रात का समय था...
टेबल पर गोदान खुली हुई थी...
बाहर कहीं दूर कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी...और भीतर शब्द धीरे-धीरे मनुष्य को खोल रहे थे...
पहले लगता था कि गोदान सिर्फ किसान जीवन का उपन्यास है...
लेकिन जितना पढ़ो...उतना लगता है कि यह सिर्फ होरी की कहानी नहीं...पूरे समाज का आईना है...
होरी खेत में हल चलाता है...
लेकिन असल में वह सिर्फ मिट्टी नहीं जोत रहा...वह व्यवस्था, गरीबी, सम्मान, परिवार और उम्मीदों के बीच पिस रहे मनुष्य का प्रतीक बन जाता है...
एक पंक्ति बार-बार मन में घूमती रही -
“विपन्नता के कारण आत्म-सम्मान उदासीनता में बदल जाता है...”
कितनी गहरी बात है...
गरीबी सिर्फ जेब खाली नहीं करती...
धीरे-धीरे मनुष्य के भीतर की चमक भी कम करने लगती है...
गाँवों में कई बार देखा है...
कोई बुजुर्ग किसान मदद मांगने नहीं जाता...
वह चुप हो जाता है...
क्योंकि अभाव से पहले मनुष्य अपना आत्मसम्मान बचाना चाहता है...
और प्रेमचंद यही पकड़ लेते हैं...
वे आँकड़े नहीं लिखते...
वे मनुष्य के भीतर उतर जाते हैं...
गोदान पढ़ते हुए महसूस होता है कि ग्रामीण समाज सिर्फ संघर्ष नहीं...सहयोग पर भी टिका है...
किसान ऊपर से स्वार्थी दिख सकता है...
लेकिन उसका जीवन मूलतः साझेदारी पर चलता है...
कभी बैल मांगना...
कभी बीज बाँटना...
कभी संकट में साथ खड़ा होना...
गाँव की असली अर्थव्यवस्था सिर्फ पैसों से नहीं चलती...
विश्वास से भी चलती है...
और यह बात आज शहरों में कम दिखती है...
आज लोग फ्लैट के बगल में रहने वाले का नाम तक नहीं जानते...
लेकिन गाँव में कोई बीमार हो जाए तो आधा गाँव पहुँच जाता है...
यही कारण है कि अभाव के बावजूद गाँव पूरी तरह टूटते नहीं...
एक और बात भीतर तक लगी...
“गृहस्थ के लिए गाय केवल संपत्ति नहीं, सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है...”
शहर वाला इसे शायद तुरंत न समझे...
लेकिन गाँवों में पशु सिर्फ पशु नहीं होते...
वे परिवार का हिस्सा बन जाते हैं...
बचपन में मैंने भी लोगों को अपनी गाय से बात करते देखा है...
जैसे वह कोई मनुष्य हो...
क्योंकि ग्रामीण जीवन में प्रकृति, पशु और मनुष्य अलग-अलग नहीं...एक ही चक्र के हिस्से होते हैं...
और शायद आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि हमने इस संबंध को तोड़ दिया...
अब मनुष्य प्रकृति से नहीं...स्क्रीन से जुड़ गया है...
फिर गोदान व्यवस्था की तरफ ले जाता है...
“व्यवस्था व्यक्ति से बड़ी होती है...व्यक्ति उसका गुलाम बन जाता है...”
यह सिर्फ उपन्यास की बात नहीं...आज भी सच है...
कई बार व्यक्ति गलत नहीं होता...
लेकिन व्यवस्था उसे गलत बना देती है...
किसी दफ्तर में देखो...
किसी राजनीति में देखो...
किसी शिक्षा व्यवस्था में देखो...
व्यक्ति सोचता कुछ है...करता कुछ और है...
रायसाहब जैसे पात्र इसी द्वंद्व को दिखाते हैं...
वे संवेदनशील भी दिखते हैं...
लेकिन शोषण से अलग भी नहीं हो पाते...
यहीं प्रेमचंद की ताकत है...
वे किसी को पूरी तरह देवता या राक्षस नहीं बनाते...
क्योंकि वास्तविक जीवन भी ऐसा ही है...
मनुष्य विरोधाभासों का बना होता है...
कई बार जो गरीब है...वह भी किसी कमजोर का शोषण कर देता है...
और कई बार जो अमीर है...उसके भीतर भी करुणा बची रहती है...
जीवन काला-सफेद नहीं...बीच का धूसर रंग है...
मुझे सबसे अधिक जो बात छूती है...वह है सम्मान की लालसा...
गरीबी के बावजूद मनुष्य सम्मान चाहता है...
शायद रोटी के बाद सबसे बड़ी भूख सम्मान की ही होती है...
कोई मजदूर नया कपड़ा इसलिए नहीं पहनता कि फैशन दिखाना है...
वह इसलिए पहनता है क्योंकि वह भी समाज में सिर उठाकर चलना चाहता है...
और यही बात गोदान को अमर बनाती है...
वह किसान की कहानी लिखते-लिखते मनुष्य की कहानी लिख देता है...
कभी-कभी लगता है...
आज तकनीक बढ़ गई...
मोबाइल आ गए...
शहर चमक गए...
लेकिन मनुष्य की मूल पीड़ा अब भी वही है...
सम्मान चाहिए...
सहयोग चाहिए...
सुना जाना चाहिए...
और शायद साहित्य इसलिए कभी पुराना नहीं होता...
क्योंकि समय बदलता है...
लेकिन मनुष्य का भीतर उतना नहीं बदलता...
शायद इसी कारण गोदान पढ़ते हुए कई बार लगता है...
हम उपन्यास नहीं पढ़ रहे...
हम अपने समाज को...अपने घर को...और कहीं न कहीं खुद को पढ़ रहे हैं...