Jism nahi... Izazat chahiye - 2 in Hindi Drama by Anshu Gupta books and stories PDF | जिस्म नहीं… इजाज़त चाहिए - 2

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जिस्म नहीं… इजाज़त चाहिए - 2

उस रात के बाद…
नींद मेरी आँखों से जैसे गायब हो गई थी… 
कमरे में हल्की रोशनी अब भी जल रही थी…
लेकिन मेरे अंदर अजीब सा अंधेरा फैल चुका था…
मैं बेहद बेचैन थी…
बिस्तर पर लेटे-लेटे बार-बार करवटें बदल रही थी…
लेकिन नींद जैसे मुझसे रूठ गई थी…अचानक…
मेरी चूड़ियों की हल्की सी आवाज़ पूरे कमरे में गूंज गई…  वो आवाज़… मुझे बार-बार याद दिला रही थी—
कि अब मैं अकेली नहीं हूँ…
फिर भी… खुद को अकेला महसूस कर रही हूँ…
 हर करवट के साथ…
मेरे मन के सवाल और गहरे होते जा रहे थे…
“आखिर वो मुझसे दूर क्यों है…?”
मैंने हल्के से उसकी तरफ देखा…
वो खिड़की के पास खड़ा था…
पीठ मेरी तरफ…वो मेरे सामने था…
लेकिन फिर भी… मुझसे बहुत दूर लग रहा था…
जैसे हमारे बीच सिर्फ दूरी नहीं…
 कोई अनकहा सच खड़ा हो…
जैसे किसी गहरी सोच में डूबा हुआ हो…
वो मुझसे दूर था…
लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे… वो खुद से भी भाग रहा हो…
मैंने हिम्मत जुटाई…
“आपने ऐसा क्यों कहा…?”
मेरी आवाज़ धीमी थी… लेकिन सवाल भारी…
वो कुछ पल चुप रहा…
फिर धीरे से मेरी तरफ मुड़ा…
उसकी आँखों में कुछ था…
 जो मैं समझ नहीं पा रही थी…
“हर रिश्ता… अपनी रफ्तार से आगे बढ़ना चाहिए…”
उसने शांत स्वर में कहा…
“मैं नहीं चाहता कि तुम किसी भी चीज़ के लिए मजबूर महसूस करो…”
उसकी बातें सुनकर…
एक पल के लिए सुकून मिला…
लेकिन अगले ही पल…
 दिल फिर सवालों से भर गया…
क्योंकि ये सब…
बहुत अलग था…
बहुत ज्यादा अलग…
मैंने हिम्मत करके फिर पूछा—
“लेकिन… क्या मैं आपको पसंद नहीं हूँ…?”
ये कहते हुए…
मेरे दिल की धड़कन जैसे रुक गई…
वो थोड़ा घबरा गया…
“ऐसी बात नहीं है…”
उसने तुरंत कहा…
लेकिन…
 उसकी आँखों में एक झिझक साफ दिख रही थी…
जैसे वो कुछ छुपा रहा हो…
कमरे में फिर खामोशी छा गई…
कुछ देर बाद…
वो धीरे-धीरे मेरे करीब आया…
मैंने सोचा…
शायद अब वो कुछ साफ-साफ बताएगा…
लेकिन…
 वो मेरे पास आकर भी… दूरी बनाए रहा…
“कुछ बातें… वक्त आने पर ही बताई जाती हैं…”
उसने धीमे से कहा…
मेरे अंदर बेचैनी और बढ़ गई…
“मतलब… कोई बात है…?”
मैंने घबराकर पूछा…
इस बार वो चुप नहीं रहा…
उसने गहरी सांस ली…
और मेरी आँखों में देखते हुए कहा—
 “अगर मैं तुम्हें अभी सब कुछ बता दूँ…”
“तो शायद… तुम ये रिश्ता निभा नहीं पाओगी…”
मेरे पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई…
“ऐसा क्या है…?”
मेरी आवाज़ कांप रही थी…
वो कुछ पल मुझे देखता रहा…
फिर धीरे से बोला—
 “मैंने ये शादी… अपनी मर्ज़ी से नहीं की…”
मेरी आँखें फैल गईं…
दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया…
“क्या…?”
मेरे होंठ काँप रहे थे…
लेकिन…
ये तो बस शुरुआत थी…
 क्योंकि उसके अगले शब्द…
मेरी पूरी दुनिया बदलने वाले थे—
“और… जिस वजह से मैंने ये शादी की है…”
उसने नजरें झुका लीं…
 “वो वजह… तुमसे जुड़ी है…”
मैं पूरी तरह सन्न रह गई…
“मुझसे…?”“कुछ बातें… वक्त आने पर ही बताई जाती हैं…”
उसकी ये बात सुनकर…
मेरे दिल में एक अजीब सा डर बैठ गया…
 क्योंकि कभी-कभी…
देर से बताया गया सच…
और भी ज्यादा दर्द देता है…
मेरी आवाज़ अब सिर्फ एक फुसफुसाहट थी…
लेकिन वो कुछ नहीं बोला…
बस खामोश खड़ा रहा…
और उसी खामोशी में…
 मुझे पहली बार एहसास हुआ—
कि ये रिश्ता उतना सीधा नहीं है…
जितना मैंने सोचा था…
और मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था…
उसका ये छुपा हुआ सच…
मुझे किस अंधेरे में ले जाने वाला है…मैं चुप हो गई…
लेकिन मेरे अंदर सवालों का शोर बढ़ता जा रहा था…
 और मुझे लग रहा था…
कि ये खामोशी…
बहुत जल्द तूफान में बदलने वाली है…