अक्सर आपके मन में एक सवाल आता होगा कि आख़िर में क्षत्रिय में क्यों पैदा हुआ? या ब्राह्मण परिवार में क्यों पैदा हुआ उसका आख़िर मुझे क्या फ़ायदा?
इससे तो अच्छा मैं किसी भी जाति में पैदा हो जाता और जो अमीर होती तो उससे मेरा फ़ायदा होता।
ये ही सवाल मैंने अपने पिताजी से पूछा और मेरे पिताजी ने कहा की जाओ किसी गली को पार करो वहाँ तुम जो भी चीज़ दुख देने वाली देखो मुझे आकर बताना।
मैंने अगले दिन वैसा ही किया और मैं एक गली को पार करने चल दिया। उसके कोने पर मुझे एक चूहा मरा हुआ मिला। मैंने वापस जाकर अपने पापा को बताया।
पापा ने बोला मृत्यु इस दुनिया का सबसे बड़ा दुख है क्यों? क्योंकि ये हमारे मोह से जुड़ा होता है। मृत्यु के दो मतलब होते हैं।
पहला, जो मर गया उसके लिए इसका मतलब है कि सभी तरह के दुख और सुख से मुक्ति पा जाना। क्या मर जाने वाले को किसी भी दुख से फ़र्क़ पड़ता है? नहीं। क्योंकि वो इंसान मोह का त्याग कर चुका होता है और उसकी आत्मा प्रकृति में चली गई है।
दूसरा, जो रह गये। उसके लिए इसका मतलब है किसी का हमेशा के लिये इस दुनिया से चले जाना।
अब मुझे बताओ क्या सिर्फ़ किसी के लिए हमेशा के लिए चले जाना ही सिर्फ़ एकमात्र दुनिया का दुख है? नहीं न? हर वो चीज़ जो हम पसंद करते हैं या पाना चाहते हैं उन सबका हमसे चले जाना ही दुख है जो हर दुख कि जननी है। किसी के नंबर कम आने से कॉलेज की सीट चली जाती है। किसी का पैसा चला जाता है। किसी बच्चे के लिए पैसे की कमी से उसका खिलौना चल जाता है।
अब मुझे बताओ इस दुख से निकलने के लिए चारों जाति क्या क्या करती?
क्षत्रिय कहता कि ये मानसिक युद्ध है और मुझे इससे हारना नहीं है बल्कि जीतना है। वो हर सिच्युएशन को एक युद्ध और लड़ाई की तरह देखता और उससे भी एक योद्धा की तरह बाहर आ जाता।
ब्राह्मण कौन है जो या तो ज्ञान पा चुका है या सीख रहा है तो वो क्या कहता कि जो हुआ अच्छा ही हुआ होगा। ज़रूर ईश्वर ने कुछ सिखाने के लिए मेरे जीवन में ये दुख लाए होंगे।
वैश्य यानी व्यापारी क्या कहता? वो कहता क्या होगा एक चीज़ चली गई? दूसरी चीज़ मिल भी तो गई। व्यापारी हमेशा आने पर फ़ॉक्स करता है और जाने वाले से उसको ज़्यादा इम्पोर्टेंस देता है।
लेकिन यहीं पर शूद्र क्या करता? इतिहास में शूद्रों ने सिर्फ़ दुख सहा लेकिन वो उस दुख से आज तक नहीं निकल पाए उसका सिर्फ़ एक कारण था की उन्हें पता ही नहीं था की वो इससे बाहर कैसे निकले? वो सिर्फ़ इसे अपनी नियति समझते हैं और इसलिए दुख उनके जीवन का हिस्सा बनता चला गया।
अब यहीं पर गौतम बुध ने खेल खेला। उन्होंने उन सभी दुखी लोगो को बताया जिनके पास दुख से निकलने की ताक़त या वो सोच नहीं थी। उन्हें बताया कि मेरे पास हर दुख से निकलने का तरीक़ा है। और बुध ने क्या कहा की दुख से छुटकारा चाहिए तो इच्छा शक्ति यानि मोह का त्याग कर दो।
क्या ये बात भागवत गीता में कही बात से अलग है? या भारद्वाज और विश्वामित्र या अगस्त्य मुनि के कहे वचनों से अलग है? ये बातें पहले भी कहीं गई है। लेकिन धीरे धीरे शिक्षा का अधिकार खोने की वजह से ये बातें शूद्र जाति तक पहुँचना बंद हो गई। इसलिए उन्हें ये ज्ञान ही नहीं की ये बातें पहले भी कहीं गई हैं।
मान लो अगर तुम्हें ये बात ना पता होती की ये बात बुद्ध, भारद्वाज ऋषि या अन्य लोगो ने भी कहीं है तो तुम जब ये बात किसी दूसरे को बताते तो क्या कहते?
ये ही न की मेरे पापा ने एक बात बोली थी। बस गौतम बुद्ध ने वो सत्य दूसरे तक पहुँचाया बिना ये बताए कि ये बातें पहले भी हो चुकी है। इससे क्या हुआ ज्ञान लोगो को अट्रैक्ट करता है और वहीं हुआ हिंदू धर्म की बड़ी जाति बुद्ध के अनुयायी बन गए।
पहली बार धर्म में समुदायों का गठन हुआ और ये किसके द्वारा एक क्षत्रिय के द्वारा। एक क्षत्रिय का बुद्ध बनना हिंदू धर्म की दूसरी बड़ी हार थी?
पहली जानते हो कौन सी थी? जैन धर्म का बनना अब अगली वीडियो में हम बात करेंगे जैन धर्म की तब तक के लिये हमसे जुड़े रहिए।