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गाँव के पश्चिम छोर पर एक कुआँ था। वह पुराना, गोल और काई से भरा था। इतना गहरा था कि दोपहर की धूप भी उसके तल तक पहुँचते-पहुँचते बूढ़ी पड़ जाती। किसने बनवाया, किसी को याद नहीं। क्यों बनवाया, यह पूछने की आदत किसी में नहीं थी। बस, यूँ समझ लो कि गाँव में चीज़ें कारण से कम, परंपरा से ज़्यादा बची रहती थीं। शायद इसलिए इतने आधुनिक युग में भी उसकी उपयोगिता और उसका आधार बचा हुआ था। खैर, उसी कुएँ के जगत पर एक लड़का बैठा मिल जाता, "ईशान"। वह न पानी भरता, न नहाता, न सिक्का फेंककर इच्छा माँगता। वह सिर्फ़ देखता, ऐसे… जैसे नीचे पानी नहीं, कुछ और रखा हो। पहले-पहल लोगों ने सोचा कि उसे पानी से प्रेम है। फिर लगा कि उसे अकेलेपन से प्रेम है। फिर एक समय आया जब लोगों ने उसके बारे में सोचना छोड़ दिया। समाज अंततः उस बात को आदत कहकर भुला देता है। ईशान घंटों कुएँ के जगत पर बैठा रहता। कभी झुककर, कभी लेटकर, कभी आँखें बंद करके। फिर अचानक झाँकता घंटों, जैसे कोई बच्चा जन्म लेने के बाद दुनिया देख रहा हो।
एक दिन उसकी माँ ने पूछा,
“दिन भर उस कुएँ में क्या देखता है?”
ईशान ने कहा, “पूरा आसमान।
” माँ हँस पड़ी।
“आसमान ऊपर है।
” ईशान ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।
“अगर ऊपर है, तो नीचे पूरा कैसे दिखता है?”
माँ ने जवाब नहीं दिया (रोटी जलने लगी थी)।
उस दिन के बाद ईशान ने लोगों से कम और कुएँ से ज़्यादा बात करनी शुरू कर दी। बरसात के दिनों में जब पानी साफ़ होता, वह मुस्कुराता। गर्मी में जब पानी नीचे चला जाता, वह और गहरा झुककर देखता। सर्दियों में जब धुंध पड़ती, वह देर तक इंतज़ार करता कि धुंध हटे, और आसमान फिर से लौटे। गाँव का सबसे बूढ़ा आदमी एक दिन उसके पास बैठा।
पूछा, “हर मौसम में एक ही चीज़ देखने से ऊब नहीं होती?”
ईशान ने कुएँ में झाँकते हुए कहा —
मैं हर बार वही नहीं देखता।
फिर क्या बदलता है? आसमान?
ईशान मुस्कुराया
नहीं… देखने वाला।
बूढ़ा चुप हो गया।
फिर बोला, “तुम्हारी उम्र में हम खेत देखते थे, देह देखते थे, भविष्य देखते थे… तुम पानी में क्या खोजते हो?”
ईशान ने कुएँ में झाँका
जिस दिन पहली बार मुझे मेरा नाम पुकारा गया, उस दिन से मैं सोच रहा हूँ… जिसे लोग पुकारते हैं, क्या मैं वही हूँ?
हवा कुछ देर तक दोनों के बीच बैठी रही।
दूर कहीं गाय बँधी थी ,कहीं कोई बच्चा रो रहा था,
कहीं रोटी फूल रही थी और दुनिया अपने काम में लगी रही।
बूढ़े ने धीरे से पूछा—
और कुछ मिला?
ईशान ने कहा, “हाँ।”
“क्या?”
लड़के ने पानी में झाँकते हुए कहा,
जो चीज़ें सबसे ज़्यादा मेरी लगती थीं— नाम, घर, चेहरा, यादें… उनमें से एक भी मेरे साथ पैदा नहीं हुई थी।
बूढ़े ने पहली बार कुएँ में झाँका ।
उसे अपना चेहरा दिखा ,झुर्रियों से भरा, काँपता हुआ।
कुछ देर बाद उसने पूछा —
“फिर अपना क्या है?”
ईशान ने कहा, “शायद… सिर्फ़ वह क्षण, जब आदमी बिना किसी गवाह के अपने भीतर गिरता है।”
उस रात बूढ़ा घर लौटा तो उसने पहली बार अपने पोते का नाम भूलकर उसे सिर्फ़ देखा। पहली बार अपनी पत्नी के चेहरे की झुर्रियों को उम्र नहीं, समय की लिखावट समझा। पहली बार खाना खाते हुए जल्दी नहीं की। और पहली बार सोने से पहले उसने छत नहीं देखी।
आँखें बंद कीं… और भीतर एक गोल, गहरा कुआँ देखा।
एक कुआँ जिसमें — पूरा आसमान था।
@ कुणाल कुमार