Chapter 1: डर की शुरुआत
रतनपुर…
एक छोटा सा गाँव… गुजरात के किनारे बसा हुआ।
दिन में ये गाँव बिल्कुल साधारण लगता था —
मिट्टी के घर, कच्ची सड़कें, खेतों में काम करते लोग,
और बच्चों की हँसी…
लेकिन जैसे ही सूरज ढलता…
ये गाँव बदल जाता था।
हवा भारी हो जाती…
गलीयाँ सूनी पड़ जाती…
और हर घर के दरवाजे सूरज ढलने से पहले ही बंद हो जाते।
यहाँ लोग रात से नहीं डरते थे…
डरते थे उस चीज़ से… जो उन्हें दिखती नहीं थी।
“शाम के बाद बाहर मत निकलना…”
“पीपल के पेड़ के पास मत जाना…”
“अगर किसी ने नाम लेकर पुकारा… तो पीछे मत देखना…”
ये सब बातें यहाँ बच्चों को कहानी की तरह नहीं…
हकीकत की तरह सिखाई जाती थीं।
गाँव के बीचो-बीच एक पुराना पीपल का पेड़ था…
कहते थे —
उस पेड़ पर कोई रहता है।
कौन?
किसी ने कभी देखा नहीं…
लेकिन हर किसी ने उसके बारे में सुना जरूर था।
उसी गाँव में… कई साल बाद वापस लौटा था —
आरव।
शहर में पढ़ाई करके आया हुआ,
आँखों में सपने…
और दिमाग में सवाल लिए हुए।
जैसे ही वो बस से उतरा…
उसने गाँव को देखा… और हल्की सी मुस्कान आई।
“कुछ भी नहीं बदला…”
उसने मन ही मन सोचा।
घर पहुँचते ही उसकी माँ ने उसे गले लगा लिया।
“आ गया मेरा बेटा…”
उनकी आँखों में खुशी थी… और थोड़ा डर भी।
आरव ने तुरंत नोटिस किया।
“माँ… सब ठीक है ना?”
उसने पूछा।
माँ ने इधर-उधर देखा… जैसे कोई सुन रहा हो…
फिर धीरे से बोली —
“तू शहर में था… तुझे नहीं पता… यहाँ बहुत कुछ बदल गया है…”
आरव हँस पड़ा —
“माँ… ये गाँव है, यहाँ क्या बदल जाएगा?”
माँ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा —
“यहाँ अब लोग… लोगों से नहीं… चीज़ों से डरते हैं…”
आरव थोड़ा serious हो गया।
“मतलब?”
माँ ने कुछ कहने ही वाली थी…
तभी बाहर से तेज़ आवाज आई —
“अरे जल्दी आओ! मुकुंद भाई के घर कुछ हो गया!!”
पूरा गाँव जैसे एक साथ भागने लगा…
आरव भी बाहर निकला।
गली में अफरा-तफरी मची थी…
लोग डर के मारे फुसफुसा रहे थे —
“फिर से वही हुआ…”
“इस बार मुकुंद भाई के घर…”
“भगवान बचाए…”
आरव ने एक आदमी को रोका —
“क्या हुआ?”
वो आदमी घबराया हुआ था…
“उनकी बेटी… पूजा…
अचानक चिल्लाने लगी…
कह रही है कोई उसे पकड़ रहा है…”
आरव का दिमाग तुरंत active हो गया।
“कोई बीमारी होगी…”
उसने सोचा।
लेकिन गाँव वाले पहले ही फैसला कर चुके थे —
“उस पर साया है…”
जब आरव मुकुंद भाई के घर पहुँचा…
तो अंदर का नज़ारा देखकर वो एक पल के लिए रुक गया।
पूजा जमीन पर बैठी थी…
उसके बाल बिखरे हुए…
आँखें लाल…
और वो जोर-जोर से काँप रही थी।
“मत आओ मेरे पास!!”
वो चीखी।
“वो यहीं है… वो मुझे देख रहा है…”
चारों तरफ खड़े लोग डर के मारे पीछे हट गए।
कोई पास जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था।
एक औरत बोली —
“ये वही साया है… जो पिछले महीने रमेश के बेटे को ले गया…”
दूसरी ने कहा —
“हाँ… पहले भी ऐसे ही हुआ था…”
आरव आगे बढ़ा।
“Side हटो…”
उसने कहा।
जैसे ही वो पूजा के पास गया…
उसने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
लेकिन पूजा ने झटके से हाथ छुड़ा लिया और चीखी —
“तू भी मर जाएगा!! वो तुझे नहीं छोड़ेगा!!”
पूरा कमरा सन्न हो गया।
तभी…
एक भारी आवाज गूंजी —
“कोई उसे हाथ मत लगाना…”
सबने पीछे मुड़कर देखा।
दरवाजे पर खड़ा था —
कालिया बाबा।
लंबी दाढ़ी…
काले कपड़े…
गले में माला…
और आँखों में अजीब सा आत्मविश्वास।
जैसे ही वो अंदर आया…
लोग अपने आप रास्ता छोड़ते गए।
मुकुंद भाई दौड़कर उसके पास आए —
“बाबा… मेरी बेटी को बचा लो…”
कालिया बाबा ने पूजा की तरफ देखा…
और आँखें बंद करके कुछ बुदबुदाया।
फिर धीरे से बोला —
“इस पर… बहुत पुराना साया है…”
कमरे में खामोशी छा गई।
आरव ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“ये सब ड्रामा है…”
उसने मन में सोचा।
वो आगे बढ़ा और बोला —
“ये साया-वाया कुछ नहीं होता…
इसे hospital ले जाओ… ये medical case है।”
पूरा गाँव उसकी तरफ देखने लगा।
किसी ने धीरे से कहा —
“शहर से आया है… भगवान को नहीं मानता…”
कालिया बाबा ने आँखें खोलीं…
और सीधे आरव को घूरते हुए बोला —
“तू बहुत बड़ा ज्ञानी बन रहा है…
लेकिन कुछ चीजें तेरे समझ से बाहर हैं…”
आरव ने भी बिना डरे जवाब दिया —
“और कुछ चीजें… आपके धोखे से बाहर हैं।”
कमरे में tension बढ़ गया।
मुकुंद भाई घबरा गए —
“बस करो! मेरी बेटी की जान खतरे में है!”
कालिया बाबा ने हाथ उठाया…
और गहरी आवाज में बोला —
“आज रात… पूजा होगी।
अगर ये पूजा नहीं हुई…
तो ये लड़की… सुबह तक जिंदा नहीं बचेगी।”
ये सुनकर सबके चेहरे पर डर साफ दिखने लगा।
आरव ने आखिरी बार कोशिश की —
“आप लोग समझ क्यों नहीं रहे… ये बीमारी है—”
लेकिन इस बार…
किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।
सबकी उम्मीद अब सिर्फ एक इंसान पर थी —
कालिया बाबा।
आरव चुप हो गया…
लेकिन उसके अंदर कुछ जल रहा था।
उसने पूजा को देखा…
उसकी हालत… उसकी सांस… उसका डर…
और फिर धीरे से खुद से कहा —
“या तो ये लो आज सच जानेंगे…
या फिर एक और जान चली जाएगी…”
बाहर…
सूरज पूरी तरह डूब चुका था।
और रतनपुर गाँव पर…
फिर से डर का अंधेरा छा गया था…
(To be continued…)