी आगे चलकर
मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी कहानी बनने वाली थी