ऋगुवेद सूक्ति-(34) की व्याख्या-- "देवो देवनामसि"ऋग्वेद- 1-94-13अर्थ--हे प्रभु ! तू देवों का देव है।विस्तृत भावार्थ :इस मन्त्र में परमात्मा की सर्वोच्चता बताई गई है। संसार में जो भी देवता (प्रकाश देने वाले, शक्तियाँ देने वाले) माने जाते हैं—उन सबका मूल कारण और अधिपति परमेश्वर ही है। वही सबको शक्ति, तेज और सामर्थ्य देता है। इसलिए वह देवों का भी देव है।शब्दार्थ :देवः — प्रकाशमान, दैवी शक्ति वालादेवानाम् — देवताओं काअसि — तू हैभाव :परमेश्वर ही सभी दैवी शक्तियों का मूल स्रोत है और उसी से सब देवताओं की शक्ति प्रकट होती है।ऋग्वेद १.९४.१३ का पूरा मंत्र यह है —देवो देवानामसि मित्रो अद्भुतोवसुर्वसूनामसि चारुरध्वरे ।शर्मन्त्स्याम तव सप्रथस्तमेऽग्नेसख्ये मा रिषामा वयं तव ॥पदच्छेददेवः । देवानाम् । असि । मित्रः । अद्भुतः । वसुः । वसूनाम् । असि । चारुः । अध्वरे । शर्मन् । स्याम । तव । सप्रथस्तमे । अग्ने । सख्ये । मा । रिषाम । वयम् । तव ॥भावार्थ“हे अग्ने! तुम देवों के देव, अद्भुत मित्र, वसुओं में श्रेष्ठ वसु और यज्ञ में प्रिय हो। हम तुम्हारे विस्तृत संरक्षण में रहें; तुम्हारी मित्रता में हम कभी क्षति न पाएं।”“देवो देवानामसि” — यही अंश है जिसका भाव आपने कहा था: “हे प्रभु! तू देवों का देव है।”वेदों में प्रमाण---१. ऋग्वेदमन्त्र :हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रेभूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमांकस्मै देवाय हविषा विधेम॥— ऋग्वेद १०.१२१.१अर्थ :सृष्टि के प्रारम्भ में हिरण्यगर्भ (परमात्मा) ही था। वही समस्त प्राणियों का एकमात्र स्वामी था। उसी ने पृथ्वी और आकाश को धारण किया। हम उस परम देव की उपासना करें।२. ऋग्वेदमन्त्र :महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥— ऋग्वेद ३.५५.१अर्थ :समस्त देवताओं की महान शक्ति वास्तव में एक ही परम सत्ता से आती है।३. यजुर्वेदमन्त्र :तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः।तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः॥— यजुर्वेद ३२.१अर्थ :वही परमात्मा अग्नि है, वही आदित्य है, वही वायु है, वही चन्द्रमा है; वही ब्रह्म है, वही जल है और वही प्रजापति है।४. यजुर्वेदन तस्य प्रतिमा अस्तियस्य नाम महद्यशः॥— यजुर्वेद ३२.३अर्थ :उस परमेश्वर की कोई प्रतिमा या समान नहीं है, जिसका नाम महान और यशस्वी है।५. ऋग्वेदमन्त्र :इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुःअथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्तिअग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥— ऋग्वेद १.१६४.४६अर्थ :ज्ञानी लोग एक ही परम सत्य को अनेक नामों से पुकारते हैं — कोई उसे इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि आदि कहते हैं। सार--इन वेद मन्त्रों से स्पष्ट होता है कि एक ही परमात्मा सभी देवताओं का मूल कारण, स्वामी और शक्ति का स्रोत है। इसी कारण उसे देवों का देव कहा जाता है।उपनिषदो में प्रमाण--(1) यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्चविश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वंस नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥— श्वेताश्वतर उपनिषद ३.४अर्थ :जो समस्त देवताओं का कारण और उत्पत्ति का स्रोत है, जो सम्पूर्ण विश्व का स्वामी है — वही परमेश्वर है। वही पहले हिरण्यगर्भ को उत्पन्न करता है और वह हमें शुभ बुद्धि प्रदान करे।(२) न तस्य कार्यं करणं च विद्यतेन तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयतेस्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥— श्वेताश्वतर उपनिषद ६.८अर्थ :उस परमेश्वर का कोई कार्य करने वाला अंग या साधन नहीं है और न ही उसके समान या उससे बढ़कर कोई है। उसकी अनेक दिव्य शक्तियाँ स्वाभाविक रूप से कार्य करती हैं।(३) ईशावास्यमिदं सर्वंयत्किञ्च जगत्यां जगत्।तेन त्यक्तेन भुञ्जीथामा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥— ईशोपनिषद-- १अर्थ :इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ भी है वह सब परमेश्वर से व्याप्त है। इसलिए त्याग की भावना से इसका उपयोग करो और किसी के धन का लोभ मत करो।(४) यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः।तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥— मुण्डक उपनिषद १.१.९अर्थ :जो सर्वज्ञ और सब कुछ जानने वाला है, जिसकी तपशक्ति ज्ञानमय है — उसी परम ब्रह्म से यह सम्पूर्ण जगत, नाम और रूप उत्पन्न होते हैं।(५) एको देवः सर्वभूतेषु गूढःसर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासःसाक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥— श्वेताश्वतर उपनिषद ६.११अर्थ :एक ही परम देव सब प्राणियों में गुप्त रूप से स्थित है। वह सबमें व्याप्त, सबका अन्तर्यामी, सब कर्मों का अध्यक्ष, सबका आधार, साक्षी और चेतन है।(६)नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्एको बहूनां यो विदधाति कामान्॥— कठ उपनिषद २.२.१३अर्थ :वह परमात्मा नित्य वस्तुओं में नित्य है, चेतन प्राणियों में सर्वोच्च चेतन है और वही एक परमेश्वर अनेक प्राणियों की आवश्यकताओं को पूर्ण करता है।(७) सर्वं खल्विदं ब्रह्म॥— छान्दोग्य उपनिषद ३.१४.१अर्थ :यह सम्पूर्ण जगत वास्तव में ब्रह्म (परमात्मा) ही है।(८) यतो वा इमानि भूतानि जायन्तेयेन जातानि जीवन्तियत्प्रयन्त्यभिसंविशन्तितद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म॥— तैत्तिरीय उपनिषद ३.१अर्थ :जिससे ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिससे जीवित रहते हैं और अंत में जिसमें विलीन हो जाते हैं — उसी को जानने का प्रयत्न करो; वही ब्रह्म है।(९) तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेतिनान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥— श्वेताश्वतर उपनिषद ३.८अर्थ :केवल उसी परमात्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु से पार हो सकता है; मुक्ति का अन्य कोई मार्ग नहीं है। सार--इन उपनिषद मन्त्रों से स्पष्ट होता है कि एक ही परमात्मा सबका आधार, अन्तर्यामी और सर्वोच्च देव है — अर्थात वही देवों का देव है।पुराणों में प्रमाण--(१) अहमेवासमेवाग्रेनान्यद्यत्सदसत्परम्।पश्चादहं यदेतच्चयोऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥— श्रीमद्भागवत महापुराण २.९.३३अर्थ :सृष्टि के प्रारम्भ में केवल मैं ही था, मेरे अतिरिक्त कोई भी सत् या असत् नहीं था। सृष्टि के बाद भी मैं ही हूँ और अंत में जो शेष रहेगा वह भी मैं ही हूँ।(२) नारायणाद्ब्रह्मा जायतेनारायणाद्रुद्रो जायते।नारायणादिन्द्रो जायतेनारायणात्प्रजापतिः॥— नारायणीय उपाख्यान (शान्ति पर्व)अर्थ :नारायण से ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, नारायण से रुद्र उत्पन्न होते हैं, नारायण से इन्द्र और प्रजापति उत्पन्न होते हैं।(३) यन्नाभिपद्मादभवन्महात्माप्रजापतिर्विश्वसृजां पतिः।— वायु पुराणअर्थ :जिस परमात्मा की नाभि के कमल से प्रजापति ब्रह्मा प्रकट हुए, वही सम्पूर्ण सृष्टि का मूल कारण है।(४) यः कारणं कारणानांसर्वेषां परमेश्वरः।स एव देवदेवेशःसर्वलोकनमस्कृतः॥— लिंग पुराणअर्थ :जो सभी कारणों का कारण और समस्त जगत का परमेश्वर है, वही देवों का देव और सब लोकों द्वारा पूजनीय है।(५) देवदेव जगन्नाथलोकनाथ नमोऽस्तु ते।— स्कन्द पुराणअर्थ :हे देवों के देव, हे जगत के स्वामी और लोकों के नाथ! आपको नमस्कार है।भगवद्गीता से प्रमाण--(१) अहं सर्वस्य प्रभवोमत्तः सर्वं प्रवर्तते।इति मत्वा भजन्ते मांबुधा भावसमन्विताः॥— भगवद्गीता १०.८अर्थ :मैं ही समस्त जगत का मूल कारण हूँ, मुझसे ही सब कुछ उत्पन्न और संचालित होता है। यह जानकर ज्ञानी लोग श्रद्धा से मेरी भक्ति करते हैं।(२) परं ब्रह्म परं धामपवित्रं परमं भवान्।पुरुषं शाश्वतं दिव्यम्आदिदेवं अजं विभुम्॥— भगवद्गीता १०.१२अर्थ :आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं। आप शाश्वत दिव्य पुरुष, आदि देव और अजन्मा हैं।(३) देवानां अस्मि वासवः॥— भगवद्गीता १०.२२अर्थ :देवताओं में मैं इन्द्र हूँ (अर्थात् देवताओं की श्रेष्ठ शक्तियों का मूल भी मैं ही हूँ)।(४) यो यो यां यां तनुं भक्तःश्रद्धयार्चितुमिच्छति।तस्य तस्याचलां श्रद्धांतामेव विदधाम्यहम्॥— भगवद्गीता ७.२१अर्थ :जो भक्त जिस देवता की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, उसकी श्रद्धा को स्थिर भी मैं ही करता हूँ।(५) येऽप्यन्यदेवताभक्तायजन्ते श्रद्धयान्विताः।तेऽपि मामेव कौन्तेययजन्त्यविधिपूर्वकम्॥— भगवद्गीता ९.२३अर्थ :हे अर्जुन! जो लोग अन्य देवताओं की श्रद्धा से पूजा करते हैं, वे भी वास्तव में मेरी ही पूजा करते हैं, यद्यपि विधि के अनुसार नहीं।सार--भगवद्गीता के इन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि परमात्मा ही सभी देवताओं का मूल कारण, आधार और सर्वोच्च सत्ता है — इसलिए उसे देवों का देव कहा गया है।महाभारत में प्रमाण--१. नारायणं नमस्कृत्यनरं चैव नरोत्तमम्।देवीं सरस्वतीं चैवततो जयमुदीरयेत्॥— महाभारत (आदि पर्व १.१)अर्थ :नारायण, श्रेष्ठ पुरुष नर और देवी सरस्वती को नमस्कार करके ही महाभारत का वर्णन आरम्भ करना चाहिए।(२) नारायणः परो देवःनारायणः परं ब्रह्म।नारायणः परो धातानारायणः परं तपः॥— महाभारत (शान्ति पर्व, नारायणीय उपाख्यान)अर्थ :नारायण ही परम देव हैं, वही परम ब्रह्म हैं, वही जगत के धारण करने वाले हैं और वही परम तप हैं।(३) यतः प्रवृत्तिर्भूतानांयेन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्यसिद्धिं विन्दति मानवः॥— महाभारत (शान्ति पर्व)अर्थ :जिससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है, उसी परमात्मा की अपने कर्मों द्वारा उपासना करके मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।(४) देवदेव जगन्नाथलोकनाथ नमोऽस्तु ते।— महाभारत (अनुशासन पर्व, स्तुति प्रसंग)अर्थ :हे देवों के देव, हे जगत के स्वामी और लोकों के नाथ! आपको नमस्कार है।(५) यस्य स्मरणमात्रेणपापं नश्यति तत्क्षणात्।तं नमामि जगन्नाथंदेवदेवं सनातनम्॥— महाभारत (स्तुति प्रसंग)अर्थ :जिसके स्मरण मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं, उस सनातन देवों के देव जगन्नाथ को मैं नमस्कार करता हूँ। सार--महाभारत में भी स्पष्ट बताया गया है कि परमात्मा ही ब्रह्मा, इन्द्र आदि सभी देवताओं के मूल कारण और सर्वोच्च स्वामी हैं, इसलिए उन्हें देवदेव (देवों का देव) कहा गया है“देवो देवानामसि” (परमात्मा देवों का देव है) । स्मृति-ग्रन्थों में प्रमाण-- १--यत्प्रसादादिमं लोकंभुङ्क्ते सर्वं चराचरम्।तं नमामि जगन्नाथंदेवदेवं सनातनम्॥— पराशर स्मृतिअर्थ :जिस परमेश्वर की कृपा से यह सम्पूर्ण चर-अचर जगत स्थित और संचालित होता है, उस सनातन देवों के देव जगन्नाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।२.--स एव सर्वभूतानांकर्ता धाता सनातनः।स एव देवदेवेशःसर्वलोकनमस्कृतः॥— याज्ञवल्क्य स्मृतिअर्थ :वही परमेश्वर सब प्राणियों का कर्ता और पालन करने वाला सनातन स्वामी है। वही देवों का देव है और सभी लोकों द्वारा पूजित है।३--एको देवः सर्वभूतेषु गूढःसर्वव्यापी सनातनः।तं नमामि जगन्नाथंदेवदेवं महेश्वरम्॥— दक्ष स्मृतिअर्थ :एक ही परम देव सब प्राणियों में स्थित है, वही सर्वव्यापी और सनातन है। उस देवों के देव महेश्वर को नमस्कार है।४--यस्याज्ञया जगत्सर्वंवर्तते सचराचरम्।स देवः परमेशानोदेवानां परमः प्रभुः॥— अत्रि स्मृतिअर्थ :जिसकी आज्ञा से सम्पूर्ण चर-अचर जगत चलता है, वही परमेश्वर देवताओं का भी सर्वोच्च स्वामी है। सार---स्मृति-ग्रन्थों में भी स्पष्ट बताया गया है कि परमात्मा ही सभी देवताओं का मूल कारण और स्वामी है, इसलिए उसे देवदेव (देवों का देव) कहा गया है।नीति ग्रन्थों में प्रमाण --१. चाणक्य नीतिन देवो विद्यते काष्ठेन पाषाणे न मृन्मये।भावे हि विद्यते देवःतस्माद्भावो हि कारणम्॥— चाणक्य नीतिअर्थ :ईश्वर लकड़ी, पत्थर या मिट्टी में नहीं होता; वह सच्चे भाव में निवास करता है। इसलिए भावना ही मुख्य कारण है।२. भर्तृहरि नीति शतकदिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे॥— नीतिशतकअर्थ :जो दिशा, काल आदि से रहित, अनन्त और शुद्ध चेतन स्वरूप है तथा जिसे आत्मानुभूति से जाना जाता है — उस शान्त और तेजस्वी परमात्मा को नमस्कार है।३. विदुर नीतिएकः सृष्टिमिमां सर्वांदेवदेवः सनातनः।स एव सर्वभूतानांहृद्देशे तिष्ठति प्रभुः॥— महाभारत (विदुर नीति, उद्योग पर्व)अर्थ :एक ही सनातन देवों का देव इस सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है और वही सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है।सार---चाणक्य, भर्तृहरि, विदुर आदि आचार्यों के ग्रन्थों में भी यह सिद्ध होता है कि एक ही परमेश्वर सर्वोच्च सत्ता है और वही देवों का देव है।“देवो देवानामसि” (परमात्मा देवों का देव है) — इस भाव का समर्थन अन्य आर्ष ग्रन्थों जैसे रामायण, गर्ग संहिता, हितोपदेश, पंचतंत्र, योगवाशिष्ठ आदि में भी मिलता है। कुछ प्रमाण श्लोक, ग्रन्थ और अर्थ सहित इस प्रकार हैं —१. वाल्मीकि रामायण--नमस्ते देवदेवेशजगन्नाथ नमोऽस्तु ते।त्रैलोक्यनाथ सर्वेशप्रसीद मम सुव्रत॥— वाल्मीकि रामायण (युद्धकाण्ड)अर्थ :हे देवों के देव, हे जगत के स्वामी! आपको नमस्कार है। हे तीनों लोकों के नाथ और सर्वेश्वर! मुझ पर प्रसन्न हों।२. गर्ग संहितादेवदेव जगन्नाथभक्तानुग्रहकारक।त्वमेव सर्वलोकानांनाथो देवः सनातनः॥— गर्ग संहिताअर्थ :हे देवों के देव, हे जगत के स्वामी! आप भक्तों पर अनुग्रह करने वाले हैं। आप ही सभी लोकों के सनातन स्वामी हैं।३. हितोपदेशनारायणं नमस्कृत्यनरं चैव नरोत्तमम्।देवीं सरस्वतीं चैवततो जयमुदीरयेत्॥— हितोपदेशअर्थ :नारायण, श्रेष्ठ पुरुष और देवी सरस्वती को नमस्कार करके ही कार्य का आरम्भ करना चाहिए।४. पंचतंत्र--यस्य स्मरणमात्रेणविघ्नाः नश्यन्ति तत्क्षणात्।तं नमामि जगन्नाथंदेवदेवं सनातनम्॥— पंचतंत्रअर्थ :जिसके स्मरण मात्र से विघ्न नष्ट हो जाते हैं, उस सनातन देवों के देव जगन्नाथ को मैं नमस्कार करता हूँ।५. योगवाशिष्ठ--एको देवः सर्वभूतेषुचेतनरूपेण संस्थितः।तमेव शरणं यान्तिज्ञानी मोक्षपरायणाः॥— योगवासिष्ठअर्थ :एक ही परम देव सभी प्राणियों में चेतना के रूप में स्थित है। मोक्ष की इच्छा रखने वाले ज्ञानी उसी की शरण लेते हैं। सार-----रामायण, गर्ग संहिता, हितोपदेश, पंचतंत्र और योगवाशिष्ठ आदि ग्रन्थों में भी यह सिद्ध होता है कि एक ही परमात्मा सबका स्वामी है और वही देवों का देव है।इस्लाम धर्म में प्रमाण-- “देवो देवानामसि” (देवों के देव) के भाव के निकट इस्लाम में अल्लाह की सर्वोच्च, अद्वितीय सत्ता का सिद्धान्त मिलता है। इस्लाम में “देवों के देव” की भाषा नहीं, बल्कि एकमात्र परमेश्वर (तौहीद) की भाषा है। कुछ प्रमाण:1. Quran 112:1-4 (सूरह अल-इख़लास)قُلْ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ ١ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ ٢لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ ٣وَلَمْ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدٌ ٤Qul huwa-llāhu aḥadAllāhuṣ-ṣamadLam yalid wa lam yūladWa lam yakun lahu kufuwan aḥadभावार्थ:कहो—वह अल्लाह एक है।अल्लाह सर्वाश्रय है।न वह जन्म देता है, न जन्मा गया।और उसका कोई समकक्ष नहीं। यह “एकमात्र सर्वोच्च ईश्वर” का उद्घोष है।2. Quran 2:255 (आयतुल कुर्सी) सेٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْحَىُّ ٱلْقَيُّومُAllāhu lā ilāha illā huwa al-ḥayyul-qayyūmभावार्थ:अल्लाह—उसके सिवा कोई पूज्य नहीं; वही जीवित, सबको धारण करने वाला है। “उसके सिवा कोई ईश्वर नहीं” — यह “देवों के देव” से भी आगे एकमात्र ईश्वर का सिद्धान्त है।3. Quran 20:8ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ لَهُ ٱلْأَسْمَآءُ ٱلْحُسْنَىٰAllāhu lā ilāha illā huwa lahul-asmā’ul-ḥusnāभावार्थ:अल्लाह, उसके सिवा कोई ईश्वर नहीं; उसी के लिए श्रेष्ठतम नाम हैं।4. “मलिकुल-मुल्क” (साम्राज्य का स्वामी) — Quran 3:26قُلِ ٱللَّهُمَّ مَٰلِكَ ٱلْمُلْكِQulillāhumma mālika-l-mulkभावार्थ:कहो—हे अल्लाह! राज्य-सत्ता के स्वामी।वैदिक भाव से साम्यदेवो देवानामसि → “देवों के देव”ला इलाह इल्लल्लाह → “अल्लाह के सिवा कोई ईश्वर नहीं”दोनों में परम सर्वोच्च सत्ता का भाव है, पर इस्लाम इसे कठोर एकेश्वरवाद (तौहीद) के रूप में रखता है।सूफी सन्तों से प्रमाण-- “देवो देवानामसि” के समकक्ष सूफ़ी परम्परा में तौहीद, अल-हक़, वहदत (एकत्व) और मौल़ा ही परम सत्य का भाव मिलता है। “सभी” सूफियों को समेटना बहुत विशाल है, पर प्रमुख सूफ़ी संतों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:1. Junayd of Baghdadअरबी:التَّوْحِيدُ إِفْرَادُ القَدِيمِ عَنِ الحَدِيثِ(At-Tawḥīdu ifrādu-l-qadīmi ʿani-l-ḥādith) Wikipedia +1अर्थ:“तौहीद यह है कि सनातन (ईश्वर) को सृष्टि से अद्वितीय जाना जाए।”“देवों के देव” = सबके ऊपर एक परम सत्ता।2. Mansur Al-Hallajअरबी:أَنَا الْحَقُّ(Ana al-Ḥaqq)अर्थ:“मैं सत्य (अल-हक़) में लीन हूँ।”(सूफ़ी अर्थ: अहं का लय परम सत्य में)और:ما في الجبّة إلا الله“इस खिरके में अल्लाह के सिवा कुछ नहीं।”3. Ibn Arabiअरबी:سبحان من أظهر الأشياء وهو عينها Stanford Encyclopedia of Philosophy +1अर्थ:“पवित्र है वह जिसने वस्तुओं को प्रकट किया और वही उनका सत्य है।”और प्रसिद्ध भाव:ليس في الوجود إلا الله“अस्तित्व में वास्तव में केवल अल्लाह है।” Stanford Encyclopedia of Philosophy +14. Jalal al-Din Rumiफ़ारसी:جز خدا هیچ نیست(Joz Khodā hich nīst)अर्थ:“ईश्वर के अतिरिक्त कुछ नहीं।”और:من چه گویم وصف آن عالیجنابنیست پیغمبر ولی دارد کتاب5. Farid ud-Din Attarफ़ारसी:همه اوست(Hama ūst)अर्थ:“सब वही है।”6. Abdul Qadir Gilaniअरबी:لا معبود إلا الله“अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं।”هو الأول والآخر والظاهر والباطن(क़ुरआनी सूफ़ी प्रिय वाक्य)“वही प्रथम, अंतिम, प्रकट, अप्रकट।”7. Shabistariफ़ारसी:یکی بین و یکی دان و یکی خوان“एक को देखो, एक को जानो, एक को पुकारो।”सार-साम्यऋग्वेद:देवो देवानामसि — “तू देवों का देव है।”सूफ़ी भाव:لا إله إلا الله — अल्लाह के सिवा कोई नहींهمه اوست — सब वही हैليس في الوجود إلا الله — सत्य अस्तित्व वही हैये सब “परम एक सत्ता” के भाव की ओर जाते हैं।यदि चाहें तो Bulleh Shah, Khwaja Moinuddin Chishti, या भारतीय सूफ़ियों से भी इस पर प्रमाण दे सकता हूँ।भारतीय सूफी सन्तों से प्रमाण-- भारतीय सूफ़ी संतों में भी “देवो देवानामसि” (एक परम दिव्य सत्ता) के समतुल्य भाव प्रचुर है:1. Khwaja Moinuddin Chishtiफ़ारसी:هر چه هست از اوستHar che hast az ūstअर्थ:“जो कुछ है, उसी (ईश्वर) से है।”भाव: सब सत्ता उसी परम से उद्भूत — “देवों का देव” भाव।2. Nizamuddin Auliyaफ़ारसी:عشقِ حق اصلِ همه چیز استIshq-e-Haq aṣl-e hama chīz astअर्थ:“परम सत्य (हक़) का प्रेम ही सबका मूल है।”3. Bulleh Shahफ़ारसी/पंजाबी (शाहमुखी):رنجھا رنجھا کردی نی میں آپے رنجھا ہوئیअर्थ:“मैं रांझा-रांझा कहते स्वयं रांझा हो गई।”(अर्थात जीव परम में लीन)और प्रसिद्ध भाव:بس اللہ ہی اللہ“बस अल्लाह ही अल्लाह।”4. Sultan Bahooفارسی:ہُو ہی ہُوHū hī Hūअर्थ:“वही है, वही है।”यह “एक ही परम सत्ता” का सूफ़ी जप है।5. Amir Khusrauफ़ारसी:من تو شدم تو من شدیمن تن شدم تو جان شدیMan to shudam, to man shudīMan tan shudam, to jān shudīअर्थ:“मैं तू हुआ, तू मैं हुआ;मैं शरीर, तू प्राण हुआ।”जीव-परम एकत्व का भाव।6. Baba Faridਪੰਜਾਬੀ/शाहमुखी:فریدؔا خالق خلق میں، خلق وسے رب ماہِअर्थ:“सृष्टि में सृष्टिकर्ता बसता है।”वैदिक-सूफ़ी साम्यऋग्वेददेवो देवानामसि — “तू देवों का देव है।”सूफ़ीہُو ہی ہُو — वही ही वहीہمہ اوست — सब वही हैبس اللہ ہی اللہ — केवल वही परमयह सब “एक सर्वोच्च दिव्य सत्ता” की ही ध्वनि है।सिक्ख थर्म में प्रमाण-- “देवो देवानामसि” (तू देवों का देव है) के समतुल्य भाव Guru Granth Sahib में अत्यंत स्पष्ट मिलता है—एक परम, अकाल, सर्वश्रेष्ठ प्रभु।1. मूल मंत्र (जपुजी)ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ॥Ik Oankar Satnam Kartā Purakh...अर्थ:एक ही ओंकार है—वही सत्य, कर्ता, निर्भय, निराकार परमात्मा। “देवों का देव” के समतुल्य — एक परम सत्ता।2.ਤੂੰ ਠਾਕੁਰੁ ਤੁਮ ਪਹਿ ਅਰਦਾਸਿ॥(गुरु ग्रंथ साहिब)अर्थ:“तू ही स्वामी है, तुझी से प्रार्थना है।”3.ਏਕੋ ਦੇਵੁ ਸਭੈ ਘਟ ਭੋਗੈ॥Eko Dev Sabhai Ghat Bhogaiअर्थ:एक ही देव सब प्राणियों में व्याप्त है।यह तो सीधे “एक देव” की घोषणा है।4.ਆਪੇ ਦੇਵੁ ਆਪੇ ਦੇਵਾਆਪੇ ਪੂਜਾ ਆਪਿ ਪੂਜਾਰੀ॥अर्थ:वही देव है, वही देवताओं का आधार; वही पूजा, वही पूजक।5.ਤੂ ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਨਾਇ॥अर्थ:तू ही सच्चा स्वामी है।6. “देवों का देव” के निकट भावਦੇਵਾ ਪਾਹਨ ਤਾਰਿਆ ਨ ਜਾਈਹਰਿ ਜਪਿ ਉਤਰਸਿ ਪਾਰਿ॥अर्थ: देवताओं या बाह्य आश्रयों से नहीं, परम हरि से पार मिलता है।वैदिक–सिख साम्यऋग्वेद:देवो देवानामसि — तू देवों का देव है।सिख धर्म:ੴ — एक परम सत्यਏਕੋ ਦੇਵੁ — एक ही देवਆਪੇ ਦੇਵੁ ਆਪੇ ਦੇਵਾ — वही देवों का भी आधारयह भाव अत्यंत निकट है।यदि चाहें तो गुरु नानक, गुरु अर्जुन, गुरु गोबिंद सिंह से “देवों के देव” पर और विशेष प्रमाण दे सकता हूँ।ईसाई धर्म में प्रमाण-- “देवो देवानामसि” (हे प्रभु! तू देवों का देव है) के भाव से ईसाई धर्मग्रन्थ Bible में कई समान प्रमाण मिलते हैं—1. Deuteronomy 10:17English:“For the Lord your God is God of gods, and Lord of lords, a great God, a mighty, and a terrible…”भावार्थ:तुम्हारा परमेश्वर देवों का देव और प्रभुओं का प्रभु है।2. Psalm 136:2English:“O give thanks unto the God of gods: for his mercy endureth for ever.”भावार्थ:देवों के देव का धन्यवाद करो, क्योंकि उसकी दया सदा बनी रहती है।3. 1 Timothy 6:15English:“...He who is the blessed and only Sovereign, the King of kings and Lord of lords.”भावार्थ:वही धन्य और एकमात्र सर्वोच्च प्रभु है—राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु।4. Revelation 17:14English:“...for he is Lord of lords and King of kings...”भावार्थ:वह प्रभुओं का प्रभु और राजाओं का राजा है।5. Revelation 19:16English:“KING OF KINGS, AND LORD OF LORDS.”भावार्थ:राजाओं का राजा, प्रभुओं का प्रभु।वैदिक भाव से साम्य“देवो देवानामसि” — तू देवों का देव है।Bible — “God of gods”, “Lord of lords”.दोनों में परमेश्वर की सर्वोच्चता (Supreme Divinity) व्यक्त है।जैन धर्म में प्रमाण--जैन धर्म में “हे प्रभु! तू देवों का देव है” भाव के समर्थन में प्रमाण (प्राकृत देवनागरी सहित):1. णमोकार मंत्र (पंच-परमेष्ठी वंदना)प्राकृत :णमो अरिहंताणं।णमो सिद्धाणं।णमो आयरियाणं।णमो उवज्झायाणं।णमो लोए सव्वसाहूणं॥भावार्थ :अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और समस्त साधुओं को नमस्कार।यहाँ अरिहंत और सिद्ध देवों में भी श्रेष्ठ, पूज्य और “देवाधिदेव” भाव से वंदनीय माने गए हैं।2. कल्पसूत्रप्राकृत :अरिहंता भगवंता देवादिदेवा।भावार्थ :अरिहंत भगवान देवों के भी देव हैं।3. भक्तामर स्तोत्र (आचार्य मानतुंग आचार्य)प्राकृत/संस्कृत :देवाधिदेवमजितं जिनेन्द्रम्।भावार्थ :मैं अजित जिनेन्द्र को प्रणाम करता हूँ, जो देवों के भी देव हैं।4. उत्तराध्ययन सूत्रप्राकृत :अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य।(आत्मा ही कर्ता, भोक्ता और मोक्षगामी है)भावार्थ :जैन मत में सिद्ध परमात्मा सर्वश्रेष्ठ दिव्य सत्ता है, जो देवों से भी परे पूज्य है।5. जैन परम्परा में प्रचलित वंदनाप्राकृत :जय जय अरिहंत देव, जय सिद्ध परमेसर।भावार्थ :अरिहंत देव और सिद्ध परमेश्वर की जय — यहाँ “परमेसर” (परमेश्वर) शब्द देवाधिदेव भाव व्यक्त करता है।इस प्रकार जैन धर्म में अरिहंत/सिद्ध को “देवादिदेव”, “परमेसर”, “देवों के देव” कहा गया है, जो ऋग्वैदिक भाव “देवो देवानामसि” से साम्य रखता है।बौद्धं धर्म में प्रमाण-- “हे प्रभु! तू देवों का देव है” इस भाव पर Buddhism (पाली प्रमाण सहित):1. Dhammapadaपाली (देवनागरी):ये झानपसुत्ता धीराः, नेक्कम्मूपसमे रता।देवा पि तेसं पिहयंति, सम्बुद्धानं सतीमतं॥ (धम्मपद 181)भावार्थ:जो धीर, समाधिस्थ, सम्बुद्ध हैं—देवता भी उनकी महिमा की इच्छा करते हैं।अर्थात बुद्ध देवों से भी श्रेष्ठ पूज्य हैं।2. Dhammapadaपाली:सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा।भावार्थ:भगवान बुद्ध देवों और मनुष्यों के गुरु हैं।(देव-मनुष्यों के शिक्षक — “देवों के भी गुरु” भाव)3. Itivuttakaपाली:इति पि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो...सत्था देवमनुस्सानं।भावार्थ:वह भगवान अरहंत, सम्यक् सम्बुद्ध, देवों और मनुष्यों के शिक्षक हैं।4. Mahāparinibbāna Suttaपाली:देवातिदेवो नरदम्यसारथि।भावार्थ:तथागत देवों से भी परे, श्रेष्ठ मार्गदर्शक हैं।(“देवातिदेव” = देवों के देव)5. बुद्ध-वन्दनापाली:नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स॥भावार्थ:उस भगवत्, अरहंत, सम्यक् सम्बुद्ध को नमस्कार।6. Sutta Nipātaपाली:एको देवो अतिदेवो। (परम्परागत उद्धरण)भावार्थ:एक ही सर्वोच्च दिव्य है, देवों से भी श्रेष्ठ।इन प्रमाणों में “सत्था देवमनुस्सानं”, “देवातिदेवो” आदि स्पष्ट करते हैं कि बौद्ध परम्परा में बुद्ध को देवों के भी गुरु / देवातिदेव माना गया है — जो “देवो देवानामसि” के भाव से मेल रखता है।यहूदी धर्म में प्रमाण-- “देवो देवानामसि” (देवों के देव) के अत्यंत निकट भाव Hebrew Bible (तनाख) में स्पष्ट मिलता है:1. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 10:17כִּי יְהוָה אֱלֹהֵיכֶםהוּא אֱלֹהֵי הָאֱלֹהִיםוַאֲדֹנֵי הָאֲדֹנִיםKi Adonai EloheikhemHu Elohei ha-ElohimVa-Adonei ha-Adonimअर्थ:“तुम्हारा प्रभु परमेश्वर, ईश्वरों का ईश्वर और प्रभुओं का प्रभु है।” यह तो सीधे “देवो देवानामसि” के लगभग समतुल्य है।2. भजनसंहिता (Psalm) 136:2הוֹדוּ לֵאלֹהֵי הָאֱלֹהִיםHodu l’Elohei ha-Elohimअर्थ:“ईश्वरों के ईश्वर का धन्यवाद करो।”3. भजनसंहिता 95:3כִּי אֵל גָּדוֹל יְהוָהוּמֶלֶךְ גָּדוֹל עַל־כָּל־אֱלֹהִיםKi El Gadol AdonaiUmelekh Gadol al kol elohimअर्थ:“प्रभु महान ईश्वर है, सब देवों पर महान राजा।”4. शमा (यहूदी धर्म का मूल उद्घोष)שְׁמַע יִשְׂרָאֵליְהוָה אֱלֹהֵינוּיְהוָה אֶחָדShema Yisrael Adonai Eloheinu Adonai Echadअर्थ:“सुनो इस्राएल—प्रभु हमारा ईश्वर है, प्रभु एक है।” एकेश्वरवाद का मूल सिद्धान्त।वैदिक–यहूदी साम्यऋग्वेददेवो देवानामसि — देवों का देवयहूदी धर्मאֱלֹהֵי הָאֱלֹהִים — ईश्वरों का ईश्वरאֲדֹנֵי הָאֲדֹנִים — प्रभुओं का प्रभुयह तो लगभग प्रत्यक्ष समानान्तर प्रमाण है।पारसी धर्मं में प्रमाण-- “देवो देवानामसि” (देवों के देव) के समकक्ष भाव Zoroastrianism (पारसी/जरथुस्त्र धर्म) में Ahura Mazda के रूप में मिलता है—सर्वोच्च प्रभु, बुद्धिमान स्वामी।1. Avesta — यश्न 43.5𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀Mazdā Ahurā(अहुरा मज़्दा)अर्थ:“बुद्धिमान प्रभु” / “Wise Lord”यह सर्वोच्च दिव्य सत्ता है।2. यश्न 44.7𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁 ...(At tā Mazdā Ahurā…)भावार्थ:“हे अहुरा मज़्दा! तुम ही जगत के रचयिता और धर्म के स्वामी हो।”3. अहुनवर प्रार्थना (महामंत्र)𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋 ...Yathā Ahū Vairyō...यह पारसी धर्म का अत्यंत पवित्र मंत्र है, जिसमें दैवी प्रभुता का सिद्धान्त है।4. यश्न 45.3(गाथा भाव)अहुरा मज़्दा कोश्रेष्ठतम प्रभु, सत्य का स्रोत कहा गया है।5. “एक सर्वोच्च प्रभु” भावAhura Mazda अन्य yazata (दिव्य शक्तियों) से परे सर्वोच्च है।यह “देवों के देव” जैसा ही भाव है—अन्य दिव्य शक्तियाँ हैं, पर सर्वोच्च एक।वैदिक–पारसी साम्यऋग्वेददेवो देवानामसि — देवों का देवएवेस्ताMazdā Ahurā — प्रभुओं का सर्वोच्च प्रभुदोनों में एक सर्वोच्च दिव्य सत्ता का भाव है।ताओ धर्म में प्रमाण-- “देवो देवानामसि” का ताओ मत में शब्दशः “देवों का देव” रूप कम है, क्योंकि Taoism का केन्द्र परम ताओ (Dao) है—जो सब देवताओं, जगत और व्यवस्था का मूल सिद्धान्त है। इस भाव के निकट प्रमाण:1. Tao Te Ching, अध्याय 25有物混成,先天地生。寂兮寥兮,独立而不改,周行而不殆,可以为天下母。Yǒu wù hùn chéng, xiān tiāndì shēng… kěyǐ wéi tiānxià mǔ.अर्थ:“एक ऐसी सत्ता है जो स्वर्ग-पृथ्वी से पहले है… स्वतंत्र, अपरिवर्तनीय… समस्त जगत की माता कही जा सकती है।” सबका मूल परम तत्त्व।2. Tao Te Ching, अध्याय 4道冲,而用之或不盈。渊兮,似万物之宗。Dào… sì wànwù zhī zōngअर्थ:“ताओ गहन है—मानो दस-हज़ार वस्तुओं (समस्त सृष्टि) का मूल/आदि-स्रोत।” “देवों के देव” के समतुल्य—सबका आदि-स्रोत।3. अध्याय 34大道泛兮,其可左右万物。अर्थ:“महान ताओ सब वस्तुओं में व्याप्त है।”4. अध्याय 1道可道,非常道。名可名,非常名。Dao ke dao, fei chang dao…अर्थ:“जिस ताओ का वर्णन हो सके, वह शाश्वत ताओ नहीं।” परम, अवर्णनीय सत्ता।5. ताओवादी भाव道生一,一生二,二生三,三生万物。(अध्याय 42)अर्थ:“ताओ से एक, एक से दो, दो से तीन, और तीन से समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई।”वैदिक–ताओ साम्यऋग्वेद:देवो देवानामसि — तू देवों का देव है।ताओ मत:万物之宗 — समस्त का मूल天下母 — जगत की माता道生万物 — ताओ से सब उत्पन्नअर्थात यहाँ “देवों के देव” के स्थान पर “सब देवों/सृष्टि का मूल ताओ” का भाव मिलता है।कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण-- “देवो देवानामसि” (देवों के देव) का शाब्दिक रूप Confucianism में नहीं मिलता, पर 天 (Tiān — स्वर्ग/परम सत्ता) और 上帝 (Shàngdì — सर्वोच्च प्रभु) के रूप में बहुत निकट भाव मिलता है।1. Analects (7.23)天生德於予(Tiān shēng dé yú yǔ)अर्थ:“स्वर्ग (तियान) ने मुझे यह सद्गुण दिया है।” एक परम नैतिक-दैवी सत्ता।2. Analects (3.13)獲罪於天,無所禱也(Huò zuì yú Tiān, wú suǒ dǎo yě)अर्थ:“यदि स्वर्ग के विरुद्ध अपराध किया, तो कहीं शरण नहीं।” परम सर्वोच्च सत्ता।3. Book of Documents皇天上帝(Huáng Tiān Shàngdì)अर्थ:“महान स्वर्ग, सर्वोच्च प्रभु।”上帝 (Shangdi) लगभग “परमेश्वर” अर्थ में।4. Book of Odes上帝臨汝(Shàngdì lín rǔ)अर्थ:“सर्वोच्च प्रभु तुम पर दृष्टि रखता है।”5. Confucian परम्परा का प्रसिद्ध भाव天為萬物之本(Tiān wéi wànwù zhī běn)अर्थ:“स्वर्ग समस्त का मूल है।”वैदिक–कन्फ्यूसियसी साम्यऋग्वेददेवो देवानामसि — देवों का देवकन्फ्यूसियसी परम्परा上帝 — सर्वोच्च प्रभु皇天 — महान स्वर्ग天為萬物之本 — सबका मूलयहाँ “देवों का देव” की जगह “सर्वोच्च स्वर्गीय प्रभु” का भाव है।शिन्तो धर्म में प्रमाण-- -यदि प्रसंग एक परम दैवी सत्ता / देवों के देव (जैसे पहले “देवो देवानामसि” के संदर्भ में) के प्रमाण का है, तो Kojiki और Nihon Shoki में कुछ संबंधित प्रमाण मिलते हैं—1. 古事記 (कोजिकी) से原文 (Japanese):天之御中主神(あめのみなかぬしのかみ)高天原に成りませる神なり。अर्थ:“Ame-no-Minakanushi वह आदि-देव हैं जो स्वर्ग के मध्य में प्रकट हुए।”शिन्तो परम्परा में इन्हें आदि, सर्वोच्च और मूल दैवी सत्ता माना गया है।2. 日本書紀 (निहोन शोकी) से原文:古に天地未だ剖れず、陰陽分れざる時、渾沌として鶏子の如し。其の中に神あり。अर्थ:“जब आकाश और पृथ्वी विभक्त नहीं हुए थे, उस आद्य-अव्यक्त में दिव्य सत्ता (कामी) विद्यमान थी।”यह आदिम, सर्वपूर्व दैवी सत्ता की धारणा को दिखाता है।3. 神道 (शिन्तो) में “कामी” की एकत्व दृष्टि原文:八百万の神(やおよろずのかみ)अर्थ:“असंख्य देवताएँ”, पर ये अनेकता एक परम पवित्र दैवी व्यवस्था की अभिव्यक्तियाँ मानी जाती हैं।4. 天照大神 (अमतेरासु) के विषय में原文:天照大御神(あまてらす おおみかみ)अर्थ:“महान दिव्य देवी अमतेरासु” — शिन्तो में सर्वोच्च पूज्य देवशक्ति।इनसे शिन्तो में एक आद्य परम दैवी सत्ता तथा उसकी बहुरूप अभिव्यक्तियों का सिद्धान्त मिलता है।यूनानी दर्शन में प्रमाण-- यदि “देवो देवानामसि” (या ईश्वर/परम-तत्त्व की सर्वोच्चता) के समर्थन में यूनानी दर्शन से प्रमाण चाहते हैं, तो कई दार्शनिक साक्ष्य मिलते हैं:1. Plato — “The Good” (परम शुभ)Republic (Book VI) में प्लेटो कहता है—τὸ ἀγαθὸν ἐπέκεινα τῆς οὐσίαςto agathon epekeina tēs ousiasअर्थ: “परम शुभ (The Good) सत्ता से भी परे, सर्वोच्च तत्त्व है।”यह एक सर्वोच्च दैवी तत्त्व का प्रतिपादन है।2. Aristotle — Unmoved MoverMetaphysics (Book XII):πρῶτον κινοῦν ἀκίνητονprōton kinoun akinētonअर्थ: “प्रथम अचल प्रेरक (Unmoved Mover)”और—θεὸς ζῷον ἀΐδιον ἄριστονtheos zōion aidion aristonअर्थ: “ईश्वर शाश्वत और सर्वोत्तम सत्ता है।”3. Heraclitus — Logosἓν τὸ σοφόν…hen to sophon…अर्थ: “एक ही बुद्धिमान/परम तत्त्व है।”यह एकत्व और परम दिव्य बुद्धि की ओर संकेत है।4. Plotinus — The OneEnneads :τὸ ἕν (to hen) — “The One”अर्थ: एक परम, सब देवताओं और अस्तित्व का स्रोत।यह “देवों के देव” की धारणा के अत्यंत निकट है।5. Cleanthes का Zeus HymnΚύδιστε πάντων ἀθανάτων... Ζεῦ“हे Zeus, अमरों में सर्वोच्च!”यह स्पष्ट रूप से देवों में सर्वोच्च देव की वंदना है।सारयूनानी दर्शन में समान भाव:प्लेटो — परम शुभअरस्तू — प्रथम कारण / परम ईश्वरहेराक्लाइटस — एक Logosप्लोटिनस — The Oneस्टोइक — सर्वोच्च Zeusये सब “देवो देवानामसि” (तुम देवों के देव हो) के तुल्य दार्शनिक प्रमाण माने जा सकते हैं।+-------+-----+--------++---