The one whom the heart desired - 34 in Hindi Love Stories by R B Chavda books and stories PDF | दिल ने जिसे चाहा - 34

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दिल ने जिसे चाहा - 34

बहुत देर रात तक रुशाली की आँखों में नींद नहीं आई।

कमरे की लाइट बंद थी, खिड़की से हल्की-सी चाँदनी अंदर आ रही थी… और उसके तकिये के पास रखा फोन बार-बार उसका ध्यान खींच रहा था।

उसने धीरे से फोन उठाया।

स्क्रीन ऑन की…

और वही मैसेज सामने चमक उठा—

“मैं घर पहुँच गया, मेडम जी… अब सो जाओ… Good Night.”

रुशाली के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

इतनी छोटी-सी लाइन… लेकिन दिल को जैसे पूरा सुकून मिल गया था।

उसने फोन को धीरे से अपने दिल के पास रख लिया और आँखें बंद कर लीं।

कभी-कभी ज़िंदगी में बहुत बड़ी-बड़ी बातें नहीं चाहिए होतीं…
बस एक ऐसा इंसान चाहिए होता है जो यह पूछ ले कि तुम ठीक हो या नहीं।

उस रात उसे पहली बार सच में लगा—

अब उसका इंतज़ार खत्म होने वाला है।

अगली सुबह

सुबह की हल्की-सी धूप खिड़की से कमरे में उतर रही थी।

रुशाली की आँखें धीरे-धीरे खुलीं।

पहला ख्याल…

मयूर सर।

उसने तुरंत फोन उठाया और बिना वजह ही चैट खोल ली।

मैसेज तो वही था… लेकिन आज उसे पढ़कर दिल में एक अलग-सी गर्माहट महसूस हो रही थी।

वो धीरे से मुस्कुराई और खुद से बोली—

“पाँच साल…
पूरा पाँच साल मैंने बस इंतज़ार ही किया है…”

उसने खिड़की की तरफ देखा। बाहर पेड़ों पर हल्की हवा चल रही थी।

“लेकिन शायद इंतज़ार भी तभी खूबसूरत होता है…
जब उसका अंत सही इंसान से हो…”

किस्मत कभी-कभी बहुत देर से जवाब देती है,
लेकिन जब देती है तो आँखों में आँसू भी खुशी के ही आते हैं…

कुछ लोग ज़िंदगी में देर से आते हैं,
लेकिन आते सही वक्त पर ही हैं…


रुशाली तैयार होकर बाहर आई तो माँ रसोई में चाय बना रही थीं।

वो कुछ पल तक दरवाज़े के पास खड़ी उन्हें देखती रही।

कितने सालों से माँ ने उसके लिए सब कुछ सहा था…

पापा के जाने के बाद भी कभी उसे टूटने नहीं दिया।

रुशाली धीरे से बोली—
“माँ…”

माँ ने पीछे मुड़कर देखा—
“अरे… आज इतनी जल्दी उठ गई?”

रुशाली हल्का-सा मुस्कुराई।
“माँ… मुझे आपसे एक बात कहनी है।”

माँ ने ध्यान से उसकी तरफ देखा।
“क्या हुआ बेटा?”

रुशाली कुछ पल चुप रही… फिर धीरे-धीरे बोली—
“मयूर सर के घर वाले… दो दिन बाद… हमारे घर शगुन लेकर आने वाले हैं।”

माँ के हाथ रुक गए।
रसोई में कुछ पल के लिए बिल्कुल खामोशी छा गई।

माँ ने धीरे से पूछा—
“सच में…?”

रुशाली की आँखें भर आईं।
“हाँ माँ…”

माँ की आँखों में भी आँसू आ गए।

उन्होंने धीरे से कहा—
“अगर तुम्हारे पापा आज होते ना… तो सबसे ज्यादा खुश वही होते…”

बस इतना सुनते ही रुशाली तुरंत माँ के गले लग गई।

दोनों कुछ देर तक वैसे ही खड़ी रहीं।

कोई कुछ नहीं बोल रहा था… लेकिन दोनों के दिल में एक ही बात थी—
आज पापा की बहुत याद आ रही थी।


थोड़ी देर बाद रुशाली अपने कमरे में गई।

दीवार पर पापा की फोटो लगी थी।

वो धीरे-धीरे उसके सामने जाकर खड़ी हो गई।
कुछ पल तक बस उन्हें देखती रही।

फिर धीरे से बोली—
“पापा…
आप हमेशा कहते थे ना कि एक दिन आपकी बेटी की ज़िंदगी में वो सारी खुशियां आएगी जिसकी वो हकदार है…”

उसकी आवाज़ भर गई।
“पापा… आपकी बेटी आज सच में खुश है…”

उसने धीरे से फोटो को छुआ।
“और जिस इंसान को मैंने चुना है…
वो बहुत अच्छा है पापा…
बहुत अच्छा…”

उसकी आँखों से आँसू गिर गए… लेकिन इस बार ये आँसू दर्द के नहीं थे।

ये आँसू सुकून के थे।

मयूर सर सुबह से ही बहुत खुश थे।

माँ फोन पर रिश्तेदारों से बात कर रही थीं—
“हाँ… दो दिन बाद शगुन लेकर जाना है… तुम लोग भी आ जाना…”

पिताजी अखबार पढ़ते-पढ़ते मुस्कुरा रहे थे।

“लगता है अब घर में शादी का माहौल शुरू हो ही गया…”

माँ हँस दीं—
“और क्या… हमारी बहू भी कोई छोटी-मोटी नहीं है… बड़ी अफसर है।”

मयूर मुस्कुरा दिए।
“माँ… वो ऐसी बिल्कुल नहीं है… बहुत simple है।”

माँ ने कहा—
“तो ठीक है… अब जल्दी से हमें उससे मिलवा दो।”

मयूर ने धीरे से कहा—
“बस दो दिन और… फिर आप खुद मिल लेना…”

शाम को मयूर का फोन बजा।

स्क्रीन पर नाम चमक रहा था—
Medam ji Calling…

मयूर के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

उन्होंने तुरंत फोन उठाया—
“Hello मेडम जी…”

उधर से हल्की-सी हँसी आई—
“मयूर सर… आप भी ना…”

मयूर बोले—
“तो बताइए… आज दिन कैसा रहा?”

रुशाली कुछ पल चुप रही।
फिर धीरे से बोली—
“मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा… कि दो दिन बाद आप शगुन लेकर मेरे घर आने वाले हो…”

मयूर सर भी कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
“मुझे भी नहीं हो रहा… पाँच साल पहले जो रिश्ता अधूरा रह गया था… वही अब किस्मत खुद पूरा करने जा रही है…”

रुशाली मुस्कुराई।

“मयूर सर…”

“हम्म…”

“एक बात पूछूँ?”

“पूछो…”

“अगर उस दिन मैं आपसे दूर नहीं जाती… तो क्या हम आज भी ऐसे ही होते?”

मयूर सर कुछ पल चुप रहे।

फिर धीरे से बोले—
“नहीं… शायद तब हमें अपने प्यार की कीमत ही समझ नहीं आती…”

थोड़ी देर बाद मयूर ने कहा—

“वैसे एक और बात बतानी थी…”

“क्या?”

“माँ-पापा ने कहा है… शगुन वाले दिन ही engagement की date भी fix कर देंगे।”

रुशाली कुछ पल बिल्कुल चुप हो गई।
“सच में…?”

“हाँ… और शायद अगले महीने ही engagement हो जाएगी…”

रुशाली की आँखें भर आईं।

“मुझे तो अब भी लग रहा है जैसे मैं सपना देख रही हूँ…”

मयूर मुस्कुराए—
“तो सुन लो… ये सपना नहीं है… ये हमारी जिंदगी है… और अब कोई हमें अलग नहीं कर सकता।”

फोन कटने के बाद भी रुशाली कुछ देर तक वैसे ही खड़ी रही…

हाथ में फोन… होंठों पर हल्की-सी मुस्कान… और आँखों में एक अजीब-सा सुकून।

वो धीरे से खिड़की के पास गई।

आसमान में चाँद चमक रहा था।

रुशाली ने उसे देखते हुए हल्के से कहा—

“पाँच साल पहले…
मैं इसी चाँद को देखकर रोती थी…”

उसकी आँखें नम हो गईं… लेकिन इस बार दर्द नहीं था।

“और आज…
उसी चाँद को देखकर मुस्कुरा रही हूँ…”

उसने आँखें बंद कीं।

जैसे अपने सारे पुराने दर्द को वहीं छोड़ दिया हो…

और धीरे से खुद से कहा—

“अब सब ठीक है…”

कभी-कभी प्यार अधूरा रह जाता है…
लेकिन अगर वो सच्चा हो,
तो किस्मत उसे फिर से पूरा करने का रास्ता ढूंढ ही लेती है…

कुछ इंतज़ार लंबे जरूर होते हैं,
लेकिन उनका अंत… हमेशा खूबसूरत होता है…

उधर मयूर सर भी अपने कमरे की खिड़की के पास खड़े थे।

फोन हाथ में था…
और चेहरे पर वही सुकून।

उन्होंने धीरे से आसमान की तरफ देखा और मुस्कुराए—

“अब और इंतज़ार नहीं… रुशाली…”

दोनों अपने-अपने घरों में थे…
लेकिन दिल एक ही जगह था।

दो दिन बाद…
दोनों परिवार मिलेंगे…

शगुन होगा…
और उसी दिन उनके रिश्ते को एक नाम भी मिलेगा।

पाँच साल पहले जो कहानी अधूरी रह गई थी…
अब वो पूरी होने जा रही थी।

अब शुरुआत होने वाली थी उस सफर की…
जहाँ इंतज़ार नहीं…
सिर्फ साथ होगा।

जहाँ खामोशियाँ नहीं…
सिर्फ बातें होंगी।

और जहाँ दो नाम नहीं…
सिर्फ एक रिश्ता होगा—

मयूर और रुशाली। ❤️

अगले भाग में —
उनकी सगाई… और एक नई शुरुआत। ✨