नाटक का नाम: “पढ़ही त बढ़ही – बिटिया के सपना”
✍️ विषय:
नारी शिक्षा, जागरूकता, समाज परिवर्तन
👥 पात्र:
सुनीता – पढ़ाई के लिए उत्सुक लड़की
रामू – सुनीता के पिता (पुरानी सोच)
सीता – सुनीता की माँ (समझदार)
मास्टर जी – स्कूल शिक्षक
गांव के सरपंच
दो-तीन ग्रामीण (पुरुष/महिला)
🎬 दृश्य 1 – (घर के आंगन में)
(सुनीता किताब लेकर बैठी है)
सुनीता:
माँ, मोला स्कूल जाए के मन करत हे। मोर संगवारी मन सब पढ़े जाथें, मंय काबर नई जा सकत हंव?
रामू (गुस्सा में):
लइकी मन पढ़-लिख के का करहीं? तोला घर-गिरस्ती सिखे के जरूरत हे।
सीता (धीरे से):
अरे सुनव जी, जमाना बदलत हे। लइकी मन घलो पढ़-लिख के आगू बढ़त हें।
रामू:
मोर घर के नियम हे—लइकी स्कूल नई जाही!
(सुनीता उदास हो जाथे)
🎬 दृश्य 2 – (गांव के स्कूल के बाहर)
(मास्टर जी और सरपंच बात कर रहे हैं)
मास्टर जी:
सरपंच जी, गांव मं अभी घलो कई लइकी मन स्कूल नई आवत हें। ये ठीक नई ये।
सरपंच:
हव मास्टर जी, अब हमन ला सब ला समझाय के परही।
(सुनीता धीरे-धीरे आके खड़ी हो जाथे)
मास्टर जी:
का हो बेटी, तंय स्कूल काबर नई आवत हस?
सुनीता:
बाबूजी मनाही करथें मास्टर जी..
🎬 दृश्य 3 – (गांव में बैठक)
(सब ग्रामीण जमा हें)
सरपंच:
भाइयो-बहिनी हो! पढ़ई सबके अधिकार हे—चाहे लइका होय या लइकी।
मास्टर जी:
जेन घर के लइकी पढ़ही, ओ घर अउ गांव दुनो आगे बढ़ही।
ग्रामीण 1:
हमन गलती करत रहेन... अब अपन बेटी ला जरूर पढ़ाबो।
🎬 दृश्य 4 – (घर में बदलाव)
(रामू सोचत हावे)
रामू:
मंय गलत सोचत रहेंव का? अगर मोर बेटी पढ़ही, त वो घलो कुछ बन सकथे।
(सुनीता उदास बैठी है)
रामू (प्यार से):
सुनीता, कल ले तंय स्कूल जाबे।
सुनीता (खुशी से):
सच बाबूजी? मंय खूब पढ़हूं!
सीता:
देखव, पढ़ई से जिनगी बदल जाथे।
🎬 दृश्य 5 – (कुछ साल बाद – स्कूल मंच)
(सुनीता अब बड़ी हो गई, पुरस्कार लेत हावे)
सुनीता:
आज मंय जेन बने हंव, वो मोर पढ़ई अउ मोर परिवार के समर्थन ले बने हंव।
सरपंच:
ये गांव अब हर लइकी ला पढ़ाही!
सब मिलके:
👉 “पढ़ही त बढ़ही, लइकी घलो आगे बढ़ही!” 👈
कवि लेखक
कुलेश्वर जायसवाल
सेमरिया जिला कबीरधाम
नाटक का नाम: “पढ़ही त बढ़ही – बिटिया के सपना”
✍️ विषय:
नारी शिक्षा, जागरूकता, समाज परिवर्तन
👥 पात्र:
सुनीता – पढ़ाई के लिए उत्सुक लड़की
रामू – सुनीता के पिता (पुरानी सोच)
सीता – सुनीता की माँ (समझदार)
मास्टर जी – स्कूल शिक्षक
गांव के सरपंच
दो-तीन ग्रामीण (पुरुष/महिला)
🎬 दृश्य 1 – (घर के आंगन में)
(सुनीता किताब लेकर बैठी है)
सुनीता:
माँ, मोला स्कूल जाए के मन करत हे। मोर संगवारी मन सब पढ़े जाथें, मंय काबर नई जा सकत हंव?
रामू (गुस्सा में):
लइकी मन पढ़-लिख के का करहीं? तोला घर-गिरस्ती सिखे के जरूरत हे।
सीता (धीरे से):
अरे सुनव जी, जमाना बदलत हे। लइकी मन घलो पढ़-लिख के आगू बढ़त हें।
रामू:
मोर घर के नियम हे—लइकी स्कूल नई जाही!
(सुनीता उदास हो जाथे)
🎬 दृश्य 2 – (गांव के स्कूल के बाहर)
(मास्टर जी और सरपंच बात कर रहे हैं)
मास्टर जी:
सरपंच जी, गांव मं अभी घलो कई लइकी मन स्कूल नई आवत हें। ये ठीक नई ये।
सरपंच:
हव मास्टर जी, अब हमन ला सब ला समझाय के परही।
(सुनीता धीरे-धीरे आके खड़ी हो जाथे)
मास्टर जी:
का हो बेटी, तंय स्कूल काबर नई आवत हस?
सुनीता:
बाबूजी मनाही करथें मास्टर जी..
🎬 दृश्य 3 – (गांव में बैठक)
(सब ग्रामीण जमा हें)
सरपंच:
भाइयो-बहिनी हो! पढ़ई सबके अधिकार हे—चाहे लइका होय या लइकी।
मास्टर जी:
जेन घर के लइकी पढ़ही, ओ घर अउ गांव दुनो आगे बढ़ही।
ग्रामीण 1:
हमन गलती करत रहेन... अब अपन बेटी ला जरूर पढ़ाबो।
🎬 दृश्य 4 – (घर में बदलाव)
(रामू सोचत हावे)
रामू:
मंय गलत सोचत रहेंव का? अगर मोर बेटी पढ़ही, त वो घलो कुछ बन सकथे।
(सुनीता उदास बैठी है)
रामू (प्यार से):
सुनीता, कल ले तंय स्कूल जाबे।
सुनीता (खुशी से):
सच बाबूजी? मंय खूब पढ़हूं!
सीता:
देखव, पढ़ई से जिनगी बदल जाथे।
🎬 दृश्य 5 – (कुछ साल बाद – स्कूल मंच)
(सुनीता अब बड़ी हो गई, पुरस्कार लेत हावे)
सुनीता:
आज मंय जेन बने हंव, वो मोर पढ़ई अउ मोर परिवार के समर्थन ले बने हंव।
सरपंच:
ये गांव अब हर लइकी ला पढ़ाही!
सब मिलके:
👉 “पढ़ही त बढ़ही, लइकी घलो आगे बढ़ही!” 👈
कवि लेखक
कुलेश्वर जायसवाल
सेमरिया जिला कबीरधाम